क्यों होती है मेल इनफर्टिलिटी? जानिए इसकी जाँच और इलाज के तरीके

Last updated: June 28, 2026

Overview

पुरुष बांझपन यानी मेल इनफर्टिलिटी (male infertility) तब होती है जब पुरुष के स्पर्म में किसी तरह की कमी हो जो महिला के एग को फर्टिलाइज़ करने में रुकावट बने। लेकिन यह कमी एक ही तरह की नहीं होती। कभी स्पर्म काउंट कम होता है, कभी उनकी मोटिलिटी, कभी शेप यानी मोर्फोलॉजी की समस्या होती है, और कभी तीनों समस्याएँ एक साथ होती हैं।

जो दंपति एक साल की कोशिश के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं पा पाते, उनमें से करीब 50 प्रतिशत मामलों में पुरुष से संबंधित कोई न कोई कारण होता है। यह आँकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर केवल महिला की जाँच होती है और पुरुष अपनी जाँच नहीं करवाते।

ओलिगोस्पर्मिया (oligospermia) यानी काउंट कम, एस्थेनोज़ूस्पर्मिया (asthenozoospermia) यानी मोटिलिटी कम, और टेराटोज़ूस्पर्मिया (teratozoospermia) यानी मॉर्फोलॉजी खराब, ये तीन मुख्य सीमेन समस्याएँ हैं। इनके पीछे कारण स्ट्रक्चरल, हॉर्मोनल, जेनेटिक, इनफेक्शन, या लाइफस्टाइल से जुड़ा हो सकता है।

अच्छी बात यह है कि ज़्यादातर कारण पहचाने जा सकते हैं और उनका इलाज उपलब्ध है।

स्पर्म और फर्टिलिटी का संबंध

एक स्वस्थ स्पर्म का काम सिर्फ एग तक पहुँचना नहीं होता। उसे पर्याप्त संख्या में होना चाहिए, सही दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और उसकी बनावट भी ऐसी होनी चाहिए कि वह एग को फर्टिलाइज़ कर सके। अगर इनमें से किसी एक चीज़ में भी कमी हो, तो प्रेगनेंसी ठहरने की संभावना कम हो सकता है।

स्पर्म टेस्टिकल्स में बनते हैं और एक नए स्पर्म को विकसित होने में लगभग 72 से 74 दिन लगते हैं। इस प्रक्रिया को FSH और LH जैसे हॉर्मोन नियंत्रित करते हैं। इसलिए शरीर में किसी भी स्तर पर गड़बड़ी होने से स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और क्वालिटी प्रभावित हो सकती है।

इसीलिए पुरुष फर्टिलिटी को सिर्फ स्पर्म काउंट देखकर नहीं समझा जा सकता। सीमेन एनालिसिस में काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी (Morphology) जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण स्पर्म की DNA क्वालिटी भी है। ये सभी पैरामीटर मिलकर बताते हैं कि स्पर्म प्रेगनेंसी की प्रक्रिया में कितना सक्षम है।

स्ट्रक्चरल कारण: वैरिकोसील और ब्लॉकेज

वैरिकोसील

वैरिकोसील (varicocele) टेस्टिकल की नसों में सूजन है जिससे ब्लड बैकफ्लो होता है। बैकफ्लो से टेस्टिकल में ऑक्सीजन कम होती है, तापमान बढ़ता है, और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है। ये तीनों स्पर्म को नुकसान पहुँचाते हैं।

NIH StatPearls के अनुसार, वैरिकोसेलेक्टमी यानी वैरिकोसील सर्जरी के बाद स्पर्म काउंट और मोटिलिटी में सुधार होता है। स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड से इसकी पुष्टि होती है। माइक्रोसर्जिकल वैरिकोसेलेक्टमी में सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं।

ऑब्सट्रक्टिव एज़ूस्पर्मिया

वास डेफ़ेरेंस (vas deferens) या एपिडिडाइमिस (epididymis) में ब्लॉकेज हो तो स्पर्म सीमेन तक नहीं पहुँचता। यह ऑब्सट्रक्टिव एज़ोस्पर्मिया (obstructive azoospermia) है। इसका कारण पुराना इंफेक्शन, जन्मजात वास डेफ़ेरेंस का न होना, या पिछली सर्जरी में से कुछ भी हो सकता है।

