ओव्यूलेशन (ovulation) का मतलब है ओवरी यानी अंडाशय (ovary) से एक मैच्योर अंडा (egg) रिलीज़ होना। यह प्रेगनेंसी के लिए सबसे जरुरी प्रोसेस है क्योंकि बिना ओव्यूलेशन के नेचुरल फर्टिलाइज़ेशन संभव नहीं है। ओव्यूलेशन का मतलब क्या होता है यह समझना हर उस महिला के लिए जरुरी है जो प्रेगनेंसी प्लान कर रही है, क्योंकि पूरे मासिक चक्र (menstrual cycle) में सिर्फ़ 5 से 6 दिन ऐसे होते हैं जब प्रेगनेंसी हो सकती है।
भारत में 25 से 30% कपल्स जो इनफर्टिलिटी से जूझ रहे हैं, उनमें ओव्यूलेशन डिसऑर्डर एक प्रमुख कारण है। बहुत सी महिलाओं को यह पता ही नहीं होता कि उनका ओव्यूलेशन हो रहा है या नहीं, क्योंकि पीरियड्स आना और ओव्यूलेशन होना दो अलग चीज़ें हैं। पीरियड्स बिना ओव्यूलेशन के भी आ सकते हैं (एनोव्यूलेटरी साइकल)।
इस आर्टिकल में जानेंगे कि ओव्यूलेशन कब होता है, इसके लक्षण क्या हैं, कैसे ट्रैक करें, प्रेगनेंसी से इसका क्या संबंध है, और अगर ओव्यूलेशन न हो रहा हो तो क्या करें।
ओव्यूलेशन का मतलब क्या होता है, इसे सिंपल भाषा में समझें तो यह वो प्रोसेस है जिसमें ओवरी से एक मैच्योर अंडा रिलीज़ होता है और फ़ैलोपियन ट्यूब (fallopian tube) में आ जाता है। यहाँ अगर स्पर्म मिल जाए, तो फर्टिलाइज़ेशन हो सकता है और प्रेगनेंसी शुरू हो सकती है।
हर मासिक चक्र की शुरुआत में ब्रेन की पिट्यूटरी ग्लैंड (pituitary gland) FSH (फ़ॉलिकल स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन) रिलीज़ करती है। इससे ओवरी में कई फ़ॉलिकल्स (follicles) बढ़ने लगते हैं।
इनमें से एक डॉमिनेंट फ़ॉलिकल बनता है जो 18 से 24 mm तक बढ़ता है। जब यह फ़ॉलिकल मैच्योर होता है, तो एस्ट्रोजन (estrogen) का लेवल पीक पर पहुँचता है। यह पीक पिट्यूटरी ग्लैंड को LH (ल्यूटिनाइज़िंग हॉर्मोन) सर्ज रिलीज़ करने का सिग्नल देता है। LH सर्ज के 24 से 36 घंटे बाद फ़ॉलिकल फटता है और अंडा रिलीज़ होता है।
रिलीज़ हुआ अंडा सिर्फ़ 12 से 24 घंटे तक फर्टिलाइज़ हो सकता है। इसके बाद अगर स्पर्म नहीं मिलता, तो अंडा विघटित हो जाता है।
ओव्यूलेशन के बाद फ़ॉलिकल कॉर्पस ल्यूटियम (corpus luteum) में बदलता है जो प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) बनाता है। प्रोजेस्टेरॉन यूटरस की लाइनिंग को प्रेगनेंसी के लिए तैयार करता है।
ओव्यूलेशन का मतलब क्या होता है जानने के बाद सबसे कॉमन सवाल है कि यह कब होता है। इसका जवाब आपकी साइकल की लंबाई पर निर्भर करता है।
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साइकल की लंबाई |
संभावित ओव्यूलेशन दिन |
फर्टाइल विंडो (सबसे फर्टाइल दिन) |
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24 दिन |
दिन 10वां |
दिन 8 से 10 |
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26 दिन |
दिन 12वां |
दिन 10 से 12 |
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28 दिन |
दिन 14वां |
दिन 12 से 14 |
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30 दिन |
दिन 16वां |
दिन 14 से 16 |
