प्रेगनेंसी की खबर जितनी खुशियां लाती है, उसका अचानक खत्म हो जाना उतना ही बड़ा खालीपन दे जाता है। मिसकैरेज (Miscarriage) यानि गर्भपात सिर्फ एक मेडिकल टर्म नहीं है, बल्कि एक टूटते हुए सपने का दुख है जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। सबसे तकलीफदेह बात यह है कि कई बार इस दुख के साथ एक 'अपराध बोध' यानी गिल्ट (guilt) भी जुड़ जाता है जब महिला को लगने लगता है कि कहीं उसकी ही किसी गलती या लापरवाही की वजह से ऐसा न हो गया हो। सच तो यह है कि miscarriage kaise hota hai, इसे गहराई से समझना आपको इस मानसिक बोझ से आज़ाद कर सकता है। क्योंकि आधे से ज्यादा मामलों में गर्भपात पर आपका कोई बस नहीं होता। कुदरती तौर पर, जब भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) के बनने में कोई जेनेटिक या क्रोमोसोम से सम्बंधित गड़बड़ी रह जाती है, तो शरीर खुद ही उस प्रेगनेंसी को आगे नहीं बढ़ाता। यह आर्टिकल miscarriage kaise hota hai को जानने और दोबारा एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ने का रास्ता दिखायेगा। इस लेख का सार (Take Away): यहाँ आप जानेंगे कि मिसकैरेज के पीछे क्या कारण होते हैं, इसके शरीर में दिखने वाले शुरुआती लक्षण क्या होते हैं और अगर किसी को बार-बार यह समस्या हो रही है, तो इसका इलाज क्या है।
मिसकैरेज यानी गर्भपात तब होता है जब प्रेगनेंसी के पहले 20 हफ्तों में भ्रूण अपने आप गिर जाता है या उसका विकास रुक जाता है। ज़्यादातर मिसकैरेज पहले 12 हफ्तों यानी पहली तिमाही में होते हैं।
यह जानना ज़रूरी है कि मिसकैरेज बहुत कॉमन है। :विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और क्लिनिकल डेटा के अनुसार, लगभग 10% से 15% क्लिनिकल प्रेगनेंसी मिसकैरेज में समाप्त होती हैं। ज़्यादातर मामले पहली तिमाही (First 12 weeks) में देखे जाते हैं। कई बार तो महिला को पता भी नहीं चलता कि वो प्रेग्नेंट थी और मिसकैरेज हो गया एवं इसे पीरियड्स समझ लिया जाता है।
मिसकैरेज होने का मतलब यह नहीं कि आप दोबारा माँ नहीं बन सकतीं। ज़्यादातर महिलाएं मिसकैरेज के बाद सफलतापूर्वक प्रेग्नेंट होती हैं और स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं।
यह सेक्शन उन महिलाओं के लिए बहुत ज़रूरी है जो समझना चाहती हैं कि miscarriage kaise hota hai और इसके पीछे क्या वजहें होती हैं।
50% से ज़्यादा मिसकैरेज इसी वजह से होते हैं। जब एग और स्पर्म मिलते हैं और भ्रूण यानी एम्ब्रीओ बनता है, तो कभी-कभी क्रोमोसोम की संख्या में गड़बड़ी हो जाती है। ऐसे भ्रूण का विकास ठीक से नहीं हो पाता और शरीर उसे अपने आप रिजेक्ट कर देता है।
यह किसी की गलती नहीं होती यह प्रकृति का एक अस्वस्थ प्रेगनेंसी को रोकने का अपना तरीका है।
प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन प्रेगनेंसी को बनाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी है। अगर प्रोजेस्टेरोन कम हो तो एम्ब्रीओ यूट्रस में ठीक से इम्प्लांट नहीं हो पाता या टिक नहीं पाता। थायरॉइड की समस्या भी मिसकैरेज का कारण बन सकती है।
यूट्रस यानी गर्भाशय की संरचना में कोई दिक्कत हो जैसे सेप्टेट यूट्रस यानी बीच में पर्दा, फाइब्रॉइड, या यूट्रस का आकार असामान्य हो तो एम्ब्रीओ को इम्प्लांट होने या बढ़ने में दिक्कत आती है।
कुछ इंफेक्शन जैसे रूबेला, टॉक्सोप्लाज़्मोसिस, या सीएमवी (CMV) प्रेगनेंसी को प्रभावित कर सकते हैं और मिसकैरेज का कारण बन सकते हैं।
धूम्रपान, शराब का सेवन, बहुत ज़्यादा कैफीन, और ड्रग्स का उपयोग मिसकैरेज का खतरा बढ़ाते हैं। बहुत कम या बहुत ज़्यादा वज़न भी रिस्क फैक्टर है।
35 साल के बाद मिसकैरेज का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि एग की क्वालिटी उम्र के साथ कम होती जाती है। 40 के बाद यह खतरा और भी ज़्यादा होता है।
एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम (APS) जैसी कंडीशन में खून के थक्के बनने की समस्या होती है जो प्लेसेंटा में ब्लड फ्लो को प्रभावित करती है जिसके कारण मिसकैरेज हो सकता है।
मिसकैरेज के कुछ लक्षण हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है। प्रेगनेंसी में हल्की स्पॉटिंग हमेशा मिसकैरेज नहीं होती। कई बार यह नॉर्मल होती है। लेकिन अगर ब्लीडिंग हो या दर्द हो तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
