सारांश (Overview)
मिसकैरेज के बाद थायरॉइड की जांच अक्सर सबसे पहले की जाती है। लेकिन थायरॉइड की कमी और मिसकैरेज के बीच रिलेशन हर कंडीशन में एक जैसा नहीं होता। कुछ केसेस में इलाज से फायदा साफ दिखता है, कुछ में एविडेंस मिले-जुले हैं, और एक कंडीशन ऐसी भी है जिसमें बड़े ट्रायल में थायरॉक्सिन से कोई फायदा नहीं मिला।
इस आर्टिकल में जानेंगे कि ओवर्ट और सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म में क्या फर्क है, TSH नॉर्मल होने पर भी रिस्क क्यों रह सकता है, TPO एंटीबॉडी क्या बताती है और थायरॉक्सिन किन स्थितियों में सच में जरूरी होती है। साथ ही, यह भी समझेंगे कि प्रेगनेंसी की पुष्टि होते ही थायरॉक्सिन की डोज पर दोबारा ध्यान क्यों देना पड़ता है।
अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन के अनुसार, जिन महिलाओं के हाइपोथायरॉइडिज्म का इलाज नहीं हुआ है या ठीक से कंट्रोल में नहीं है, उनमें मिसकैरेज का रिस्क बढ़ा हुआ रहता है।
प्रेगनेंसी के शुरुआती हफ्तों में बच्चे को जरूरी थायरॉइड हार्मोन मां से ही मिलता है। इसलिए इस समय मां में इसकी कमी होने पर प्रेगनेंसी पर असर पड़ सकता है।
अब सवाल है कि थायरॉइड की कितनी कमी हो तब चिंता करनी चाहिए और कौन से केसेस हैं जिनमें थायरॉक्सिन से फायदा होता है। इसे समझने के लिए ओवर्ट और सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म का अंतर जानना जरूरी है।
रिपोर्ट में दोनों को “थायरॉइड” कह दिया जाता है, लेकिन ओवर्ट और सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म एक जैसे नहीं होते।
ओवर्ट हाइपोथायरॉइडिज्म | सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म | |
|---|---|---|
TSH | बढ़ा हुआ | बढ़ा हुआ |
फ्री T4 | कम | नॉर्मल |
लक्षण | अक्सर दिखते हैं | अक्सर कुछ नहीं |
इलाज पर सहमति | पूरी, इलाज जरूरी | मिली-जुली, हर केस में अलग |
StatPearls के अनुसार ओवर्ट हाइपोथायरॉइडिज्म में फ्री T4 कम और TSH ज्यादा होता है, जबकि सबक्लिनिकल में फ्री T4 नॉर्मल रहता है और सिर्फ TSH बढ़ा होता है।
यही वजह है कि सिर्फ TSH देखकर फैसला नहीं किया जा सकता। बढ़ा हुआ TSH मिलने पर फ्री T4 देखना भी जरूरी है। इससे पता चलता है कि हाइपोथायरॉइडिज्म किस कंडीशन में है और इलाज की जरूरत कितनी है।
इसलिए अपनी रिपोर्ट में सिर्फ TSH न देखें। फ्री T4 की वैल्यू भी जरूर देखें।
थायरॉइड की जांच में सिर्फ TSH देखना काफी नहीं होता। एक और जांच होती है, TPO एंटीबॉडी, जो यह पता लगाने में मदद करती है कि शरीर थायरॉइड ग्रंथि के खिलाफ एंटीबॉडी तो नहीं बना रहा।
स्टेटपर्ल्स के अनुसार, TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव होने पर मिसकैरेज और प्रीटर्म डिलीवरी का रिस्क बढ़ा हुआ पाया गया है। अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन के अनुसार भी TPO एंटीबॉडी वाली महिलाओं में कुछ प्रेगनेंसी रिस्क ज्यादा देखे गए हैं।
जरुरी बात यह है कि TPO एंटीबॉडी TSH नॉर्मल होने पर भी पॉजिटिव हो सकती है। यानी सिर्फ TSH नॉर्मल देखकर यह मान लेना कि थायरॉइड से जुड़ी कोई समस्या नहीं है, सही नहीं है।