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32 दिन |
दिन 18वां |
दिन 16 से 18 |
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35 दिन |
दिन 21वां |
दिन 19 से 21 |
ओव्यूलेशन आमतौर पर अगले पीरियड्स से 14 दिन पहले होता है। यह ल्यूटियल फेज़ (luteal phase) कहलाता है और ज़्यादातर महिलाओं में 12 से 14 दिन का होता है। इसलिए अगर आपकी साइकल 30 दिन की है, तो ओव्यूलेशन 16वें दिन के आसपास होगा।
फर्टाइल विंडो (Fertile Window): ओव्यूलेशन के दिन और उससे 5 दिन पहले तक प्रेगनेंसी के चांस होते हैं। स्पर्म फ़ीमेल रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट में 3 से 5 दिन तक ज़िंदा रह सकता है। इसलिए ओव्यूलेशन से कुछ दिन पहले इंटरकोर्स हुआ हो, तो भी स्पर्म एग तक पहुँच सकता है।
28 दिन की स्टैंडर्ड साइकल चार फ़ेज़ में बंटी यानी डिवाइड होती है।
मेंस्ट्रुअल फेज़ (दिन 1-5): इस फेज़ में पीरियड्स, यूटरस लाइनिंग शेड होती है।
फ़ॉलिक्युलर फेज़ (दिन 1-13): इस फेज़ में FSH के प्रभाव में फ़ॉलिकल्स बढ़ते हैं, एस्ट्रोजन बढ़ता है।
ओव्यूलेशन (दिन 14 के आसपास): इस फेज़ में LH सर्ज और एग रिलीज़ होता है।
ल्यूटियल फेज़ (दिन 15-28): इस फेज़ में प्रोजेस्टेरॉन बढ़ता है, यूटरस इम्प्लांटेशन के लिए तैयार होता है।
लेकिन हर महिला में बिलकुल दिन 14 पर ओव्यूलेशन हो, यह जरुरी नहीं है। Indian Journal of Medical Research (IJMR, 2018) की एक स्टडी में पाया गया कि 28 दिन की साइकल वाली भारतीय महिलाओं में भी ओव्यूलेशन दिन 12 से 16 के बीच कहीं भी हो सकता है। इसलिए सिर्फ़ कैलेंडर पर निर्भर रहना सही नहीं है।
बिना ओव्यूलेशन के नेचुरल प्रेगनेंसी संभव नहीं है। प्रेगनेंसी के लिए तीन चीजें जरुरी हैं: मैच्योर अंडा रिलीज़ होना (ओव्यूलेशन), स्पर्म का एग तक पहुँचकर फर्टिलाइज़ करना, और फर्टिलाइज्ड एम्ब्रियो (embryo) का यूटरस यानी गर्भाशय (uterus) में इम्प्लांट होना। इन तीनों में पहला कदम ओव्यूलेशन है। अगर ओव्यूलेशन ही नहीं हो रहा तो बाकी दो स्टेप्स का सवाल ही नहीं उठता।
सबसे फर्टाइल दिन: ओव्यूलेशन से 2 दिन पहले और ओव्यूलेशन के दिन प्रेगनेंसी के चांस सबसे ज़्यादा होते हैं। इसकी वजह यह है कि स्पर्म को फ़ैलोपियन ट्यूब तक पहुँचने में कुछ घंटे लगते हैं, और अगर स्पर्म पहले से वहाँ मौजूद हो तो अंडा रिलीज़ होते ही फर्टिलाइज़ेशन हो सकता है। ICMR (Indian Council of Medical Research) के National Guidelines for ART Clinics (2023) के अनुसार हर साइकल में हेल्दी कपल में प्रेगनेंसी के चांस 20 से 25% होते हैं, लेकिन यह तभी है जब ओव्यूलेशन हो रहा हो और इंटरकोर्स फर्टाइल विंडो में हुआ हो।
टाइम्ड इंटरकोर्स (Timed Intercourse): प्रेगनेंसी प्लान कर रहे हैं तो फर्टाइल विंडो में हर 1 से 2 दिन पर इंटरकोर्स यानी संबंध बनाने की सलाह दी जाती है। रोज़ इंटरकोर्स भी ठीक है, इससे स्पर्म क्वालिटी पर नेगेटिव असर नहीं पड़ता। बहुत ज़्यादा गैप यानी 5 दिन से ज़्यादा दिन के बाद संबंध बनाने पर स्पर्म मोटिलिटी कम हो सकती है, इसलिए फर्टाइल विंडो में रेगुलर इंटरकोर्स बेहतर रहता है।
