हाइपोथायरॉइडिज़्म और पुरुष बांझपन: वो कड़ी जिस पर बात कम होती है

Last updated: August 10, 2026

Overview

एक बात पर ग़ौर कीजिए।

थायरॉइड का नाम आते ही चर्चा हमेशा एक ही दिशा में मुड़ जाती है - महिला की जाँच, महिला की दवा, महिला के पीरियड्स। भारत में शायद ही कोई महिला हो जो प्रेग्नेंसी की कोशिश कर रही हो और जिसका TSH न जाँचा गया हो।

और पुरुष?

ज़्यादातर मामलों में सीमन एनालिसिस होता है, रिपोर्ट देखी जाती है, और बात आगे बढ़ जाती है। थायरॉइड का ज़िक्र तक नहीं आता।

ये असंतुलन दिलचस्प है, क्योंकि थायरॉइड हार्मोन के रिसेप्टर पुरुष के अंडकोष में भी मौजूद होते हैं - सर्टोली कोशिकाओं में, लेडिग कोशिकाओं में, शुक्राणु बनाने वाली कोशिकाओं में और एपिडिडाइमिस में भी (NCBI, NIH)।

यानी थायरॉइड वहाँ भी काम कर रहा है। सवाल सिर्फ़ ये है कि कितना, और कब मायने रखता है।

थायरॉइड करता क्या है

इसे घर के थर्मोस्टैट की तरह समझिए। वो कमरे में कुछ बनाता नहीं - बस ये तय करता है कि बाक़ी सब किस रफ़्तार से चलेगा।

थायरॉइड हार्मोन शरीर का यही काम करता है। मेटाबॉलिज़्म की गति, कोशिकाओं के बनने-बिगड़ने की रफ़्तार, ऊर्जा का इस्तेमाल - सब उसी सेटिंग पर चलता है।

अब शुक्राणु बनना एक बेहद तेज़ और लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। एक शुक्राणु को बनने में क़रीब ढाई-तीन महीने लगते हैं, और ये फ़ैक्ट्री चौबीसों घंटे चालू रहती है। अगर पूरे शरीर की रफ़्तार धीमी पड़ जाए, तो ये फ़ैक्ट्री भी उससे अछूती नहीं रहती।

रास्ता सिर्फ़ सीधा नहीं है, घुमावदार भी है। जब थायरॉइड हार्मोन कम होता है, तो शरीर में SHBG नाम के प्रोटीन का स्तर और टेस्टोस्टेरोन दोनों घट सकते हैं, जिससे शुक्राणु बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। लंबे समय तक चलने वाली थायरॉइड की कमी पिट्यूटरी से निकलने वाले हार्मोनों को भी दबा सकती है, और इसी वजह से यौन इच्छा में कमी, इरेक्शन की दिक़्क़त और स्खलन में देरी जैसी समस्याएँ भी जुड़ी पाई गई हैं 

सीमन रिपोर्ट पर असर किस तरह दिखता है

यहाँ ईमानदार होना ज़रूरी है, क्योंकि इंटरनेट पर इस विषय पर काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर लिखा जाता है।

इस पर सबसे भरोसेमंद अध्ययनों में से एक - एक प्रोस्पेक्टिव, नियंत्रित अध्ययन - का निष्कर्ष ये रहा कि हाइपोथायरॉइडिज़्म का मानव शुक्राणु-निर्माण पर प्रतिकूल असर पड़ता है, और सबसे स्पष्ट असर शुक्राणु की बनावट (मॉर्फोलॉजी) पर दिखता है। गतिशीलता (मोटिलिटी) भी प्रभावित हो सकती है, हालाँकि इस पर और अध्ययन की ज़रूरत है 

इस वाक्य में जो नहीं कहा गया, वो भी ध्यान देने लायक़ है। ये नहीं कहा गया कि थायरॉइड से शुक्राणुओं की संख्या ख़त्म हो जाती है, या कि ये पुरुष बांझपन का कोई बड़ा कारण है।

