सारांश (Overview)
पीरियड में दर्द होना इतना कॉमन है कि इसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। घर में कहा जाता है कि सबको होता है, शादी के बाद ठीक हो जाएगा, बच्चे के बाद ठीक हो जाएगा। कुछ महिलाओं में यह शरीर की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होता है, लेकिन कुछ में इसके पीछे एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड या एडेनोमायोसिस जैसी कंडीशन हो सकती है।
मेडिकल भाषा में इन्हें प्राइमरी और सेकेंडरी डिसमेनोरिया कहा जाता है। दोनों में अंतर समझने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि दर्द कितना तेज है। यह भी देखना जरूरी है कि दर्द कब शुरू होता है, कितने दिन रहता है और हर महीने उसका पैटर्न कैसा रहता है। आगे समझेंगे कि कौन सा दर्द सामान्य हो सकता है और ऐसे कौन से साइन हैं, जिनकी वजह की जांच करानी चाहिए।
StatPearls के अनुसार, प्राइमरी डिसमेनोरिया में पीरियड के दौरान पेट के निचले हिस्से में बार-बार दर्द होता है, लेकिन इसके पीछे कोई दूसरी बीमारी या यूट्रस की कोई बनावट से जुड़ी समस्या नहीं होती।
वहीं, सेकेंडरी डिसमेनोरिया में दर्द के पीछे कोई पहचानी जा सकने वाली कंडीशन होती है, जैसे एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड या एडेनोमायोसिस।
प्राइमरी | सेकेंडरी | |
|---|---|---|
कारण | कोई कंडीशन नहीं, शरीर की अपनी प्रक्रिया | कोई कंडीशन मौजूद होती है |
शुरुआत | अक्सर किशोरावस्था में, पीरियड शुरू होने के कुछ साल के भीतर | अक्सर बाद में, 25 की उम्र के बाद भी |
समय के साथ | आमतौर पर वैसा ही रहता है या कम हो सकता है | अक्सर समय के साथ बढ़ता जाता |
दर्द का समय | पीरियड के समय ब्लीडिंग के आसपास होता है | पीरियड के अलावा भी हो सकता है |
इलाज | दर्द को मैनेज करना | दर्द के पीछे की कंडीशन का इलाज |
जैसा कि बताया जा चुका है कि पीरियड में दर्द होना बहुत कॉमन है। StatPearls के अनुसार, अलग-अलग स्टडीज में 16 से 91 प्रतिशत महिलाओं ने पीरियड के दर्द की शिकायत की है। इनमें से 2 से 29 प्रतिशत महिलाओं को दर्द काफी ज्यादा था।
इतना बड़ा अंतर इसलिए दिखता है क्योंकि हर स्टडी में पीरियड के दर्द को एक ही तरह से नहीं देखा गया। लेकिन इससे एक बात साफ है, यह समस्या बहुत आम है।
और एक डाटा के अनुसार करीब 16 से 29 प्रतिशत महिलाओं में पीरियड का दर्द इतना ज्यादा होता है कि उनके रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं।
सेकेंडरी डिसमेनोरिया के पीछे कई कंडीशन हो सकती हैं। इनमें एंडोमेट्रियोसिस, यूटेराइन फाइब्रॉइड और एडेनोमायोसिस सबसे कॉमन हैं।
इसके अलावा पेल्विक इन्फ्लेमेटरी डिजीज, यूट्रस की बनावट से जुड़ी कुछ कंडीशन और कॉपर-T भी वजह हो सकती हैं। इनमें से किसी कंडीशन का पता सिर्फ लक्षणों से नहीं चलता। लक्षण केवल बताते हैं कि आगे जांच की जरूरत हो सकती है।
पीरियड के दर्द के लिए आमतौर पर सबसे पहले दर्द निवारक NSAID दवाएं दी जाती हैं। ये डिसमेनोरिया में पहली पसंद मानी जाती हैं।
StatPearls के अनुसार, NSAID दवाएं प्लेसीबो से ज्यादा असरदार होती हैं।
80 रैंडमाइज्ड ट्रायल और 5,820 महिलाओं की कॉक्रेन समीक्षा में, प्लेसीबो लेने वाली 18 प्रतिशत महिलाओं को अच्छा या बहुत अच्छा आराम मिला, जबकि NSAID लेने वाली महिलाओं में यह आंकड़ा 45 से 53 प्रतिशत था।