ओव्यूलेशन के बाद: एग सिर्फ़ 12 से 24 घंटे फर्टिलाइज़ हो सकता है। ओव्यूलेशन के एक दिन बाद प्रेगनेंसी के चांस बहुत कम हो जाते हैं। इसलिए ओव्यूलेशन से पहले तैयारी रखना ज़्यादा असरदार है बजाय ओव्यूलेशन का इंतज़ार करने के।
उम्र का असर: उम्र बढ़ने के साथ ओव्यूलेशन की क्वालिटी भी प्रभावित होती है। 35 वर्ष की आयु के बाद न सिर्फ़ एग की संख्या कम होती है, बल्कि एग्स में क्रोमोसोमल एरर (Chromosomal error) की संभावना भी बढ़ जाती है।
ICMR-NIRRCH के डेटा के अनुसार 35 वर्ष से ज्यादा की उम्र में हर साइकल में प्रेगनेंसी चांस 10 से 15% रह जाते हैं जो कि 25 साल की उम्र में 25% होते हैं। इसलिए 30 वर्ष से ज़्यादा उम्र की महिलाओं के लिए ओव्यूलेशन ट्रैकिंग और भी ज़्यादा जरुरी हो जाती है।
शरीर कुछ संकेत देता है जिनसे ओव्यूलेशन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। हर महिला को सभी लक्षण नहीं मिलते, लेकिन इनकी जानकारी रखना फ़ायदेमंद हो सकता है।
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लक्षण |
कैसे पहचानें |
कब दिखता है |
|---|---|---|
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सर्विकल म्यूकस बदलना |
पतला, स्ट्रेची, एग की सफेदी जैसा |
ओव्यूलेशन से 1-2 दिन पहले |
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पेट में हल्का दर्द (मिटलश्मर्ज़) |
एक तरफ चुभन या हल्का दर्द |
ओव्यूलेशन के दिन |
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बेसल बॉडी टेम्परेचर बढ़ना |
0.3 से 0.5°C बढ़ जाता है |
ओव्यूलेशन के बाद |
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ब्रेस्ट सेंसिटिविटी |
हल्का दर्द या भारीपन |
ओव्यूलेशन के आसपास |
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सेक्स ड्राइव बढ़ना |
इच्छा बढ़ना |
फर्टाइल विंडो में |
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हल्की स्पॉटिंग |
बहुत हल्का ब्राउनिश स्पॉट |
कुछ महिलाओं में (रेयर) |
सर्विकल म्यूकस: यह सबसे भरोसेमंद बॉडी साइन है। ओव्यूलेशन के आसपास डिस्चार्ज पतला, ट्रांसपेरेंट, और स्ट्रेची हो जाता है जिसे दो उँगलियों में रखकर खींचा जा सके। बढ़ा हुआ एस्ट्रोजन इस बदलाव की वजह है। यह म्यूकस स्पर्म को ट्रैवल करने में मदद करता है।
मिटलश्मर्ज़ (Mittelschmerz): करीब 20% महिलाओं को ओव्यूलेशन के दिन पेट के एक तरफ यानी जिस ओवरी से एग रिलीज़ हो रहा है, उस तरफ हल्का दर्द महसूस होता है। यह कुछ मिनट से लेकर कुछ घंटों तक रह सकता है।
BBT (बेसल बॉडी टेम्प्रेचर): ओव्यूलेशन के बाद प्रोजेस्टेरॉन बढ़ने से बॉडी का बेसल टेम्परेचर 0.3 से 0.5°C बढ़ जाता है। यह बदलाव ओव्यूलेशन कन्फर्म करता है, लेकिन इसका पहले से पता नहीं लगाया जा सकता। मतलब BBT से आपको पता चलेगा कि ओव्यूलेशन हो चुका है, लेकिन आने वाले ओव्यूलेशन अक पहले से अंदाज़ा लगाने के लिए कम से कम 2 से 3 महीने का डाटा चाहिए जिससे कि आप पैटर्न समझ सकें।
