Main navigation
Reviewed by Dr. Ashima Gupta
Gynaecologist & IVF Specialist
10+ years of experience
Expert Verified
How is this page expert verified?
This information has been reviewed and approved by an experienced fertility specialist at Indira IVF to provide accurate and up-to-date guidance for our readers.
"वीर्य कैसे बढ़ाएं" यह सवाल तब आता है जब या तो सीमेन की मात्रा कम लग रही हो या फिर रिपोर्ट में स्पर्म काउंट नीचे आया हो। दोनों स्थितियाँ अलग हैं और इनके कारण तथा समाधान भी अलग हो सकते हैं। वीर्य यानी सीमेन (semen) वह तरल पदार्थ है जो स्खलन (ejaculation) में निकलता है, और स्पर्म उसके अंदर मौजूद कोशिकाएं हैं जो प्रेगनेंसी के लिए ज़रूरी हैं। सीमेन कम निकलना एक अलग समस्या है जिसमें प्रोस्टेट या सेमिनल वेसिकल से जुड़ी समस्या हो सकती है। और स्पर्म काउंट कम होना एक अलग समस्या है जिसमें टेस्टिकल या हार्मोन की गड़बड़ी हो सकती है। इस लेख में दोनों पहलुओं पर चर्चा करेंगे सीमेन वॉल्यूम यानी वीर्य कैसे बढ़ाएं और स्पर्म काउंट कैसे बढ़ाएं, डाइट और लाइफस्टाइल में क्या बदलें, और कब मेडिकल ट्रीटमेंट ज़रूरी है।
सीमेन एनालिसिस (semen analysis) रिपोर्ट में "स्पर्म कॉन्सेंट्रेशन" के नीचे जो नंबर लिखा होता है, वो बताता है कि 1 ml सीमेन में कितने मिलियन स्पर्म हैं। WHO के मुताबिक 15 मिलियन/ml या उससे ऊपर सामान्य माना जाता है। पूरे इजैकुलेट में कुल स्पर्म संख्या 39 मिलियन या उससे अधिक होना सामान्य संदर्भ सीमा मानी जाती है।
अब वीर्य कैसे बढ़ाएँ, इसे समझने के लिए सबसे पहले यह फ़र्क़ जानना जरूरी है। सीमेन एक मिश्रित द्रव है जिसमें 60 से 70% हिस्सा सेमिनल वेसिकल (seminal vesicle) , 20 से 30% प्रोस्टेट (prostate) , और बाकी बल्बोयूरेथ्रल ग्लैंड (bulbourethral gland) और एपिडिडाइमिस (epididymis) से आता है। स्पर्म इस पूरे वॉल्यूम का केवल 2-5% हिस्सा होते हैं। इसलिए अगर सीमेन ज्यादा निकल रहा है, तो ज़रूरी नहीं कि स्पर्म भी ज़्यादा हों। और अगर सीमेन कम निकल रहा है, तो भी स्पर्म काउंट ठीक हो सकता है।
नॉर्मल सीमेन वॉल्यूम 1.5 ml या ज्यादा होता है। लगातार 1 ml से कम निकलना रेट्रोग्रेड इजैकुलेशन (retrograde ejaculation) नामक स्थिति का संकेत हो सकता है, जिसमें सीमेन बाहर आने की बजाय ब्लैडर में चला जाता है। इजैकुलेशन के बीच का अंतराल भी वॉल्यूम पर असर डालता है। बहुत बार इजैकुलेट करने से वॉल्यूम कम होता है, 2 से 3 दिन के गैप पर इजैकुलेट करने से वॉल्यूम बढ़ जाता है।
|
पैरामीटर |
नॉर्मल |
लो |
|
स्पर्म काउंट (प्रति ml) |
≥ 15 मिलियन/ml |
< 15 मिलियन/ml |
|
कुल स्पर्म संख्या (प्रति इजैकुलेट) |
≥ 39 मिलियन |
< 39 मिलियन |
|
सीमेन वॉल्यूम |
≥ 1.5 ml |
< 1.5 ml |
|
फर्टिलिटी पर प्रभाव |
