सारांश (Overview)
रिपोर्ट में शुगर बढ़ी हुई आई और उसी दिन से चावल बंद, आलू बंद, केला बंद, मीठा तो बिल्कुल बंद। दो हफ्ते बाद फिर जांच होती है और शुगर अब भी ऊपर है। ऐसे में समझ नहीं आता कि इतना परहेज करने के बाद भी गलती कहां रह गई
दरअसल, gestational diabetes में सिर्फ कुछ चीजें बंद कर देना काफी नहीं होता। क्या खाना है, कितनी मात्रा में खाना है और दिन में कितनी बार खाना है, इन तीनों का शुगर पर असर पड़ता है। इसलिए डाइट ऐसी होनी चाहिए जिससे आपको पर्याप्त पोषण भी मिले और खाने के बाद शुगर भी तय सीमा में रहे।
इस आर्टिकल जानेंगे कि सही gestational diabetes diet क्या है।
प्रेगनेंसी में प्लेसेंटा ऐसे हार्मोन बनाता है जो इंसुलिन का असर कम कर देते हैं। ज्यादातर महिलाओं का शरीर इसकी भरपाई ज्यादा इंसुलिन बनाकर कर लेता है। जिनका नहीं कर पाता, उनमें खाने के बाद शुगर ऊपर चली जाती है। इसी को जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं।
डाइट का उद्देश्य वजन घटाना या खाना कम करना नहीं बल्कि इतना है कि खाने के बाद शुगर कंट्रोल में रहे, एवं आपको और बच्चे को जरूरी पोषण मिलता रहे।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि gestational diabetes के लिए कोई एक सबसे अच्छी डाइट नहीं है। Cochrane की एक एनालिसिस में अलग-अलग तरह की डाइट की तुलना की गई, लेकिन ज्यादातर रिजल्ट में इनके बीच कोई बहुत अंतर नहीं मिला।
यानी किसी एक तय डाइट चार्ट को सब पर लागू नहीं किया जा सकता। आपकी डाइट सही है या उसमें बदलाव की जरूरत है, यह समझने में ग्लूकोमीटर की रीडिंग सबसे ज्यादा मदद करती है।
Gestational diabetes में शुगर किस समय कितनी होनी चाहिए, इसे समझने के लिए इन तीन readings पर ध्यान दिया जाता है
कब शुगर चेक करें | टारगेट |
|---|---|
सुबह खाली पेट | 95 mg/dL से कम |
खाने के 1 घंटे बाद | 140 mg/dL से कम |
खाने के 2 घंटे बाद | 120 mg/dL से कम |
ये तीनों टारगेट अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के स्टैंडर्ड्स ऑफ केयर से है। दो घंटे वाला हिसाब खाना खत्म करने से नहीं, खाना शुरू करने से गिना जाता है। यह छोटी सी बात नंबर में बड़ा फर्क डालती है।
रोटी और चावल पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। प्रेगनेंसी में कार्बोहाइड्रेट शरीर और बच्चे दोनों के लिए जरूरी है, इसलिए सही तरीका मात्रा को संभालना और उसे प्रोटीन या फाइबर के साथ लेना है।
अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के अनुसार प्रेगनेंसी में रोजाना कम से कम 175 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, कम से कम 71 ग्राम प्रोटीन और 28 ग्राम फाइबर लेना चाहिए।
175 ग्राम कार्बोहाइड्रेट मोटे तौर पर दिन भर में सात से आठ रोटी या करीब 500 ग्राम पके चावल के बराबर होता है, लेकिन इसमें फल, दूध, दाल और दूसरी चीजों से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट भी शामिल होते हैं।
दिन में तीन छोटे से मीडियम साइज के मील और दो से तीन स्नैक्स लेने चाहिए, जिनमें साबुत अनाज वाले कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और गुड फैट हो, और नाश्ते में कार्बोहाइड्रेट कम रखना चाहिए।
समय | प्लेट में क्या हो | ध्यान रहे |
|---|---|---|
नाश्ता | कार्ब सबसे कम, प्रोटीन ज्यादा | यहीं शुगर सबसे तेज चढ़ती है |
दोपहर का खाना | कार्ब मध्यम, आधी प्लेट सब्जी, साथ में दाल या दही | रोटी गिनकर, थाली में एक साथ नहीं |
शाम का स्नैक | छोटा, प्रोटीन वाला | भूख को रात के खाने तक रोकने के लिए |
रात का खाना | कार्ब मध्यम, जल्दी खाएं | देर रात खाने से सुबह का खाली पेट वाला नंबर बिगड़ता है |
सोने से पहले | हल्का स्नैक, जिसमें प्रोटीन हो | रात भर की लंबी खाली अवधि तोड़ने के लिए |
एक व्यावहारिक नियम याद रखिए। कार्बोहाइड्रेट कभी अकेला मत खाइए। रोटी के साथ दाल, चावल के साथ दही, फल के साथ मुट्ठी भर मेवा खाएं। प्रोटीन और फाइबर साथ होने पर वही कार्ब धीरे पचता है और शुगर का स्पाइक कम रहती है।
प्रेगनेंसी में सुबह के समय शरीर इंसुलिन के असर के प्रति थोड़ा कम सेंसिटिव हो सकता है, इसलिए सुबह खाए गए कार्बोहाइड्रेट से शुगर ज्यादा बढ़ सकती है। इसलिए वही पोहा जो शाम को शुगर नहीं बढ़ाता, सुबह खाने पर शुगर ज्यादा बढ़ा सकता है।
