सारांश (Overview)
गर्भधारण की कोशिश कर रहे कपल्स अक्सर हार्मोन, उम्र, ओव्यूलेशन और प्रजनन अंगों की सेहत पर ध्यान देते हैं। लेकिन फर्टिलिटी सिर्फ इन चीज़ों पर निर्भर नहीं करती। अंडाणु (egg) और शुक्राणु (sperm) की क्वालिटी पर शरीर के अंदर होने वाली एक और प्रक्रिया का असर पड़ता है, जिसे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस (oxidative stress) कहते हैं। यह तब होता है जब शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स (free radicals) और उन्हें कंट्रोल करने वाले एंटीऑक्सीडेंट (antioxidant) के बीच संतुलन बिगड़ जाता है।
फ्री रेडिकल्स शरीर में सामान्य रूप से बनते रहते हैं और कम मात्रा में इनकी जरूरत भी होती है। लेकिन जब इनकी मात्रा बढ़ जाती है और शरीर की एंटीऑक्सीडेंट डिफेंस इन्हें संभाल नहीं पाती, तो कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। अंडाणु और शुक्राणु भी इससे प्रभावित होते हैं। पुरुषों में इसका असर स्पर्म की क्वालिटी, मोटिलिटी और डीएनए (DNA) पर पड़ सकता है, जबकि महिलाओं में यह अंडाणु की क्वालिटी और ओवरी के सामान्य काम को प्रभावित कर सकता है।
इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस क्या होता है और फ्री रेडिकल्स व एंटीऑक्सीडेंट के बीच संतुलन क्यों जरूरी है। इसके बाद जानेंगे कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पुरुषों और महिलाओं की फर्टिलिटी को कैसे प्रभावित करता है, इसे बढ़ाने वाले कारण क्या हैं और किन लाइफस्टाइल बदलावों से इसे कम किया जा सकता है। साथ ही, हम यह भी समझेंगे कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के लिए एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट्स लेना कब जरूरी हो सकता है और कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को समझने के लिए पहले फ्री रेडिकल्स को समझना जरूरी है। हमारे शरीर की कोशिकाएं ऊर्जा बनाने के लिए ऑक्सीजन का इस्तेमाल करती हैं। इस दौरान कुछ अस्थिर अणु बनते हैं, जिन्हें रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज़ (Reactive Oxygen Species) या ROS कहा जाता है।
इन अणुओं में इलेक्ट्रॉन का संतुलन पूरा नहीं होता। इसलिए ये आसपास के अणुओं से इलेक्ट्रॉन लेने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। यही वजह है कि फ्री रेडिकल्स की मात्रा शरीर में संतुलित रहना जरूरी है।
फ्री रेडिकल्स को सिर्फ नुकसान पहुंचाने वाली चीज़ समझना सही नहीं है। थोड़ी मात्रा में ये शरीर के लिए जरूरी भी होते हैं। ये संक्रमण यानी इन्फेक्शन से लड़ने और शरीर की कुछ सामान्य प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं।
शरीर में इन्हें नियंत्रित करने के लिए अपनी एक रक्षा प्रणाली होती है, जिसे एंटीऑक्सीडेंट कहते हैं। एंटीऑक्सीडेंट फ्री रेडिकल्स को अपना इलेक्ट्रॉन देकर उन्हें स्थिर करने में मदद करते हैं और खुद अस्थिर नहीं होते। इस तरह शरीर में फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच एक संतुलन बना रहता है।
समस्या तब होती है जब शरीर में फ्री रेडिकल्स बहुत ज्यादा बनने लगें या उन्हें संभालने के लिए एंटीऑक्सीडेंट पर्याप्त न हों। ऐसे में फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है। इसी स्थिति को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कहा जाता है।
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ने पर कोशिकाओं के अलग-अलग हिस्सों को नुकसान पहुंच सकता है, जैसे
फर्टिलिटी के मामले में यह नुकसान खास महत्व रखता है, क्योंकि एग और स्पर्म भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए रिप्रोडक्टिव हेल्थ को समझने के लिए ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को समझना बहुत जरूरी है।
इसे एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे लोहे में हवा और नमी के लगातार संपर्क में आने से धीरे-धीरे जंग लगने लगती है, उसी तरह फ्री रेडिकल्स के ज्यादा संपर्क में आने से सेल्स को भी नुकसान हो सकता है।