इसी समीक्षा में NSAID को पैरासिटामोल से ज्यादा असरदार पाया गया, हालांकि इस तुलना का सबूत सीमित था। NSAID से अपच, सिरदर्द और नींद आने जैसी शिकायतें हो सकती हैं। साइड इफेक्ट प्लेसीबो में 10 प्रतिशत और NSAID में 11 से 14 प्रतिशत महिलाओं में देखे गए।
कौन सी दवा और कितनी मात्रा आपके लिए सही है, यह आपकी बाकी स्थिति पर निर्भर करता है।
दो जरुरी बातें, दवा दर्द बढ़ने का इंतजार करने के बजाय शुरुआत में लेने पर ज्यादा काम करती है। और खाली पेट दवा मत लीजिए, पेट की कोई पुरानी दिक्कत हो तो डॉक्टर को बताइए।
सिकाई, एक्सरसाइज और दूसरे घरेलू उपायों को लेकर एविडेंस एक जैसे नहीं है। इसलिए इन्हें अलग-अलग समझना होगा।
तरीका | सबूत की हालत |
|---|---|
NSAID दवाएं | पहली पसंद, प्लेसीबो से साफ बेहतर |
गर्म सिकाई | कई मरीजों के लिए पसंदीदा शुरुआती विकल्प |
एक्सरसाइज | दर्द में बड़ी कमी दिखी, पर सबूत का दर्जा कम |
हर्बल और डाइट वाले उपाय | नियमित इलाज के तौर पर सिफारिश लायक सबूत नहीं |
StatPearls के अनुसार, गर्म सिकाई शुरुआती विकल्प हो सकती है और नियमित एक्सरसाइज से दर्द कम हो सकता है। हर्बल और डाइट वाले उपायों के नियमित इस्तेमाल के लिए अभी पर्याप्त एविडेंस नहीं है।
हर पीरियड के दर्द में जांच की जरूरत नहीं होती। लेकिन कुछ साइन हों, तो इसकी वजह पता करने के लिए डॉक्टर से मिलना चाहिए।
जांच आमतौर पर लक्षणों और शारीरिक जांच से शुरू होती है। जरूरत पड़ने पर पेल्विक अल्ट्रासाउंड कराया जाता है। फाइब्रॉइड और एडेनोमायोसिस अल्ट्रासाउंड में अक्सर दिख जाते हैं, लेकिन हर तरह का एंडोमेट्रियोसिस नहीं दिखता। इसलिए नॉर्मल अल्ट्रासाउंड के बाद भी लक्षण बने रहें, तो आगे जांच की जरूरत हो सकती है।
प्राइमरी डिसमेनोरिया का फर्टिलिटी पर कोई असर नहीं होता। तेज पीरियड दर्द होना अपने आप में इस बात का साइन नहीं है कि कंसीव करने में दिक्कत आएगी।
सेकेंडरी डिसमेनोरिया में बात अलग होती है। दर्द के पीछे जो कंडीशन है, वही कंसीव करने में भी दिक्कत पैदा कर सकती है। एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड और एडेनोमायोसिस तीनों का फर्टिलिटी से संबंध हो सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर महिला को दर्द होने पर फर्टिलिटी की चिंता करनी चाहिए। लेकिन अगर दर्द का पैटर्न बदला है या ऊपर बताए लक्षण मौजूद हैं, तो उसकी वजह की जांच करा लेनी चाहिए।
हर पीरियड का दर्द एक जैसा नहीं होता। प्राइमरी डिसमेनोरिया में दर्द के पीछे कोई दूसरी कंडीशन नहीं होती, जबकि सेकेंडरी डिसमेनोरिया में किसी कंडीशन की वजह से दर्द होता है। इसलिए सिर्फ दर्द कितना तेज है, यह देखना काफी नहीं है।
दर्द कब शुरू हुआ, हर महीने उसका पैटर्न कैसा है, समय के साथ बढ़ रहा है या नहीं और दवा से आराम मिलता है या नहीं, ये बातें ज्यादा काम की हैं। इनमें कोई बदलाव दिखे, तो इसकी वजह की जांच कराना सही रहता है।
पीरियड का दर्द बहुत कॉमन है, लेकिन इसे हर बार “सबको होता है” कहकर नज़रअंदाज़ करना भी ठीक नहीं है। दर्द बार-बार हो रहा है या रोजमर्रा के काम प्रभावित कर रहा है, तो उसकी वजह समझना जरूरी है।