PCOD और PCOS दो अलग अलग कंडीशन हैं, जिन्हें महिलाएं अक्सर एक दूसरे की जगह बोल देती हैं। दोनों कंडीशन ओवरी से जुड़ी समस्याएं हैं। समानता बस यही है कि दोनों के कुछ लक्षण मिलते जुलते हैं, और दोनों ही प्रेगनेंसी को प्रभावित कर सकती हैं। यही वजह है कि ज़्यादातर महिलाओं को इन दोनों में फर्क समझ नहीं आता।
PCOD or PCOS symptoms in Hindi आर्टिकल में हम दोनों समस्याओं की पूरी पहचान करेंगे, बताएंगे कि इनके लक्षण कैसे दिखते हैं, प्रेगनेंसी पर इनका क्या असर पड़ता है, और इनसे कैसे निपटा जा सकता है।
PCOD का पूरा नाम पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिसीज़ (polycystic ovarian disease) है। इसमें ओवरी में छोटे छोटे फॉलिकल (follicle) बन जाते हैं जो एग्स को ठीक से बनने नहीं होने देते। नॉर्मल तरीके से हर महीने ओवरी एक एग बनाती है और जो मैच्योर होने रिलीज़ होकर फैलोपियन ट्यूब में चला जाता है, लेकिन PCOD में यह प्रक्रिया ठीक से नहीं हो पाती क्योंकि PCOD में एंड्रोजन (androgen) यानी पुरुष हार्मोन का लेवल थोड़ा बढ़ जाता है।
PCOD बहुत कॉमन कंडीशन है और भारत में लगभग हर तीसरी से चौथी महिला को किसी न किसी हद तक PCOD होता है। ज़्यादातर मामलों में PCOD बहुत सीरियस नहीं होता और लाइफस्टाइल में बदलाव से काफी हद तक इसमें सुधार हो सकता है।
कई महिलाओं को तो पता ही नहीं चलता कि उन्हें PCOD है, जब तक कि किसी और वजह से अल्ट्रासाउंड नहीं करवातीं।
PCOS का पूरा नाम है पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (polycystic ovarian syndrome)। यहां "सिंड्रोम" शब्द से मतलब है कि शरीर में कहीं एक जगह जैसे ओवरी में ही, दिक्कत नहीं है बल्कि पूरे शरीर के हार्मोनल सिस्टम में गड़बड़ी है।
PCOS कई लक्षणों का एक समूह होता है, यानी बहुत सारे लक्षणों की वजह से PCOS होता है। इसीलिए PCOS, PCOD से ज़्यादा सीरियस कंडीशन मानी जाती है।
PCOS में इंसुलिन रेज़िस्टेंस (insulin resistance) बड़ा रोल होता है। इसका मतलब है कि शरीर की कोशिकाएं यानी सेल्स (cells) इंसुलिन को ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पा रहीं, जिससे खून में शुगर और इंसुलिन दोनों बढ़ जाते हैं। यह बढ़ा हुआ इंसुलिन ओवरी को और ज़्यादा एंड्रोजन बनाने के लिए बोलता है। नतीजा यह होता है कि ओव्यूलेशन (ovulation) रुक जाता है और पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं।
PCOS अगर बहुत लंबे समय तक रहे तो टाइप 2 डायबिटीज़, दिल की बीमारी, और एंडोमेट्रियल कैंसर (endometrial cancer) का रिस्क भी बढ़ सकता है। इसलिए PCOS को सिर्फ ओवरी की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर की मेटाबोलिक (metabolic) कंडीशन मानना चाहिए।
दोनों के कई लक्षण एक जैसे होते हैं, इसीलिए अक्सर कन्फ्यूज़न हो जाता है। इसे नीचे दी गयी टेबल से समझते हैं।
| लक्षण | PCOD | PCOS |
|---|---|---|
| पीरियड्स | अनियमित हो सकते हैं, लेकिन कभी-कभी अपने आप आ जाते हैं | बहुत अनियमित, महीनों तक नहीं आते |
| ओव्यूलेशन | कभी-कभी होता है, पूरी तरह बंद नहीं होता | अक्सर नहीं होता या बहुत कम होता है |
| वज़न बढ़ना | कम बढ़ता है, या धीरे धीरे बढ़ता है | तेजी से बढ़ता है, खासकर पेट के आसपास |
| इंसुलिन रेज़िस्टेंस | हर केस में नहीं होता | आमतौर पर मौजूद होता है |
| चेहरे और शरीर पर बाल | हल्के बाल या बहुत कम | मोटे और ज़्यादा बाल (हिर्सूटिज़्म) |
| मुंहासे | हल्के या कभी कभी | बार-बार और गहरे, खासकर जॉलाइन पर |
