मायोमा क्या होता है? (Myoma meaning in Hindi)

Last updated: April 23, 2026

सारांश (Overview)

कई महिलाओं के गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) में गाँठ होती है और उन्हें इसका कोई खास लक्षण यानी सिम्पटम (symptom) भी दिखाई नहीं देता। इस गाँठ के बारे में अक्सर तब पता चलता है जब किसी वजह से अल्ट्रासाउंड करवाती हैं। ऐसी गाँठों को मायोमा (Myoma) कहते हैं। मायोमा यूट्रस की मसल्स में बनने वाली एक बिनाइन (benign) गाँठ होती है। ऐसी गाँठ से डरने की जरुरत नहीं होती, क्योंकि यह कैंसर वाली गांठ नहीं होती। इसे फाइब्रॉइड (Fibroid) या लेयोमायोमा (Leiomyoma) भी कहा जाता है। तीनों नाम इसी एक तरह की गाँठ के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। मायोमा काफी कॉमन होता है और कई महिलाओं में यह गाँठ पायी जाती है, लेकिन ज़्यादातर मामलों में कोई लक्षण नहीं दिखते, इसलिए इसका पता भी नहीं चलता।

इस आर्टिकल में आप Myoma meaning in hindi समझेंगे, कि यह क्या होता है, कैसे बनता है, इसके कितने प्रकार होते हैं, और किन परिस्थितियों में इसके इलाज की जरूरत पड़ती है।

Myoma, फाइब्रॉइड, लेयोमायोमा में क्या अंतर है?

मायोमा, फाइब्रॉइड और लेयोमायोमा ये तीनों एक ही कंडीशन के अलग अलग नाम हैं। डॉक्टर आमतौर पर Myoma या Leiomyoma टर्म का इस्तेमाल करते हैं, और यही शब्द अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में भी लिखा होता है। वहीं आम बोलचाल में इसे फाइब्रॉइड भी कहते हैं।

अब समझते हैं कि यह बनता कहाँ से है। मायोमा यूट्रस यानी बच्चेदानी की मसल्स, जिसे स्मूद मसल (smooth muscle) कहते हैं, उससे बनता है। यह एक सॉलिड गाँठ होती है, सिस्ट की तरह नहीं होती। सिस्ट में अंदर फ्लूइड भरा होता है, जबकि मायोमा में मसल और टिश्यू होता है।

एक जरूरी बात यहाँ समझना जरूरी है कि ज़्यादातर मायोमा बिनाइन (benign) होते हैं, यानी यह कैंसर वाली गाँठ नहीं होती। बहुत ही कम मामलों में यह कैंसर से जुड़ा होता है, इसलिए सामान्य स्थिति में इससे डरने की जरूरत नहीं होती।

मायोमा के टाइप कौन-कौन से हैं? (Types of Myoma)

मायोमा के अलग-अलग टाइप होते हैं और यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह यूट्रस में कहाँ बना है। हर टाइप का असर थोड़ा अलग होता है।

इंट्राम्यूरल (Intramural) मायोमा

यह यूट्रस की दीवार के अंदर बनता है और सबसे कॉमन टाइप है। लगभग 55 से 60% केस में यही पाया जाता है। अगर इसका साइज़ बड़ा हो जाए तो हैवी पीरियड्स और पेट में दबाव महसूस हो सकता है।

सबम्यूकोसल (Submucosal) मायोमा

यह यूट्रस की अंदरूनी लाइनिंग की तरफ़ बढ़ता है। यह कम पाया जाता है, लेकिन फर्टिलिटी पर इसका असर ज्यादा हो सकता है। यह एम्ब्रीओ के इम्प्लांटेशन (embryo implantation) में रुकावट डाल सकता है और हैवी ब्लीडिंग का कारण बन सकता है।

सबसीरोसल (Subserosal) मायोमा

यह यूट्रस की बाहरी सतह पर बनता है। 30 से 35% केस में मिलता है। यह आमतौर पर फर्टिलिटी पर असर नहीं डालता, लेकिन अगर बड़ा हो जाये तो ब्लैडर या आँत पर प्रेशर डाल सकता है।

पेडंक्युलेटेड (Pedunculated) मायोमा

पेडंक्युलेटेड मायोमा एक पतले डंठल के सहारे यूट्रस से जुड़ा होता है। यह कम देखने को मिलता है, लेकिन अगर इसका डंठल मुड़ जाए, तो अचानक तेज दर्द हो सकता है। ऐसी स्थिति को टॉर्शन (torsion) कहा जाता है, जो एक मेडिकल इमरजेंसी होती है और इसमें तुरंत हॉस्पिटल जाना जरूरी होता है।

कैसे पहचानें कि आपको मायोमा है ?