यूरिन में LH सर्ज: OPK यानी ओव्यूलेशन प्रिडिक्शन किट, यूरिन में LH सर्ज डिटेक्ट करती है। LH सर्ज ओव्यूलेशन से 24 से 36 घंटे पहले होता है, इसलिए यह आने वाले ओव्यूलेशन का सबसे प्रैक्टिकल सिग्नल है। जो महिलाएँ प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, उनके लिए यह सबसे ज्यादा काम आने वाली किट है।
ओव्यूलेशन ट्रैक करना प्रेगनेंसी प्लानिंग का अहम हिस्सा है। कई तरीके उपलब्ध हैं, हर एक की अपनी ख़ूबी और कमी है।
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तरीका |
कैसे काम करता है |
सटीकता |
किसके लिए बेस्ट |
|---|---|---|---|
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ओव्यूलेशन किट (OPK) |
यूरिन में LH सर्ज डिटेक्ट |
ज़्यादा (97%+) |
सभी, सबसे आसान |
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BBT ट्रैकिंग |
रोज़ सुबह तापमान नोट |
मीडियम |
रेगुलर साइकल |
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सर्विकल म्यूकस |
डिस्चार्ज में बदलाव |
मीडियम |
कॉस्ट-फ्री ऑप्शन |
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कैलेंडर मेथड |
साइकल लंबाई से अनुमान |
कम |
सिर्फ़ रेगुलर साइकल |
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फर्टिलिटी ऐप्स |
डेटा कॉम्बाइन करके प्रेडिक्ट |
मीडियम |
सभी |
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अल्ट्रासाउंड मॉनिटरिंग |
फ़ॉलिकल ग्रोथ देखना |
सबसे ज़्यादा |
फर्टिलिटी ट्रीटमेंट |
ओव्यूलेशन टेस्ट किट (OPK): यूरिन में LH सर्ज डिटेक्ट करता है। LH सर्ज ओव्यूलेशन से 24 से 36 घंटे पहले होता है। पॉज़िटिव आने पर अगले 24 से 48 घंटे सबसे फर्टाइल हैं। कैमिस्ट या ऑनलाइन 200 से 500 रुपये में मिल जाती है।
BBT ट्रैकिंग: रोज़ सुबह उठते ही बिस्तर से हिले बिना डिजिटल थर्मामीटर से तापमान नोट करें। ओव्यूलेशन के बाद 0.3 से 0.5°C बढ़ता है और पीरियड्स तक बढ़ा रहता है। 2 से 3 महीने ट्रैक करने पर पैटर्न समझ आता है।
कैलेंडर मेथड: अगर पीरियड्स रेगुलर हैं तो अगले पीरियड से 14 दिन पहले ओव्यूलेशन का अनुमान। यह सबसे कम सटीक है लेकिन एक शुरुआती अंदाज़ा देता है। अनियमित साइकल वाली महिलाओं के लिए यह तरीका काम नहीं करता।
सर्विकल म्यूकस मेथड: पीरियड्स ख़त्म होने के बाद रोज़ डिस्चार्ज पर ध्यान दें। शुरू में सूखा या चिपचिपा होता है, फिर ओव्यूलेशन के पास पतला, ट्रांसपेरेंट, और रबर जैसा स्ट्रेची हो जाता है। यह बदलाव दिखे तो समझिए फर्टाइल विंडो शुरू हो गई। यह कॉस्ट-फ्री तरीका है लेकिन इसे पहचानने में 2-3 साइकल प्रैक्टिस लग सकती है।
अल्ट्रासाउंड फ़ॉलिकल मॉनिटरिंग: डॉक्टर ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड से फ़ॉलिकल की ग्रोथ ट्रैक करते हैं। साइकल के दिन 9-10 से शुरू करके हर 2-3 दिन पर अल्ट्रासाउंड करते हैं। फ़ॉलिकल 18 से 24 mm तक पहुँचने पर ओव्यूलेशन होने वाला है। यह सबसे सटीक तरीका है और फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में स्टैंडर्ड प्रैक्टिस है। साथ ही एंडोमेट्रियम (यूटरस लाइनिंग) की थिकनेस भी देखी जाती है जो इम्प्लांटेशन के लिए जरुरी है।
