सारांश (Overview)
अगर आपको PMOS है, तो आपने शायद PCOS या PCOD के बारे में पहले सुना होगा। PMOS को पहले आमतौर पर PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (Polycystic Ovary Syndrome) या PCOD यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी डिजीज (Polycystic Ovary Disease) कहा जाता था।
अब इसे PMOS यानी पॉलीसिस्टिक मॉर्फोलॉजी ओवेरियन सिंड्रोम (Polycystic Morphology Ovarian Syndrome) के नाम से भी जाना जाता है। नाम अलग हो सकता है, लेकिन इससे जुड़ी समस्याएं जैसे पीरियड्स का अनियमित होना, ओव्यूलेशन में दिक्कत, वज़न बढ़ना और हार्मोन में बदलाव अभी भी देखने को मिलते हैं।
PMOS अक्सर इंसुलिन रेज़िस्टेंस (insulin resistance) की वजह से होता है। इसमें शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन पर पहले जैसा असर नहीं दिखातीं, इसलिए शरीर ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। इसका असर हार्मोन बैलेंस और ओव्यूलेशन पर पड़ सकता है। यही वजह है कि PMOS को कंट्रोल करने में डाइट और लाइफस्टाइल का बड़ा रोल होता है।
सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज़, अच्छी नींद और तनाव को कंट्रोल करना इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधारने और PMOS के लक्षणों को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है। इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि PMOS में क्या खाना चाहिए, किन चीज़ों से बचना चाहिए, एक्सरसाइज़, नींद और तनाव की क्या भूमिका है और कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
इसे समझने के लिए PMOS की जड़ को समझना ज़रूरी है। इसमें शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन की बात पर पहले जैसा जवाब नहीं देतीं। इसकी भरपाई के लिए शरीर ज़्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। इंसुलिन रेज़िस्टेंस PMOS की एक बड़ी पहचान है और यह मोटी व दुबली, दोनों तरह की महिलाओं में देखी जाती है।
यह बढ़ा हुआ इंसुलिन ओवरी को ज़्यादा पुरुष हार्मोन बनाने का सिग्नल देता है। इससे ओव्यूलेशन यानी एग निकलने की प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है और पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं। यही चेन PMOS के ज़्यादातर लक्षणों के पीछे होती है।
अब यहीं लाइफस्टाइल काम आती है। सही डाइट और रोज़ की एक्सरसाइज़ सीधे इंसुलिन पर असर डालती है और शरीर की इंसुलिन के प्रति सेंसिटिविटी बढ़ाती है। जब इंसुलिन कंट्रोल में आता है, तो हार्मोन भी बेहतर होते हैं और पीरियड्स व दूसरे लक्षणों में सुधार दिखता है। इसीलिए लाइफस्टाइल में बदलाव को PMOS के इलाज में पहला कदम माना जाता है।
वज़न का रोल भी बड़ा है। अगर आपका वज़न ज़्यादा है, तो थोड़ा वज़न घटाना भी बड़ा फ़र्क लाता है। स्टडीज़ बताती हैं कि शरीर का सिर्फ़ 5 से 10 प्रतिशत वज़न कम करना भी ओव्यूलेशन को वापस पटरी पर लाने, पुरुष हार्मोन घटाने और इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधारने में मदद करता है।
यहां एक चक्र समझ लीजिए। बढ़ा हुआ इंसुलिन वज़न बढ़ाना आसान और घटाना मुश्किल कर देता है, और बढ़ा हुआ वज़न इंसुलिन रेज़िस्टेंस को और गहरा कर देता है। लाइफस्टाइल की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह इस चक्र को कहीं ना कहीं से तोड़ देती है। एक बार डाइट और एक्सरसाइज़ से इंसुलिन घटता है, तो वज़न कम करना आसान होता है, और घटता वज़न इंसुलिन को और बेहतर करता है।
PMOS की डाइट का एक सीधा नियम है, ऐसा खाना चुनें जो ब्लड शुगर को धीरे बढ़ाए, तेज़ी से नहीं। इसे कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (low glycemic index) वाला खाना कहते हैं।
