सारांश (Overview)
अगर प्रेगनेंसी के शुरुआती स्कैन में सैक तो दिखे, लेकिन उसके अंदर एम्ब्रीओ न दिखे, तो यह चिंता होना स्वाभाविक है कि प्रेगनेंसी ठीक से आगे बढ़ रही है या नहीं। ऐसे में डॉक्टर कुछ दिन बाद दोबारा स्कैन कराने को कह सकते हैं।
Blighted Ovum में प्रेगनेंसी का सैक तो बन जाता है, लेकिन उसके अंदर एम्ब्रीओ डेवलप नहीं हो पाता। मेडिकल भाषा में इसे अनएम्ब्रियोनिक प्रेगनेंसी कहा जाता है। यह फर्स्ट ट्राइमेस्टर में होने वाले मिसकैरेज की एक कॉमन वजह है।
आगे जानेंगे कि स्कैन में इसकी पहचान कैसे होती है, दोबारा स्कैन क्यों जरूरी होता है, यह किस वजह से होता है और इलाज के क्या विकल्प हैं।
प्रेगनेंसी की शुरुआत में दो चीजें बनती हैं। एक, सैक और दूसरा, उसके अंदर बनने वाला एम्ब्रियो।
ब्लाइटेड ओवम में सैक बन जाता है और बढ़ता भी रहता है, लेकिन उसके अंदर एम्ब्रियो विकसित नहीं हो पाता। कभी-कभी एम्ब्रीओ बनकर बहुत शुरुआत में ही बढ़ना बंद कर देता है। इसे मेडिकल भाषा में अनएम्ब्रियोनिक प्रेगनेंसी भी कहा जाता है।
इस कंडीशन में प्रेगनेंसी के हॉर्मोन कुछ समय तक शरीर में बनते रहते हैं। इसी वजह से प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है और मितली, थकान जैसे लक्षण भी महसूस होते रह सकते हैं।
ब्लाइटेड ओवम के बारे में पता अक्सर छठवें से आठवें हफ्ते के बीच अल्ट्रासाउंड से चलता है। इससे पहले सैक बहुत छोटा हो सकता है, इसलिए सिर्फ एम्ब्रीओ न दिखने के आधार पर इतनी जल्दी ब्लाइटेड ओवम का फैसला नहीं किया जाता।
अगर स्कैन में सैक दिख गया है, लेकिन अंदर एम्ब्रीओ नहीं दिख रहा, तो सिर्फ एक स्कैन देखकर तुरंत ब्लाइटेड ओवम नहीं कहा जाता। डॉक्टर सैक के साइज और पिछले स्कैन में क्या दिखा था, इन दोनों बातों को देखते हैं।
रिपोर्ट में सैक का एवरेज साइज मीन सैक डायमीटर के रूप में लिखा हो सकता है।
स्कैन में क्या मिला | इसका मतलब |
|---|---|
सैक 25 मिलीमीटर या उससे बड़ा, अंदर एम्ब्रीओ नहीं | प्रेगनेंसी आगे नहीं बढ़ रही, यह ब्लाइटेड ओवम माना जाता है |
सैक 16 से 24 मिलीमीटर, अंदर एम्ब्रीओ नहीं | शक की स्थिति, फैसला अभी नहीं, दोबारा स्कैन जरूरी |
पिछली बार सिर्फ सैक दिखा था और 2 हफ्ते बाद भी एम्ब्रीओ नहीं दिखा | प्रेगनेंसी आगे नहीं बढ़ रही |
पिछली बार योक सैक दिखा था और 11 दिन बाद भी एम्ब्रीओ नहीं दिखा | प्रेगनेंसी आगे नहीं बढ़ रही |
एम्ब्रीओ 7 मिलीमीटर या उससे बड़ा पर हार्टबीट नहीं है | यह ब्लाइटेड ओवम नहीं, मिस्ड मिसकैरेज है |
ये पैरामीटर इसलिए तय किए गए हैं ताकि जल्दबाजी में कोई गलत फैसला न हो जाए। 25 मिलीमीटर की सीमा इतनी ऊपर रखी गई है कि इससे नीचे के साइज पर गलती की कोई गुंजाइश ही न बचे।
अगर एम्ब्रीओ दिख चुका हो और सिर्फ हार्टबीट न मिल रही हो, तो उसे मिस्ड मिसकैरेज कहते हैं, ब्लाइटेड ओवम नहीं।