गर्भधारण की संभावना सामान्य |
गर्भधारण की संभावना कम हो सकती है | |
वीर्य कैसे बढ़ाएं इसका सही जवाब तभी मिलेगा जब कारण पता हो। स्पर्म काउंट कम होने के कारणों को हम तीन कैटेगरी में बाँटकर समझते हैं।
ये ऐसे कारण हैं जिन्हें आप अपनीलाइफस्टाइल में बदलाव करके सुधार सकते हैं।
कुछ मेडिकल कंडीशन्स की वजह से भी वीर्य और स्पर्म काउंट से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।
ये कारण कुछ दवाइयों के उपयोग और मेडिकल हिस्ट्री से जुड़े हो सकते हैं।
डॉ आशिमा के अनुसार:
वीर्य की मात्रा होने की स्थिति में संपूर्ण स्वास्थ्य बनाए रखना शुक्राणुओं की संख्या और फर्टिलिटी को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्वस्थ और संतुलित आहार का पालन करने की पुरजोर सलाह दी जाती है, जिसमें फलों, हरी सब्जियों, दूध, अंडे और दालों जैसे प्राकृतिक खाद्य स्रोतों से पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन और खनिज शामिल हों, जबकि जंक और प्रोसेस्ड फुड से परहेज करें।
हम हमारे मरीजों को नियमित शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देते हैं, क्योंकि व्यायाम हार्मोनल संतुलन और संपूर्ण स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायक होता है। प्रतिदिन 7-8 घंटे की पर्याप्त नींद भी अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, क्योंकि नींद की कमी हार्मोन के स्तर को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।
फैमिली प्लानिंग करने वाले मरीजों को धूम्रपान और शराब के सेवन से पूरी तरह परहेज करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि ये आदतें शुक्राणुओं की गुणवत्ता और संख्या को काफी कम कर सकती हैं। तनाव प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, और मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए ध्यान, योग और विश्राम तकनीकों का अभ्यास करना चाहिए।
आवश्यकता पड़ने पर, डॉक्टर की सलाह के अनुसार उचित सप्लीमेंट या दवाओं के लिए चिकित्सा परामर्श लिया जा सकता है। कुल मिलाकर, स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनावमुक्त जीवनशैली अपनाने से सामान्य स्वास्थ्य के साथ-साथ प्रजनन स्वास्थ्य में भी काफी सुधार हो सकता है।
कुछ आदतें ऐसी हैं जो धीरे-धीरे स्पर्म क्वालिटी को नुकसान पहुँचा सकती हैं,, और ज़्यादातर पुरुषों को इसका पता भी नहीं चलता।
गर्मी का एक्सपोज़र सबसे underrated कारण है। टेस्टिकल इसीलिए शरीर के बाहर होते हैं क्योंकि उन्हें बॉडी टेम्परेचर से 2 से 3 डिग्री नीचे रहना होता है। लैपटॉप गोद में रखकर काम करना, गर्म पानी के बाथ, सॉना, और टाइट अंडरवियर ये सब टेस्टिकल्स का तापमान बढ़ाते हैं। कुछ स्टडीज़ के मुताबिक रोज़ 30 मिनट से ज़्यादा लैपटॉप गोद में रखने परस्क्रोटल टेम्परेचर 2.5 डिग्री बढ़ जाता है।