ग्लाइसेमिक इंडेक्स बताता है कि कोई चीज़ ब्लड शुगर को कितनी तेज़ी से बढ़ाती है। सफेद चावल, मैदा और चीनी शुगर को तेज़ी से बढ़ाते हैं। साबुत अनाज, दाल और ज़्यादातर सब्ज़ियां इसे धीरे बढ़ाती हैं। रिव्यू स्टडीज़ में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली, मेडिटेरेनियन और सूजन घटाने वाली डाइट को PMOS में इंसुलिन सेंसिटिविटी और हार्मोन बैलेंस सुधारने से जोड़ा गया है। अब देखते हैं कि आपकी डाइट में कौन कौन सी चीज़ें होनी चाहिए।
क्या खाएं: ओट्स, जौ, बाजरा, रागी, साबुत गेहूं, ब्राउन राइस, क्विनोआ।
इनमें फाइबर ज्यादा होता है, जो खाना धीरे पचाने और ब्लड शुगर को धीरे बढ़ाने में मदद करता है। इससे इंसुलिन को कंट्रोल में रखने में भी मदद मिल सकती है।
क्या खाएं: मूंग दाल, मसूर दाल, अरहर दाल, चना, राजमा, लोबिया, काला चना।
इनमें प्रोटीन और फाइबर दोनों होते हैं। इससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है और खाने के बाद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ने से रोकने में मदद मिलती है।
क्या खाएं: अंडे, दही, पनीर, टोफू, सोया, चिकन और मछली।
प्रोटीन पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करता है। हर मील में प्रोटीन शामिल करने से भूख और मीठा खाने की क्रेविंग को कंट्रोल करना आसान हो सकता है।
क्या खाएं: पालक, मेथी, ब्रोकोली, फूलगोभी, भिंडी, लौकी, तोरी, पत्तागोभी, शिमला मिर्च और खीरा।
इनमें फाइबर और दूसरे जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं और कैलोरी कम होती है। इसलिए ये वज़न और ब्लड शुगर को कंट्रोल करने वाली डाइट का अच्छा हिस्सा हैं।
क्या खाएं: सेब, अमरूद, संतरा, नाशपाती, कीवी, जामुन, स्ट्रॉबेरी और पपीता।
फलों में फाइबर और दूसरे पोषक तत्व होते हैं। साबुत फल जूस से बेहतर विकल्प हैं, क्योंकि इनमें फाइबर बना रहता है और शुगर धीरे शरीर में जाती है।
क्या खाएं: बादाम, अखरोट, मूंगफली, पिस्ता, कद्दू के बीज, चिया सीड्स, अलसी और सूरजमुखी के बीज।
इनसे हेल्दी फैट, फाइबर और कुछ जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं। ये पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करते हैं। हालांकि, इनमें कैलोरी ज्यादा होती है, इसलिए मात्रा का ध्यान रखें।
क्या खाएं: ऑलिव ऑयल, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, अखरोट, बादाम, अलसी और चिया सीड्स।
इनसे मिलने वाली अनसैचुरेटेड फैट संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकती है। दूसरी तरफ ट्रांस फैट और बहुत ज्यादा तला हुआ खाना कम रखना बेहतर है।
क्या खाएं: सादा दही, दूध, पनीर और बिना चीनी वाला ग्रीक योगर्ट।
इनसे प्रोटीन और कैल्शियम मिलता है। फ्लेवर्ड योगर्ट या ज्यादा चीनी वाले डेयरी प्रोडक्ट की जगह सादा दही या बिना चीनी वाला विकल्प लेना बेहतर है।
क्या लें: पानी, नींबू पानी बिना चीनी, सादा छाछ, ग्रीन टी और बिना चीनी की चाय या कॉफी।
इनसे रोज़ की डाइट में अतिरिक्त चीनी और कैलोरी कम करने में मदद मिलती है। कोल्ड ड्रिंक, मीठे पैकेज्ड जूस और ज्यादा चीनी वाली चाय या कॉफी को कम रखना बेहतर है।
क्या खाएं | उदाहरण | PMOS में फ़ायदा |
|---|---|---|
साबुत अनाज | जौ, बाजरा, ओट्स, साबुत गेहूं | फाइबर से शुगर धीरे बढ़ती है |
प्रोटीन | दाल, अंडे, दही, पनीर, सोया | भूख और शुगर स्थिर रहती है |
हरी सब्ज़ियां | पालक, मेथी, दूसरी हरी सब्ज़ियां | कम कैलोरी, सूजन में कमी |
कम मीठे फल | जामुन, सेब, अमरूद | फाइबर के साथ धीमी शुगर |
हेल्दी फैट्स | मेवे, बीज, अलसी, ऑलिव ऑयल | सूजन कम, हार्मोन बैलेंस |
एक आसान तरीका यह है कि थाली का आधा हिस्सा सब्ज़ियां, एक चौथाई प्रोटीन और एक चौथाई साबुत अनाज रखें। खाने की शुरुआत सलाद या सब्ज़ी से करें और अनाज बाद में लें, इससे शुगर धीरे बढ़ती है।
PMOS में डाइट का फोकस सिर्फ कैलोरी कम करने पर नहीं होना चाहिए। शरीर को ऐसे पोषक तत्व भी चाहिए जो इंसुलिन, हार्मोन और ओवरऑल मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करें। कुछ पोषक तत्व PMOS में खास तौर पर चर्चा में रहते हैं। इन्हें आप इन खाद्य पदार्थों से डाइट में शामिल कर सकती हैं।
कहां से मिलेगा?
