पुरुष निःसंतानता का इलाज: कारण से उपचार तक का सफर

Last updated: June 26, 2026

साराँश (Overview)

पुरुष निःसंतानता यानी मेल इनफर्टिलिटी (Male infertility) का इलाज एक नहीं, कई तरीकों से किया जाता है। और सही तरीका चुनने के लिए सही कारण पहचानना ज़रूरी होता है। वैरिकोसील जैसी दिक्कत का इलाज सर्जरी से होता है। हॉर्मोनल असंतुलन में दवाइयाँ काम करती हैं। और अगर इनफर्टिलिटी का कारण लाइफस्टाइल है तो उसमें बदलाव ज़रूरी होता है।

जब इन सब उपायों के बाद भी नेचुरल प्रेगनेंसी नहीं होती, तब ART यानी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (assisted reproductive technology) का सहारा लिया जाता है। IUI से शुरू करके IVF-ICSI तक, और ज़रूरत पड़े तो TESE से टेस्टिकल से स्पर्म निकालकर ICSI तक, हर कंडीशन के लिए एक ऑप्शन मौजूद है।

NIH StatPearls के अनुसार, सही डायग्नोसिस के बाद इलाज की सफलता दर बहुत बढ़ जाती है। बिना कारण जाने सीधे ART पर जाना हमेशा सही नहीं होता। इस आर्टिकल में हर कारण के हिसाब से इलाज का रास्ता बताया गया है, ताकि आप और आपके डॉक्टर मिलकर सही फैसला ले सकें।

पहले डायग्नोसिस, फिर इलाज

मेल इनफर्टिलिटी की जाँच में सबसे पहले सीमेन एनालिसिस (semen analysis) की जाती है। 2 से 5 दिन के एब्स्टिनेंस के बाद सैंपल लिया जाता है। स्पर्म काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी, और सफेद रक्त कोशिकाएं यानी वाइट ब्लड सेल्स (white blood cells), सब एक साथ देखे जाते हैं। किसी एक टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर कोई निर्णय नहीं लिया जाता, 3 से 4 हफ्ते बाद दोबारा टेस्ट करवाये जाते हैं।

कौन-कौन सी जाँचें की जाती हैं?

हॉर्मोन टेस्ट (Hormone Tests)

पुरुष इनफर्टिलिटी की जाँच में सबसे पहले कुछ जरूरी हॉर्मोन देखे जाते हैं। इनमें FSH, LH, टेस्टोस्टेरोन, प्रोलैक्टिन और TSH शामिल हैं।

  • FSH बहुत ज़्यादा हो तो यह टेस्टिकुलर फेलियर (Testicular Failure) यानी अंडकोष के ठीक से काम न करने का संकेत हो सकता है।
  • FSH कम हो तो हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) या पिट्यूटरी ग्लैंड (Pituitary Gland) की समस्या की जाँच की जाती है।
  • टेस्टोस्टेरोन, प्रोलैक्टिन और TSH की असामान्य रिपोर्ट से भी स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित हो सकता है।

स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड (Scrotal Ultrasound)

यह एक साधारण टेस्ट है जिससे अंडकोष यानी टेस्टिकल्स (testicles) की संरचना देखी जाती है।

  • वैरिकोसील (Varicocele) की पुष्टि करने में मदद मिलती है।
  • टेस्टिकल का साइज़ और अन्य संरचनात्मक समस्याओं का पता चलता है।
  • अगर शारीरिक परीक्षण में कोई असामान्यता दिखे तो डॉक्टर यह जाँच कराने की सलाह दे सकते हैं।

जेनेटिक टेस्ट (Genetic Tests)

कुछ मामलों में स्पर्म की समस्या के पीछे जेनेटिक कारण हो सकते हैं।

  • कैरियोटाइप (Karyotype) टेस्ट से क्रोमोसोम की संख्या और संरचना की जाँच की जाती है।
  • Y क्रोमोसोम माइक्रोडिलीशन (Y Chromosome Microdeletion) टेस्ट से Y क्रोमोसोम में मौजूद छोटी जेनेटिक कमी का पता लगाया जाता है।
  • यह जाँच आमतौर पर तब करवाई जाती है जब स्पर्म काउंट 5 मिलियन/ml से कम हो या एज़ूस्पर्मिया (Azoospermia) यानी वीर्य में स्पर्म बिल्कुल न हों।