| त्वचा का कालापन | कम देखने को मिलता है | गर्दन, बगल में काली मोटी त्वचा दिखना आम है |
| बाल झड़ना | कम या हल्का असर | पुरुष पैटर्न जैसा बाल पतला होना |
| हार्मोनल असंतुलन | हल्का या सीमित | ज्यादा स्पष्ट और गंभीर |
| ओवरी की स्थिति | सिस्ट हो सकते हैं लेकिन कम और कम जटिल | कई छोटे-छोटे सिस्ट और ओवरी का साइज बड़ा |
| फर्टिलिटी पर असर | फर्टिलिटी पर असर कम होता है | प्रेगनेंसी में दिक्कत हो सकती है |
| मेटाबॉलिक रिस्क | रिस्क कम होता है | डायबिटीज, थायरॉइड जैसी समस्याओं का रिस्क ज्यादा |
यह सबसे बड़ा भ्रम है कि PCOD या PCOS में प्रेगनेंसी संभव नहीं। हां, इसमें थोड़ी ज़्यादा कोशिश और कभी कभी मेडिकल मदद की ज़रूरत पड़ सकती है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं है।
मुख्य समस्या यह है कि ओव्यूलेशन नियमित नहीं होता। जब एग ठीक से नहीं बनता या नहीं निकलता, तो प्रेगनेंसी मुश्किल हो जाती है। इसे मैनेज करने का सबसे पहला स्टेप है वज़न सही करना। सिर्फ 5 से 10 प्रतिशत वज़न कम करने से भी ओव्यूलेशन बेहतर हो सकता है।
अगर लाइफस्टाइल बदलाव से काम न बने, तो डॉक्टर ओव्यूलेशन इंडक्शन (ovulation induction) की दवाएं देते हैं। अल्ट्रासाउंड से मॉनिटरिंग होती है ताकि सही समय पर कोशिश की जा सके।
अगर 3 से 6 महीने की कोशिश के बाद भी सफलता न मिले तो IUI एक अगला स्टेप हो सकता है, और IUI से भी नतीजा न मिले तो IVF बेस्ट ऑप्शन है। PCOS वाली महिलाओं में IVF की सक्सेस रेट काफी अच्छी होती है क्योंकि उनकी ओवरी में एग्स की संख्या पर्याप्त होती है।
PCOD or PCOS को कोई परमानेंट इलाज नहीं है, लेकिन इन्हें बहुत अच्छे से मैनेज किया जा सकता है।
यह गलत है। लगभग 20 से 30 प्रतिशत PCOS की मरीज़ सामान्य वज़न की होती हैं, जिसे "लीन PCOS" कहा जाता है। इनमें भी हार्मोनल असंतुलन और ओव्यूलेशन की समस्या हो सकती है।
सिर्फ अल्ट्रासाउंड से PCOS का निदान नहीं होता। कई जवान महिलाओं की ओवरी में कई छोटे फॉलिकल दिखना सामान्य बात है। PCOS के लिए तीन में से कम से कम दो चीज़ें होनी चाहिए: अनियमित पीरियड्स, बढ़ा हुआ एंड्रोजन, और अल्ट्रासाउंड में पॉलीसिस्टिक ओवरी।
PCOS or PCOD बीमारी नहीं बल्कि कंडीशन हैं। इनका कोई परमानेंट इलाज अभी नहीं मिला है। लेकिन सही लाइफस्टाइल और दवाओं से इनके सिम्पटम्स काफी हद तक कंट्रोल हो सकते हैं और आप बिना किसी परेशानी के न सिर्फ हेल्दी लाइफ जी सकती हैं बल्कि माँ भी बन सकती हैं।
अगर पीरियड्स लगातार अनियमित हैं, दो महीने या ज़्यादा का गैप हो रहा है, चेहरे पर अचानक बाल बढ़ रहे हैं, वज़न बिना किसी कारण बढ़ रहा है, या एक साल से प्रेगनेंसी की कोशिश कर रही हैं लेकिन सफलता नहीं मिल रही, तो डॉक्टर से मिलना चाहिए।
डॉक्टर कुछ खून की जांच करवाते हैं जिसमें LH, FSH, टेस्टोस्टेरॉन (testosterone), इंसुलिन, थाइरॉइड (thyroid), और शुगर लेवल शामिल हैं।
TVS अल्ट्रासाउंड से ओवरी का आकार और फॉलिकल की संख्या देखी जाती है। इन सब रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं कि इलाज कैसे करना है। जांच को टालना ठीक नहीं है, जितनी जल्दी पहचान हो, मैनेजमेंट उतना ही आसान और अच्छा होगा।
PCOD और PCOS दोनों ही मैनेज होने वाली स्थितियां हैं। सही जानकारी, समय पर जांच, और लाइफस्टाइल में बदलाव से इन दोनों को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। प्रेगनेंसी भी संभव है, बस सही समय पर सही कदम उठाना ज़रूरी है। अपने शरीर के संकेतों को पहचानें और अपने डॉक्टर से खुलकर बात करें।