T3, T4 और TSH आमतौर पर थायरॉइड प्रोफाइल में शामिल होते हैं, जबकि TPO एंटीबॉडी की जांच अलग से करानी पड़ती है।
हर किसी को नहीं। यह उन महिलाओं के लिए है जिनका मिसकैरेज एक से ज्यादा बार हो चुका है।
ESHRE की गाइडलाइन के अनुसार, जिन महिलाओं को बार-बार मिसकैरेज हुआ है, उनमें TSH और TPO एंटीबॉडी दोनों की जांच करनी चाहिए। अगर TSH बढ़ा हुआ आता है, तो आगे फ्री T4 की जांच भी की जाती है।
इसलिए अगर आपको पहले भी मिसकैरेज हो चुका है, तो डॉक्टर से बात करते समय अपनी रिपोर्ट में TSH और TPO एंटीबॉडी की जांच जरूर देखें। अगर TSH बढ़ा हुआ है, तो फ्री T4 की जांच भी जरूरी हो सकती है।
साथ ही, TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव आने का मतलब यह नहीं है कि अगली प्रेगनेंसी में भी मिसकैरेज होगा। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि प्रेगनेंसी के दौरान थायरॉइड और दूसरी जरूरी चीजों पर डॉक्टर को थोड़ा ज्यादा ध्यान देना पड़ सकता है।
अगर TSH नॉर्मल है लेकिन TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव है, तो सिर्फ मिसकैरेज रोकने के लिए थायरॉक्सिन लेने से फायदा साबित नहीं हुआ है।
TABLET ट्रायल में 952 महिलाओं को शामिल किया गया। थायरॉक्सिन और प्लेसीबो लेने वाली महिलाओं में जीवित संतान को जन्म की दर 37 और 38 प्रतिशत, जबकि मिसकैरेज की दर 28 और 30 प्रतिशत रही। यानी दोनों ग्रुप में कोई खास अंतर नहीं था।
इसी आधार पर ESHRE की गाइडलाइन कहती है कि नॉर्मल TSH और पॉजिटिव TPO एंटीबॉडी वाली महिलाओं को सिर्फ इस वजह से थायरॉक्सिन नहीं दी जानी चाहिए।
सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म में एविडेंस इतने क्लियर नहीं हैं। ESHRE के अनुसार, इलाज के फायदे को लेकर मिले-जुले एविडेंस हैं। इसलिए थायरॉक्सिन की जरूरत TSH, फ्री T4 और बाकी स्थिति देखकर तय की जाती है।
कंडीशन | इलाज पर क्या कहा गया है |
|---|---|
फर्स्ट ट्राइमेस्टर में TSH 10 से ज्यादा | इलाज दिया जाना चाहिए |
TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव और TSH 4 से ज्यादा | इलाज की सलाह दी जाती है |
TSH नॉर्मल, सिर्फ TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव | ट्रायल में फायदा नहीं मिला, ESHRE इलाज न देने को कहती है |
पहले से थायरॉक्सिन चल रही है | प्रेगनेंसी पता चलते ही डोज बढ़ाने की बात आती है |
अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन के अनुसार, फर्स्ट ट्राइमेस्टर में TSH 10 mIU/L से ज्यादा होने पर इलाज किया जाना चाहिए। TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव महिलाओं में TSH 4 mIU/L से ऊपर होने पर भी इलाज की सलाह दी जाती है।
डॉक्टर TSH, फ्री T4, TPO एंटीबॉडी और आपकी पूरी प्रेगनेंसी हिस्ट्री देखकर तय करते हैं कि इलाज की जरूरत है या नहीं। इसीलिए टेबल देख कर खुद से इलाज शुरू न करें।