मायोमा होने पर हर महिला को कोई परेशानी हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कई महिलाओं में मायोमा होने के बावजूद कोई सिम्पटम (symptom) दिखाई नहीं देता और उन्हें इसके बारे में पता भी नहीं चलता।

लेकिन कुछ मामलों में इसके सिम्पटम सामने आ सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि मायोमा का साइज कितना है और वह कहाँ बना है।

  • पीरियड्स के दौरान बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग होना, और कभी-कभी खून के थक्के यानी क्लॉट्स (clots) आना।
  • पीरियड्स का 7 दिन से ज्यादा चलना या बार-बार आना।
  • पेट के निचले हिस्से में भारीपन या दबाव महसूस होना।
  • बार-बार यूरिन आना, खासकर जब मायोमा ब्लैडर पर दबाव डाल रहा हो।
  • कमर या पैरों में दर्द महसूस होना।
  • कब्ज़ की समस्या होना, अगर मायोमा आँत पर दबाव बना रहा हो।
  • संबंध (intercourse) के दौरान दर्द या असहजता महसूस होना।

अगर ब्लीडिंग लंबे समय तक ज्यादा होती रहे, तो शरीर में आयरन की कमी यानी एनीमिया (anemia) भी हो सकता है। ऐसे में थकान, चक्कर आना या साँस फूलना जैसे लक्षण दिख सकते हैं।

Myoma के साइज़ से क्या फ़र्क पड़ता है?

मायोमा का साइज हर महिला में अलग हो सकता है। यह बहुत छोटा, मटर के दाने जितना भी हो सकता है और कुछ मामलों में काफी बड़ा भी हो सकता है। साइज का सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि सिम्पटम होंगे या नहीं और आगे क्या ट्रीटमेंट करना है।

  • छोटा मायोमा (3 सेमी से कम): आमतौर पर कोई खास सिम्पटम नहीं देता। ऐसी स्थिति में डॉक्टर इसे सिर्फ़ मॉनिटर करते हैं, यानी समय-समय पर अल्ट्रासाउंड से इसकी जांच की जाती है।
  • मीडियम मायोमा (3 से 5 सेमी): इसमें कुछ सिम्पटम दिखाई दे सकते हैं, खासकर जब यह यूट्रस की अंदर की परत के पास हो। कई मामलों में इसे दवाइयों से मैनेज किया जा सकता है। फर्टिलिटी पर इसका असर मायोमा की लोकेशन और टाइप पर निर्भर करता है।
  • बड़ा मायोमा (5 सेमी से ज़्यादा): इसके सिम्पटम्स ज़्यादा क्लियर होते हैं। इसे दवाइयों से कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है इसीलिए सर्जरी का ऑप्शन भी रखा जाता है। साथ ही, फर्टिलिटी पर इसके असर की जाँच ज़रूरी होती है।

मायोमा का पता कैसे चलता है?

मायोमा ज़्यादातर रूटीन अल्ट्रासाउंड या चेकअप के दौरान अचानक पकड़ में आता है।

  • TVS अल्ट्रासाउंड: यह सबसे कॉमन और रिलायबल टेस्ट है। ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड से मायोमा की साइज़, लोकेशन, नंबर और टाइप सब पता चल जाता है।
  • MRI: अगर सर्जरी प्लान हो रही हो तो MRI से डिटेल्ड मैप बनाया जाता है। इसमें मायोमा की एग्ज़ैक्ट पोज़िशन क्लियर दिखती है।
  • हिस्टेरोस्कोपी (Hysteroscopy): सबम्यूकोसल मायोमा को कन्फर्म करने के लिए हिस्टेरोस्कोपी की जाती है, जिसमें एक पतली कैमरा ट्यूब से यूट्रस के अंदर देखा जाता है।
  • पेल्विक एग्ज़ाम (Pelvic Examination): डॉक्टर पेट और पेल्विक एरिया को छूकर यूट्रस का साइज़ और शेप चेक करते हैं। बड़ा मायोमा इसी तरह पकड़ में आ जाता है।

रिपोर्ट में Myoma लिखा आए तो क्या करें?

  • "Intramural Myoma of 2.5 cm": मतलब यूट्रस की दीवार में 2.5 सेमी का मायोमा है। छोटा है, टेंशन की बात नहीं, बस मॉनिटरिंग काफ़ी है।
  • "Submucosal Fibroid with Endometrial Distortion": मतलब मायोमा यूट्रस की अंदरूनी लाइनिंग को बिगाड़ रहा है यानी डिस्टॉर्ट (distort) कर रहा है। यह फर्टिलिटी पर असर डाल सकता है इसीलिए डॉक्टर से डिटेल में बात करें।
  • "Multiple Myomata": मतलब है कि एक से ज्यादा मायोमा हैं। ऐसे में उनकी संख्या, साइज और लोकेशन समझना जरूरी होता है।
  • "Subserosal Fibroid — no mass effect": मायोमा यूट्रस की बाहरी सतह पर है और किसी आसपास के अंग पर दबाव नहीं डाल रहा। ऐसी स्थिति में अक्सर इलाज की जरूरत नहीं होती।

हर मायोमा का इलाज जरूरी नहीं होता। इसलिए रिपोर्ट को सही तरह से समझकर डॉक्टर की सलाह लेना सबसे सही कदम होता है।

Myoma का ट्रीटमेंट कैसे होता है?