इसे शरीर के अंदर होने वाली एक तरह की भीतरी जंग समझ सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि शरीर के पास इस नुकसान को कण्ट्रोल करने के लिए एंटीऑक्सीडेंट की अपनी व्यवस्था होती है। परेशानी तब होती है जब फ्री रेडिकल्स का प्रभाव एंटीऑक्सीडेंट की क्षमता से ज्यादा हो जाता है।
इसलिए ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को पूरी तरह खत्म करना लक्ष्य नहीं होता। असली मकसद फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच ऐसा संतुलन बनाए रखना है, जिससे सेल्स को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे।
एग और स्पर्म शरीर की दूसरी कई सेल्स की तुलना में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। एग शरीर की सबसे बड़ी कोशिकाओं में से एक है और इसे पूरी तरह परिपक्व होने में लंबा समय लगता है। इस दौरान ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से होने वाला नुकसान इसकी क्वालिटी को प्रभावित कर सकता है।
वहीं, स्पर्म में हुए नुकसान की मरम्मत करने की क्षमता बहुत सीमित होती है। खासकर स्पर्म के डीएनए को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से नुकसान पहुंच सकता है, जिसका असर स्पर्म की क्वालिटी पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि फर्टिलिटी की बात करते समय सिर्फ हार्मोन और रिप्रोडक्टिव ऑर्गन्स की सेहत पर ध्यान देना काफी नहीं है। एग और स्पर्म के आसपास का सेलुलर वातावरण और फ्री रेडिकल्स व एंटीऑक्सीडेंट के बीच संतुलन भी महत्वपूर्ण होता है।
एग और स्पर्म दोनों ही ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के प्रति संवेदनशील होते हैं, लेकिन इसका असर दोनों पर अलग-अलग तरीके से हो सकता है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस अपने आप में कोई बीमारी नहीं है। यह शरीर के अंदर बनने वाली एक ऐसी स्थिति है, जिसमें फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। यह असंतुलन धीरे धीरे सेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसकी खास बात यह है कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कोई साफ लक्षण दिखाई नहीं देते। कई बार इसका पता तब चलता है जब गर्भधारण में परेशानी आती है या किसी जांच में फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या सामने आती है। महिलाओं और पुरुषों में इसका असर अलग-अलग हो सकता है। आइए इसे दोनों के संदर्भ में समझते हैं।
महिलाओं में एग की क्वालिटी का माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) की सेहत से सीधा संबंध होता है। माइटोकॉन्ड्रिया सेल के अंदर ऊर्जा बनाने का काम करते हैं। जब ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, तो माइटोकॉन्ड्रिया प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर एग के मैच्योर होने और उसकी क्वालिटी पर पड़ सकता है। रिसर्च में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को माइटोकॉन्ड्रिया की गड़बड़ी, फॉलिकल के समय से पहले नष्ट होने, सेल डिवीजन में गड़बड़ी और डीएनए डैमेज जैसे बदलावों से जोड़ा गया है।
इसका असर सिर्फ एग तक सीमित नहीं रहता। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस ओवरी के सामान्य काम और रिप्रोडक्शन से जुड़ी दूसरी प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है। लगातार बना हुआ यह असंतुलन ओव्यूलेशन और गर्भाशय की अंदरूनी परत की ग्रहणशीलता को प्रभावित कर सकता है। इसका सीधा असर कंसीव करने की संभावना पर पड़ सकता है।
उम्र बढ़ने के साथ एग के अंदर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यक्षमता स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है। साथ ही, समय के साथ ऑक्सीडेटिव डैमेज भी जमा हो सकता है। यही वजह है कि उम्र बढ़ने के साथ एग की क्वालिटी से जुड़ी समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं।