खराब डाइट जिसमें ज़िंक (zinc), सेलेनियम (selenium), और एंटीऑक्सीडेंट्स (antioxidants) की कमी हो। प्रोसेस्ड फूड, ट्रांस फैट, और अत्यधिक शुगर जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाते हैं जिससे स्पर्म को नुकसान पहुँच सकता है।
नींद की कमी भी बड़ा फैक्टर है। टेस्टोस्टेरोन का 70% उत्पादन गहरी नींद (deep sleep) के दौरान होता है। जो पुरुष रोज़ 6 घंटे से कम सोते हैंउनमें टेस्टोस्टेरोन 10 से 15% तक कम पाया गया है।
दिनभर बैठे रहना, बहुत ज्यादा चाय कॉफी 5 से 6 कप से ज़्यादा, और ड्रग्स भी स्पर्म हेल्थ को नुकसान पहुँचाते हैं।
|
आदत |
स्पर्म हेल्थ पर असर |
|
टेस्टिकल्स के आसपास ज्यादा गर्मी |
स्पर्म प्रोडक्शन और क्वालिटी कम हो सकती है। |
|
अनहेल्दी डाइट |
स्पर्म को ऑक्सीडेटिव डैमेज पहुंच सकता है। |
|
कम नींद लेना |
टेस्टोस्टेरोन और स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित हो सकता है। |
|
दिनभर बैठे रहना |
प्रजनन स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। |
|
बहुत ज्यादा चाय/कॉफी पीना |
स्पर्म हेल्थ प्रभावित हो सकती है। |
|
ड्रग्स का सेवन |
स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और क्वालिटी घट सकती है। |
वीर्य बढ़ाने के लिए दो तरह के बदलाव ज़रूरी हैं: एक जो सीमेन वॉल्यूम बढ़ाएँ, और दूसरे जो स्पर्म काउंट में सुधार करें । दोनों में काफ़ी ओवरलैप है।
बहुत ज़्यादा बार (जैसे दिन में दो बार) इजैकुलेट करने से सीमेन वॉल्यूम कम हो जाता है और स्पर्म को mature होने का पर्याप्त समय नहीं मिलता। 2-3 दिन का गैप रखने पर वॉल्यूम और स्पर्म काउंट दोनों में सुधार देखा जाता है। लेकिन 7 दिन से ज़्यादा रुकना भी ठीक नहीं, क्योंकि तब स्पर्म की मोटिलिटी कम हो जाती है।
हफ्ते में 4 से 5 दिन, 30 से 45 मिनट की मॉडरेट एक्टिविटी करनी चाहिए। वॉकिंग, जॉगिंग, स्विमिंग, या बैडमिंटन जैसी चीज़ें टेस्टोस्टेरोन को नेचुरली बढ़ाती हैं।
एक स्टडी में 16 हफ्ते रेगुलर एक्सरसाइज करने वाले पुरुषों में स्पर्म कॉन्सेंट्रेशन 8.3% और मोटिलिटी 12.4% बढ़ी।
बहुत अधिक या बहुत लंबा वर्कआउट यानी रेगुलर 2 घंटे से ज़्यादा एक्सरसाइज करना भी उल्टा असर डाल सकता है।
अगर BMI 25 से ऊपर है, तो वज़न कम करना एक महत्वपूर्ण कदम है। कुछ मामलों में 10% वज़न कम करने से टेस्टोस्टेरोन 50 से 100 ng/dl तक बढ़ सकता है।
सीमेन 90% से अधिक पानी से बना होता है। डिहाइड्रेशन सीधे सीमेन वॉल्यूम को प्रभावित करता है। रोज़ 8 से 10 गिलास पानी ज़रूरी है, गर्मियों में और भी ज़्यादा।
सोने और जागने का टाइम फिक्स रखें। सोने से 1 घंटा पहले स्क्रीन बंद करें। गहरी नींद में टेस्टोस्टेरोन अपने उच्चतम स्तर पर होता है।
