स्पर्मेटोजेनेसिस (Spermatogenesis): शुक्राणु बनने की पूरी प्रक्रिया और फर्टिलिटी से इसका रिश्ता

Last updated: August 10, 2026

Overview

स्पर्मेटोजेनेसिस पुरुषों में अंडकोष के अंदर शुक्राणु बनने और उनके परिपक्व होने की प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस ब्लॉग में जानें शुक्राणु कहाँ और कैसे बनते हैं, स्पर्मेटोजेनेसिस के अलग-अलग चरण क्या हैं, FSH, LH और टेस्टोस्टेरोन की क्या भूमिका होती है और शुक्राणु बनने में कितना समय लगता है। साथ ही समझें कि टेस्टोस्टेरोन या एनाबॉलिक स्टेरॉयड, जीवनशैली और अन्य कारक शुक्राणु निर्माण को कैसे प्रभावित कर सकते हैं और सीमन रिपोर्ट में बदलाव कब दिखाई दे सकता है। 

परिचय

आपके हाथ में जो सीमन रिपोर्ट है, वो आज की तस्वीर नहीं है।

वो क़रीब ढाई महीने पुरानी कहानी बता रही है।

ये एक वाक्य पुरुष प्रजनन के बारे में सबसे ज़्यादा उपयोगी बात है, और सबसे कम बताई जाने वाली भी। जो शुक्राणु आज आपकी रिपोर्ट में गिने गए, उनका बनना दो-ढाई महीने पहले शुरू हुआ था।

यानी अगर उन दिनों तेज़ बुख़ार आया था, कोई दवा चली थी, बहुत तनाव रहा था या नींद बिगड़ी थी - तो असर आज की रिपोर्ट में दिख रहा है।

और उल्टा भी उतना ही सच है। आज से जो सुधार आप शुरू करेंगे, वो रिपोर्ट में तीन महीने बाद दिखेगा। पंद्रह दिन बाद नहीं।

ये पूरी बात इसी घड़ी पर टिकी है, तो चलिए देखते हैं कि ये घड़ी चलती कैसे है।

शुक्राणु कहाँ और कैसे बनते हैं? (Where and How Sperm Is Made)

अंडकोष (Testes) के अंदर बेहद बारीक़ नलियों का एक गुच्छा होता है, जिन्हें सेमिनिफ़ेरस ट्यूब्यूल्स (Seminiferous Tubules) कहते हैं। शुक्राणु यहीं बनते हैं।

इसे एक असेंबली लाइन की तरह समझिए, जो चौबीसों घंटे चलती है। एक सिरे से कच्ची कोशिकाएँ घुसती हैं, दूसरे सिरे से तैयार शुक्राणु निकलते हैं। बीच में कई चरण, और हर चरण का अपना तय समय।

पैमाना समझने लायक़ है। शोध साहित्य के मुताबिक़ मनुष्य में शुक्राणुओं का दैनिक उत्पादन प्रति अंडकोष लगभग 4.5 करोड़ प्रतिदिन आँका गया है - यानी हर सेकंड क़रीब 1,000 शुक्राणु 

हर सेकंड। जब आप ये पंक्ति पढ़ रहे थे, तब भी।

और पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है? उसी स्रोत के मुताबिक़ मनुष्य में स्पर्मेटोजेनेसिस की अवधि 74 दिन बताई गई है, जिसमें सेमिनिफ़ेरस एपिथीलियम का एक चक्र 16 दिन का होता है 

74 दिन। यही वो घड़ी है जिसका ज़िक्र शुरुआत में हुआ था।

स्पर्मेटोजेनेसिस के चरण (Stages of Spermatogenesis): शुक्राणु बनने की पूरी प्रक्रिया

पूरी प्रक्रिया को तीन हिस्सों में बाँटकर देखना आसान है।

पहला हिस्सा - गुणा होना। नली की सबसे बाहरी परत पर मूल कोशिकाएँ बैठी होती हैं, जिन्हें स्पर्मेटोगोनिया (Spermatogonia) कहते हैं। ये लगातार विभाजित होती रहती हैं। कुछ नई कोशिकाएँ आगे बढ़ती हैं, कुछ वहीं रुककर भंडार बनाए रखती हैं - इसीलिए ये फ़ैक्ट्री जीवन भर चलती रह पाती है।

दूसरा हिस्सा - आधा होना। यहाँ मियोसिस (Meiosis) होता है। StatPearls के अनुसार द्विगुणित स्पर्मेटोगोनिया माइटोसिस से प्राइमरी स्पर्मेटोसाइट्स (Primary Spermatocytes) बनाती हैं, जो मियोसिस-I से सेकेंडरी स्पर्मेटोसाइट्स (Secondary Spermatocytes) और फिर मियोसिस-II से स्पर्मेटिड्स (Spermatids) बनाती हैं ।