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस इस प्राकृतिक प्रक्रिया को और बढ़ा सकता है। इसलिए अगर आप अधिक उम्र में प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो अपनी लाइफस्टाइल पर ध्यान देना मददगार हो सकता है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि अच्छी लाइफस्टाइल उम्र के असर को पूरी तरह रोक नहीं सकती। लेकिन इससे शरीर पर पड़ने वाले अतिरिक्त ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद मिल सकती है।
पुरुषों में स्पर्म ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। इसकी एक वजह यह है कि स्पर्म की झिल्ली में ऐसी वसा ज्यादा होती है जो फ्री रेडिकल्स से जल्दी डैमेज हो सकती है। इसके अलावा स्पर्म में खुद को हुए नुकसान की मरम्मत करने की क्षमता भी बहुत कम होती है। यही वजह है कि फर्टिलिटी की समस्या से जूझ रहे करीब 30 से 80 प्रतिशत पुरुषों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को एक कारण माना जाता है।
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस स्पर्म को कई तरह से नुकसान पहुंचा सकता है। इसका असर सिर्फ स्पर्म काउंट पर नहीं बल्कि स्पर्म की पूरी क्वालिटी पर पड़ सकता है।
स्पर्म काउंट: ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस स्पर्म बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, जिससे स्पर्म की संख्या कम हो सकती है।
स्पर्म मोटिलिटी: फ्री रेडिकल्स स्पर्म की बाहरी झिल्ली को डैमेज कर सकते हैं। इससे स्पर्म की मूवमेंट यानी मोटिलिटी कम हो सकती है और उसके लिए एग तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
स्पर्म डीएनए: ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस स्पर्म के डीएनए को भी डैमेज कर सकता है। इसे डीएनए फ्रैगमेंटेशन (DNA fragmentation) कहा जाता है। इसमें स्पर्म की झिल्ली में मौजूद वसा का ऑक्सीकरण, प्रोटीन को नुकसान और डीएनए का टूटना शामिल हो सकता है।
स्पर्म के डीएनए में होने वाला यह नुकसान फर्टिलाइजेशन और एम्ब्रियो के शुरुआती विकास को प्रभावित कर सकता है। कुछ मामलों में स्पर्म डीएनए डैमेज को बार-बार होने वाले मिसकैरेज से भी जोड़ा गया है। इसलिए अगर स्पर्म काउंट या मोटिलिटी ठीक है, तब भी सिर्फ इन्हीं दो चीज़ों से स्पर्म की पूरी क्वालिटी का पता नहीं चलता। स्पर्म के डीएनए की क्वालिटी भी महत्वपूर्ण होती है।
पुरुषों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कुछ कारण ऐसे भी हो सकते हैं जो सीधे लाइफस्टाइल से जुड़े नहीं होते। उदाहरण के लिए, वैरिकोसील (varicocele) यानी टेस्टिकल्स की नसों में सूजन और रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट में होने वाला इंफेक्शन स्थानीय स्तर पर फ्री रेडिकल्स को बढ़ा सकते हैं।
इसलिए अगर लगातार स्पर्म काउंट, मोटिलिटी या स्पर्म क्वालिटी से जुड़ी समस्या बनी हुई है, तो सिर्फ डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव करना पर्याप्त नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में इसके पीछे किसी मेडिकल कारण की जांच के लिए डॉक्टर से सलाह लेना भी जरूरी होता है।
कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि क्या कोई टेस्ट करके यह पता लगाया जा सकता है कि शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा हुआ है या नहीं। इसका जवाब है, कुछ हद तक हां। हालांकि, पुरुषों में इसे मापना महिलाओं की तुलना में आसान होता है।
पुरुषों में फर्टिलिटी की शुरुआती जांच के लिए सीमेन एनालिसिस किया जाता है। इसमें स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और स्पर्म की शेप यानी मॉर्फोलॉजी देखी जाती है।
अगर बार-बार मिसकैरेज हो रहा हो या बिना किसी स्पष्ट कारण के प्रेग्नेंसी नहीं हो रही हो, तो डॉक्टर कुछ मामलों में स्पर्म के डीएनए को होने वाले नुकसान की जांच की सलाह दे सकते हैं। इसे डीएनए फ्रैगमेंटेशन टेस्ट (DNA fragmentation test) कहा जाता है।