योग, प्राणायाम, मेडिटेशन, या कोई भी ऐसी एक्टिविटी करें जो दिमाग को शांत करें । स्ट्रेस कम होने पर कॉर्टिसोल का स्तर कम होता है और टेस्टोस्टेरोन का प्रभाव बढ़ता है।
स्मोकिंग छोड़ने के लगभग 3 महीने बाद नए बनने वाले स्पर्म बेहतर क्वालिटी के होते हैं। अगर शराब पूरी तरह नहीं छोड़ी जा सकती, तो हफ़्ते में 3 से 4 ड्रिंक्स से कम पिएं।
लैपटॉप गोद में न रखकर हमेशा टेबल पर रखें। लूज़ कॉटन बॉक्सर्स पहनें। गर्म पानी से नहाना कम करें और सॉना अवॉइड करें।
स्पर्म बनने की पूरी प्रक्रिया (spermatogenesis) में करीब 74 दिन लगते हैं। इसलिए किसी भी बदलाव का नतीजा 3 से 6 महीने बाद रिपोर्ट में दिखेगा। एक-दो हफ़्ते में कोई चमत्कार नहीं होगा।
वीर्य कैसे बढ़ाएं इसमें डाइट का रोल बहुत बड़ा है। नीचे वो फूड्स हैं जो स्पर्म प्रोडक्शन और सीमेन हेल्थ दोनों के लिए फ़ायदेमंद हैं।
ज़िंक (Zinc) स्पर्म प्रोडक्शन और टेस्टोस्टेरोन दोनों के लिए ज़रूरी मिनरल है। कुछ स्टडीज़ में 3 महीने तक ज़िंक सप्लीमेंट लेने से स्पर्म काउंट में सुधार देखा गया है।
टमाटर (लाइकोपीन/lycopene), अनार, ब्लूबेरी, डार्क चॉकलेट। ये ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से स्पर्म DNA को बचाते हैं। रोज़ 2 टमाटर खाने वाले पुरुषों में लाइकोपीन का पॉजिटिव इफेक्ट दिखा है।
अखरोट (ओमेगा-3), बादाम (विटामिन E), ब्राज़ील नट्स (सेलेनियम/selenium) सिर्फ 2 से 3 नट्स में पूरे दिन की ज़रूरत पूरी हो जाती है। एक 12 सप्ताह की स्टडी में रोज़ 75 gm अखरोट खाने वालों की मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी दोनों सुधरी।
ज़र्दी सहित अंडे जिसमें विटामिन D होता है, पनीर, दही, दालें, स्प्राउट्स इत्यादि प्रोटीन के सोर्स अपने खाने में शामिल करें। स्पर्म बनने के लिए अमीनो एसिड्स आवश्यक होते हैं , जो प्रोटीन से मिलते हैं।
संतरा, आँवला, अमरूद इनसे विटामिन C मिलता है, पालक, ब्रोकली से फ़ोलिक एसिड मिलता है, गाजर से बीटा कैरोटीन मिलती है, इसीलिए इन्हें अपने भोजन में जरूर शामिल करें।
|
फूड कैटेगरी |
क्या खाएं |
क्या फायदा करता है |
|
ज़िंक-रिच फूड्स |
कद्दू के बीज, दालें, चने, काजू, मूंगफली, अंडे; नॉन-वेज में ऑयस्टर, मटन, चिकन लिवर |
ज़िंक स्पर्म प्रोडक्शन और टेस्टोस्टेरोन बनाने में मदद करता है, जिससे स्पर्म काउंट बेहतर हो सकता है। |
|
एंटीऑक्सीडेंट फूड्स |
टमाटर (लाइकोपीन), अनार, ब्लूबेरी, डार्क चॉकलेट |
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से स्पर्म DNA की रक्षा करते हैं और स्पर्म की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करते हैं। |
|
नट्स और सीड्स |
अखरोट, बादाम, ब्राज़ील नट्स |
ओमेगा-3, विटामिन E और सेलेनियम स्पर्म की मोटिलिटी (गतिशीलता) और मॉर्फोलॉजी (बनावट) को सपोर्ट करते हैं। |
|
प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ |
