ट्रिपल मार्कर टेस्ट क्या है? कब किया जाता है और रिपोर्ट कैसे समझें

Last updated: September 02, 2026

सारांश (Overview)

अगर डबल मार्कर टेस्ट का समय निकल गया है, तो सेकंड ट्राइमेस्टर में किया जाने वाला ट्रिपल मार्कर टेस्ट करवाया जा सकता है। इस टेस्ट में मां के खून में AFP, hCG और एस्ट्रिओल की जांच की जाती है और इन रिजल्ट्स को प्रेगनेंसी के हफ्ते और मां की उम्र जैसी जानकारी के साथ मिलाकर रिस्क निकाला जाता है। 

ट्रिपल मार्कर टेस्ट किसी बीमारी की पुष्टि नहीं करता, लेकिन डाउन सिंड्रोम, एडवर्ड सिंड्रोम और न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट की संभावना का अंदाजा देता है। इस आर्टिकल में आगे जानेंगे कि यह टेस्ट कब करना चाहिए, रिपोर्ट में लिखे नंबरों का क्या मतलब है और हाई रिस्क आने पर आगे क्या किया जाता है। 

Triple Marker Test क्या होता है?

यह सेकंड ट्राइमेस्टर में किया जाने वाला ब्लड टेस्ट है, जिसमें मां के ब्लड में तीन मार्कर की जांच होती है। इन्हीं तीन मार्कर की वजह से इसे ट्रिपल मार्कर टेस्ट कहा जाता है। इसे मैटरनल सीरम स्क्रीनिंग भी कहते हैं।

इन तीनों मार्कर के रिजल्ट को मां की उम्र, वजन और प्रेग्नेंसी के हफ्तों के साथ मिलाकर एक रिस्क रेशियो निकाला जाता है। इससे मुख्य रूप से डाउन सिंड्रोम यानी ट्राइसोमी 21, एडवर्ड सिंड्रोम यानी ट्राइसोमी 18 और खुली न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट की संभावना देखी जाती है।

Pregnancy में Triple Marker Test क्यों किया जाता है?

  • पहली तिमाही की स्क्रीनिंग छूटने पर: डबल मार्कर का समय निकल गया हो, तो सेकंड ट्राइमेस्टर में यह स्क्रीनिंग का विकल्प देता है।
  • न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट की जांच के लिए: इसमें AFP की जांच होती है, जो स्पाइना बिफिडा और एनेंसेफली का संकेत दे सकता है। यही जानकारी पहली तिमाही की स्क्रीनिंग से नहीं मिलती।

ट्रिपल मार्कर टेस्ट कब किया जाता है?

ट्रिपल मार्कर टेस्ट सेकंड ट्राइमेस्टर में 15 से 22 हफ्ते के बीच किया जाता है। न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट की स्क्रीनिंग के लिए कम से कम 15 हफ्ते पूरे होना जरूरी है, इसलिए इससे पहले लिया गया सैंपल दोबारा देना पड़ सकता है। 

ट्रिपल मार्कर टेस्ट करवाने का बेस्ट टाइम 16 से 18 हफ्ते के बीच का होता है। रिपोर्ट सही आने के लिए प्रेगनेंसी के हफ्तों की गिनती भी सही होना जरूरी है। 

Triple Marker Test में कौन-कौन से मार्कर जांचे जाते हैं?

AFP (Alpha-Fetoprotein)

AFP बच्चे के लिवर से बनने वाला प्रोटीन है, जो मां के ब्लड में भी पाया जाता है। अगर इसकी मात्रा ज्यादा आए, तो डॉक्टर न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट की संभावना देखते हैं। वहीं, डाउन सिंड्रोम वाली प्रेगनेंसी में AFP की मात्रा अक्सर कम आती है। 

hCG (Human Chorionic Gonadotropin)

यह प्लेसेंटा से बनने वाला प्रेग्नेंसी हार्मोन है। डाउन सिंड्रोम वाली प्रेगनेंसी में इसका लेवल आमतौर पर बढ़ा हुआ मिलता है।

Estriol (uE3)

Estriol का लेवल, डाउन सिंड्रोम वाली प्रेगनेंसी में अक्सर कम पाया जाता है। वहीं, ट्राइसोमी 18 में AFP, hCG और Estriol तीनों का लेवल कम आ सकता है। इसलिए डॉक्टर तीनों मार्कर को साथ में देखकर बच्चे में इन कंडीशन की संभावना का अंदाजा लगाते हैं।

मार्कर

कहां से आता है

डाउन सिंड्रोम में आमतौर पर

AFP

बच्चे के लिवर से

कम

hCG

प्लेसेंटा से

ज्यादा

Estriol (uE3)

बच्चे और प्लेसेंटा से

कम

तीनों का लेवल एक साथ कम

ट्राइसोमी 18 का पैटर्न

जांच आगे बढ़ाई जाती है

ट्रिपल मार्कर टेस्ट कैसे किया जाता है?

यह नॉर्मल ब्लड टेस्ट ही है। इसमें बांह की नस से सैंपल लेकर लैब भेजा जाता है। इसके लिए आपको खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती।

ब्लड सैंपल के साथ उम्र, वजन, प्रेगनेंसी के हफ्ते, डायबिटीज, सिंगल प्रेगनेंसी है या ट्विन्स हैं और स्मोकिंग करती हैं या नहीं, जैसी जानकारी भी भेजी जाती है। 

इन्हीं जानकारी को मिलाकर रिस्क रेशियो निकाला जाता है, इसलिए सारी जानकारी सही सही देना जरूरी है। जानकारी गलत होने पर रिपोर्ट का रिस्क रेशियो भी गलत आ सकता है।

Triple Marker Test की रिपोर्ट कैसे समझें?