इस टेस्ट में स्पर्म के डीएनए में कितनी क्षति हुई है, यह देखा जाता है। डीएनए फ्रैगमेंटेशन का स्तर बढ़ा हुआ होने पर यह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस की ओर इशारा कर सकता है। कुछ सेंटरों पर स्पर्म में आरओएस (ROS) का स्तर सीधे मापने वाली जांच भी की जाती है, लेकिन यह टेस्ट हर जगह उपलब्ध नहीं होता।
महिलाओं में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को सीधे मापना थोड़ा मुश्किल होता है। इसकी वजह यह है कि एग शरीर के अंदर मौजूद होते हैं और उन तक सीधे पहुंचना आसान नहीं होता। इसलिए महिलाओं में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का अनुमान अक्सर दूसरी चीज़ों को देखकर किया जाता है, जैसे:
इसलिए महिलाओं में सिर्फ किसी एक टेस्ट के आधार पर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का पता लगाना हमेशा संभव नहीं होता। फोकस अक्सर उन चीज़ों पर होता है जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ा सकती हैं और जिन्हें लाइफस्टाइल या डाइट में बदलाव करके कम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, टेस्ट कराने का मकसद सिर्फ यह पता लगाना नहीं होता कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस है या नहीं। इसका मकसद यह समझना होता है कि क्या यह आपकी फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या में कोई भूमिका निभा रहा है। इसके आधार पर डॉक्टर आगे की जांच और ट्रीटमेंट की रणनीति तय कर सकते हैं।
पुरुषों में | महिलाओं में | |
शुरुआती जांच | सीमेन एनालिसिस से स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी देखी जाती है। | ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को सीधे मापना मुश्किल होता है। |
आगे की जांच कब? | बार-बार मिसकैरेज या बिना कारण प्रेग्नेंसी न होने पर डॉक्टर आगे की जांच बता सकते हैं। | उम्र, वजन, लाइफस्टाइल और मौजूदा मेडिकल कंडीशन को देखकर स्थिति का आकलन किया जाता है। |
खास टेस्ट | डीएनए फ्रैगमेंटेशन टेस्ट से स्पर्म के डीएनए में हुए नुकसान का पता चलता है। कुछ सेंटरों पर ROS भी मापा जाता है। | एग में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस मापने के लिए कोई सामान्य टेस्ट उपलब्ध नहीं है। |
जांच का मकसद | यह पता लगाना कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस स्पर्म क्वालिटी को प्रभावित कर रहा है या नहीं। | यह पहचानना कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाने वाले कौन से कारण मौजूद हैं। |
आगे क्या? | रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर आगे की जांच या ट्रीटमेंट तय कर सकते हैं। | लाइफस्टाइल और डाइट में सुधार पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। |
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ने के कई कारण हमारी रोज़मर्रा की आदतों से जुड़े होते हैं। अच्छी बात यह है कि इनमें से कई चीज़ों को बदला जा सकता है। इसलिए इन्हें पहचानना और अपनी लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव करना ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।
धूम्रपान शरीर में फ्री रेडिकल्स बढ़ाता है और एंटीऑक्सीडेंट की सुरक्षा को कमजोर करता है। इसका असर पुरुषों और महिलाओं दोनों की रिप्रोडक्टिव सेल्स पर पड़ सकता है। स्टडीज़ में धूम्रपान को लाइव बर्थ रेट कम होने और मिसकैरेज का जोखिम बढ़ने से भी जोड़ा गया है।
इसी तरह ज्यादा शराब पीने से भी शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ सकता है। इसका असर रिप्रोडक्टिव हेल्थ पर पड़ सकता है।
आपकी डाइट का भी ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पर असर पड़ता है। बहुत ज्यादा तला हुआ, प्रोसेस्ड और मीठा खाना शरीर में सूजन और फ्री रेडिकल्स को बढ़ा सकता है।