स्पर्म DNA फ्रैगमेंटेशन इंडेक्स यानी DFI (DNA Fragmentation Index)

कई बार स्पर्म काउंट और मोटिलिटी सामान्य होने के बावजूद प्रेगनेंसी नहीं ठहरती। ऐसे मामलों में DFI टेस्ट मददगार हो सकता है।

  • यह स्पर्म के DNA में मौजूद किसी टूट-फूट की मात्रा बताता है।
  • बार-बार IVF या IUI फेल होने पर यह टेस्ट करवाया जा सकता है।
  • रिकरेंट मिसकैरेज (Recurrent Miscarriage) के मामलों में भी इसकी सलाह दी जाती है।
  • DFI 25% से ज़्यादा होने पर एम्ब्रीओ की क्वालिटी प्रभावित हो सकती है और ऐसे मामलों में ICSI बेहतर विकल्प माना जाता है।

वैरिकोसेलेक्टमी के माध्यम से इलाज

वैरिकोसेलेक्टमी (varicocelectomy) मेल इनफर्टिलिटी की सबसे सफल सर्जरी है। इसमें टेस्टिकल की सूजी हुई नसों को माइक्रोस्कोप की मदद से बंद किया जाता है। इससे ब्लड बैकफ्लो रुकता है, टेस्टिकल का टेम्परेचर कम होता है, और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस घटता है।

NIH StatPearls के अनुसार, माइक्रोसर्जिकल वैरिकोसेलेक्टमी में सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं। सर्जरी के 3 से 6 महीने बाद सीमेन एनालिसिस से असर का पता चलता है। कुछ मामलों में सर्जरी के बाद नेचुरल प्रेगनेंसी हो जाती है।

अगर सर्जरी के बाद भी स्पर्म काउंट और मोटिलिटी उतनी नहीं सुधरती कि नेचुरल प्रेगनेंसी हो सके, तो प्रेगनेंसी के लिए IUI या IVF-ICSI का सहारा लिया जाता है।

ऑब्सट्रक्शन हटाने के लिए माइक्रोसर्जरी

ऑब्सट्रक्टिव एज़ोस्पर्मिया (obstructive azoospermia) में स्पर्म बनता है लेकिन ब्लॉकेज के कारण सीमेन तक नहीं पहुँचता। इसका कारण पुराना इंफेक्शन, वासेक्टमी (vasectomy), या जन्मजात वास डेफ़ेरेंस का न होना हो सकता है।

वासोवासोस्टमी (vasovasostomy) में वास डेफ़ेरेंस के दो सिरे जोड़े जाते हैं। एपिडिडाइमोवासोस्टमी (epididymovasostomy) में एपिडिडाइमिस और वास डेफ़ेरेंस जोड़े जाते हैं। दोनों माइक्रोसर्जरी हैं और अनुभवी यूरोलॉजिस्ट से ही करवाएँ।

हॉर्मोनल और मेडिकल इलाज

अगर स्पर्म काउंट कम होने के पीछे हॉर्मोनल असंतुलन, इंफेक्शन या कोई दूसरी मेडिकल समस्या है, तो पहले उसी का इलाज किया जाता है।

  • हाइपोगोनाडोट्रोपिक हाइपोगोनाडिज़्म (Hypogonadotropic Hypogonadism) में पिट्यूटरी से हॉर्मोनल सिग्नल कम आते हैं। ऐसे मामलों में FSH और hCG (Human Chorionic Gonadotropin) इंजेक्शन से स्पर्म प्रोडक्शन दोबारा शुरू हो सकता है।
  • क्लोमीफीन साइट्रेट (Clomiphene Citrate) कुछ पुरुषों में ऑफ-लेबल इस्तेमाल किया जाता है। यह LH और FSH बढ़ाकर टेस्टोस्टेरोन और स्पर्म प्रोडक्शन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
  • हाइपरप्रोलैक्टिनेमिया (Hyperprolactinemia) में कैबरगोलिन (Cabergoline) से प्रोलैक्टिन का लेवल कम किया जाता है, जिससे हॉर्मोनल संतुलन सुधर सकता है।
  • थायरॉइड की समस्या होने पर उसका इलाज करना ज़रूरी है क्योंकि थायरॉइड सामान्य होने पर स्पर्म क्वालिटी में भी सुधार आ सकता है।
  • अगर इंफेक्शन हो, तो सही एंटीबायोटिक कोर्स लेना जरूरी है। सेमिनल ल्यूकोसाइटोस्पर्मिया (Seminal Leukocytospermia) यानी सीमेन में सफेद रक्त कोशिकाओं की अधिकता को भी पहले ठीक किया जाता है क्योंकि यह IVF और ICSI की सक्सेस को प्रभावित कर सकती है।