स्कैन का तरीका भी मायने रखता है। इन हफ्तों में पेट के ऊपर से किया गया स्कैन कई बार साफ तस्वीर नहीं देता, इसलिए ट्रांसवेजाइनल स्कैन किया जाता है। पहली रिपोर्ट में कुछ न दिखने की वजह कई बार सिर्फ यही होती है।
ब्लाइटेड ओवम की सबसे आम वजह एम्ब्रीओ बनने के शुरुआती स्टेप में होने वाली क्रोमोसोम से सम्बंधित गड़बड़ी होती है। इनमें ट्राइसोमी सबसे ज्यादा देखी जाती है।
करीब आधे केसेस में क्रोमोसोम सामान्य ही पाए गए हैं। यानी हर केस की वजह जेनेटिक नहीं होती, और कई बार तो वजह साफ साफ पता ही नहीं चलती।
उम्र के साथ शुरुआती प्रेगनेंसी लॉस का रिस्क भी बढ़ता है। हालांकि, नीचे दिए गए आंकड़े सिर्फ ब्लाइटेड ओवम के नहीं, बल्कि सभी शुरुआती प्रेगनेंसी लॉस के हैं।
माँ की उम्र | शुरुआती प्रेगनेंसी लॉस की दर |
|---|---|
20 से 24 साल | करीब 10% |
40 से 44 साल | करीब 51% |
इसके अलावा कुछ दूसरी कंडीशन भी ब्लाइटेड ओवम से जुड़ी हो सकती हैं, लेकिन हर महिला में इसकी वजह अलग हो सकती है।
कई महिलाओं में ब्लाइटेड ओवम का कोई खास लक्षण नहीं होता और इसका पता रूटीन स्कैन में चलता है। अगर लक्षण हों, तो आमतौर पर ये दिखाई दे सकते हैं:
ध्यान रखें, इन लक्षणों से अकेले ब्लाइटेड ओवम की पुष्टि नहीं होती। इसकी पहचान के लिए TVS में सैक और एम्ब्रीओ की स्थिति देखी जाती है।
hCG हॉर्मोन की वजह से प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आता है। ब्लाइटेड ओवम में भी सैक और उससे जुड़ी बाहरी परत कुछ समय तक hCG बनाती रहती है। इसलिए एम्ब्रीओ डेवलप न होने के बावजूद प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है और hCG का लेवल भी बढ़ता हुआ मिल सकता है।
लेकिन सिर्फ hCG के नंबर से ब्लाइटेड ओवम को कन्फर्म नहीं करते। डॉक्टर hCG के साथ TVS की रिपोर्ट भी देखते हैं। TVS में सैक, योक सैक और एम्ब्रीओ की मौजूदगी और डेवलपमेंट को देखकर यह पता चलता है कि प्रेगनेंसी आगे बढ़ रही है या नहीं। जरूरत पड़ने पर कुछ समय के बाद hCG और TVS दोनों दोबारा किए जा सकते हैं।
अगर ब्लाइटेड ओवम की डायग्नोसिस पक्की हो जाए, तो आगे तीन ऑप्शन होते हैं।तीनों ही ऑप्शन सेफ हैं और कोई भी ऑप्शन अपनाया जा सकता है। बस उसका चुनाव आपकी कंडीशन और पसंद पर निर्भर करता है।
ऑप्शन | इसमें क्या होता है | कितना कारगर | किसके लिए ठीक रहता है |
|---|---|---|---|
इंतजार करना | शरीर खुद इसे बाहर निकाल देता है, कुछ दिन से कुछ हफ्ते लग सकते हैं | नतीजा सबसे ज्यादा बदलता है | ब्लीडिंग शुरू हो चुकी हो और आप इंतजार करना चाहें |
दवा से | गोली देकर प्रोसेस शुरू की जाती है, ज्यादातर मामलों में एक या दो दिन में पूरी हो जाती है | 52 से 95%, दवा के तरीके पर निर्भर | सर्जरी से बचना हो और डॉक्टर की निगरानी उपलब्ध हो |