क्यों जरूरी है?
इनोसिटॉल शरीर में इंसुलिन के सिग्नल को बेहतर तरीके से काम करने में मदद कर सकता है। PMOS में इंसुलिन रेजिस्टेंस एक आम समस्या हो सकती है, इसलिए इनोसिटॉल का पर्याप्त सेवन फायदेमंद हो सकता है। कुछ महिलाओं में यह ओव्यूलेशन और पीरियड्स को नियमित करने में भी मदद कर सकता है।
हालांकि, खाने से मिलने वाले इनोसिटॉल और इनोसिटॉल सप्लीमेंट को एक जैसा नहीं समझना चाहिए। सप्लीमेंट की जरूरत है या नहीं, यह डॉक्टर आपकी स्थिति के हिसाब से तय कर सकते हैं।
कहां से मिलेगा?
क्यों जरूरी है?
विटामिन D शरीर में हड्डियों के स्वास्थ्य के साथ-साथ कई दूसरे कामों में भी भूमिका निभाता है। PMOS वाली महिलाओं में विटामिन D की कमी देखी जा सकती है। इसलिए अगर शरीर में इसकी कमी है, तो सही लेवल तक लाना ओवरऑल हेल्थ के लिए जरूरी है।
विटामिन D की कमी है या नहीं, यह ब्लड टेस्ट से पता चलता है। बिना टेस्ट के हाई-डोज विटामिन D सप्लीमेंट लेना सही नहीं है।
कहां से मिलेगा?
क्यों जरूरी है?
ओमेगा-3 फैटी एसिड शरीर के लिए जरूरी हेल्दी फैट हैं। ये हार्ट और मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करते हैं। PMOS में मेटाबॉलिक हेल्थ पर ध्यान देना जरूरी होता है, इसलिए ओमेगा-3 वाले खाद्य पदार्थ संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं।
अगर आप मछली नहीं खाती हैं, तो अलसी, चिया और अखरोट जैसे पौधों से मिलने वाले स्रोत डाइट में शामिल किए जा सकते हैं।
कहां से मिलेगा?
क्यों जरूरी है?
मैग्नीशियम शरीर में ग्लूकोज और इंसुलिन के मेटाबॉलिज्म समेत कई प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। इसलिए पर्याप्त मैग्नीशियम लेना संतुलित डाइट का हिस्सा होना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले मैग्नीशियम से भरपूर खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना बेहतर तरीका है।
कहां से मिलेगा?
क्यों जरूरी है?
फोलेट शरीर में नई कोशिकाएं बनाने और डीएनए से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए जरूरी है। खासकर अगर आप प्रेग्नेंसी प्लान कर रही हैं, तो फोलेट का पर्याप्त सेवन महत्वपूर्ण हो जाता है। इस समय डॉक्टर जरूरत के अनुसार फोलिक एसिड सप्लीमेंट की सलाह भी दे सकते हैं।
कहां से मिलेगा?
क्यों जरूरी है?