वहीं, फल, सब्जियां और साबुत अनाज जैसे एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर खाद्य पदार्थ शरीर की एंटीऑक्सीडेंट डिफेंस को सपोर्ट करते हैं। इसलिए डाइट में ताजा और पौष्टिक चीज़ों की जगह अगर प्रोसेस्ड फूड ज्यादा हो जाए, तो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ सकता है।
मोटापा सिर्फ वजन बढ़ने की समस्या नहीं है। शरीर में ज्यादा फैट होने पर लंबे समय तक हल्की सूजन बनी रह सकती है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस भी बढ़ सकता है। मोटापा ओव्यूलेशन और गर्भाशय की ग्रहणशीलता को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इसका असर फर्टिलिटी पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि फर्टिलिटी के लिए स्वस्थ वजन बनाए रखना भी जरूरी है।
नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करने और संतुलन बनाए रखने का काम करता है। अगर आप लगातार कम नींद लेते हैं, तो यह प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ सकता है।
नींद की कमी हार्मोन के संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है। इसका असर फर्टिलिटी पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है।
कभी-कभार तनाव होना सामान्य है। लेकिन अगर तनाव लंबे समय तक बना रहे, तो इसका असर शरीर की कई प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है। लंबे समय तक तनाव फ्री रेडिकल्स को बढ़ा सकता है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ा सकता है।
इसके अलावा तनाव आपकी नींद, भूख और रोज़मर्रा की आदतों को भी प्रभावित करता है। इससे समस्या और बढ़ सकती है।
हमारे आसपास का वातावरण भी ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ा सकता है। वायु प्रदूषण, कीटनाशक, भारी धातुएं और कुछ औद्योगिक रसायनों के संपर्क में आने से शरीर में फ्री रेडिकल्स बढ़ सकते हैं।
बहुत ज्यादा गर्मी के संपर्क में रहना भी खासकर पुरुषों में समस्या बन सकता है। लंबे समय तक बहुत गर्म वातावरण में काम करने से टेस्टिकल्स के आसपास ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ सकता है और इसका असर स्पर्म पर पड़ सकता है।
इन सभी चीज़ों से पूरी तरह बचना हमेशा संभव नहीं होता। लेकिन जहां संभव हो, वहां इनके संपर्क को कम किया जा सकता है। जैसे प्रदूषण में मास्क का इस्तेमाल करना और डाइट में ताजा और पौष्टिक चीज़ों को शामिल करना। छोटे-छोटे बदलाव भी ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद कर सकते हैं।
कारण | ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पर असर |
|---|---|
धूम्रपान और शराब | फ्री रेडिकल्स तेज़ी से बढ़ाना, एंटीऑक्सीडेंट रक्षा कमज़ोर करना |
असंतुलित खानपान | सूजन और फ्री रेडिकल्स बढ़ाना, एंटीऑक्सीडेंट की कमी |
मोटापा | लगातार हल्की सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का स्रोत |
नींद की कमी | शरीर की मरम्मत बाधित, हार्मोन असंतुलन |
लंबे समय तक तनाव | फ्री रेडिकल्स में वृद्धि, आदतों पर बुरा असर |
प्रदूषण और विषैले तत्व | बाहरी स्रोत से फ्री रेडिकल्स का बढ़ना |
अच्छी बात यह है कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाने वाली कई चीज़ें हमारी रोज़मर्रा की आदतों से जुड़ी होती हैं। इसलिए अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव करके इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए किसी खास या महंगे इलाज की जरूरत हमेशा नहीं होती। डाइट, एक्सरसाइज, नींद और तनाव जैसी छोटी-छोटी चीज़ों पर ध्यान देना भी मदद कर सकता है।
इसका सीधा तरीका है कि एक तरफ फ्री रेडिकल्स बढ़ाने वाली चीज़ों को कम किया जाए और दूसरी तरफ शरीर को पर्याप्त एंटीऑक्सीडेंट दिए जाएं। इन दोनों पर एक साथ काम करने से शरीर में फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।