हॉर्मोनल कारण

स्पर्म प्रोडक्शन दिमाग, पिट्यूटरी ग्रंथि और टेस्टिकल्स के बीच होने वाले हॉर्मोनल सिग्नल्स पर निर्भर करता है। FSH और LH हॉर्मोन स्पर्म बनने और टेस्टोस्टेरोन प्रोडक्शन को कंट्रोल करते हैं। इस चेन में किसी भी स्तर पर गड़बड़ी होने से स्पर्म काउंट कम हो सकता है।

हाइपोगोनाडोट्रोपिक हाइपोगोनाडिज़्म, हाइपरप्रोलैक्टिनेमिया, हाइपोथायरॉइडिज़्म और एनाबॉलिक स्टेरॉइड के इस्तेमाल की वजह से हॉर्मोन में गड़बड़ी हो सकती है। अच्छी बात यह है कि इनमें से कई कारणों का इलाज संभव है और सही ट्रीटमेंट से स्पर्म प्रोडक्शन में सुधार आ सकता है।

जेनेटिक कारण

कुछ पुरुषों में स्पर्म प्रोडक्शन की समस्या जन्मजात यानी जेनेटिक कारणों से होती है। क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter Syndrome), Y क्रोमोसोम माइक्रोडिलीशन (Y Chromosome Microdeletion) और CBAVD यानी कंजेनिटल बाइलेटरल एब्सेंस ऑफ वास डेफ़ेरेंस (Congenital Bilateral Absence of Vas Deferens) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

ऐसे मामलों में स्पर्म काउंट बहुत कम या शून्य हो सकता है। गंभीर ओलिगोस्पर्मिया या एज़ूस्पर्मिया में जेनेटिक जाँच कारण पता करने और सही इलाज चुनने में मदद करती है।

इनफेक्शन और सूजन से नुकसान

कुछ संक्रमण यानी इंफेक्शन भी स्पर्म प्रोडक्शन और उसके रास्ते को नुकसान पहुँचा सकते हैं। मम्प्स (Mumps), क्लैमाइडिया (Chlamydia) और गोनोरिया (Gonorrhea) जैसे इंफेक्शन टेस्टिकल्स, एपिडिडाइमिस या वास डेफ़ेरेंस को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे स्पर्म काउंट कम हो सकती है या रुकावट पैदा हो सकती है।

इसके अलावा प्रोस्टेट और अन्य प्रजनन अंगों यानी रिप्रोडक्टिव ऑर्गन्स की सूजन भी सीमेन की क्वालिटी को खराब कर सकती है।

लाइफस्टाइल कारण

स्मोकिंग: सिगरेट में मौजूद केमिकल स्पर्म के DNA और क्वालिटी को नुकसान पहुँचाते हैं। स्मोकिंग छोड़ने के कुछ समय बाद सुधार दिख सकता है।

मोटापा:अधिक वज़न से हॉर्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे स्पर्म काउंट और मोटिलिटी प्रभावित हो सकती है।

अधिक गर्मी:लैपटॉप गोद में रखना, टाइट अंडरवियर पहनना या लंबे समय तक गर्म वातावरण में काम करना टेस्टिकल्स का तापमान बढ़ाकर स्पर्म प्रोडक्शन को प्रभावित कर सकता है।

शराब और स्टेरॉइड: अधिक शराब का सेवन और बॉडीबिल्डिंग के लिए एनाबॉलिक स्टेरॉइड का इस्तेमाल स्पर्म प्रोडक्शन को कम कर सकता है।

पर्यावरणीय विषैले तत्व: पेस्टिसाइड, हेवी मेटल और कुछ औद्योगिक रसायनों के लंबे संपर्क से स्पर्म की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

कारण से इलाज: एक नज़र

कारणकैसे असर करता हैइलाज की दिशा
वैरिकोसीलब्लड बैकफ्लो, ऑक्सिडेटिव स्ट्रेसमाइक्रोसर्जरी
हॉर्मोनल इम्बैलेंसFSH/LH कम, स्पर्म नहीं बनता हॉर्मोन इंजेक्शन
जेनेटिकAZF जीन्स मिसिंगICSI, TESE
इनफेक्शन/सूजनस्पर्म नलियाँ ब्लॉकएंटीबायोटिक, सर्जरी
लाइफस्टाइलDNA डैमेज, ऑक्सिडेटिवलाइफस्टाइल में बदलाव के साथ एंटीऑक्सीडेंट 
इडियोपैथिककारण अज्ञातICSI


 

मेल इनफर्टिलिटी की जाँच कैसे होती है?