रिपोर्ट में मुख्य रूप से दो चीजें देखी जाती हैं। पहली, तीनों मार्कर की वैल्यू, जो MoM यानी मल्टीपल ऑफ मीडियन में दी जाती है। इससे पता चलता है कि उसी हफ्ते की प्रेगनेंसी में नॉर्मल लेवल की तुलना में आपकी वैल्यू कितनी है।

दूसरी और ज्यादा जरूरी चीज है रिस्क रेशियो, जैसे 1:500 या 1:180। 1:500 का मतलब है कि ऐसी 500 प्रेगनेंसी में से एक में यह कंडीशन मिलने की संभावना है। यानी नंबर जितना बड़ा होगा, रिस्क उतना कम होगा। इसलिए सिर्फ किसी एक मार्कर की वैल्यू देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

Triple Marker Test में हाई रिस्क आने का क्या मतलब है?

हाई रिस्क आने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे में कोई कंडीशन है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की जांच की जरूरत हो सकती है।

किस चीज का रिस्क बढ़ा है, उसके हिसाब से आगे की जांच तय होती है। क्रोमोसोमल कंडीशन की आशंका हो तो NIPT या एम्नियोसेंटेसिस किया जा सकता है। वहीं, AFP ज्यादा आया हो तो डिटेल्ड अल्ट्रासाउंड से बच्चे की रीढ़ और सिर की बनावट देखी जाती है।

अगर आगे की जांच नॉर्मल भी आए, तब भी डॉक्टर प्रेगनेंसी पर थोड़ी ज्यादा नजर रखते हैं, क्योंकि प्रीटर्म डिलीवरी, बच्चे की ग्रोथ कम रहने और प्रीएक्लेम्पसिया का रिस्क थोड़ा बढ़ा हुआ देखा गया है।

Triple Marker Test की Accuracy कितनी होती है?

ट्रिपल मार्कर टेस्ट से डाउन सिंड्रोम के करीब 70 प्रतिशत मामले पकड़ में आ जाते हैं, जबकि करीब 5 प्रतिशत प्रेगनेंसी में रिपोर्ट पॉजिटिव आ सकती है। अगर इसमें चौथा मार्कर इनहिबिन-A भी जोड़ दिया जाए, तो इसे क्वाड्रपल टेस्ट कहते हैं और डाउन सिंड्रोम पकड़ने की क्षमता करीब 80 प्रतिशत हो जाती है।

यानी ट्रिपल मार्कर टेस्ट से हर मामला पकड़ में नहीं आता और हाई रिस्क रिपोर्ट आने का मतलब भी यह नहीं है कि बच्चे में कंडीशन है। यह स्क्रीनिंग टेस्ट है, इसलिए पक्की पुष्टि के लिए आगे की जांच करनी पड़ती है।

Triple Marker Test और Double Marker Test में क्या अंतर है?

पहचान

डबल मार्कर

ट्रिपल मार्कर

कब

11 से 13 हफ्ते 6 दिन

15 से 22 हफ्ते

क्या नापा जाता है

PAPP-A और फ्री बीटा-hCG

AFP, hCG और एस्ट्रिओल

साथ में स्कैन

NT स्कैन जरूरी

अलग से जरूरी नहीं

न्यूरल ट्यूब की जांच

नहीं

हां, AFP के जरिए

डाउन सिंड्रोम की पकड़

करीब 82 से 87 प्रतिशत

करीब 70 प्रतिशत

ट्रिपल मार्कर टेस्ट के लिए डॉक्टर से कब सलाह लें?

  • अगर फर्स्ट ट्राइमेस्टर की स्क्रीनिंग छूट गई है, तो 15 हफ्ते के आसपास डॉक्टर से ट्रिपल मार्कर टेस्ट के बारे में बात कर लें, क्योंकि इसे कराने का समय सीमित होता है।
  • रिपोर्ट हाई रिस्क आई है, तो खुद से नंबर समझने के बजाय डॉक्टर से मिलें। पिछली प्रेगनेंसी में कोई क्रोमोसोमल कंडीशन या न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट रहा हो, डायबिटीज हो या माँ की उम्र 35 साल से ज्यादा हो, तो डॉक्टर को पहले ही बता दें।

 

निष्कर्ष (Conclusion)

ट्रिपल मार्कर टेस्ट सेकंड ट्राइमेस्टर में किया जाने वाला ब्लड टेस्ट है, जिसमें AFP, hCG और एस्ट्रिओल की जांच होती है। इसे 15 से 22 हफ्ते के बीच किया जाता है और 16 से 18 हफ्ते का समय बेहतर माना जाता है। यह डाउन सिंड्रोम, एडवर्ड सिंड्रोम और न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट का रिस्क बताता है, बीमारी की पुष्टि नहीं करता। रिपोर्ट में रिस्क रेशियो सबसे ज्यादा मायने रखता है। हाई रिस्क आने पर NIPT, डिटेल्ड अल्ट्रासाउंड या एम्नियोसेंटेसिस की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए रिपोर्ट देखकर घबराने के बजाय डॉक्टर से उसका मतलब समझें। 

Triple Marker Test के बारे में पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

क्या Triple Marker Test हर गर्भवती महिला के लिए जरूरी है?

क्या Triple Marker Test से बच्चे में किसी बीमारी की पक्की पुष्टि होती है?

Triple Marker Test के लिए खाली पेट रहना पड़ता है?

Triple Marker Test की रिपोर्ट कितने समय में आती है?

Triple Marker Test में High Risk आने पर क्या करना चाहिए?

क्या Triple Marker Test सुरक्षित है?

Triple Marker Test और Anomaly Scan में क्या अंतर है?

Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
© 2026 Indira IVF Hospital Limited. All Rights Reserved. T&C Apply | Privacy Policy| *Disclaimer