जिंक इम्यून सिस्टम, सेल्स की ग्रोथ और शरीर की कई जरूरी प्रक्रियाओं में काम करता है। PMOS के लिए जिंक को कोई खास इलाज नहीं माना जाता, लेकिन इसकी पर्याप्त मात्रा एक संतुलित डाइट का हिस्सा है।
यहां यह समझना जरूरी है कि इन पोषक तत्वों में से किसी एक को ज्यादा लेने से PMOS ठीक नहीं होता। फूड से पर्याप्त पोषण लेना प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर किसी पोषक तत्व की कमी है या डॉक्टर को सप्लीमेंट की जरूरत लगती है, तभी उसे सप्लीमेंट के रूप में लेना चाहिए।
पोषक तत्व | क्या खायें? | शरीर में क्यों जरूरी है? |
इनोसिटॉल | संतरा, खरबूजा, बीन्स, चना, ब्राउन राइस, नट्स | इंसुलिन सिग्नलिंग को सपोर्ट करता है और कुछ महिलाओं में ओव्यूलेशन को सहारा दे सकता है |
विटामिन D | धूप, अंडे की जर्दी, फैटी फिश, फोर्टिफाइड दूध | हड्डियों और ओवरऑल मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए जरूरी |
ओमेगा-3 | फैटी एसिड फैटी फिश, अलसी, चिया, अखरोट | हार्ट और मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करता है |
मैग्नीशियम | बादाम, कद्दू के बीज, चिया, साबुत अनाज, पालक, दालें | ग्लूकोज और इंसुलिन मेटाबॉलिज्म समेत कई शरीर की प्रक्रियाओं में भूमिका |
फोलेट | पालक, मेथी, चना, राजमा, मसूर, एवोकाडो | नई कोशिकाओं और डीएनए से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए जरूरी |
जिंक | कद्दू के बीज, तिल, चना, दालें, काजू, अंडे | इम्यून सिस्टम और शरीर की कई जरूरी प्रक्रियाओं में भूमिका |
PMOS में क्या खाना चाहिए, यह समझना जितना जरूरी है, उतना ही यह समझना भी जरूरी है कि किन चीज़ों को कम करना चाहिए। खासकर ऐसी चीज़ें जिनमें चीनी, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और अनहेल्दी फैट ज्यादा होते हैं। ये चीज़ें ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकती हैं और शरीर पर मेटाबॉलिक दबाव बढ़ा सकती हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि आपको अपनी पसंद की हर चीज़ पूरी तरह छोड़नी होगी। कभी-कभार मिठाई या पसंद का खाना खाना ठीक है। दिक्कत तब होती है जब ऐसी चीज़ें रोज़ की डाइट का हिस्सा बन जाती हैं। इसलिए इनकी मात्रा और बार-बार खाने की आदत, दोनों पर ध्यान देना जरूरी है।
मिठाई, केक, बिस्किट, पेस्ट्री और दूसरी चीनी वाली चीज़ों में ऊपर से मिलायी गयी चीनी यानी एडेड शुगर (added sugar) ज्यादा होती है। इनमें फाइबर कम होने की वजह से इनका असर ब्लड शुगर पर जल्दी हो सकता है।
PMOS में इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या हो सकती है, इसलिए रोज़ाना ज्यादा मीठा खाना ब्लड शुगर और इंसुलिन को मैनेज करना मुश्किल बना सकता है।
क्या कम करें?
इन चीज़ों को पूरी तरह बंद करने के बजाय रोज़ खाने की आदत से बचें और मात्रा छोटी रखें।
मैदे से बनी चीज़ों में आमतौर पर फाइबर कम होता है। इसलिए इनसे मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट जल्दी पच सकते हैं और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है।
क्या कम करें?
इनकी जगह ओट्स, जौ, बाजरा, रागी, साबुत गेहूं और दूसरे साबुत अनाज जैसे ज्यादा फाइबर वाले विकल्प ले सकती हैं।
चिप्स, नमकीन, इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड स्नैक्स और फास्ट फूड में अक्सर ज्यादा नमक, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, कैलोरी और अनहेल्दी फैट हो सकते हैं। इन्हें बार-बार खाने से संतुलित डाइट बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
क्या कम करें?
इनकी जगह घर का बना खाना, भुना चना, मखाना, मेवे या साबुत फल जैसे विकल्प रख सकती हैं।
कोल्ड ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, एनर्जी ड्रिंक और ज्यादा चीनी वाली चाय या कॉफी से आपको काफी मात्रा में चीनी मिल सकती है, लेकिन पेट भरने वाला फाइबर बहुत कम मिलता है। इसलिए इनसे मिलने वाली कैलोरी भी आसानी से ज्यादा हो सकती है।
क्या कम करें?