अगर ओव्यूलेशन नहीं हो रहा (ऐनोव्यूलेशन/anovulation), तो नेचुरल प्रेगनेंसी संभव नहीं है। Journal of Human Reproductive Sciences (JHRS, 2019) के अनुसार भारत में फीमेल इनफर्टिलिटी के 30 से 40% केसों में ओव्यूलेटरी डिसऑर्डर प्रमुख कारण है।
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कारण |
कैसे प्रभावित करता है |
कितना कॉमन |
|---|---|---|
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PCOS/PCOD |
हॉर्मोनल इम्बैलेंस, अंडा मैच्योर नहीं होता |
सबसे कॉमन (70% ऐनोव्यूलेशन) |
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थायरॉइड डिसऑर्डर |
TSH बढ़ने/घटने से ओव्यूलेशन बिगड़ता है |
15-20% केसों में |
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हाइपरप्रोलैक्टिनीमिया |
प्रोलैक्टिन GnRH दबाता है |
10-15% केसों में |
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स्ट्रेस और वज़न |
हाइपोथैलेमस प्रभावित होता है |
सब में अलग अलग |
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प्रीमैच्योर ओवेरियन फ़ेल्योर |
40 से पहले ओवरी का काम बंद |
1-2% महिलाओं में |
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ज़्यादा एक्सरसाइज़ |
एनर्जी में कमी आने से हॉर्मोन बिगड़ते हैं |
एथलीट्स में |
PCOS/PCOD: ओव्यूलेशन न होने का सबसे कॉमन कारण। WHO के अनुसार एनोव्यूलेटरी इनफर्टिलिटी के 70 से 80% केसों में PCOS ज़िम्मेदार होता है। बढ़ा हुआ एंड्रोजन और इंसुलिन रेज़िस्टेंस एग्स के मैच्योर होने और रिलीज़ दोनों रोकते हैं।
थायरॉइड: TSH बढ़ा होने पर पीरियड्स अनियमित होते हैं और ओव्यूलेशन प्रभावित होता है। सही दवा से TSH कंट्रोल होने पर ओव्यूलेशन अपने आप ठीक हो जाता है।
स्ट्रेस और वज़न: बहुत कम वज़न यानी जब BMI 18.5 से कम हो या बहुत ज़्यादा वज़न जब BMI 30 से ज्यादा हो, ये दोनों कंडीशन ओव्यूलेशन रोक सकते हैं।
क्रॉनिक स्ट्रेस हाइपोथैलेमस (hypothalamus) को प्रभावित करता है जो GnRH हॉर्मोन रिलीज़ करता है, इससे पूरी हॉर्मोन चेन बिगड़ जाती है। कई बार महिलाएँ बताती हैं कि एग्ज़ाम, जॉब चेंज, या फ़ैमिली स्ट्रेस के दौरान उनके पीरियड्स लेट हुए। यह इसी वजह से होता है क्योंकि स्ट्रेस ओव्यूलेशन को डिले कर देता है।
हाइपरप्रोलैक्टिनीमिया: प्रोलैक्टिन (prolactin) हॉर्मोन बढ़ने पर GnRH दब जाता है यानी सप्रेस हो जाता है, जिससे FSH और LH दोनों कम बनते हैं। नतीजा यह होता है कि ओव्यूलेशन रुक जाता है और पीरियड्स मिस होते हैं। कुछ दवाइयां भी प्रोलैक्टिन बढ़ा सकती हैं। ब्लड टेस्ट से पता चलता है और दवाई से ठीक हो जाता है।
POI यानी प्रीमैच्योर ओवेरियन इनसफिशिएंसी: 40 से पहले ओवरी का काम बंद होना। AMH बहुत कम और FSH बहुत ज़्यादा आती है। एक स्टडी में पाया गया कि महिलाओं में POI का प्रीवैलेंस करीब 1 से 2% है। इन महिलाओं में ओव्यूलेशन इंडक्शन से भी रिस्पॉन्स कम मिलता है, इसलिए जल्दी पहचान जरुरी है।
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स्थिति |
कब मिलें |
