सारांश (Overview)
अगर स्कैन में पानी ज्यादा आया है, तो सबसे पहले सिर्फ “Polyhydramnios” शब्द देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। अब यह देखना जरूरी है कि पानी कितना ज्यादा है और वह किस कैटेगरी में आता है।
रिपोर्ट में AFI या SDP का नंबर देखकर इसकी गंभीरता समझी जा सकती है। हल्के मामलों में अक्सर किसी खास इलाज की जरूरत नहीं पड़ती और पानी अपने आप सामान्य भी हो सकता है।
आगे समझेंगे कि इन दोनों नंबरों का क्या मतलब है, Polyhydramnios के कारण कैसे पता किए जाते हैं, कौन सी जांच जरूरी होती है और डिलीवरी को लेकर क्या ध्यान रखना चाहिए।
गर्भ में बच्चा जिस पानी के बीच रहता है, उसे एमिनियोटिक फ्लूइड कहते हैं। यह बच्चे को चोट से बचाता है, उसे हाथ-पैर चलाने की जगह देता है और फेफड़ों के विकास में भी मदद करता है।
प्रेगनेंसी के दूसरे हिस्से में इस पानी का ज्यादातर हिस्सा बच्चे के पेशाब से बनता है। बच्चा इसे निगलता है और शरीर इसे वापस सोख लेता है। यानी पानी लगातार बनता और कम होता रहता है।
जब यह बैलेंस बिगड़ जाता है और गर्भ में पानी सामान्य से ज्यादा हो जाता है, तो इसे पॉलीहाइड्रैम्नियोस (Polyhydramnios) कहते हैं। ऐसा या तो पानी ज्यादा बनने पर होता है या बच्चा इसे सामान्य मात्रा में निगल नहीं पाता।
यह करीब 1 से 2 प्रतिशत प्रेगनेंसी में होता है। इनमें लगभग65 से 70 प्रतिशत मामले हल्के होते हैं, यानी करीब 10 में से 7 महिलाएं हल्की कैटेगरी में आती हैं।
स्कैन रिपोर्ट में आमतौर पर पानी की मात्रा बताने के लिए AFI या SDP में से किसी एक की वैल्यू दी जाती है। दोनों की गणना अलग तरीके से होती है।
AFI यानी एमनियोटिक फ्लूइड इंडेक्स: गर्भाशय को चार हिस्सों में बांटकर, हर हिस्से में पानी से भरी सबसे बड़ी जगह की लंबाई नापी जाती है। चारों माप को जोड़कर AFI मिलता है।
SDP यानी सिंगल डीपेस्ट पॉकेट: गर्भ में पानी से भरी सबसे बड़ी जगह की लंबाई नापी जाती है।
SDP 8 सेंटीमीटर या ज्यादा या AFI 24 सेंटीमीटर या ज्यादा होने पर Polyhydramnios माना जाता है।
इसलिए रिपोर्ट में पहले देखें कि नंबर AFI का है या SDP का, क्योंकि दोनों को अलग तरीके से नापा जाता है और इनके नंबरों की तुलना नहीं की जाती।
कैटेगरी | SDP | AFI |
|---|---|---|
हल्का | 8 से 11.9 सेमी | 24 से 30 सेमी से कम |
मध्यम | 12 से 15.9 सेमी | 30 से 35 सेमी से कम |
गंभीर | 16 सेमी या ज्यादा | 35 सेमी या ज्यादा |
ये तीनों कैटेगरी StatPearls में इन्हीं नंबरों के साथ दी गई हैं।
इन नंबरों से आप अपनी रिपोर्ट की कैटेगरी समझ सकती हैं। जैसे, AFI 26 हल्का, 31 मीडियम और 36 सीरियस पॉलीहाइड्रैम्नियोस की कैटेगरी में आता है।
ध्यान रखें, पानी की मात्रा समय के साथ बदल सकती है। इसलिए अगली स्कैन में AFI या SDP कम या ज्यादा भी आ सकता है।
StatPearls के अनुसार 50 से 60 प्रतिशत मामलों में पॉलीहाइड्रेम्नियोस का कोई कारण नहीं मिलता, यानी वह इडियोपैथिक होता है।
आधे से ज्यादा मामलों में जांच के बाद भी कुछ नहीं निकलता, इसका मतलब है कि कोई अंदरूनी गड़बड़ी नहीं मिली।
कारण | कैसे असर डालता है |
|---|---|
कोई कारण न मिलना (इडियोपैथिक) | सबसे कॉमन, आधे से ज्यादा मामलों में |
मां की डायबिटीज | बच्चे का पेशाब ज्यादा बन सकता है |
बच्चे के निगलने में रुकावट | पानी सामान्य तरीके से कम नहीं हो पाता |
हार्ट या क्रोमोसोम से जुड़ी कंडीशन | पानी के सामान्य बैलेंस पर असर पड़ सकता है |
जुड़वां प्रेगनेंसी में एक बच्चे के आसपास ज्यादा पानी | दोनों बच्चों के बीच खून के बंटवारे में गड़बड़ी से ऐसा हो सकता है |
कुछ इन्फेक्शन | पानी की मात्रा पर असर डाल सकते हैं |
डायबिटीज वाला कारण इसलिए अहम है क्योंकि वह इकलौता ऐसा है जिसे कंट्रोल में किया जा सकता है। इसीलिए पानी ज्यादा मिलने पर शुगर की जांच सबसे पहले की जाती है।