अपनी डाइट में एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर चीज़ों को शामिल करना सबसे आसान कदमों में से एक है। आंवला, संतरा, टमाटर, गाजर, पालक और जामुन जैसे फल और सब्जियां शरीर को अलग-अलग एंटीऑक्सीडेंट देते हैं। स्टडीज़ में एंटीऑक्सीडेंट पोषक तत्वों और स्पर्म क्वालिटी के बीच भी संबंध पाया गया है।
एंटीऑक्सीडेंट | मुख्य स्रोत |
|---|---|
विटामिन C | आंवला, संतरा, नींबू, अमरूद |
विटामिन E | मेवे, बीज, वनस्पति तेल |
लाइकोपीन | टमाटर, तरबूज |
बीटा कैरोटीन | गाजर, हरी और पीली सब्जियां |
फ्लेवोनॉइड्स | जामुन, हरी चाय, रंगीन फल |
कोशिश करें कि डाइट में ताजे फल, सब्जियां, मेवे और बीज नियमित रूप से शामिल हों। बहुत ज्यादा तला हुआ और बार-बार गर्म किया हुआ तेल इस्तेमाल करने से बचें। इस तरह की छोटी आदतों से डाइट को ज्यादा संतुलित बनाया जा सकता है।
नियमित और हल्की से मध्यम एक्सरसाइज शरीर को एक्टिव रखने और वजन को कंट्रोल करने में मदद करती है। इससे शरीर की एंटीऑक्सीडेंट डिफेंस को भी सपोर्ट मिल सकता है।
लेकिन बहुत ज्यादा और थका देने वाली एक्सरसाइज करना भी सही नहीं है। इससे शरीर पर अतिरिक्त स्ट्रेस पड़ सकता है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ सकता है। इसलिए रोज़ करीब 30 मिनट की तेज चाल में वॉक, हल्का योग या साइकिलिंग जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं।
नींद शरीर को आराम करने और खुद को रिपेयर करने का समय देती है। अगर आप लगातार कम नींद लेते हैं, तो इसका असर शरीर के सामान्य संतुलन पर पड़ सकता है।
इसलिए रोज़ करीब 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लेने की कोशिश करें। सोने और जागने का समय तय रखना भी मददगार होता है। सोने से पहले मोबाइल या दूसरी स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना और कमरे को शांत रखना नींद की क्वालिटी को बेहतर कर सकता है।
बे समय तक बना रहने वाला तनाव शरीर पर कई तरह से असर डाल सकता है। इसलिए तनाव को कंट्रोल करना भी जरूरी है।
इसके लिए आप अपनी पसंद के तरीके अपना सकते हैं, जैसे:
जब तनाव कंट्रोल में रहता है, तो नींद और खानपान जैसी दूसरी आदतों को भी बेहतर बनाए रखना आसान होता है।
धूम्रपान और ज्यादा शराब शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं। इसलिए अगर आप फर्टिलिटी बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं, तो इन्हें छोड़ना या कम करना एक जरूरी कदम है।
धूम्रपान छोड़ने और शराब से दूरी बनाने का फायदा तुरंत दिखाई नहीं देता। स्पर्म बनने की पूरी प्रक्रिया में समय लगता है। इसलिए लाइफस्टाइल में बदलाव को लगातार बनाए रखना जरूरी है।
लाइफस्टाइल में बदलाव का असर तुरंत दिखाई नहीं देता। इसका एक कारण यह है कि नई रिप्रोडक्टिव सेल्स को बनने और मैच्योर होने में समय लगता है।
पुरुषों में स्पर्म बनने का पूरा चक्र करीब ढाई से तीन महीने का होता है। इसलिए डाइट, एक्सरसाइज, नींद और दूसरी आदतों में किए गए बदलाव का असर लगभग तीन महीने बाद की स्पर्म जांच में दिखाई दे सकता है।
महिलाओं में भी एग की मैच्योरिटी की प्रक्रिया समय लेती है। इसलिए अगर आप प्रेग्नेंसी प्लान कर रहे हैं, तो इन बदलावों को कुछ महीने पहले से शुरू करना बेहतर रहता है।
इसमें सबसे जरूरी बात यह है कि एक साथ बहुत बड़े बदलाव करने के बजाय ऐसी आदतें बनाएं जिन्हें आप लंबे समय तक जारी रख सकें। यही बदलाव फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच संतुलन बनाए रखने में ज्यादा मदद करते हैं।
एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट आसानी से मिल जाते हैं, इसलिए अक्सर मन में यह सवाल आता है कि क्या फर्टिलिटी बेहतर करने के लिए इन्हें लेना जरूरी है। इसका जवाब है, हर व्यक्ति को सप्लीमेंट की जरूरत नहीं होती।
अगर आपकी डाइट में फल, सब्जियां और साबुत अनाज अच्छी मात्रा में शामिल हैं, तो शरीर को जरूरी एंटीऑक्सीडेंट काफी हद तक भोजन से ही मिल सकते हैं। भोजन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट के साथ कई दूसरे पोषक तत्व भी मिलते हैं, जो सिर्फ एक सप्लीमेंट लेने से नहीं मिलते।