डॉक्टर क्या करेंगे |
|---|---|---|
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पीरियड्स 35 दिन से ज़्यादा का गैप या 3 महीने मिस |
तुरंत |
हॉर्मोन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड की सलाह देंगे |
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35 साल से ज्यादा उम्र, 6 महीने कोशिश, प्रेगनेंसी नहीं |
जल्द |
फर्टिलिटी वर्कअप की सलाह देंगे |
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35 साल से कम उम्र, 1 साल कोशिश, प्रेगनेंसी नहीं |
अब |
बेसिक इन्वेस्टिगेशन करेंगे |
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OPK कभी पॉज़िटिव न आए |
3 से 4 महीने ट्राई के बाद |
ओव्यूलेशन कन्फर्मेशन टेस्ट करेंगे |
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PCOS या थायरॉइड डायग्नोज़ और प्रेगनेंसी चाहिए |
तुरंत |
ओव्यूलेशन इंडक्शन प्लान करेंगे |
FOGSI Good Clinical Practice Recommendations (2022) के अनुसार ऐनोव्यूलेटरी इनफर्टिलिटी में जल्दी रेफरल करना चाहिए क्योंकि ट्रीटमेंट बहुत असरदार है और देरी से उम्र का फ़ैक्टर बिगड़ता है।
डॉक्टर ये टेस्ट करवा सकते हैं:
अगर आप सबसे आसानी से ओव्यूलेशन कन्फर्म चाहती हैं है तो मेंस्ट्रुअल साइकल में 21वें प्रोजेस्टेरॉन टेस्ट करवाएं।
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प्रोजेस्टेरॉन लेवल (Progesterone Level) |
क्या मतलब हुआ? |
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3 ng/mL से कम |
संभवतः ओव्यूलेशन नहीं हुआ |
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3 ng/mL से ज़्यादा |
ओव्यूलेशन होने का संकेत |
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10 ng/mL से ज़्यादा |
अच्छा या पर्याप्त ल्यूटियल फेज़ सपोर्ट माना जाता है |
यह टेस्ट सिर्फ़ तभी सही रिज़ल्ट देता है जब सही दिन यानी अगले पीरियड से 7 दिन पहले किया जाए, इसलिए डॉक्टर आपकी पीरियड साइकल की लंबाई के हिसाब से सही दिन बताएँगे।
ओव्यूलेशन डिसऑर्डर इनफर्टिलिटी का एक कॉमन कारण है, लेकिन अच्छी बात यह है कि इसका इलाज बहुत आसानी से उपलब्ध है।
PCOS हो तो 5 से 10% वज़न कम करने से ओव्यूलेशन अपने आप शुरू हो सकता है। ज्यादा वज़न वाले PCOS पेशेंट्स में वज़न कम करना ट्रीटमेंट का पहला स्टेप होता है। थायरॉइड डिसऑर्डर हो तो इसकी दवाई से TSH नॉर्मल होने पर ओव्यूलेशन अपने आप शुरू हो सकता है।
इस स्टेप में ओवरी को एग बनाने और सही समय पर ओव्यूलेशन कराने के लिए ट्रीटमेंट दिया जाता है। आमतौर पर यह प्रोसेस मेंस्ट्रुअल साइकल के शुरुआती दिनों में शुरू की जाती है और कुछ दिनों तक मॉनिटरिंग की जाती है। इस दौरान अल्ट्रासाउंड से फ़ॉलिकल की ग्रोथ और ओव्यूलेशन की तैयारी को ट्रैक किया जाता है, ताकि सही समय पर आगे की प्रक्रिया की जा सके।
ओरल दवाई से 3 से 6 साइकल में काम न बने तो FSH इंजेक्शन और IUI किया जाता है। इसमें ओव्यूलेशन के सही समय पर प्रोसेस्ड स्पर्म सीधे यूट्रस में पहुँचाया जाता है, जिससे स्पर्म को एग तक पहुँचने का रास्ता छोटा हो जाता है। IUI की सक्सेस रेट ओव्यूलेशन डिसऑर्डर में 15 से 20% प्रति साइकल होती है।