मायोमा का ट्रीटमेंट इस बात पर डिपेंड करता है कि यह कितना बड़ा है, कहाँ है, सिम्पटम्स कैसे हैं, और आपका प्रेगनेंसी को लेकर क्या प्लान है।

  • कोई ट्रीटमेंट नहीं (Wait and Watch): अगर मायोमा छोटा है और कोई सिम्पटम नहीं है, तो सिर्फ़ रेगुलर मॉनिटरिंग काफ़ी है। साल में एक-दो बार अल्ट्रासाउंड करवाएँ।
  • दवाइयाँ: हैवी ब्लीडिंग और दर्द को कंट्रोल करने के लिए दवाइयाँ दी जाती हैं। हॉर्मोनल मेडिसिन मायोमा की ग्रोथ धीमी कर सकती हैं लेकिन मायोमा पूरी तरह खत्म नहीं करतीं।
  • मायोमेक्टमी (Myomectomy): सर्जरी से मायोमा को हटा दिया जाता है लेकिन यूट्रस बचाया जाता है। यह उन महिलाओं के लिए बेस्ट ऑप्शन है जो आगे माँ बनना चाहती हैं। इसके लिए लैप्रोस्कोपी या हिस्टेरोस्कोपी हो सकती है।
  • यूटरिन आर्टरी एम्बोलाइज़ेशन UAE (Uterine Artery Embolization): इसमें मायोमा की ब्लड सप्लाई बंद कर दी जाती है। ब्लड सप्लाई रुकने से मायोमा सिकुड़ जाता है। सर्जरी से बचना हो तो यह ऑप्शन है।
  • हिस्टेरेक्टमी (Hysterectomy): इसमें पूरा यूट्रस हटा दिया जाता है, लेकिन यह तभी किया जाता है जब और कोई ऑप्शन काम न करे या प्रेगनेंसी की प्लानिंग न हो। इसके बाद मायोमा दोबारा नहीं बनता।

मायोमा और फर्टिलिटी: क्या प्रेगनेंसी पर असर पड़ता है?

ज़्यादातर महिलाएँ मायोमा होते हुए भी नेचुरली कंसीव कर लेती हैं। मायोमा वाली सिर्फ़ 2 से 3 परसेंट महिलाओं में ही यह इनफर्टिलिटी का मुख्य कारण होता है। लेकिन कुछ केसेस में फ़र्टिलिटी पर असर पड़ सकता है

  • सबम्यूकोसल मायोमा सबसे ज़्यादा प्रॉब्लम करता है, ऐसे में इसे हिस्टेरोस्कोपी से हटाने की सलाह दी जाती है।
  • इंट्राम्यूरल मायोमा अगर 5 सेमी से बड़ा हो तो यूट्रस की शेप बदल सकता है। इसका ट्रीटमेंट साइज़ और लोकेशन पर डिपेंड करता है।
  • सबसीरोसल मायोमा आमतौर पर फर्टिलिटी को प्रभावित नहीं करता। ज़्यादातर केस में इसे छोड़ दिया जाता है।

अगर मायोमा हटाने के बाद भी 6 से 12 महीने में प्रेगनेंसी न हो, तो IVF एक अच्छा ऑप्शन है। IVF से पहले डॉक्टर TVS से चेक करते हैं कि यूट्रस की लाइनिंग और कैविटी नॉर्मल है या नहीं।

निष्कर्ष (Conclusion)

मायोमा, फाइब्रॉइड, और लेयोमायोमा तीनों एक ही गांठ के तीन नाम हैं। यह यूट्रस में बनने वाली गाँठ है जो बहुत कॉमन है, यह कैंसर की गांठ नहीं होती।

हर मायोमा को ट्रीटमेंट की ज़रूरत नहीं होती। छोटे और बिना सिम्पटम वाले मायोमा को सिर्फ़ मॉनिटर करना काफ़ी है। सिम्पटम्स हों तो दवाइयों से राहत मिल सकती है। फर्टिलिटी पर असर हो रहा हो तो मायोमेक्टमी बेस्ट ऑप्शन है।

रिपोर्ट में myoma लिखा देखकर पैनिक न करें। डॉक्टर से मिलें, साइज़ और टाइप समझें, और फिर तय करें कि आगे क्या करना है। अगर भविष्य में माँ बनने का प्लान है तो सही गाइडेंस लें, ज़्यादातर महिलाएँ मायोमा के बाद भी माँ बन पाती हैं।

Myoma के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

मायोमा और फाइब्रॉइड में क्या फ़र्क है?

क्या मायोमा कैंसर बन सकता है?

क्या मायोमा अपने आप ठीक हो सकता है?

मायोमा होने पर प्रेगनेंसी पॉसिबल है?

मायोमा का साइज़ कितना होने पर ट्रीटमेंट ज़रूरी है?

क्या मायोमा दोबारा हो सकता है?

Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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