कई महिलाओं के गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) में गाँठ होती है और उन्हें इसका कोई खास लक्षण यानी सिम्पटम (symptom) भी दिखाई नहीं देता। इस गाँठ के बारे में अक्सर तब पता चलता है जब किसी वजह से अल्ट्रासाउंड करवाती हैं। ऐसी गाँठों को मायोमा (Myoma) कहते हैं। मायोमा यूट्रस की मसल्स में बनने वाली एक बिनाइन (benign) गाँठ होती है। ऐसी गाँठ से डरने की जरुरत नहीं होती, क्योंकि यह कैंसर वाली गांठ नहीं होती। इसे फाइब्रॉइड (Fibroid) या लेयोमायोमा (Leiomyoma) भी कहा जाता है। तीनों नाम इसी एक तरह की गाँठ के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। मायोमा काफी कॉमन होता है और कई महिलाओं में यह गाँठ पायी जाती है, लेकिन ज़्यादातर मामलों में कोई लक्षण नहीं दिखते, इसलिए इसका पता भी नहीं चलता।
इस आर्टिकल में आप Myoma meaning in hindi समझेंगे, कि यह क्या होता है, कैसे बनता है, इसके कितने प्रकार होते हैं, और किन परिस्थितियों में इसके इलाज की जरूरत पड़ती है।
मायोमा, फाइब्रॉइड और लेयोमायोमा ये तीनों एक ही कंडीशन के अलग अलग नाम हैं। डॉक्टर आमतौर पर Myoma या Leiomyoma टर्म का इस्तेमाल करते हैं, और यही शब्द अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में भी लिखा होता है। वहीं आम बोलचाल में इसे फाइब्रॉइड भी कहते हैं।
अब समझते हैं कि यह बनता कहाँ से है। मायोमा यूट्रस यानी बच्चेदानी की मसल्स, जिसे स्मूद मसल (smooth muscle) कहते हैं, उससे बनता है। यह एक सॉलिड गाँठ होती है, सिस्ट की तरह नहीं होती। सिस्ट में अंदर फ्लूइड भरा होता है, जबकि मायोमा में मसल और टिश्यू होता है।
एक जरूरी बात यहाँ समझना जरूरी है कि ज़्यादातर मायोमा बिनाइन (benign) होते हैं, यानी यह कैंसर वाली गाँठ नहीं होती। बहुत ही कम मामलों में यह कैंसर से जुड़ा होता है, इसलिए सामान्य स्थिति में इससे डरने की जरूरत नहीं होती।
मायोमा के अलग-अलग टाइप होते हैं और यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह यूट्रस में कहाँ बना है। हर टाइप का असर थोड़ा अलग होता है।
यह यूट्रस की दीवार के अंदर बनता है और सबसे कॉमन टाइप है। लगभग 55 से 60% केस में यही पाया जाता है। अगर इसका साइज़ बड़ा हो जाए तो हैवी पीरियड्स और पेट में दबाव महसूस हो सकता है।
यह यूट्रस की अंदरूनी लाइनिंग की तरफ़ बढ़ता है। यह कम पाया जाता है, लेकिन फर्टिलिटी पर इसका असर ज्यादा हो सकता है। यह एम्ब्रीओ के इम्प्लांटेशन (embryo implantation) में रुकावट डाल सकता है और हैवी ब्लीडिंग का कारण बन सकता है।
यह यूट्रस की बाहरी सतह पर बनता है। 30 से 35% केस में मिलता है। यह आमतौर पर फर्टिलिटी पर असर नहीं डालता, लेकिन अगर बड़ा हो जाये तो ब्लैडर या आँत पर प्रेशर डाल सकता है।
पेडंक्युलेटेड मायोमा एक पतले डंठल के सहारे यूट्रस से जुड़ा होता है। यह कम देखने को मिलता है, लेकिन अगर इसका डंठल मुड़ जाए, तो अचानक तेज दर्द हो सकता है। ऐसी स्थिति को टॉर्शन (torsion) कहा जाता है, जो एक मेडिकल इमरजेंसी होती है और इसमें तुरंत हॉस्पिटल जाना जरूरी होता है।
मायोमा होने पर हर महिला को कोई परेशानी हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कई महिलाओं में मायोमा होने के बावजूद कोई सिम्पटम (symptom) दिखाई नहीं देता और उन्हें इसके बारे में पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुछ मामलों में इसके सिम्पटम सामने आ सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि मायोमा का साइज कितना है और वह कहाँ बना है।
अगर ब्लीडिंग लंबे समय तक ज्यादा होती रहे, तो शरीर में आयरन की कमी यानी एनीमिया (anemia) भी हो सकता है। ऐसे में थकान, चक्कर आना या साँस फूलना जैसे लक्षण दिख सकते हैं।
मायोमा का साइज हर महिला में अलग हो सकता है। यह बहुत छोटा, मटर के दाने जितना भी हो सकता है और कुछ मामलों में काफी बड़ा भी हो सकता है। साइज का सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि सिम्पटम होंगे या नहीं और आगे क्या ट्रीटमेंट करना है।
मायोमा ज़्यादातर रूटीन अल्ट्रासाउंड या चेकअप के दौरान अचानक पकड़ में आता है।
हर मायोमा का इलाज जरूरी नहीं होता। इसलिए रिपोर्ट को सही तरह से समझकर डॉक्टर की सलाह लेना सबसे सही कदम होता है।
मायोमा का ट्रीटमेंट इस बात पर डिपेंड करता है कि यह कितना बड़ा है, कहाँ है, सिम्पटम्स कैसे हैं, और आपका प्रेगनेंसी को लेकर क्या प्लान है।
ज़्यादातर महिलाएँ मायोमा होते हुए भी नेचुरली कंसीव कर लेती हैं। मायोमा वाली सिर्फ़ 2 से 3 परसेंट महिलाओं में ही यह इनफर्टिलिटी का मुख्य कारण होता है। लेकिन कुछ केसेस में फ़र्टिलिटी पर असर पड़ सकता है
अगर मायोमा हटाने के बाद भी 6 से 12 महीने में प्रेगनेंसी न हो, तो IVF एक अच्छा ऑप्शन है। IVF से पहले डॉक्टर TVS से चेक करते हैं कि यूट्रस की लाइनिंग और कैविटी नॉर्मल है या नहीं।
मायोमा, फाइब्रॉइड, और लेयोमायोमा तीनों एक ही गांठ के तीन नाम हैं। यह यूट्रस में बनने वाली गाँठ है जो बहुत कॉमन है, यह कैंसर की गांठ नहीं होती।
हर मायोमा को ट्रीटमेंट की ज़रूरत नहीं होती। छोटे और बिना सिम्पटम वाले मायोमा को सिर्फ़ मॉनिटर करना काफ़ी है। सिम्पटम्स हों तो दवाइयों से राहत मिल सकती है। फर्टिलिटी पर असर हो रहा हो तो मायोमेक्टमी बेस्ट ऑप्शन है।
रिपोर्ट में myoma लिखा देखकर पैनिक न करें। डॉक्टर से मिलें, साइज़ और टाइप समझें, और फिर तय करें कि आगे क्या करना है। अगर भविष्य में माँ बनने का प्लान है तो सही गाइडेंस लें, ज़्यादातर महिलाएँ मायोमा के बाद भी माँ बन पाती हैं।