साबुत फल जूस से बेहतर विकल्प हैं क्योंकि इनमें फाइबर मौजूद रहता है। पीने के लिए पानी, बिना चीनी का नींबू पानी, सादा छाछ या बिना चीनी की चाय-कॉफी ले सकती हैं।
समोसा, कचौरी, पकौड़े, पूरी और दूसरी डीप-फ्राइड चीज़ों में कैलोरी और फैट ज्यादा हो सकते हैं। इन्हें बार-बार खाने से ओवरऑल डाइट की क्वालिटी प्रभावित हो सकती है।
क्या कम करें?
इनकी जगह भुने, उबले या कम तेल में बने विकल्प लेना बेहतर है।
कम करें | इसकी जगह लें |
मिठाई, केक, पेस्ट्री | साबुत फल या थोड़ी मात्रा में मेवे |
वाइट ब्रेड | साबुत गेहूं की ब्रेड |
चिप्स और पैकेज्ड नमकीन | भुने हुए चना, मखाना या ड्राई फ्रूट्स |
कोल्ड ड्रिंक | पानी या बिना चीनी का नींबू पानी |
पैकेज्ड जूस | साबुत फल |
मीठी चाय या कॉफी | बिना चीनी की चाय या कॉफी |
समोसा, कचौरी, पकौड़े | भुना या कम तेल में बना नाश्ता |
इंस्टेंट नूडल्स और फास्ट फूड | घर का बना संतुलित खाना |
डाइट के साथ रोज़ की एक्सरसाइज़ भी PMOS को मैनेज करने में मदद करती है। एक्सरसाइज़ करने से मांसपेशियां ब्लड शुगर का बेहतर इस्तेमाल करने लगती हैं, जिससे इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार हो सकता है। कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, दोनों तरह की एक्सरसाइज़ PMOS में इंसुलिन सेंसिटिविटी, वज़न और हार्मोन से जुड़े कुछ बदलावों में मदद कर सकती हैं।
एक्सरसाइज़ का फायदा सिर्फ़ वज़न कम होने के बाद ही नहीं मिलता। आप नियमित एक्सरसाइज़ शुरू करती हैं, तो वज़न में बड़ा बदलाव दिखने से पहले भी शरीर का ब्लड शुगर और इंसुलिन को इस्तेमाल करने का तरीका बेहतर हो सकता है। इसलिए PMOS में एक्सरसाइज़ को सिर्फ़ वज़न घटाने का तरीका नहीं समझना चाहिए। यह मेटाबॉलिक हेल्थ को बेहतर रखने का भी एक जरूरी हिस्सा है।
कार्डियो एक्सरसाइज़ से शरीर एक्टिव रहता है, कैलोरी खर्च होती है और इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर करने में मदद मिल सकती है। आप अपनी सुविधा और फिटनेस के हिसाब से इनमें से कोई भी एक्सरसाइज़ चुन सकती हैं।
स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से मांसपेशियां मजबूत होती हैं। मांसपेशियां ब्लड शुगर का इस्तेमाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए PMOS में कार्डियो के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी फायदेमंद हो सकती है।
स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के लिए आप नीचे दी गयी एक्सरसाइज़ कर सकती हैं।
इसे हफ़्ते में दो से तीन बार अपनी रूटीन में शामिल किया जा सकता है।
योग शरीर को एक्टिव रखने के साथ लचीलापन और स्ट्रेस मैनेज करने में मदद कर सकता है। अगर आप हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज़ नहीं करना चाहती हैं, तो योग को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाया जा सकता है।
योग के विकल्प नीचे दिए जा रहे हैं।
पिलाटेस में कोर मसल्स को मजबूत करने और शरीर की मूवमेंट को बेहतर करने पर ध्यान दिया जाता है। यह हल्की से मध्यम इंटेंसिटी वाली एक्सरसाइज़ के रूप में की जा सकती है।
पिलाटेस में नीचे दी गयी एक्सरसाइज़ शामिल हो सकती हैं।