तस्वीर इससे कहीं ज़्यादा संतुलित है: थायरॉइड की गड़बड़ी सीमन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है, पर ये अपेक्षाकृत कम मिलने वाला कारण है - और इसीलिए इसे सही क्रम में जाँचना ज़रूरी है, हर किसी में नहीं।

और अब सबसे अच्छी ख़बर

अगर आपकी रिपोर्ट में थायरॉइड की गड़बड़ी निकली है, तो ये पढ़िए।

शोध साहित्य में दर्ज है कि हाइपोथायरॉइडिज़्म और हाइपरथायरॉइडिज़्म - दोनों में सीमन से जुड़े ये बदलाव प्रतिवर्ती (reversible) हैं और थायरॉइड सामान्य हो जाने पर ये ठीक हो जाते हैं (NCBI, NIH)।

पुरुष बांझपन के मामले में ऐसे कारण बहुत कम हैं जिनके बारे में इतनी साफ़ बात कही जा सके। ज़्यादातर कारण या तो अस्पष्ट होते हैं, या इलाज कठिन होता है।

थायरॉइड उन गिने-चुने कारणों में है जिनकी जाँच सस्ती है, इलाज सीधा है, और सुधार की गुंजाइश असली है।

बस एक बात याद रखिए - असर तुरंत नहीं दिखेगा। शुक्राणु बनने के चक्र में ही ढाई-तीन महीने लगते हैं, इसलिए थायरॉइड ठीक होने के बाद भी दोबारा सीमन एनालिसिस में इतना समय देना पड़ता है। दो हफ़्ते बाद रिपोर्ट दोहराकर निराश होने की ज़रूरत नहीं।

एक ज़रूरी चेतावनी: TSH अकेला टेस्ट नहीं है

ये वो हिस्सा है जो लगभग किसी हिंदी लेख में नहीं मिलेगा, और यही सबसे ज़्यादा पैसा और वक़्त बचाता है।

पुरुष बांझपन की जाँच का एक तयशुदा क्रम है। AUA और ASRM की साझा गाइडलाइन के मुताबिक़ FSH और टेस्टोस्टेरोन जैसी हार्मोन जाँच भी पुरुष बांझपन में पहली-पंक्ति की जाँच के तौर पर सुझाई नहीं जाती - ये तब की जाती है जब यौन इच्छा में कमी हो, इरेक्शन की दिक़्क़त हो, शुक्राणुओं की संख्या कम या शून्य हो, अंडकोष छोटे हों, या शारीरिक जाँच में हार्मोनल गड़बड़ी के संकेत मिलें

ग़ौर कीजिए कि पहली-पंक्ति की जाँच क्या है - सीमन एनालिसिस और शारीरिक परीक्षण। बाक़ी सब उसके बाद आता है, और उसी के नतीजे के आधार पर आता है।

तो व्यावहारिक मतलब क्या हुआ?

अगर आपने बिना सीमन एनालिसिस करवाए सीधे थायरॉइड प्रोफ़ाइल करवा ली है, तो आपने क्रम उलट दिया है। रिपोर्ट सामान्य आई तो भी असली सवाल अनुत्तरित रहेगा, और गड़बड़ आई तो भी ये पता नहीं चलेगा कि वही समस्या की जड़ है या एक अलग खोज।

लैब में जाकर एक लंबा पैकेज करवा लेना आसान है। पर बिना क्रम के करवाई गई जाँचें अक्सर जवाब कम, उलझन ज़्यादा देती हैं।

सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज़्म का मामला

यहाँ बहुत सावधानी की ज़रूरत है।

"सबक्लिनिकल" का मतलब है - TSH थोड़ा बढ़ा हुआ है, लेकिन असली थायरॉइड हार्मोन सामान्य सीमा में हैं और लक्षण नहीं हैं। ये स्थिति बहुत आम है।

क्या इससे सीमन की गुणवत्ता पर असर पड़ता है? कुछ अध्ययन ऐसा संकेत देते हैं, कुछ में सम्बंध साफ़ नहीं मिलता। शोध की तस्वीर अभी बँटी हुई है।