इस चरण का मक़सद समझिए - गुणसूत्रों (Chromosomes) की संख्या आधी करना। ताकि जब शुक्राणु अंडे से मिले, तो पूरी संख्या बने, दोगुनी नहीं।

तीसरा हिस्सा - शक्ल बदलना। इसे स्पर्मियोजेनेसिस (Spermiogenesis) कहते हैं। अब तक कोशिका गोल थी। यहाँ वो पूरी तरह बदल जाती है - नाभिक सिकुड़कर घना हो जाता है, आगे एक्रोसोम (Acrosome) नाम की टोपी बनती है जो अंडे तक पहुँचने के काम आती है, और पीछे एक पूँछ निकलती है जो तैरने के लिए है ।

इसे ऐसे समझिए जैसे एक गोल डिब्बे को तराशकर तीर बना दिया गया हो - आगे नोक, पीछे पंख।

और एक आख़िरी पड़ाव। अंडकोष से निकलने के बाद भी शुक्राणु तुरंत तैयार नहीं होते। उन्हें एपिडिडाइमिस (Epididymis) नाम की मुड़ी हुई नली से गुज़रना पड़ता है, जहाँ वो तैरना सीखते हैं और परिपक्व होते हैं। इसमें कुछ और दिन लगते हैं।

सर्टोली और लेडिग कोशिकाएँ: शुक्राणु बनने में FSH, LH और टेस्टोस्टेरोन की भूमिका

नली के अंदर दो तरह की सहायक कोशिकाएँ होती हैं, और दोनों का काम अलग है।

सर्टोली कोशिकाएँ (Sertoli Cells) - इन्हें "नर्स कोशिकाएँ" कहा जाता है। ये बढ़ती हुई कोशिकाओं को पोषण, सहारा और सुरक्षा देती हैं। इन्हें आदेश FSH (Follicle Stimulating Hormone) से मिलता है।

लेडिग कोशिकाएँ (Leydig Cells) - ये टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) बनाती हैं, और इन्हें आदेश LH (Luteinizing Hormone) से मिलता है ।

और ये दोनों हार्मोन कहाँ से आते हैं? दिमाग़ से। हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) से GnRH निकलता है, वो पिट्यूटरी ग्रंथि (Pituitary Gland) को कहता है, और पिट्यूटरी FSH और LH भेजती है ।

तो पूरी शृंखला ऐसी है: दिमाग़ → पिट्यूटरी → अंडकोष।

ये शृंखला याद रखिए। अगले सेक्शन में यही सबसे ज़रूरी होने वाली है।

टेस्टोस्टेरोन और स्टेरॉयड का स्पर्म काउंट पर असर (Effect of Testosterone on Sperm Count)

अब बात उस चीज़ की, जो भारत में तेज़ी से बढ़ रही है और जिसका असर लोग समझते नहीं।

बाहर से ली गई टेस्टोस्टेरोन - इंजेक्शन, जेल या "मसल बनाने वाले" स्टेरॉयड - शुक्राणु बनना रोक देती है।

क्यों? उसी शृंखला की वजह से।

इसे थर्मोस्टैट की तरह समझिए। कमरे में हीटर बाहर से लगा दीजिए, तो थर्मोस्टैट सोचेगा कि कमरा गर्म है और बॉयलर बंद कर देगा। शरीर ठीक यही करता है - बाहर से टेस्टोस्टेरोन आती देखकर दिमाग़ मान लेता है कि काम हो रहा है, और FSH व LH भेजना बंद कर देता है। सिग्नल रुकते ही फ़ैक्ट्री ठप।

AUA/ASRM गाइडलाइन इसे साफ़ शब्दों में दर्ज करती है - बाहर से दी गई टेस्टोस्टेरोन हाइपोथैलेमस और पिट्यूटरी को नेगेटिव फ़ीडबैक देती है, जिससे गोनैडोट्रॉपिन का स्राव रुक सकता है; दबाव की मात्रा के हिसाब से शुक्राणु-निर्माण घट सकता है या पूरी तरह बंद हो सकता है, जिसका नतीजा एज़ूस्पर्मिया (Azoospermia) होता है।

एज़ूस्पर्मिया यानी वीर्य में शुक्राणु का बिल्कुल न होना।

गाइडलाइन की सिफ़ारिश इससे भी दो-टूक है - जो पुरुष अभी या भविष्य में संतान चाहते हैं, उन्हें बाहर से टेस्टोस्टेरोन थेरेपी नहीं दी जानी चाहिए (AUA/ASRM Guideline)। और AUA की अलग टेस्टोस्टेरोन गाइडलाइन में इसे सबसे ऊँचे दर्जे की सिफ़ारिश के तौर पर रखा गया है - जो पुरुष इस वक़्त संतान की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें बाहर से टेस्टोस्टेरोन थेरेपी नहीं दी जानी चाहिए (Strong Recommendation, Grade A) ।

