FSH ब्रेन के एक छोटे से हिस्से पिट्यूटरी ग्लैंड (pituitary gland) से बनता है। यह ग्लैंड ब्रेन के बेस पर होती है और इसका साइज़ मटर के दाने जितना होता है, लेकिन इसका काम बहुत बड़ा है।
FSH का काम है अंडाशय यानी ओवरी (ovary) में फॉलिकल्स (follicles) को ग्रो करना। फॉलिकल्स वो छोटी-छोटी थैलियाँ हैं जिनमें एग्स होते हैं। हर महीने FSH इन फॉलिकल्स को सिग्नल देता है कि ग्रो करो, और उनमें से एक फॉलिकल मैच्योर होकर ओव्यूलेशन (ovulation) के दौरान एग रिलीज़ करता है।
यही वजह है कि FSH test फर्टिलिटी चेकअप का एक बेसिक और ज़रूरी हिस्सा माना जाता है।
यह हिस्सा सबसे ज़रूरी है क्योंकि इसे समझने के बाद FSH के नंबर अपने आप समझ आने लगते हैं।
ब्रेन और ओवरी के बीच एक फीडबैक सिस्टम (feedback system) काम करता है। ब्रेन FSH भेजता है और ओवरी जवाब में एस्ट्रडियोल (estradiol) और इनहिबिन B (inhibin B) बनाती है।
अगर ओवरी में काफ़ी हेल्दी फॉलिकल्स हैं, तो थोड़े से FSH पर भी ओवरी अच्छा रिस्पॉन्ड दे देती है। ओवरी एस्ट्राडियोल बनाती है, और ब्रेन को सिग्नल जाता है कि "काम हो रहा है, और FSH भेजने की जरूरत नहीं है" इसीलिए FSH लेवल नॉर्मल रहता है।
लेकिन अगर ओवरी में फॉलिकल्स कम बचे हैं, तो ओवरी का रिस्पॉन्ड कमज़ोर हो जाता है। ब्रेन को लगता है कि सिग्नल पहुँचा नहीं, इसलिए वो और ज़्यादा FSH भेजने लगता है। यही कारण है कि जब ओवेरियन रिज़र्व (ovarian reserve) कम होता है तो FSH लेवल बढ़ जाता है।
सीधे शब्दों में समझें तो ज़्यादा FSH का मतलब है कि ब्रेन ज़ोर से आवाज़ लगा रहा है क्योंकि ओवरी सुन नहीं रही। और ओवरी इसलिए नहीं सुन रही क्योंकि वहाँ एग्स कम बचे हैं।
FSH का लेवल पूरे महीने बदलता रहता है। इसीलिए इसे किसी भी दिन चेक करना सही नहीं होता। डॉक्टर पीरियड साइकल के Day 2 या Day 3 को चुनते हैं क्योंकि यह बेसलाइन टाइम होता है। इस समय तक फॉलिकल्स ग्रो नहीं हुए होते, एस्ट्राडियोल कम होता है, और FSH की सही वैल्यू टेस्ट में आती है।
अगर Day 3 पर ही FSH ज़्यादा दिख रहा है, तो इसका मतलब है कि ब्रेन को ओवरी को एक्टिवेट करने के लिए साइकल की शुरुआत में ही ज़्यादा मेहनत करनी पड़ रही है।
FSH test के साथ डॉक्टर आमतौर पर एस्ट्राडियोल (E2) भी उसी दिन चेक करते हैं। अगर Day 3 पर E2 पहले से ही ज़्यादा (80 pg/mL) से ऊपर है, तो FSH की रीडिंग गलत आ सकती है क्योंकि हाई E2 की वजह से FSH सप्रेस (suppress) यानी दब जाता है। इसीलिए दोनों टेस्ट साथ में देखे जाते हैं।
FSH की रिपोर्ट को समझने के लिए केवल यह देखना काफी नहीं है कि वैल्यू नॉर्मल है या नहीं, बल्कि यह भी जानना ज़रूरी है कि अलग-अलग FSH लेवल ओवरी में बचे एग्स के ओवेरियन रिज़र्व के बारे में क्या बताते हैं।
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Day 3 FSH वैल्यू (mIU/mL) |
मतलब |
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3–7 |
ओवेरियन रिज़र्व अच्छा है |
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7–10 |
ओवेरियन रिज़र्व नॉर्मल रेंज में है |
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10–13 |
ओवेरियन रिज़र्व कम होने का लक्षण |
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13 से अधिक |
ओवेरियन रिज़र्व काफी कम हो सकता है |
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25 से अधिक |
मेनोपॉज़ के करीब होने का लक्षण हो सकता है |
रिपोर्ट को पढ़ते हुए ध्यान रखें कि FSH रिपोर्ट को हमेशा उम्र, AMH, AFC और अन्य फर्टिलिटी टेस्ट के साथ मिलाकर देखा जाता है। सिर्फ FSH रिपोर्ट से फर्टिलिटी के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिलती।
35 साल के बाद FSH धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। यह नॉर्मल प्रोसेस है क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ ओवरी में एग्स की संख्या कम होती जाती है। यह बदलाव हर महिला में होता है, लेकिन इसकी रफ़्तार अलग-अलग हो सकती है।