ज़र्दी सहित अंडे, पनीर, दही, दालें, स्प्राउट्स |
स्पर्म सेल्स बनने के लिए आवश्यक अमीनो एसिड्स उपलब्ध कराते हैं। |
|
फल और सब्ज़ियाँ |
संतरा, आँवला, अमरूद, पालक, ब्रोकोली, गाजर |
विटामिन C, फोलिक एसिड और बीटा-कैरोटीन स्पर्म को फ्री-रैडिकल डैमेज से बचाने और उनकी गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करते हैं। |
ज़्यादा प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड, सोडा और कोल्ड ड्रिंक्स, ट्रांस फैट जैसे बेकरी आइटम्स से बचें क्योंकि इससे फ़ाइटोएस्ट्रोजन बढ़ सकता है, और 4 कप से ज़्यादा कैफ़ीन को अवॉयड करें।
वीर्य कैसे बढ़ाएँ में सिर्फ स्पर्म काउंट पर फ़ोकस करना गलती होगी। मोटिलिटी (motility) और मॉर्फोलॉजी (morphology) भी उतनी ही जरूरी हैं, बल्कि कई बार इनका महत्त्व ज़्यादा होता है।
स्पर्म को अंडे (egg) तक पहुँचने के लिए सर्विक्स (cervix) को पार करना होता है , फिर यूट्रस (uterus) से होते हुए फ़ैलोपियन ट्यूब (fallopian tube) तक जाना होता है। यह 15-18 cm की दूरी होती है। अगर स्पर्म ठीक से तैर नहीं पा रहा है, तो वह बीच में ही रुक जाएगा। WHO स्टैंडर्ड के हिसाब से 40% या ज़्यादा स्पर्म मोटाइल, और 32% प्रोग्रेसिव मोटिलिटी वाले यानी सीधे आगे बढ़ने वाले स्पर्म नॉर्मल होते हैं।
मॉर्फोलॉजी (Morphology) का मतलब है स्पर्म की बनावट कैसी है। WHO की गाइडलाइन के अनुसार कम से कम 4% स्पर्म का आकार और संरचना नॉर्मल होना चाहिए।
अगर स्पर्म की शेप खराब हो, तो उन्हें एग की बाहरी परत यानी ज़ोना पेलुसिडा (Zona Pellucida) को भेदने और एग को फर्टिलाइज़ करने में दिक्कत हो सकती है।
स्पर्म की मॉर्फोलॉजी खराब होने के पीछे ऑक्सीडेटिव डैमेज, इंफेक्शन, स्मोकिंग, गर्मी, और कुछ जेनेटिक कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।
कई मामलों में एंटीऑक्सीडेंट-रिच डाइट, सही लाइफस्टाइल, और इंफेक्शन का समय पर इलाज करने से मॉर्फोलॉजी में सुधार देखा जा सकता है।
सबसे पहले यही टेस्ट किया जाता है। इसमें 2-5 दिन बिना इज़ाक्युलेशन के रहने के बाद सैंपल दिया जाता है।
इस एक टेस्ट में काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी, सीमेन वॉल्यूम, pH, और लिक्विफ़ेक्शन टाइम इत्यादि सब चेक किया जाता है ।
लेकिन एक बात याद रखें कि एब्नॉर्मल रिपोर्ट मतलब यह नहीं कि आपको कोई प्रॉब्लम है। बुखार, खराब नींद, या स्ट्रेस से भी अस्थायी गिरावट आ सकती है। डॉक्टर पुष्टि के लिए 2 से 4 हफ्ते बाद दोबारा टेस्ट करवाते हैं और तब कोई निर्णय लिया जाता है।
ब्लड से FSH, LH, टेस्टोस्टेरोन, प्रोलैक्टिन, और थायरॉइड (TSH, T3, T4) की जांच की जाती है। FSH बहुत ज़्यादा बढ़ा हो तो इसका मतलब है कि टेस्टिकल्स ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। प्रोलैक्टिन बढ़ा हो तो यह स्पर्म का प्रोडक्शन रोक देता है।