सफाई की प्रोसेस | एक छोटी प्रोसेस से गर्भाशय खाली किया जाता है | 98% से ज्यादा | ब्लीडिंग ज्यादा हो, इन्फेक्शन का शक हो, या आप जल्दी पूरा करना चाहें |
इन तीनों की तुलना करने वाली एक स्टडी में सर्जरी की सफलता दर 98% से ऊपर मिली, जबकि दवा वाले ऑप्शन में 15 से 40% महिलाओं को बाद में सफाई की जरूरत पड़ गई। इन्फेक्शन का रिस्क दोनों में लगभग बराबर रहा, और सर्जरी के बाद ब्लीडिंग औसतन करीब तीन दिन रुक गयी।
ब्लीडिंग एक से दो हफ्ते तक रह सकती है, और अगला पीरियड चार से छह हफ्ते में आ सकता है। hCG का लेवल को पूरी तरह जीरो होने में कुछ हफ्ते लग सकते हैं। इसलिए इस दौरान किया गया प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है, और इससे घबराने की जरूरत नहीं होती।
ब्लाइटेड ओवम के बाद आमतौर पर ब्लीडिंग रुकने और एक पीरियड आ जाने के बाद दोबारा प्रेगनेंसी की कोशिश की जा सकती है। हर महिला को कई महीनों तक इंतजार करने की जरूरत नहीं होती।
दस लाख से ज्यादा महिलाओं पर हुयी एक स्टडी में पाया गया कि मिसकैरेज के छह महीने के भीतर दोबारा कंसीव करने वाली महिलाओं में अगला मिसकैरेज कम हुआ, प्रीटर्म डिलीवरी कम हुई, और जीवित जन्म की दर ज्यादा रही।
नतीजा | छह महीने के भीतर कंसीव करने पर |
|---|---|
दोबारा मिसकैरेज | करीब 18% कम |
समय से पहले डिलीवरी | करीब 21% कम |
जीवित जन्म | करीब 6% ज्यादा |
प्री-एक्लेम्पसिया और स्टिलबर्थ | कोई फर्क नहीं |
इसी स्टडी का निष्कर्ष यह रहा कि मिसकैरेज के बाद प्रेगनेंसी टालने का कोई फायदा नहीं है, और जब तक कोई खास मेडिकल वजह न हो, कपल तैयार महसूस होते ही दोबारा कोशिश कर सकते हैं। इस दौरान फोलिक एसिड की टेबलेट को बीच में रोकने की जरूरत नहीं है, इसे चलाते रहें।
अगली प्रेगनेंसी में ज्यादातर डॉक्टर थोड़ा जल्दी स्कैन कराते हैं ताकि सैक और एम्ब्रीओ दोनों समय पर दिखें और प्रेगनेंसी कन्फर्म होने के लिए आपको ज्यादा इंतज़ार न करना पड़े। यह कोई इलाज नहीं है, पर इससे मन का बोझ काफी हल्का रहता है।
ब्लाइटेड ओवम की सबसे मुश्किल बात यह है कि शरीर प्रेगनेंसी के संकेत देता रहता है और स्कैन कुछ और बताता है। इसी अंतर की वजह से यह खबर देर से समझ में आती है।
राहत की बात यह है कि फैसला अंदाजे से नहीं, तय मापदंडों से लिया जाता है। सैक का साइज, योक सैक दिखा था या नहीं, और पिछले स्कैन के बाद कितने दिन बीते, यही तीन बातें मिलकर तस्वीर साफ करती हैं। दोबारा स्कैन के लिए कहा जाए तो इसे टालमटोल न समझिए, यह वही एहतियात है जो एक ठीक चल रही प्रेगनेंसी को गलत फैसले से बचाती है।
डायग्नोसिस पक्की हो चुकी है, तो अगला कदम आपके हाथ में है। तीनों विकल्पों पर अपनी डॉक्टर से खुलकर बात कीजिए, और यह पूछिए कि आपकी स्थिति में किसकी सफलता दर बेहतर रहेगी।
और सबसे जरूरी बात, दोबारा कोशिश के लिए महीनों रुकने की सलाह अब पुरानी पड़ चुकी है। एक बार ऐसा होना अगली प्रेगनेंसी की संभावना कम नहीं करता।