अब अच्छी ख़बर। AUA/ASRM के सबूतों की समीक्षा में ये भी दर्ज है कि एनाबॉलिक स्टेरॉयड या बाहरी टेस्टोस्टेरोन से स्थायी बांझपन नहीं होता - यानी असर लौटने योग्य है - हालाँकि इनका मौजूदा इस्तेमाल वर्तमान प्रजनन क्षमता और शुक्राणु-निर्माण पर बड़ा असर डालता है ।

तो अगर आपने जिम में या किसी की सलाह पर ये चीज़ें ली हैं - घबराइए मत, पर छुपाइए भी मत। अपने डॉक्टर को साफ़-साफ़ बता दीजिए। इसके बिना आपकी रिपोर्ट का सही मतलब निकल ही नहीं सकता, और इलाज ग़लत दिशा में चला जाएगा।

क्या स्पर्म काउंट बढ़ाने वाली दवाएँ और सप्लीमेंट काम करते हैं?

बाज़ार इन कैप्सूलों से भरा है - एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन, हर्बल मिश्रण।

AUA/ASRM गाइडलाइन का रुख़ इस पर संयत लेकिन साफ़ है - मरीज़ों को बताया जाना चाहिए कि सप्लीमेंट (जैसे एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन) के फ़ायदे पुरुष बांझपन के इलाज में संदिग्ध नैदानिक उपयोगिता के हैं।

"संदिग्ध उपयोगिता" - यानी नुक़सान की बात नहीं हो रही, पर फ़ायदे का पक्का सबूत भी नहीं है।

इसका व्यावहारिक मतलब: सप्लीमेंट को असली जाँच और इलाज का विकल्प मत बनाइए। महीनों तक कैप्सूल खाते रहना और असली कारण न ढूँढना - यही सबसे ज़्यादा समय बरबाद करता है।

स्पर्म बनने में कितना समय लगता है और सीमन रिपोर्ट कब दोहरानी चाहिए?

अब शुरुआत वाली बात पर लौटते हैं, क्योंकि इसका व्यावहारिक इस्तेमाल है।

अगर रिपोर्ट ख़राब आई है - पीछे मुड़कर देखिए कि पिछले दो-तीन महीनों में क्या हुआ था। तेज़ बुख़ार? कोई नई दवा? बहुत ज़्यादा यात्रा या तनाव? कोई सर्जरी? ये सब डॉक्टर को बताइए। कई बार एक ख़राब रिपोर्ट का पूरा कारण वहीं मिल जाता है।

अगर आप सुधार शुरू कर रहे हैं - धूम्रपान छोड़ना, वज़न कम करना, टेस्टोस्टेरोन बंद करना, नींद ठीक करना - तो दोबारा जाँच के लिए कम से कम तीन महीने रुकिए। एक महीने बाद जाँच करवाकर निराश होना बिल्कुल बेवजह है, क्योंकि जो शुक्राणु उस रिपोर्ट में गिने जाएँगे, वो आपके बदलाव से पहले ही बनना शुरू हो चुके थे।

क्या एक ख़राब सीमन रिपोर्ट का मतलब बांझपन है?

आख़िर में एक ज़रूरी संतुलन।

AUA/ASRM गाइडलाइन में एक बहुत काम की बात दर्ज है - कुछ ख़ास स्थितियों को छोड़कर, शुक्राणु का कोई भी अकेला मापदंड (जैसे संख्या, बनावट या गतिशीलता) प्रजनन क्षमता का पक्का भविष्यवक्ता नहीं है और न ही अकेले बांझपन का निदान करता है। बांझपन की आशंका तब बढ़ती है जब असामान्य मापदंडों की संख्या बढ़ती जाए ।

इसका मतलब सीधा है: एक पैरामीटर का थोड़ा कम आना कोई फ़ैसला नहीं सुनाता। जो मायने रखता है वो पूरी तस्वीर है - कितने मापदंड प्रभावित हैं, कितनी हद तक, और साथ में शारीरिक जाँच व इतिहास क्या कह रहे हैं।

और यही वजह है कि एक ही रिपोर्ट पर कोई बड़ा निष्कर्ष नहीं निकाला जाता। शुक्राणुओं की संख्या स्वस्थ पुरुषों में भी हफ़्ते-दर-हफ़्ते काफ़ी बदलती है। अगर पहली रिपोर्ट में गड़बड़ी मिली है, तो दोबारा जाँच की बात ज़रूर कीजिए।

Frequently Asked Questions

पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है?

गर्मी से सच में फ़र्क़ पड़ता है?

क्या ज़्यादा बार सम्बंध बनाने से शुक्राणु "ख़त्म" हो जाते हैं?

उम्र का असर पुरुषों पर भी पड़ता है?

बुख़ार के बाद रिपोर्ट ख़राब आई है, क्या ये स्थायी है?

मैंने जिम में टेस्टोस्टेरोन ली थी, अब बंद कर दी - कितने दिन में ठीक होगा?

Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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