इसीलिए यहाँ इस लेख में कोई TSH का आँकड़ा या "नॉर्मल रेंज" जान-बूझकर नहीं दिया जा रहा। हर लैब की सीमा थोड़ी अलग होती है, और सबक्लिनिकल स्थिति में इलाज का फ़ैसला अकेले नंबर से नहीं होता - उम्र, लक्षण, बाक़ी रिपोर्ट और एंटीबॉडी सब मिलाकर देखे जाते हैं।

अपनी रिपोर्ट लेकर इंटरनेट पर नंबर मिलाने से बेहतर है डॉक्टर से ये पूछना: "क्या इस नंबर पर इलाज शुरू करने की ज़रूरत है, या निगरानी काफ़ी है?"

जो बात सबसे ज़्यादा काम की है

उसी नियंत्रित अध्ययन में एक व्यावहारिक सिफ़ारिश भी दर्ज है, और यही शायद इस पूरे लेख की सबसे उपयोगी पंक्ति है।

शोधकर्ताओं ने लिखा कि जिन पुरुषों में शुक्राणु-निर्माण की गड़बड़ी दिखे, उनमें थायरॉइड की जाँच की सलाह दी जाती है - और अगर हाइपोथायरॉइडिज़्म मिले, तो कोई दूसरा इलाज शुरू करने से पहले थायरॉइड हार्मोन के प्रति प्रतिक्रिया का आकलन किया जाना चाहिए 

इसे आसान भाषा में रखिए तो: पहले थायरॉइड ठीक कीजिए, फिर देखिए कि रिपोर्ट कहाँ पहुँचती है - उसके बाद तय कीजिए कि आगे क्या करना है।

ये क्रम बहुत मायने रखता है। सोचिए - अगर थायरॉइड ठीक करने से ही सीमन की रिपोर्ट सुधर जाए, तो जो महँगा और भावनात्मक रूप से थका देने वाला इलाज आप शुरू करने वाले थे, उसकी शायद ज़रूरत ही न पड़े। या पड़े भी, तो बेहतर तैयारी के साथ।

इसीलिए अगर थायरॉइड की गड़बड़ी पकड़ में आई है, तो ये सवाल पूछना पूरी तरह वाजिब है: "क्या हम थायरॉइड ठीक करके तीन महीने बाद रिपोर्ट दोहरा सकते हैं?"

जाँच किन्हें करवानी चाहिए

  • सीमन रिपोर्ट में गड़बड़ी मिली हो, ख़ासकर बनावट या गतिशीलता में
  • लगातार थकान, वज़न बढ़ना, ठंड ज़्यादा लगना, बाल झड़ना, कब्ज़ जैसे लक्षण हों
  • यौन इच्छा में कमी या इरेक्शन की दिक़्क़त हो
  • परिवार में थायरॉइड की बीमारी का इतिहास हो
  • पहले से कोई ऑटोइम्यून स्थिति हो
  • गर्दन में सूजन या गिल्टी महसूस हो

और जिन्हें शायद ज़रूरत नहीं - जिनकी सीमन रिपोर्ट पूरी तरह सामान्य है और कोई लक्षण नहीं है। ऐसे में केवल "पता तो चल जाए" के लिए जाँच करवाना अक्सर ऐसे नंबर सामने ला देता है जिनका क्या करना है, ये किसी को पता नहीं होता।

Frequently Asked Questions

थायरॉइड की दवा से सीमन की रिपोर्ट कब तक सुधरेगी?

क्या थायरॉइड की दवा ख़ुद बांझपन का कारण बनती है?

पत्नी को थायरॉइड है, तो क्या मुझे भी जाँच करवानी चाहिए?

अगर थायरॉइड ठीक होने के बाद भी रिपोर्ट नहीं सुधरी?

क्या दवा जीवन भर लेनी पड़ेगी?

पुरुष बांझपन में थायरॉइड कितना बड़ा कारण है?

Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
© 2026 Indira IVF Hospital Limited. All Rights Reserved. T&C Apply | Privacy Policy| *Disclaimer