अगर आपकी उम्र 40 साल से कम है और फिर भी FSH लगातार 25 mIU/mL से ऊपर आ रहा है, पीरियड्स अनियमित या बंद हो गए हैं, तो यह POI (premature ovarian insufficiency) हो सकता है। इसमें ओवरी समय से पहले काम करना बंद करने लगती है।
PCOS वाली महिलाओं में FSH अक्सर नॉर्मल या कम होता है जबकि LH ज़्यादा होता है। FSH और LH का रेशियो भी PCOS के डायग्नोसिस में देखा जाता है। नॉर्मल में FSH और LH करीब-करीब बराबर होते हैं, लेकिन PCOS में LH दोगुना या तीन गुना हो सकता है।
FSH कम होना भी नॉर्मल नहीं है। अगर Day 3 पर FSH 2 mIU/mL से कम आ रहा है, तो इसका मतलब हो सकता है कि पिट्यूटरी ग्लैंड ठीक से काम नहीं कर रही।
हाइपोथैलेमिक एमेनोरिया (hypothalamic amenorrhea) में ब्रेन FSH और LH दोनों बहुत कम बनाता है जिससे ओव्यूलेशन होता ही नहीं। यह कंडीशन बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़, बहुत कम वज़न, या लगातार तनाव की वजह से हो सकती है।
कम FSH का इलाज संभव है। हॉर्मोनल दवाइयों से FSH का लेवल बढ़ाकर ओव्यूलेशन करवाया जा सकता है। FSH test से यह पता लगाना ज़रूरी है कि FSH कम होने की वजह ब्रेन में है या कोई और कारण है।
Fsh टेस्ट सिर्फ़ महिलाओं के लिए नहीं है। पुरुषों में भी FSH बहुत ज़रूरी हॉर्मोन है। पुरुषों में FSH टेस्टिकल्स (testicles) में स्पर्म प्रोडक्शन को रेगुलेट करता है।
FSH बहुत कम होना बताता है कि पिट्यूटरी ग्लैंड से सही सिग्नल नहीं जा रहा। दोनों स्थितियों में फर्टिलिटी पर असर पड़ता है।
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FSH लेवल (mIU/mL) |
मतलब |
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1.5-12.4 |
नॉर्मल रेंज |
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बहुत कम |
पिट्यूटरी ग्लैंड से पर्याप्त सिग्नल नहीं मिल रहा |
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15 से अधिक |
टेस्टिकल्स में स्पर्म बनाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है |
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असामान्य FSH + कम स्पर्म काउंट |
फर्टिलिटी की आगे जांच की जरूरत पड़ सकती है |
FSH test में सबसे ज़रूरी बात यह समझना है कि FSH ब्रेन और ओवरी के बीच की बातचीत का रिज़ल्ट है। ज़्यादा FSH का मतलब है कि ब्रेन को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ रही है, जो ओवेरियन रिज़र्व कम होने का लक्षण है। Day 3 पर सही टाइमिंग से टेस्ट करवाना, E2 के साथ मिलाकर पढ़ना, और AMH के साथ तुलना करना, इन सबको मिलाकर ही फर्टिलिटी की पूरी जानकारी मिलती है।
IVF हो सकता है, लेकिन ट्रीटमेंट प्लान बदलना पड़ सकता है। हाई FSH वाली महिलाओं में दवाइयों की डोज़ ज़्यादा लगती है और एग्स कम मिलते हैं। मिनी IVF या नैचुरल साइकल IVF भी एक ऑप्शन हो सकता है।
नहीं, फ़ास्टिंग की ज़रूरत नहीं है। बस टाइमिंग ज़रूरी है, Day 2 या Day 3 पर सुबह करवाना सबसे अच्छा रहता है।
दोनों टेस्ट से अलग-अलग जानकारी मिलती है। AMH ओवरी में कुल एग रिज़र्व बताता है और किसी भी दिन करवा सकते हैं। FSH ओवरी का रिस्पॉन्स बताता है और Day 3 पर ही सही रीडिंग आती है।
FSH को दवाइयों से आर्टिफिशियली कम किया जा सकता है, लेकिन इससे ओवेरियन रिज़र्व नहीं बढ़ता। असली दिक्कत एग्स की कम संख्या है, FSH तो बस उसका इंडिकेटर है। हेल्दी लाइफस्टाइल और स्ट्रेस कम करने से हॉर्मोन बैलेंस में कुछ मदद मिल सकती है।
हाँ, FSH का लेवल हर साइकल में थोड़ा अलग आ सकता है। इसीलिए एक बार हाई FSH आने पर डॉक्टर अगले महीने दोबारा टेस्ट करवा सकते हैं। अगर लगातार 2 से 3 साइकल में FSH बढ़ा हुआ आए तो इसे कन्फर्म माना जाता है।
FSH और LH दोनों पिट्यूटरी ग्लैंड से बनते हैं। नॉर्मल में दोनों करीब-करीब बराबर होते हैं। अगर LH बहुत ज़्यादा और FSH नॉर्मल है, तो यह PCOS का लक्षण हो सकता है। अगर दोनों बहुत कम हैं, तो पिट्यूटरी ग्लैंड या हाइपोथैलेमस में दिक्कत हो सकती है।