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मिसकैरेज कई प्रकार के होते हैं, जैसे थ्रेटेंड (Threatened), इनएविटेबल (Inevitable), इनकम्प्लीट (Incomplete), कम्प्लीट (Complete) और मिस्ड मिसकैरेज (Missed Miscarriage)। हर प्रकार के लक्षण, कारण और इलाज अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए समय पर डॉक्टर से जांच और सही मार्गदर्शन बहुत ज़रूरी होता है।
इसमें हल्की ब्लीडिंग और दर्द होता है लेकिन सर्विक्स बंद रहता है और अल्ट्रासाउंड में एम्ब्रीओ ठीक दिखता है। सही इलाज और आराम से ऐसे मिसकैरेज को रोका जा सकता है।
इसमें एम्ब्रीओ की ग्रोथ रुक जाती है लेकिन शरीर उसे बाहर नहीं निकालता। महिला को कोई लक्षण नहीं दिखते और अल्ट्रासाउंड में ही पता चलता है कि बच्चे की हार्टबीट नहीं है। इसे साइलेंट मिसकैरेज भी कहते हैं।
इसमें मिसकैरेज हो जाता है लेकिन कुछ टिशू यूट्रस में रह जाते हैं। इन्हें निकालने के लिए दवाई या प्रोसीजर की ज़रूरत पड़ती है।
इसमें सारा टिशू अपने आप बाहर आ जाता है और यूट्रस पूरी तरह खाली हो जाता है।
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मिसकैरेज के बाद शारीरिक और भावनात्मक दोनों तरह की देखभाल बहुत ज़रूरी है।
मिसकैरेज के बाद कुछ दिनों तक ब्लीडिंग और क्रैम्प्स हो सकते हैं। डॉक्टर जाँच करके देखते हैं कि यूट्रस पूरी तरह खाली हो गया है या नहीं। अगर कुछ टिशू रह गया हो तो दवाई दी जाती है या D&C (डाइलेशन एंड क्यूरेटेज) प्रोसीजर किया जाता है।
आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में पीरियड्स वापस आ जाते हैं और शरीर नॉर्मल हो जाता है।
मिसकैरेज के बाद दुख, गुस्सा, अपराध बोध यानी गिल्ट (guilt), या खालीपन महसूस होना बिल्कुल नॉर्मल है। अपने आप को समय दें। पार्टनर, परिवार, या किसी काउंसलर से बात करें। यह समझें कि ज़्यादातर मिसकैरेज आपकी गलती से नहीं होते।
अगर किसी महिला को लगातार दो या तीन बार मिसकैरेज हो जाए, तो इसे रिकरेंट मिसकैरेज (Recurrent Miscarriage) कहते हैं। यह सेक्शन ऐसी महिलाओं के लिए बहुत ज़रूरी है।
बार-बार मिसकैरेज होने पर विस्तृत यानी डिटेल्ड जाँच करवाना ज़रूरी है।
एक मिसकैरेज के बाद अगली प्रेगनेंसी में सफलता की संभावना 85% से ज़्यादा होती है। दो मिसकैरेज के बाद भी 75% महिलाएं सफलतापूर्वक माँ बनती हैं।
ज़्यादातर डॉक्टर मिसकैरेज के बाद कम से कम एक नॉर्मल पीरियड साइकिल का इंतज़ार करने की सलाह देते हैं। शारीरिक रूप से 1 से 3 महीने में दोबारा कंसीव किया जा सकता है।
लेकिन आपको भावनात्मक रूप से तैयार होना भी उतना ही ज़रूरी है। जब आप और आपके पार्टनर दोनों मानसिक रूप से तैयार हों, तब दोबारा कोशिश करें।
अगर आपको मिसकैरेज हुआ है, तो अपने आप को दोष न दें। शरीर और मन दोनों को ठीक होने का समय दें। Miscarriage kaise hota hai जानने के बाद समझ आता है कि इसके कई कारण हैं जैसे क्रोमोसोम में गड़बड़ी, हॉर्मोनल असंतुलन, यूट्रस की समस्या, या लाइफस्टाइल से संबंधित कारण। लेकिन सबसे ज़रूरी बात यह है कि ज़्यादातर मिसकैरेज किसी की गलती नहीं होते।
अगर बार-बार मिसकैरेज हो रहा है, तो फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें, आज IVF और PGT जैसी तकनीकों से रिकरेंट मिसकैरेज के बाद भी माँ बनना संभव है।
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आमतौर पर 1-2 हफ्ते तक हल्की ब्लीडिंग हो सकती है। अगर भारी ब्लीडिंग हो या बुखार आए तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
ज़्यादातर मिसकैरेज क्रोमोसोम में गड़बड़ी से होते हैं जिन्हें रोकना संभव नहीं है। लेकिन हेल्दी लाइफस्टाइल, फोलिक एसिड लेना, और रेगुलर चेकअप से रिस्क कम किया जा सकता है।
शारीरिक रूप से 1-3 महीने में। लेकिन डॉक्टर की सलाह लें और भावनात्मक रूप से भी तैयार होने का इंतज़ार करें।
जेनेटिक कारण, हॉर्मोनल असंतुलन, यूट्रस की समस्या, या ब्लड क्लॉटिंग डिसऑर्डर इसकी वजह हो सकते हैं। विस्तृत जाँच से कारण पता चलता है।
IVF में PGT-A (जेनेटिक टेस्टिंग) करने से क्रोमोसोम की तरफ से हेल्दी एम्ब्रीओ चुने जाते हैं जिससे मिसकैरेज का खतरा काफ़ी कम हो जाता है।