वैरिकोसील और टेस्टिकल साइज़ (नॉर्मल 15 से 25 ml), और कोई गाँठ या असामान्यता देखने के लिए।
जब बार-बार IVF (इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन) फेल हो या मिसकैरेज हो तब स्पर्म DNA फ्रैगमेंटेशन (DNA fragmentation) टेस्ट किया जाता है। जब स्पर्म काउंट 5 मिलियन से कम हो तब जेनेटिक टेस्ट जिसमें कैरियोटाइप, Y माइक्रोडिलीशन को चेक किया जाता है। पोस्ट-इजैकुलेटरी यूरिनलिसिस (post-ejaculatory urinalysis) तब किया जाता है जब रेट्रोग्रेड इजैकुलेशन का शक हो।
लो स्पर्म काउंट से नेचुरल प्रेगनेंसी के चांस कम होते हैं, लेकिन कम का मतलब यह नहीं है कि नेचुरल प्रेगनेंसी हो ही नहीं सकती
इसे इस तरह समझें, इजैकुलेट में करोड़ों स्पर्म निकलते हैं, लेकिन सर्विक्स को पार करने के बाद सिर्फ़ कुछ लाख बचते हैं, और फैलोपियन ट्यूब में एग(अंडाणु) के पास सिर्फ़ कुछ सौ स्पर्म ही पहुँचते हैं। अगर शुरुआत में ही संख्या कम हो, तो अंत तक पहुँचने वाले और भी कम हो जाते हैं।
माइल्ड ऑलिगोस्पर्मिया (10 से 15 मिलियन/ml) में नेचुरल प्रेगनेंसी के चांस अच्छे रहते हैं, खासकर अगर मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी ठीक हो और पार्टनर की फर्टिलिटी नॉर्मल हो। मॉडरेट (5 से 10 मिलियन/ml) में IUI (इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन) से मदद मिल सकती है। सीवियर (5 मिलियन/ml से कम) में IVF या ICSI ज़्यादा सही रहता है।
वीर्य कैसे बढ़ाएँ, इसके मेडिकल ऑप्शंस कारण पर डिपेंड करते हैं। ट्रीटमेंट तभी सही काम करता है जब कारण सही पहचाना गया हो।
हार्मोनल इम्बैलेंस हो तो क्लोमीफ़ीन (clomiphene) टैबलेट या HCG इंजेक्शन दिए जाते हैं। ये दिमाग को सिग्नल भेजते हैं कि FSH/LH बनाओ, जिससे टेस्टिकल्स एक्टिव होते हैं। अगर प्रोलैक्टिन बढ़ा हो तो कैबरगोलीन (cabergoline) और इंफेक्शन हो तो एंटीबायोटिक कोर्स करने की सलाह दी जाती है। लेकिन याद रहे, जब तक डॉक्टर न बताएं, कोई दवाई खुद से न लें।
वैरिकोसेलेक्टॉमी (varicocelectomy) सबसे कॉमन सर्जिकल ऑप्शन है। इसके बाद 60 से 70% पुरुषों में सीमेन पैरामीटर सुधरते हैं, और 30 से 40% में नेचुरल प्रेगनेंसी हो जाती है। ब्लॉकेज हो तो माइक्रोसर्जरी से रास्ता खोला जाता है। अगर पहले परिवार नियोजन के लिए वेसेक्टमी हुई हो तो वेसेक्टमी रिवर्सल भी एक ऑप्शन है।
कोई भी मेडिकल ट्रीटमेंट तभी पूरा फायदा देगा जब साथ में डाइट, एक्सरसाइज़, नींद, और हानिकारक आदतें भी ठीक की जाएँ।
अगर बॉडीबिल्डिंग स्टेरॉइड्स ले रहे हैं तो तुरंत बंद करें। रिकवरी में 6 से 12 महीने लगते हैं, कभी-कभी 18 महीने तक भी। कुछ केसों में HCG और FSH इंजेक्शन से रिकवरी तेज की जा सकती है।