जब ऊपर के स्टेप्स काम न करें, उम्र 35 वर्ष से ज्यादा हो, या दूसरे फ़ैक्टर भी हों जैसे ट्यूब का ब्लॉक होना या कोई पुरुष निःसंतानता के फैक्टर तब IVF सबसे सही इलाज होता है। IVF में नेचुरल ओव्यूलेशन जरुरी नहीं, दवाइयों से ओवरी में मल्टीपल एग तैयार करवाए जाते हैं और लैब में फर्टिलाइज़ किए जाते हैं। PCOS पेशेंट्स में IVF की सक्सेस रेट अच्छी होती है क्योंकि आमतौर पर ओवेरियन रिज़र्व अच्छा होता है और दवाइयों पर रिस्पॉन्स भी ठीक मिलता है।
ICMR-NIRRCH (National Institute for Research in Reproductive and Child Health के अनुसार भारत में ओव्यूलेशन इंडक्शन सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला फर्टिलिटी ट्रीटमेंट है और इसकी सक्सेस रेट काफी अच्छी है।
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मिथक |
सच्चाई |
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हर महिला का ओव्यूलेशन दिन 14 पर होता है |
हर महिला की साइकल अलग होती है |
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पीरियड्स रेगुलर हैं तो ओव्यूलेशन जरूर होता है |
कई बार बिना ओव्यूलेशन के भी पीरियड्स आते हैं |
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सिर्फ ओव्यूलेशन वाले दिन प्रेग्नेंसी हो सकती है |
फर्टाइल विंडो लगभग 5-6 दिन की होती है |
ओवरी से मैच्योर एग का रिलीज़ होना, प्रेगनेंसी के लिए सबसे पहला और जरुरी स्टेप है। हर मेंस्ट्रुअल साइकल में फर्टाइल विंडो सिर्फ 5 से 6 दिन की होती है, इसलिए प्रेगनेंसी के लिए ओव्यूलेशन का समय जानना बहुत मदद करता है।
ओव्यूलेशन का समय जानने के लिए OPK सबसे आसान और भरोसेमंद ट्रैकिंग तरीका है, BBT और सर्विकल म्यूकस मॉनिटरिंग से भी फर्टाइल दिन पहचान सकती हैं। अगर पीरियड्स अनियमित हैं, 3 महीने से ज़्यादा मिस हो गए हैं, या 1 साल और 35 वर्ष से ज्यादा की उम्र में 6 महीने कोशिश करने के बावजूद प्रेगनेंसी नहीं हो रही, तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलना चाहिए।
ज़्यादातर ओव्यूलेशन डिसऑर्डर दवाइयों से ठीक हो जाते हैं और प्रेगनेंसी हो जाती है। देरी करने से उम्र का फ़ैक्टर बिगड़ सकता है, इसलिए सही समय पर डॉक्टर से मिलना जरुरी है।
आमतौर पर ओव्युलेशन पीरियड के 14वें दिन पर होता है लेकिन यह महिला की पीरियड की साइकिल पर निर्भर करता है।
अगर आपके ओव्युलेशन के दौरान गर्भधारण कर लिया है तो आपको थकान, स्तनों में दर्द, मूड में बदलाव और हल्का रक्तस्त्राव हो सकता है।
पीरियड के शुरूआत के दिन से काउंट करने पर 11 से 16 वें दिन तक गर्भधारण की संभावना सर्वाधिक होती है, जब ओव्युलेशन होता है।
ओव्युलेशन नहीं होने की स्थिति में गर्भधारण नहीं हो सकता है लेकिन समय पर उचित उपचार से ओव्युलेशन को नियमित किया जा सकता है।
ओव्युलेशन किट के माध्यम से यूरिन में एलएच हार्मोन की मात्रा को देखा जा सकता है जिससे ओव्युलेशन का दिन पता चलता है।