मेल इनफर्टिलिटी का सही कारण पता करने के लिए कुछ जाँचों की आवश्यकता होती है। इनमें सीमेन एनालिसिस सबसे महत्वपूर्ण जाँच मानी जाती है।

  • सीमेन एनालिसिस (Semen Analysis): यह मेल इनफर्टिलिटी की सबसे महत्वपूर्ण जाँच है। इसमें स्पर्म काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी और अन्य पैरामीटर देखे जाते हैं। रिपोर्ट असामान्य आने पर 3 से 4 हफ्ते बाद दोबारा जाँच की जाती है।
  • हॉर्मोन टेस्ट: FSH, LH, टेस्टोस्टेरोन, प्रोलैक्टिन और TSH की जाँच से पता चलता है कि समस्या हॉर्मोनल कारणों से तो नहीं है।
  • अल्ट्रासाउंड: स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड से वैरिकोसील, टेस्टिकल्स का आकार और अन्य संरचनात्मक समस्याएँ पता चल सकती हैं।
  • जेनेटिक जाँच: गंभीर ओलिगोस्पर्मिया या एज़ूस्पर्मिया में जेनेटिक कारणों की पहचान के लिए यह जाँच की जाती है।
  • स्पर्म DNA फ्रैगमेंटेशन टेस्ट:बार-बार IVF फेल होने या बार-बार मिसकैरेज की स्थिति में यह टेस्ट उपयोगी हो सकता है।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

  • एक साल तक नियमित कोशिश के बाद भी प्रेगनेंसी न हो तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें।
  • अगर महिला पार्टनर की उम्र 35 साल से ज़्यादा है, तो 6 महीने कोशिश के बाद ही जाँच करवानी चाहिए।
  • सीमेन एनालिसिस में स्पर्म काउंट, मोटिलिटी या मॉर्फोलॉजी कम आए तो डॉक्टर से सलाह लें।
  • मम्प्स के बाद ऑर्काइटिस, वैरिकोसील या यौन संचारित संक्रमण की हिस्ट्री हो, तो जाँच में देरी न करें।

मेल इनफर्टिलिटी की जाँच बहुत आसान होती है और इसमें किसी भी तरह का दर्द नहीं होता। कई मामलों में सिर्फ एक सीमेन एनालिसिस से ही समस्या का पता चल जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

मेल इनफर्टिलिटी (male infertility) केवल स्पर्म काउंट की समस्या नहीं है। इसके पीछे वैरिकोसील, हॉर्मोनल असंतुलन, संक्रमण, जेनेटिक कारण या लाइफस्टाइल से जुड़ी कई वजहें हो सकती हैं।

अच्छी बात यह है कि इनमें से कई कारणों की पहचान और इलाज संभव है। इसलिए अगर लंबे समय से प्रेगनेंसी नहीं ठहर रही है, तो अनुमान लगाने या इंतजार करने के बजाय फर्टिलिटी टेस्ट करवाना सबसे सही कदम है।

समय पर सीमेन एनालिसिस और सही डायग्नोसिस न सिर्फ कारण तक पहुँचने में मदद करते हैं, बल्कि इसकी सहायता से सही इलाज चुनकर पिता बनने की संभावना भी बढ़ जाती है।

Male Infertility Causes के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

क्या वैरिकोसील की वजह से हमेशा male infertility हो सकती है?

क्या जेनेटिक कारण से बच्चा हो सकता है?

क्या लाइफस्टाइल बदलाव से स्पर्म सच में सुधरती है?

क्या स्पर्म में एंटीबॉडी बांझपन का कारण बन सकती हैं?

क्या male infertility की जाँच के समय दर्द होता है?

Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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