IVF सिर्फ एग और स्पर्म (sperm) को लैब में मिलाना नहीं है, इसके पीछे बहुत एडवांस्ड टेक्नोलॉजी काम करती है। पिछले कुछ सालों में IVF टेक्नोलॉजी में काफ़ी बदलाव आया है जिसकी वजह से सक्सेस रेट पहले से बेहतर हो रहा है। IVF technology in hindi आर्टिकल में हम उन सभी नयी टेक्नोलॉजी को समझेंगे जो आज IVF लैब्स में इस्तेमाल हो रही हैं।
आईसीएसआई (ICSI) यानी इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (Intracytoplasmic Sperm Injection) IVF की एक एडवांस तकनीक है, जिसे खासतौर पर तब इस्तेमाल किया जाता है जब स्पर्म से जुड़ी समस्या हो।
इसमें प्रक्रिया थोड़ी अलग होती है। यहाँ एग और स्पर्म को खुद से फर्टिलाइजेशन करने के लिए नहीं छोड़ा जाता, बल्कि एम्ब्रियोलॉजिस्ट माइक्रोस्कोप की मदद से सबसे अच्छा स्पर्म चुनते हैं और उसे एक बहुत पतली सुई से सीधे एग के अंदर डाल दिया जाता है। यानी फर्टिलाइजेशन को पूरी तरह एम्ब्रियोलॉजिस्ट के कंट्रोल में होता है।
ICSI की सलाह तब दी जाती है जब पुरुष का-
पहले जिन मामलों में पुरुष निःसंतानता की वजह से कंसीव करना मुश्किल होता था, ICSI टेक्नोलॉजी की सहायता से वैसे पुरुष भी पिता बन पा रहे हैं।
ICSI में फर्टिलाइजेशन रेट लगभग 70 से 80% तक रहता है। इस पूरी प्रक्रिया में एम्ब्रियोलॉजिस्ट एक खास मशीन माइक्रोमैनिपुलेटर (micromanipulator) का इस्तेमाल करते हैं, जो हाथ से कहीं ज़्यादा सटीक (precise) मूवमेंट देती है। इसी वजह से सही स्पर्म को चुनकर एग के अंदर डालना संभव हो पाता है।
पहले भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) को चेक करने के लिए उसे इनक्यूबेटर (incubator) से बार-बार बाहर निकालना पड़ता था, जिससे टेम्परेचर और एनवायरनमेंट में बदलाव आता था। लेकिन अब टाइम-लैप्स टेक्नोलॉजी की वजह से यह समस्या नहीं आती।
इस टेक्नोलॉजी में इनक्यूबेटर के अंदर ही कैमरा लगा होता है जो हर कुछ मिनट में एम्ब्रीओ की फ़ोटो लेता है। इससे एम्ब्रियोलॉजिस्ट बिना एम्ब्रीओ को डिस्टर्ब किए उसकी ग्रोथ का पूरा डेटा देख सकते हैं और सबसे अच्छी क्वालिटी के एम्ब्रीओ चुन लेते है।
टाइम-लैप्स इन्क्यूबेटर से यह भी पता चलता है कि एम्ब्रीओ की सेल डिवीज़न सही समय पर हो रही है या नहीं। अगर कोई एम्ब्रीओ बहुत तेज़ या बहुत धीरे डिवाइड हो रहा है तो यह लक्षण कमज़ोर क्वालिटी का हो सकता है।
यह भी पढ़ें : AMH टेस्ट कब करना चाहिए?
प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (preimplantation genetic testing) मतलब PGT में एम्ब्रीओ के कुछ सेल्स (cells) लेकर उनकी जेनेटिक जाँच की जाती है। इससे ट्रांसफर से पहले ही पता चल जाता है कि एम्ब्रीओ क्रोमोज़ोमली (chromosomally) नॉर्मल है या नहीं।
PGT तीन टाइप का होता है।
पीजीटी टेक्नोलॉजी (PGT Technology) खासकर उन महिलाओं के काम आती है जिनकी उम्र 35 साल से ज़्यादा है, इसके अलावा उन केसों में जहाँ IVF बार बार फ़ैल हो जा रहा है या फिर बार-बार मिसकैरेज होने पर भी पीजीटी बहुत काम आती है।
PGT टेक्नोलॉजी की मदद से सिंगल एम्ब्रीओ ट्रांसफर (SET) करने आसान हो जाता है क्योंकि डॉक्टर को पता होता है कि ट्रांसफर किया जा रहा एम्ब्रीओ जेनेटिकली नॉर्मल है। इससे ट्विन्स प्रेगनेंसी का रिस्क भी कम होता है।
यह भी पढ़ें : बीटा एचसीजी क्या है?
प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (preimplantation genetic testing) मतलब PGT में एम्ब्रीओ के कुछ सेल्स (cells) लेकर उनकी जेनेटिक जाँच की जाती है। इससे ट्रांसफर से पहले ही पता चल जाता है कि एम्ब्रीओ क्रोमोज़ोमली (chromosomally) नॉर्मल है या नहीं।
PGT तीन टाइप का होता है।
पीजीटी टेक्नोलॉजी (PGT Technology) खासकर उन महिलाओं के काम आती है जिनकी उम्र 35 साल से ज़्यादा है, इसके अलावा उन केसों में जहाँ IVF बार बार फ़ैल हो जा रहा है या फिर बार-बार मिसकैरेज होने पर भी पीजीटी बहुत काम आती है।
PGT टेक्नोलॉजी की मदद से सिंगल एम्ब्रीओ ट्रांसफर (SET) करने आसान हो जाता है क्योंकि डॉक्टर को पता होता है कि ट्रांसफर किया जा रहा एम्ब्रीओ जेनेटिकली नॉर्मल है। इससे ट्विन्स प्रेगनेंसी का रिस्क भी कम होता है।
यह भी पढ़ें : बीटा एचसीजी क्या है?
AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) अब IVF लैब्स में भी इस्तेमाल हो रही है। AI पर आधारित सॉफ़्टवेयर टाइम-लैप्स इमेजेज़ को जाँच कर बता सकता है कि कौन सा एम्ब्रीओ सबसे ज़्यादा इम्प्लांट होने के चांस रखता है।
ERICA, iDAScore, और DeepEmbryo जैसे AI टूल्स एम्ब्रीओ की ग्रोथ पैटर्न, सेल डिवीज़न टाइमिंग, और शेप को एनालाइज करते हैं। कुछ ऐसे रिजल्ट मिले हैं जहाँ AI ने एम्ब्रीओ चुनने का काम एम्ब्रियोलॉजिस्ट से अच्छा किया है।
हालांकि यह टेक्नोलॉजी अभी बहुत ज्यादा चलन में नहीं है, लेकिन कुछ क्लीनिक में AI एम्ब्रीओ सिलेक्शन की सुविधा उपलब्ध है।
वेट्रिफ़िकेशन (vitrification) एक अल्ट्रा-फ़ास्ट फ्रीज़िंग टेक्नोलॉजी (Ultra-fast Freezing technology) है, जिसने एम्ब्रीओ और एग्स को स्टोर करने का तरीका बदल दिया है। पुराने स्लो-फ्रीज़िंग मेथड में सेल्स में बर्फ़ के क्रिस्टल बन जाते थे जो सेल्स को नुकसान पहुँचता था लेकिन अब वेट्रिफ़िकेशन में इतनी तेजी से सेल फ्रीज़ किया जाता है कि क्रिस्टल बनते ही नहीं।
इस टेक्नोलॉजी की वजह से फ्रोज़न एम्ब्रीओ ट्रांसफर (FET) के रिजल्ट फ्रेश ट्रांसफर जितने ही अच्छे, बल्कि कई केसों में फ्रेश ट्रांसफर से भी अच्छे रिजल्ट आ रहे हैं। एग फ्रीज़िंग भी अब पहले की तुलना में ज्यादा भरोसेमंद हो गई है जिससे महिलाएं अपनी फ़र्टिलिटी को भविष्य के लिए बचाये रख सकती हैं।
वेट्रिफ़िकेशन की सर्वाइवल रेट (survival rate) 95% से ज़्यादा है, मतलब फ्रीज़ किए गए ज़्यादातर एम्ब्रीओ थॉइंग यानी फ्रीज़ कंडीशन से सामान्य टेम्परेचर पर लाने के बाद हेल्दी रहते हैं। इसकी टेक्नोलॉजी की वजह से "freeze-all" एप्रोच संभव हुयी है। इसमें सारे एम्ब्रीओ फ्रीज़ कर दिए जाते हैं और ट्रांसफर तभी किया जाता है जब आपका शरीर आगे के प्रोसेस के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका हो।
एम्ब्रीओ के बाहर एक प्रोटेक्टिव परत यानी लेयर होती है जिसे ज़ोना पेलुसिडा (zona pellucida) कहते हैं। इम्प्लांटेशन होने के लिए एम्ब्रीओ को इस लेयर से बाहर निकलना पड़ता है। कुछ मामलों में यह लेयर ज़्यादा मोटी या सख्त हो जाती है, जिससे एम्ब्रीओ का बाहर आना मुश्किल हो सकता है।
लेज़र असिस्टेड हैचिंग (LAH) में इस लेयर पर लेज़र की मदद से एक छोटा सा रास्ता बनाया जाता है, ताकि एम्ब्रीओ आसानी से बाहर आ सके। यह प्रोसेस कुछ सेकंड में पूरा हो जाता है और सही तरीके से करने पर एम्ब्रीओ को नुकसान नहीं पहुँचता।
यह टेक्नोलॉजी खासतौर पर ज़्यादा उम्र, फ्रोज़न एम्ब्रीओ ट्रांसफर या बार-बार IVF फेल होने वाले केसों में मददगार हो सकती है।
ERA यानी एंडोमेट्रियल रिसेप्टिविटी एनालिसिस (endometrial receptivity analysis) एक जेनेटिक टेस्ट है जो बताता है कि किसी महिला का गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) एम्ब्रीओ इम्प्लांटेशन के लिए सबसे ज़्यादा तैयार कब होता है। करीब 30% महिलाओं की इम्प्लांटेशन विंडो स्टैंडर्ड टाइमिंग से अलग होती है।
ERA टेस्ट में एंडोमेट्रियम की बायोप्सी करके उसके जीन एक्सप्रेशन को देखा जाता है, जिससे यह पता चलता है कि एम्ब्रीओ ट्रांसफर का सही समय क्या होना चाहिए।
ERA टेस्ट खासकर उन मामलों में उपयोगी है जहाँ बार-बार इम्प्लांटेशन फेल हो रहा हो। इस टेस्ट से सही इम्प्लांटेशन विंडो पता चलने पर महिला के यूट्रस की तैयारी के हिसाब से ही एम्ब्रीओ ट्रांसफर किया जाता है, जिससे IVF सक्सेस रेट बढ़ सकता है।
IVF technology in hindi को समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि आप जान सकें कि आपके ट्रीटमेंट में कौन सी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल हो रही है और क्यों। ICSI, टाइम-लैप्स, PGT, AI, वेट्रिफ़िकेशन, लेज़र हैचिंग, और ERA जैसी टेक्नोलॉजीज़ ने IVF के सक्सेस रेट को काफ़ी बेहतर बनाया है। अपने डॉक्टर से पूछें कि आपके केस में कौन सी टेक्नोलॉजी फ़ायदेमंद हो सकती है।