अगर आप पहले से थायरॉक्सिन ले रही हैं और आपका प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आता है, तो अगली अपॉइंटमेंट तक इंतजार नहीं करना चाहिए। प्रेगनेंसी के शुरुआती हफ्तों में बच्चे को जरूरी थायरॉइड हार्मोन मां से ही मिलता है, इसलिए इस दौरान शरीर को ज्यादा थायरॉक्सिन की जरूरत पड़ सकती है।
अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन के अनुसार, प्रेगनेंसी में थायरॉक्सिन की जरूरत अक्सर 25 से 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसलिए प्रेगनेंसी कन्फर्म होते ही डॉक्टर से संपर्क करने की सलाह दी जाती है।
आप खुद से दवा की डोज न बढ़ायें, डॉक्टर आपकी कंडीशन के हिसाब से डोज तय करते हैं और आगे TSH की जांच भी कराते हैं।
थायरॉक्सिन सुबह खाली पेट लें और कैल्शियम या आयरन की गोली से कम से कम चार घंटे का अंतर रखें। प्रेगनेंसी में ये दोनों सप्लीमेंट आमतौर पर दिए जाते हैं, इसलिए इनके बीच का अंतर रखना जरूरी है।
बार-बार मिसकैरेज की जांच में थायरॉइड के साथ एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी, गर्भाशय की बनावट, दोनों पार्टनर के क्रोमोसोम और शुगर को भी देखा जाता है। कौन-सी जांच करनी है, यह आपकी हिस्ट्री और पिछली प्रेगनेंसी के आधार पर तय होती है।
एक मिसकैरेज के बाद हर महिला को ये सारी जांच कराने की जरूरत नहीं होती। पहला मिसकैरेज अक्सर क्रोमोसोम में अचानक हुई गड़बड़ी की वजह से होता है। लेकिन अगर दो या उससे ज्यादा मिसकैरेज हो चुके हैं, तो डॉक्टर दूसरी संभावित वजहों की जांच करने की सलाह दे सकते हैं।
IVF शुरू करने से पहले थायरॉइड की जांच हो जाती है। अगर आपको पहले से हाइपोथायरॉइडिज्म है, तो IVF के दौरान भी TSH पर नजर रखना जरूरी है।
स्टिमुलेशन के दौरान एस्ट्रोजन बढ़ने से थायरॉइड हार्मोन की जरूरत बढ़ सकती है। इसलिए शुरुआत में TSH नॉर्मल होने पर भी डॉक्टर स्टिमुलेशन या एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद इसे दोबारा चेक कर सकते हैं।
एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद प्रेगनेंसी कन्फर्म हो जाए, तो थायरॉक्सिन की डोज की जरूरत भी बढ़ सकती है। इसलिए प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आते ही डॉक्टर को बताएं और दवा की डोज खुद से न बदलें।
Hypothyroidism और miscarriage का रिलेशन है, लेकिन हर तरह के हाइपोथायरॉइडिज्म में रिस्क और इलाज का असर एक जैसा नहीं होता। बिना इलाज या ठीक से कंट्रोल में न रहने वाला हाइपोथायरॉइडिज्म मिसकैरेज का रिस्क बढ़ा सकता है और उसका इलाज जरूरी है। वहीं, TSH नॉर्मल होने पर सिर्फ TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव होने की स्थिति में थायरॉक्सिन से मिसकैरेज रोकने का फायदा साबित नहीं हुआ है।
इसलिए सिर्फ TSH देखकर फैसला न करें। जरूरत पड़ने पर TSH के साथ फ्री T4 और TPO एंटीबॉडी भी देखे जाते है। अगर आप पहले से थायरॉक्सिन ले रही हैं, तो प्रेगनेंसी कन्फर्म होते ही डॉक्टर से बात करें, क्योंकि इस दौरान दवा की जरूरत बढ़ सकती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि थायरॉक्सिन को खुद से शुरू या बंद न करें। आपकी रिपोर्ट और पूरी स्थिति देखकर डॉक्टर ही तय करते हैं कि आपको इलाज की जरूरत है या नहीं।