ओवरी यानी अंडाशय से एक मैच्योर एग का रिलीज़ होना। यह प्रेगनेंसी के लिए जरुरी है क्योंकि इसके बिना फर्टिलाइज़ेशन नहीं हो सकता।
आमतौर पर अगले पीरियड्स से 14 दिन पहले। 28 दिन की साइकल में दिन 14 के आसपास। लेकिन हर महिला में 1-2 दिन का फ़र्क हो सकता है।
अंडा रिलीज़ होने की प्रोसेस कुछ घंटों की होती है। रिलीज़ के बाद अंडा सिर्फ़ 12 से 24 घंटे फर्टिलाइज़ हो सकता है।
सर्विकल म्यूकस में बदलाव यानी यह पतला और खिंचावदार हो जाता है , पेट के एक तरफ हल्का दर्द, BBT बढ़ना, सेक्स ड्राइव बढ़ना, और ब्रेस्ट सेंसिटिविटी इत्यादि ओव्यूलेशन के लक्षण हैं।
करीब 20% महिलाओं को हल्का दर्द (मिटलश्मर्ज़) महसूस होता है। यह नॉर्मल है। बहुत तेज दर्द हो तो डॉक्टर से मिलें।
ओव्यूलेशन के दिन और 1-2 दिन पहले इंटरकोर्स हो तो हर साइकल में 20 से 25% चांस होते हैं।
सबसे आसान तरीका है OPK, उसके बाद BBT ट्रैकिंग, सर्विकल म्यूकस मॉनिटरिंग, फर्टिलिटी ऐप्स, और सबसे सटीक जानकारी अल्ट्रासाउंड फ़ॉलिकल मॉनिटरिंग से मिलती है।
नहीं। मेंस्ट्रुअल साइकल कितने दिन का है यह आपके हॉर्मोन, स्ट्रेस, और वज़न पर निर्भर करता है। एक ही महिला में भी हर महीने 1-2 दिन का फ़र्क हो सकता है।
OPK सबसे अच्छा तरीका है। कैलेंडर मेथड काम नहीं करेगा। डॉक्टर अल्ट्रासाउंड फ़ॉलिकल मॉनिटरिंग से एकदम सटीक ओव्यूलेशन टाइम बता सकते हैं।
नेचुरली नहीं। लेकिन IVF में दवाइयों से एग तैयार करवाकर लैब में फर्टिलाइज़ किए जा सकते हैं।
यूरिन में LH सर्ज डिटेक्ट करने वाला टेस्ट। पॉज़िटिव आने पर 24-36 घंटे में ओव्यूलेशन होगा। 200-500 रुपये में कैमिस्ट से मिल जाती है।
हाँ, PCOS/PCOD ऐनोव्यूलेशन का सबसे कॉमन कारण है। हॉर्मोनल इम्बैलेंस से अंडा मैच्योर नहीं होता। दवाइयों से ओव्यूलेशन बहाल किया जा सकता है।
PCOS, थायरॉइड, स्ट्रेस, बहुत कम या ज़्यादा वज़न, हाइपरप्रोलैक्टिनीमिया, प्रीमैच्योर ओवेरियन इनसफिशिएंसी, और ज़्यादा एक्सरसाइज़।
ओव्यूलेशन से 2 दिन पहले और ओव्यूलेशन का दिन सबसे फर्टाइल। पूरी फर्टाइल विंडो ओव्यूलेशन से 5 दिन पहले से शुरू होती है।
ओव्यूलेशन के बाद अगर प्रेगनेंसी नहीं होती तो 14 दिन बाद पीरियड्स आते हैं। ओव्यूलेशन न हो तो पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं।
हाँ, क्रॉनिक स्ट्रेस हाइपोथैलेमस को प्रभावित करता है जो ओव्यूलेशन के लिए जरुरी हॉर्मोन सिग्नल भेजता है। ओव्यूलेशन देरी से हो सकता है या रुक सकता है।
हेल्दी वज़न, स्ट्रेस कम करें, अच्छी नींद, बैलेंस्ड डाइट। काम न करे तो डॉक्टर लेट्रोज़ोल या क्लोमीफ़ीन से ओव्यूलेशन करवा सकते हैं।
35+ उम्र हो तो 6 महीने, 35 से कम हो तो 1 साल कोशिश के बाद। पीरियड्स 3 महीने मिस हों, OPK कभी पॉज़िटिव न आए, या PCOS, थायरॉइड हो तो डॉक्टर से मिलें।
नेचुरल ओव्यूलेशन जरुरी नहीं। IVF में दवाइयों से मल्टीपल फ़ॉलिकल्स तैयार करवाए जाते हैं और एग सीधे ओवरी से निकालकर लैब में फर्टिलाइज़ किए जाते हैं।
OPK सबसे आसान और भरोसेमंद है। इसके अलावा फर्टिलिटी ऐप्स और सर्विकल म्यूकस मॉनिटरिंग भी सिंपल तरीके हैं जो घर पर किए जा सकते हैं।