लाइफस्टाइल बदलाव और एंटीऑक्सिडेंट

  • स्मोकिंग छोड़ें क्योंकि यह स्पर्म DNA को नुकसान पहुंचा सकती है।
  • वजन नियंत्रित रखें क्योंकि मोटापा हॉर्मोनल संतुलन और स्पर्म क्वालिटी दोनों को प्रभावित कर सकता है।
  • रोज़ 7-8 घंटे की नींद लें और तनाव कम करने की कोशिश करें।
  • कोएन्ज़ाइम Q10 (Coenzyme Q10), विटामिन C, विटामिन E, L-कार्निटीन (L-Carnitine), ज़िंक और सेलेनियम जैसे एंटीऑक्सिडेंट ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस कम करने में मदद कर सकते हैं।
  • टेस्टिकल्स को अधिक गर्मी से बचाएं। लैपटॉप लंबे समय तक गोद में रखकर काम न करें और ढीले-ढाले कपड़े पहनें।

मेल इनफर्टिलिटी के केस में IUI, IVF, और ICSI का रोल

IUI यानी इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन (intrauterine insemination) तब सही है जब लैब में वाश के बाद कम से कम 5 मिलियन मोटाइल स्पर्म मिलें और महिला पार्टनर की ट्यूब खुली हो, लेकिन IUI उचित विकल्प माना जाता है। 

IVF में लैब में एग और स्पर्म मिलाए जाते हैं और बने एम्ब्रीओ को गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है। ICSI यानी इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन (intracytoplasmic sperm injection) में एक स्पर्म सीधे अंडे में इंजेक्ट किया जाता है। गंभीर ओलिगोस्पर्मिया, खराब मोटिलिटी, या OAT सिंड्रोम में ICSI सबसे प्रभावी विकल्प है।

ICSI ने मेल इनफर्टिलिटी ट्रीटमेंट (male infertility treatment) में क्रांति ला दी है। अब स्पर्म का सिर्फ जीवित होना पर्याप्त है। इस प्रोसेस में एम्ब्रीओ लॉजिस्ट एक स्पर्म को सीधे एग में इंजेक्ट कर देते हैं।

TESE और स्पर्म रिट्रीवल

TESE यानी टेस्टिकुलर स्पर्म एक्सट्रैक्शन (testicular sperm extraction) तब किया जाता है जब सीमेन में स्पर्म बिल्कुल न हो। लोकल एनेस्थीसिया में टेस्टिकल से छोटी बायोप्सी लेकर स्पर्म निकाला जाता है। ऑब्सट्रक्टिव एज़ूस्पर्मिया में TESE की सफलता दर बहुत अच्छी है।

mTESE यानी माइक्रो-TESE में माइक्रोस्कोप से उन ट्यूब्यूल्स को ढूँढा जाता है जहाँ स्पर्म बन रहे हों। इस प्रोसेस से नॉन-ऑब्सट्रक्टिव एज़ूस्पर्मिया (non-obstructive azoospermia) जैसी कंडीशन में भी 30 से 60% मामलों में स्पर्म मिल जाते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

मेल इनफर्टिलिटी का इलाज इसके कारण पर निर्भर है, इसलिए पहले कारण जानना सबसे ज़रूरी है। सर्जरी, दवाइयाँ, लाइफस्टाइल बदलाव, या ART, जो भी ज़रूरी हो वह डॉक्टर उसी की सलाह देते हैं। हर कारण के लिए इलाज का एक तरीका है।

Male infertility के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

क्या TESE से सभी को स्पर्म मिलता है?

वैरिकोसील सर्जरी के कितने समय बाद फर्क दिखता है?

क्या सिर्फ लाइफस्टाइल बदलाव काफी हैं?

क्या एक बार IVF फेल हो तो दोबारा करना चाहिए?

क्या हॉर्मोन इंजेक्शन से स्पर्म फिर से बनने लगते हैं?

Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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