आप नाश्ते में दो अंडों के साथ एक टोस्ट, बेसन का चीला या दही के साथ थोड़ी मात्रा में पोहा ले सकती हैं। सिर्फ पोहा, उपमा या ब्रेड-जैम लेने के बजाय इनके साथ प्रोटीन जोड़ना बेहतर रहता है। अगर हो सके तो सुबह की चाय भी बिना चीनी के पिएं।
Gestational diabetes में हर चीज को पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। अक्सर किसी खाने की चीज को छोड़ने के बजाय उसकी मात्रा कम करना या उसके साथ प्रोटीन और सब्जियां जोड़ना ज्यादा आसान और व्यावहारिक तरीका होता है।
इसकी जगह | यह लीजिए | क्यों |
|---|---|---|
सफेद चावल | हाथ से कुटा चावल, या चावल की मात्रा आधी और दाल-सब्जी ज्यादा | एक बार में कार्ब कम पड़ेगा |
मैदे की रोटी या ब्रेड | गेहूं, बाजरा, ज्वार या मिले-जुले आटे की रोटी | फाइबर ज्यादा, पचने में धीमा |
फलों का जूस | पूरा फल, छिलके सहित जहां हो सके | जूस में फाइबर निकल जाता है |
चाय के साथ बिस्कुट | चाय के साथ भुना चना या मुट्ठी भर मेवा | अकेला कार्ब नहीं जाएगा |
आलू की सब्जी अकेले | आलू कम, साथ में दूसरी सब्जी और दही | प्लेट का संतुलन बदल जाएगा |
मीठा, मिठाई, कोल्ड ड्रिंक | पूरी तरह बचें | इनसे नंबर सबसे तेज चढ़ता है |
फलों को लेकर अक्सर उलझन रहती है। फल बंद करने की जरूरत नहीं है। एक बार में एक फल लें, उसे दो भोजन के बीच खाएं और जरूरत हो तो साथ में थोड़ा प्रोटीन लें।
देखें कि उस मील में क्या और कितनी मात्रा में खाया था। अगली बार उसी मील में थोड़ा बदलाव करें और फिर देखें कि शुगर पर क्या असर पड़ा।
शुगर का लेवल | क्या करें |
शुगर थोड़ी ऊपर आई है | कार्बोहाइड्रेट की मात्रा थोड़ी कम करके दाल, सब्जी या प्रोटीन बढ़ा सकती हैं। |
शुगर काफी ऊपर आई है | देखें कि meal में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा तो नहीं थी या उसे अकेले तो नहीं खाया गया। अगली बार meal में प्रोटीन और सब्जियां जोड़कर देखें। |
सिर्फ नाश्ते के बाद शुगर बढ़ती है | पहले नाश्ते में बदलाव करके देखें, बाकी meals को बिना वजह बदलने की जरूरत नहीं है। |
खाने के बाद 15 से 20 मिनट की नॉर्मल वॉक भी खाने के बाद की शुगर को कंट्रोल करने में मदद कर सकती है।
एक ही मील के बाद रीडिंग देखकर उसे ख़राब न मान लें। नींद, तनाव या तबीयत खराब होने जैसी वजहों से भी किसी दिन शुगर अलग आ सकती है।
अच्छी बात यह है कि जेस्टेशनल डायबिटीज वाली 70 से 85 प्रतिशत महिलाएं खानपान और रोजमर्रा की आदतों में बदलाव करके अपनी शुगर संभाल लेती हैं। लेकिन अगर इसके बावजूद शुगर कंट्रोल में नहीं आती, तो डॉक्टर दवा या इंसुलिन की सलाह दे सकते हैं।
प्रेगनेंसी में इंसुलिन को सेफ माना जाता है और डिलीवरी के बाद कई महिलाओं को इसकी जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अगर दवा या इंसुलिन शुरू हो जाए, तो शुगर ठीक आने पर भी इसे खुद से बंद नहीं करना चाहिए। दवा की मात्रा कम करनी है या बंद करनी है, इसका फैसला डॉक्टर ही करते हैं।
ज्यादातर महिलाओं में डिलीवरी के बाद शुगर अपने आप नॉर्मल हो जाती है, क्योंकि जिस प्लेसेंटा के हार्मोन की वजह से शुगर बढ़ी थी, डिलीवरी के बाद वह शरीर में नहीं रहता।
लेकिन इसके बाद भी जांच जरूरी होती है। ADA के अनुसार जेस्टेशनल डायबिटीज के बाद डिलीवरी के 4 से 12 हफ्ते के भीतर 75 ग्राम वाली ग्लूकोज टॉलरेंस जांच करानी चाहिए और उसके बाद हर 1 से 3 साल में जांच जारी रखनी चाहिए।
इसकी वजह यह है कि जेस्टेशनल डायबिटीज के बाद आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। एक रिसर्च पेपर के अनुसार, जेस्टेशनल डायबिटीज के इतिहास वाली 15 से 70 प्रतिशत महिलाओं में आगे चलकर डायबिटीज हो सकती है। इसलिए डिलीवरी के बाद की जांच को सिर्फ एक औपचारिकता न मानें। इससे शुगर में दोबारा होने वाले बदलावों का समय रहते पता चल सकता है।
Gestational diabetes में हर महिला के लिए एक जैसी डाइट काम नहीं करती। किसी तय चार्ट को अपनाने के बजाय अपनी डाइट और खाने के बाद की शुगर को साथ देखकर यह समझना ज्यादा जरूरी है कि आपके शरीर के लिए क्या सही है।
अगर केवल खानपान से शुगर कंट्रोल में नहीं आती, तो दवा या इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है। यह आपकी गलती नहीं है। डिलीवरी के बाद शुगर सामान्य हो जाए, तब भी आगे की जांच को नजरअंदाज न करें, क्योंकि जेस्टेशनल डायबिटीज भविष्य में डायबिटीज के बढ़े हुए खतरे का संकेत हो सकती है।