हल्के पॉलीहाइड्रैम्नियोस में आमतौर पर कोई खास लक्षण नहीं होता। ऐसे मामलों में यह अक्सर सिर्फ स्कैन में पता चलता है।
मीडियम से सीरियस पॉलीहाइड्रैम्नियोस में लक्षण ज्यादा साफ हो सकते हैं। इनमें सांस लेने में तकलीफ और पैरों में सूजन जैसी परेशानियां शामिल हैं।
अगर इनमें से कोई लक्षण तेजी से बढ़ रहा है, खासकर सांस लेने में तकलीफ, तो अगली अपॉइंटमेंट का इंतजार न करें और डॉक्टर से संपर्क करें।
जांच का उद्देश्य यह पता करना होता है कि पानी ज्यादा होने के पीछे कोई कारण तो नहीं है।करीब 40 से 50 प्रतिशत मामलों में कोई कारण मिल जाता है।
आमतौर पर तीन जांचें की जाती हैं:
अगर पहले की शुगर जांच सामान्य थी, तब भी पॉलीहाइड्रैम्नियोस मिलने पर डॉक्टर इसे दोबारा करने की सलाह दे सकते हैं, खासकर उस स्टेज में जब प्रेगनेंसी आगे बढ़ चुकी हो।
अगर पॉलीहाइड्रैम्नियोस हल्का और इडियोपैथिक है, तो अक्सर किसी खास इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। SMFM की गाइडलाइन के अनुसार सिर्फ हल्के इडियोपैथिक पॉलीहाइड्रैम्नियोस के आधार पर अतिरिक्त एंटीनेटल टेस्टिंग जरूरी नहीं है।
अच्छी बात यह है कि हल्के केसेस में पानी की मात्रा बाद में अपने आप सामान्य हो सकती है। एक स्टडी में 37 प्रतिशत हल्के केसेस में पानी की मात्रा अपने आप सामान्य हो गई।
इसका मतलब यह नहीं है कि नियमित प्रेगनेंसी चेकअप बंद कर दें। मतलब यह है कि हल्की कैटेगरी में घबराने की कोई वजह नहीं है और नियमित चेकअप काफी होता है।
ज्यादातर मामलों में पॉलीहाइड्रैम्नियोस के लिए अलग से किसी इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। अगर कोई कारण मिलता है, तो इलाज उसी कारण का किया जाता है, जैसे डायबिटीज होने पर ब्लड शुगर को काबू में रखना।
अगर पानी बहुत ज्यादा हो और उससे आपको काफी तकलीफ हो रही हो, तो एमनिओरिडक्शन किया जा सकता है। इसमें सुई की मदद से गर्भ में मौजूद कुछ एमनिओटिक फ्लूइड बाहर निकाला जाता है।
SMFM की गाइडलाइन के अनुसार एम्नियोरिडक्शन तभी सोचा जाता है जब पानी ज्यादा होने से मां को गंभीर असहजता हो। इसका मकसद सिर्फ रिपोर्ट में पानी का नंबर कम करना नहीं, बल्कि आपकी तकलीफ कम करना होता है।
एक दवा को लेकर भी बात साफ है। सिर्फ एमनियोटिक फ्लूइड कम करने के लिए इंडोमेथासिन का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए अगर कोई दवा शुरू की जाती है, तो डॉक्टर से यह जरूर पूछें कि वह किस वजह से दी जा रही है।
सिर्फ पॉलीहाइड्रैम्नियोस होने की वजह से डिलीवरी जल्दी कराने की जरूरत नहीं होती। SMFM के अनुसार अगर इंडक्शन की जरूरत हो, तो इसे 39 हफ्ते से पहले नहीं करना चाहिए, जब तक कोई दूसरा कारण न हो।
पॉलीहाइड्रैम्नियोस में बच्चे का वजन ज्यादा होना, बच्चे का उल्टा या आड़ा होना, बच्चे के बाहर आने से पहले अम्बिलिकल कॉर्ड का नीचे आ जाना और सिजेरियन की जरूरत जैसे रिस्क बढ़ सकते हैं।
पानी की थैली फटने यानी वाटर ब्रेक होने पर तुरंत अस्पताल जाएं, ताकि बच्चे की स्थिति और अम्बिलिकल कॉर्ड (umbilical cord) को समय पर देखा जा सके।
Polyhydramnios का मतलब अपने आप में यह नहीं है कि प्रेगनेंसी में कोई बड़ी समस्या है। इसकी गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि पानी कितना ज्यादा है और जांच में कोई कारण मिला है या नहीं।
अगर मामला हल्का है और कोई कारण नहीं मिला है, तो अक्सर सिर्फ नियमित देखभाल और डॉक्टर की निगरानी काफी होती है। पानी की मात्रा समय के साथ बदल भी सकती है, इसलिए एक स्कैन की रिपोर्ट को देखकर पूरी प्रेगनेंसी का अंदाजा नहीं लगाया जाता।
सबसे जरूरी बात, अपनी रिपोर्ट में AFI या SDP की वैल्यू और उसकी कैटेगरी समझें और डॉक्टर से पूछें कि आपके मामले में आगे सिर्फ निगरानी करनी है या किसी जांच या इलाज की जरूरत है।