जब स्पर्म काउंट बहुत कम हो, मोटिलिटी बहुत खराब हो, या दवाइयों और सर्जरी से 6-12 महीने तक कोई सुधार न हो, तो ART यानी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
यह माइल्ड लो-काउंट स्पर्म होने पर पहला तरीका होता है। स्पर्म को लैब में वॉश करके सबसे अच्छे मोटाइल स्पर्म अलग किए जाते हैं और सीधे गर्भाशय यानी यूट्रस (uterus) में डाले जाते हैं। इससे स्पर्म का एग तक पहुँचने की दूरी कम हो जाती है और प्रेगनेंसी के चांस बढ़ जाते हैं।
अंडाणु (egg) और शुक्राणु को लैब डिश में फर्टिलाइज़ किया जाता है। फर्टिलाइज़ेशन होने पर बना एम्ब्रियो(embryo) यूट्रस में ट्रांसफर किया जाता है। IVF में भी कुछ हज़ार मोटाइल स्पर्म जरूरी होते हैं।
सीवियर मेल इनफर्टिलिटी में ICSI सबसे कारगर उपाय है। इसमें एक सिंगल स्पर्म को माइक्रोस्कोप से चुनकर सीधे अंडे के अंदर इंजेक्ट किया जाता है। इसके लिए सिर्फ़ एक अच्छा स्पर्म काफ़ी है। अगर सीमेन में बिल्कुल स्पर्म न मिलें, यानी एज़ूस्पर्मिया (azoospermia) हो, तो TESE (टेस्टिकुलर स्पर्म एक्सट्रैक्शन) से टेस्टिकल से सीधे स्पर्म निकालकर ICSI किया जाता है।
वीर्य कैसे बढ़ाएं इसका जवाब एक बात से शुरू होता है कि, पहले समझें कि दिक्कत सीमेन वॉल्यूम में है या स्पर्म काउंट में, और फिर कारण पता करें।
बहुत से कारण, जैसे स्मोकिंग, शराब, मोटापा, खराब डाइट, और नींद की कमी, को ठीक करना आपके हाथ में हैं। इन्हें ठीक करने से 3 से 6 महीने में रिपोर्ट में सुधार दिखता है।
अगर लाइफस्टाइल बदलाव से फर्क न पड़े, तो हार्मोन और अल्ट्रासाउंड जाँच से कारण पकड़ में आता है।
दवाइयाँ और सर्जरी बहुत से केसों में काम करती हैं। और सबसे मुश्किल स्थिति में भी ICSI जैसी तकनीक मौजूद है जो सिर्फ़ एक स्पर्म से प्रेगनेंसी संभव कर सकती है।
हेल्दी डाइट (ज़िंक, विटामिन C, एंटीऑक्सीडेंट्स), रेगुलर एक्सरसाइज़, 7 से 8 घंटे की नींद, स्मोकिंग-शराब बंद करना, और स्ट्रेस मैनेज करना सबसे असरदार तरीके हैं। कोई मेडिकल कारण हो तो दवाइयों या सर्जरी से सुधार होता है।
स्मोकिंग, शराब, मोटापा, हॉर्मोनल इम्बैलेंस, वैरिकोसील, इंफेक्शन, स्ट्रेस, कुछ दवाइयाँ ख़ासकर स्टेरॉइड्स, और जेनेटिक कारण सबसे कॉमन वजहें हैं।
ज़िंक-रिच फूड्स (कद्दू के बीज, दालें, नट्स), सेलेनियम (ब्राज़ील नट्स), विटामिन C (आँवला, संतरा), ओमेगा-3 (अखरोट, अलसी), और एंटीऑक्सीडेंट फूड्स (टमाटर, अनार, बेरीज़) सबसे फ़ायदेमंद हैं।
ज़्यादातर पुरुषों में कोई बाहरी लक्षण नहीं होता। यह सिर्फ़ सीमेन एनालिसिस से पता चलता है। कुछ केसों में सेक्स ड्राइव कम होना, टेस्टिकल में दिक्कत, या इजैकुलेशन कम होना संकेत हो सकता है।
हाँ, लंबे समय का स्ट्रेस कॉर्टिसोल बढ़ाता है जो टेस्टोस्टेरोन को दबाता है। इससे स्पर्म बनने की प्रोसेस धीमी हो जाती है और काउंट गिर सकता है।