HIIT यानी हाई-इंटेंसिटी इंटरवल ट्रेनिंग (High-Intensity Interval Training) में थोड़े समय के लिए तेज़ एक्सरसाइज़ करने के बाद आराम या कम इंटेंसिटी वाली एक्सरसाइज़ की जाती है। यह कम समय में शरीर को ज्यादा एक्टिव करने का तरीका है।
HIIT के उदाहरण निम्नलिखित हैं।
अगर आपने अभी एक्सरसाइज़ शुरू की है, तो HIIT सीधे शुरू करने के बजाय धीरे-धीरे इंटेंसिटी बढ़ाना बेहतर है।
अगर जिम जाना या तय एक्सरसाइज़ करना मुश्किल लगता है, तो रोज़ पैदल चलना भी अच्छी शुरुआत है। खासकर खाने के बाद कुछ देर टहलना ब्लड शुगर को मैनेज करने में मदद कर सकता है।
रोज़ की एक्टिविटी बढ़ाने के आसान तरीके नीचे दिए जा रहे हैं।
सबसे जरूरी बात यह है कि आप ऐसी एक्सरसाइज़ चुनें जिसे लंबे समय तक नियमित रूप से कर सकें। रोज़ थोड़ा एक्टिव रहना, कभी-कभार बहुत ज्यादा एक्सरसाइज़ करने से बेहतर है।
एक्सरसाइज़ | फ़ायदा | कितनी बार |
|---|---|---|
कार्डियो | इंसुलिन सेंसिटिविटी और वज़न में सुधार | हफ़्ते के ज़्यादातर दिन |
स्ट्रेंथ ट्रेनिंग | मांसपेशी मज़बूत, शुगर का बेहतर इस्तेमाल | हफ़्ते में दो से तीन बार |
पैदल चलना | आसान शुरुआत, खाने के बाद शुगर कंट्रोल | रोज़ |
PMOS में सिर्फ़ डाइट और एक्सरसाइज़ पर ध्यान देना ही काफी नहीं है। नींद और तनाव भी आपकी मेटाबॉलिक हेल्थ और रोज़ की लाइफस्टाइल का हिस्सा हैं। इसलिए इन्हें भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
रोज़ कम या खराब नींद होने पर शरीर में इंसुलिन रेज़िस्टेंस और भूख से जुड़े हार्मोन प्रभावित हो सकते हैं। इससे भूख बढ़ सकती है और वज़न कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए रोज़ करीब सात से आठ घंटे की अच्छी नींद लेने की कोशिश करें।
PMOS में कुछ महिलाओं को नींद के दौरान सांस रुकने जैसी समस्या भी हो सकती है। अगर आपको लगातार थकान रहती है, रात में नींद बार-बार टूटती है या सोने के बाद भी आराम महसूस नहीं होता, तो डॉक्टर से बात करना बेहतर है।
लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव शरीर पर असर डाल सकता है। तनाव के दौरान शरीर में कुछ ऐसे हार्मोन बढ़ते हैं जो ब्लड शुगर और वज़न को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा, तनाव में अक्सर मीठा या ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाने का मन करता है, जिससे डाइट को कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है।
तनाव कम करने के लिए आपको कोई बहुत मुश्किल तरीका अपनाने की जरूरत नहीं है। अपनी रोज़ की लाइफ में कुछ आसान चीज़ें शामिल कर सकती हैं।
नीचे दिए जा रहे आसान तरीकों से आप स्ट्रेस यानी तनाव कम कर सकती हैं।
PMOS के साथ रहना कई बार भावनात्मक रूप से भी मुश्किल हो सकता है। अनियमित पीरियड्स, वज़न बढ़ना या प्रेगनेंसी में देरी जैसी चीज़ों को लेकर चिंता होना सामान्य है। इसलिए सिर्फ़ शरीर में होने वाले बदलावों पर ही ध्यान न दें, अपने तनाव और भावनात्मक स्थिति का भी ध्यान रखें।
जरूरत पड़ने पर परिवार का साथ लें और डॉक्टर या काउंसलर से बात करें। PMOS को मैनेज करने में छोटे-छोटे बदलाव भी काम आते हैं। इसलिए एक साथ सब कुछ बदलने के बजाय धीरे-धीरे अपनी नींद, डाइट, एक्सरसाइज़ और तनाव पर ध्यान देना शुरू करें।