एंटीऑक्सीडेंट की ज्यादा मात्रा लेना हमेशा फायदेमंद नहीं होता। शरीर को फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच एक संतुलन की जरूरत होती है। अगर एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए, तो यह संतुलन भी बिगड़ सकता है।
महिलाओं में एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट्स के फायदे को लेकर उपलब्ध सबूत भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। एक बड़े रिव्यु में इनके फ़ायदे को लेकर प्रूफ़ की निश्चितता सीमित पाई गई है। इसलिए एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट को फर्टिलिटी की समस्या का सीधा समाधान मानना सही नहीं है।
किसी व्यक्ति में अगर किसी खास पोषक तत्व की कमी है, तो उस कमी को पूरा करने से फायदा हो सकता है। लेकिन अगर पहले से कमी नहीं है, तो उसी पोषक तत्व की अतिरिक्त मात्रा लेने से जरूरी नहीं कि कोई अतिरिक्त फायदा मिले।
इसी वजह से सप्लीमेंट अपनी मर्जी से शुरू करने के बजाय पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। जरूरत होने पर डॉक्टर जांच के आधार पर तय कर सकते हैं कि किस सप्लीमेंट की जरूरत है, कितनी मात्रा में लेना है और कितने समय तक लेना है।
कुल मिलाकर, पहली प्राथमिकता संतुलित डाइट होनी चाहिए और सप्लीमेंट की जरूरत होने पर ही उसे लेना चाहिए।
लाइफस्टाइल में बदलाव करना एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन कुछ स्थितियों में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है। ऐसे मामलों में सिर्फ अपनी आदतों में बदलाव करने से बात नहीं बनती।
अगर आप लंबे समय से गर्भधारण की कोशिश कर रहे हैं और सफलता नहीं मिल रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। पुरुषों में अगर सीमेन एनालिसिस (semen analysis) की रिपोर्ट सामान्य नहीं है, तो यह स्पर्म में किसी समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी होता है। इसी तरह अगर महिला की उम्र 35 साल से ज्यादा है और गर्भधारण की योजना है या बार-बार मिसकैरेज हो रहा है, तो भी जांच में देर नहीं करनी चाहिए।
फर्टिलिटी ट्रीटमेंट शुरू करने से पहले भी डॉक्टर से बात करना सही रहता है। डॉक्टर आपकी पूरी स्थिति देखकर यह समझ सकते हैं कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस फर्टिलिटी की समस्या में कोई भूमिका निभा रहा है या नहीं। जरूरत होने पर वे सही जांच और आगे की सलाह दे सकते हैं। साथ ही, यह भी बता सकते हैं कि लाइफस्टाइल में किन चीज़ों में बदलाव करना है और किसी अतिरिक्त ट्रीटमेंट या जांच की जरूरत है या नहीं।
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस तब होता है जब शरीर में फ्री रेडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। इसका असर एग और स्पर्म दोनों की क्वालिटी पर पड़ सकता है। पुरुषों में यह स्पर्म की मोटिलिटी और डीएनए को प्रभावित कर सकता है, जबकि महिलाओं में एग की क्वालिटी और ओवरी के काम पर असर पड़ सकता है। इसलिए फर्टिलिटी को समझते समय ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
अच्छी बात यह है कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाने वाली कई चीज़ें हमारी लाइफस्टाइल से जुड़ी होती हैं। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर संतुलित डाइट, नियमित एक्सरसाइज, पर्याप्त नींद, तनाव को कंट्रोल करना और धूम्रपान व शराब से बचना इसे कम करने में मदद कर सकता है। सप्लीमेंट को डाइट का विकल्प नहीं मानना चाहिए। सबसे पहले संतुलित डाइट पर ध्यान देना जरूरी है।
अगर आप गर्भधारण की योजना बना रहे हैं और फर्टिलिटी को लेकर कोई चिंता है, तो लाइफस्टाइल में बदलाव के साथ डॉक्टर से सलाह लेना सही कदम है। डॉक्टर आपकी स्थिति देखकर बता सकते हैं कि किसी जांच या अतिरिक्त ट्रीटमेंट की जरूरत है या नहीं।