स्पर्म बनने का पूरा साइकल करीब 74 दिन का है। लाइफस्टाइल बदलाव या ट्रीटमेंट शुरू करने के 3 से 6 महीने बाद रिपोर्ट में फ़र्क़ दिखता है।
हाँ, मॉडरेट एक्सरसाइज़ (30 से 45 मिनट, हफ़्ते में 4 से 5 दिन) टेस्टोस्टेरोन बढ़ाती है और स्पर्म हेल्थ सुधारती है। बहुत ज़्यादा हैवी या लंबे वर्कआउट से बचें।
हाँ, स्मोकिंग काउंट, मोटिलिटी, और DNA क्वालिटी तीनों को खराब करती है। तम्बाकू छोड़ने के 3 महीने बाद नए स्पर्म बेहतर क्वालिटी के बनने लगते हैं।
स्पर्म की तैरने और आगे बढ़ने की क्षमता। WHO के मुताबिक 40% या ज़्यादा स्पर्म मोटाइल होने चाहिए। कम मोटिलिटी में स्पर्म अंडे तक पहुँचने में असमर्थ होते हैं।
हाँ, माइल्ड लो काउंट में नेचुरल प्रेगनेंसी के अच्छे चांस रहते हैं। मॉडरेट में IUI मदद कर सकता है। सीवियर केसों में IVF/ICSI से प्रेगनेंसी संभव है।
2 से 5 दिन एब्स्टिनेंस के बाद लैब में सीमेन सैंपल देना होता है। काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी, वॉल्यूम, और pH चेक होता है। रिज़ल्ट 1 से 2 दिन में आ जाता है।
लो स्पर्म काउंट, कम मोटिलिटी, वैरिकोसील, हॉर्मोनल इम्बैलेंस, ब्लॉकेज, इंफेक्शन, जेनेटिक कारण, और लाइफस्टाइल फ़ैक्टर्स (स्मोकिंग, शराब, मोटापा) मुख्य कारण हैं।
हाँ, 40 के बाद काउंट, मोटिलिटी, और DNA क्वालिटी में धीरे-धीरे गिरावट आती है। DNA फ्रैगमेंटेशन भी बढ़ता है जिससे मिसकैरेज का रिस्क बढ़ सकता है। लेकिन पुरुष बढ़ती उम्र में भी पिता बन सकते हैं।
विटामिन C (एंटीऑक्सीडेंट प्रोटेक्शन), विटामिन D (टेस्टोस्टेरोन सपोर्ट), विटामिन E (स्पर्म मेम्ब्रेन), ज़िंक (स्पर्म प्रोडक्शन), सेलेनियम (मोटिलिटी), फ़ोलिक एसिड (DNA क्वालिटी), और CoQ10 (सेलुलर एनर्जी) सबसे ज़रूरी हैं।
एक साल कोशिश के बाद प्रेगनेंसी न हो (पार्टनर 35+ हो तो 6 महीने), रिपोर्ट अब्नॉर्मल हो, या सेक्शुअल फंक्शन में दिक्कत हो तो तुरंत फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें।
हाँ, IVF और ICSI दोनों लो स्पर्म काउंट में कारगर हैं। ICSI में सिर्फ़ एक स्पर्म काफ़ी है जो सीधे अंडे में इंजेक्ट किया जाता है। एज़ूस्पर्मिया में भी TESE से स्पर्म निकालकर ICSI संभव है।
हाँ, वज़न कम करने से एस्ट्रोजन गिरता है, टेस्टोस्टेरोन बढ़ता है, और इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधरती है। 10% वज़न कम करने पर भी स्पर्म पैरामीटर्स में सुधार देखा गया है।
WHO के मुताबिक 15 मिलियन/ml या ज़्यादा नॉर्मल है। कुल इजैकुलेट में 39 मिलियन या ज़्यादा स्पर्म होने चाहिए। इसके अलावा मोटिलिटी 40%+, मॉर्फोलॉजी 4%+, और वॉल्यूम 1.5 ml+ भी ज़रूरी है।
छोटा-मोटा रोज़ का स्ट्रेस बड़ा नुकसान नहीं करता। लेकिन अगर हफ्तों-महीनों तक तनाव बना रहे तो हॉर्मोनल बैलेंस बिगड़ता है। योग, मेडिटेशन, या कोई रिलैक्सिंग एक्टिविटी स्पर्म हेल्थ के लिए फायदेमंद है।