लाइफस्टाइल को सही रखना PMOS को मैनेज करने का एक अहम हिस्सा है, लेकिन हर महिला के लिए सिर्फ़ लाइफस्टाइल सही कर लेना ही काफी नहीं होता।
सही डाइट, नियमित एक्सरसाइज़ और वज़न को कंट्रोल में रखने से कई महिलाओं में PMOS से जुड़े लक्षणों में सुधार हो सकता है। पीरियड्स पहले से ज्यादा नियमित हो सकते हैं और इंसुलिन रेज़िस्टेंस जैसी मेटाबॉलिक समस्याओं को मैनेज करने में भी मदद मिल सकती है। इसलिए लाइफस्टाइल में बदलाव PMOS के मैनेजमेंट का आधार माना जाता है।
लेकिन PMOS हर महिला में एक जैसा नहीं होता। किसी महिला में लक्षण ज्यादा हो सकते हैं, तो किसी को प्रेगनेंसी के लिए एग्ज़ामिनेशन या ओव्यूलेशन से जुड़ी मदद की जरूरत हो सकती है। ऐसे मामलों में डॉक्टर लाइफस्टाइल के साथ दवाएं या दूसरी ट्रीटमेंट भी दे सकते हैं। यहां यह समझना जरूरी है कि दवाएं और लाइफस्टाइल एक-दूसरे की जगह नहीं लेते। दोनों को आपकी जरूरत के हिसाब से साथ में इस्तेमाल किया जा सकता है।
लाइफस्टाइल में बदलाव का असर कुछ दिनों में दिखना जरूरी नहीं है। डाइट, एक्सरसाइज़, नींद और वज़न में किए गए बदलावों का असर धीरे-धीरे कुछ हफ़्तों से महीनों में दिखाई दे सकता है।
इसलिए शुरुआत में तुरंत नतीजे न दिखें, तो हिम्मत न हारें। सबसे जरूरी बात यह है कि आप ऐसे बदलाव करें जिन्हें लंबे समय तक अपनी रोज़ की जिंदगी में बनाए रख सकें। PMOS को मैनेज करने में किसी एक बदलाव से ज्यादा नियमितता और लंबे समय तक सही आदतों को बनाए रखना मायने रखता है।
PMOS में हर लक्षण के लिए तुरंत डॉक्टर के पास जाना जरूरी नहीं है, लेकिन कुछ बदलावों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। अगर पीरियड्स लगातार अनियमित हैं, हार्मोन से जुड़े लक्षण बढ़ रहे हैं या आप प्रेगनेंसी की कोशिश कर रही हैं, तो समय पर डॉक्टर से मिलना बेहतर है।
इन स्थितियों में डॉक्टर से मिलें।
डॉक्टर आपके लक्षण, जरूरी टेस्ट और दूसरी जांचों को देखकर आपके लिए सही प्लान तय करते हैं। जरूरत के हिसाब से लाइफस्टाइल में बदलाव, दवाएं या दूसरी ट्रीटमेंट दी जा सकती हैं। समय पर सही सलाह मिलने से PMOS को बेहतर तरीके से मैनेज करना आसान हो जाता है।
PMOS को पूरी तरह सही करना भले मुश्किल हो, लेकिन इसे कंट्रोल करना पूरी तरह मुमकिन है, और इसमें डाइट व लाइफस्टाइल का रोल सबसे बड़ा है। इसकी जड़ में अक्सर इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है, और सही डाइट, रोज़ की एक्सरसाइज़, अच्छी नींद व कम तनाव सीधे इसी पर काम करते हैं।
आसान शब्दों में इसका मतलब है, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स और फाइबर वाला खाना चुनना, मीठी व प्रोसेस्ड चीज़ें कम करना, रोज़ किसी ना किसी रूप में एक्टिव रहना, और नींद व मन का ध्यान रखना। अगर आपका वज़न ज़्यादा है, तो थोड़ा वज़न घटाना भी बड़ा फ़र्क लाता है। ये बदलाव धीरे लग सकते हैं, लेकिन नियमित रूप से करने पर इनका असर टिकता है।
आखिर में यह याद रखें कि PMOS हर महिला में अलग होता है, इसलिए एक ही सलाह सबके लिए सही नहीं होती। अगर आपको PMOS है या इसके लक्षण दिख रहे हैं, तो फर्टिलिटी या गायनी डॉक्टर से बात करके अपनी स्थिति के हिसाब से सही प्लान बनाना सबसे अच्छा कदम है।