जब कुछ समय से प्रेगनेंसी नहीं हो रही होती, तो डॉक्टर अक्सर IUI या IVF की सलाह देते हैं। दोनों ही फर्टिलिटी ट्रीटमेंट हैं, लेकिन दोनों का तरीका, खर्च, सक्सेस रेट और शरीर पर असर बिल्कुल अलग होता है। बहुत से कपल्स को यह समझ नहीं आता कि पहले IUI करवाएं या सीधे IVF, और कई बार गलत फैसले से समय और पैसे दोनों बर्बाद हो जाते हैं।
IUI vs IVF in Hindi आर्टिकल में हम आपको दोनों ट्रीटमेंट के बीच का फर्क, हर प्रक्रिया कैसे होती है, किन सिचुएशन में कौन सा ट्रीटमेंट अच्छा काम करता है, और सक्सेस रेट क्या है, यह सब विस्तार से समझाएंगे ताकि आप अपने डॉक्टर के साथ मिलकर सही फैसला ले सकें।
IUI यानी इंट्रायूटेराइन इन्सेमिनेशन (intrauterine insemination) एक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट है। इसमें आपके पार्टनर के स्पर्म को लैब में प्रोसेस करके सबसे अच्छे और फ़ास्ट स्पर्म अलग किए जाते हैं, फिर उन्हें एक पतली ट्यूब से सीधे गर्भाशय यानी यूट्रस (uterus) में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
पूरी प्रक्रिया क्लिनिक में 10 से 15 मिनट में हो जाती है, और आप उसी दिन घर जा सकती हैं।
IUI से पहले डॉक्टर कुछ दवाएं देते हैं जिनसे ओव्यूलेशन (ovulation) का सही समय पता चल सके। जब एग निकलने वाला होता है, ठीक उसी समय स्पर्म को यूट्रस में डाला जाता है।
IUI में फर्टिलाइज़ेशन (fertilization) आपके शरीर के अंदर ही होता है, डॉक्टर बस स्पर्म को सही जगह पहुंचा देते हैं।
IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (in vitro fertilization) एक एडवांस ट्रीटमेंट है जिसमें एग और स्पर्म को शरीर के बाहर लैब में मिलाया जाता है। जब भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) बन जाता है, तो उसे यूट्रस में रखा जाता है।
IVF में सबसे पहले 10 से 12 दिन तक इंजेक्शन दिए जाते हैं जिनसे ओवरी में कई एग्स एक साथ तैयार हों। अल्ट्रासाउंड से एग्स की ग्रोथ चेक होती रहती है।
एग्स सही साइज़ में आने पर एग रिट्रीवल (egg retrieval) की जाती है, जिसमें हल्की बेहोशी देकर ओवरी से एग्स निकाले जाते हैं। उसी दिन स्पर्म लेकर लैब में अंडों के साथ मिलाया जाता है।
स्पर्म की क्वालिटी कम होने पर ICSI तकनीक से एक स्पर्म सीधे अंडे में डाला जाता है। भ्रूण 3 से 5 दिन लैब में बढ़ता है, फिर सबसे अच्छे एम्ब्रीओ को गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है।
सबसे बड़ा फर्क यह है कि IUI में फर्टिलाइज़ेशन शरीर के अंदर होता है, जबकि IVF में शरीर के बाहर। IVF में डॉक्टर हर स्टेप पर कंट्रोल कर सकते हैं, इसीलिए सक्सेस रेट ज़्यादा होती है।
सक्सेस रेट दोनों ट्रीटमेंट में काफी अलग है और यह आपकी उम्र, समस्या की गंभीरता, और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करती है।
IUI की सक्सेस रेट आमतौर पर 10 से 20 प्रतिशत प्रति साइकल होती है। इसका मतलब यह है कि हर कोशिश में प्रेगनेंसी होने की संभावना 10 में से 1 या 2 होती है। लेकिन अगर 3 से 4 बार IUI करवाया जाए, तो कुल मिलाकर सफलता की संभावना 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। 35 साल से कम उम्र में और जब फैलोपियन ट्यूब खुली हो, तब IUI सबसे अच्छा काम करता है।
IVF की सक्सेस रेट काफी ज़्यादा होती है, करीब 40 से 55 प्रतिशत प्रति साइकल। 30 साल से कम उम्र में यह दर और भी बेहतर हो सकती है। 40 के बाद सक्सेस रेट घटती है क्योंकि एग की क्वालिटी उम्र के साथ कम होती जाती है।
IVF में PGT (प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग) से भ्रूण की जांच भी हो सकती है, जिससे सही भ्रूण चुनने में मदद मिलती है।
IUI उन कपल्स के लिए सबसे पहले सुझाया जाता है जिनकी समस्या बहुत गंभीर नहीं है। अगर पुरुष पार्टनर के स्पर्म की संख्या थोड़ी कम है या स्पर्म की गति धीमी है, तो IUI से स्पर्म को सीधे गर्भाशय तक पहुंचाकर उनकी यात्रा छोटी कर दी जाती है। इससे फर्टिलाइज़ेशन की संभावना बढ़ जाती है।
अगर महिला की ओव्यूलेशन में हल्की दिक्कत है, जैसे PCOS की वजह से अनियमित पीरियड्स, तो दवाओं से ओव्यूलेशन करवाकर IUI किया जा सकता है। सर्विक्स (cervix) यानी गर्भाशय के मुंह की समस्या, जैसे सर्वाइकल म्यूकस बहुत गाढ़ा हो, तो भी IUI मदद करता है क्योंकि स्पर्म को सर्विक्स पार करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
एक ज़रूरी बात यह है कि IUI तभी काम करता है जब कम से कम एक फैलोपियन ट्यूब खुली हो। क्योंकि IUI में फर्टिलाइज़ेशन ट्यूब में ही होता है, अगर दोनों ट्यूब बंद हैं तो IUI काम नहीं करेगा। ऐसे में सीधे IVF की ज़रूरत होती है।
IVF तब सुझाया जाता है जब IUI से सफलता नहीं मिलती, या समस्या इतनी गंभीर हो कि IUI से फायदा होने की उम्मीद कम हो। दोनों फैलोपियन ट्यूब बंद होने पर IVF ही एकमात्र विकल्प है क्योंकि इसमें ट्यूब की कोई भूमिका नहीं होती।
एंडोमेट्रियोसिस (endometriosis) के गंभीर मामलों में, स्पर्म की बहुत कम संख्या या गतिशीलता होने पर, और 38 से ज़्यादा उम्र में डॉक्टर अक्सर सीधे IVF सुझाते हैं। बार बार मिसकैरेज (miscarriage) होने पर भी IVF फायदेमंद है क्योंकि PGT से भ्रूण की जेनेटिक जांच करके स्वस्थ भ्रूण चुना जा सकता है। AMH लेवल कम होने पर भी IVF पहली पसंद होता है।
खर्च के मामले में IUI और IVF में बहुत बड़ा अंतर है। भारत में IUI का एक साइकल करीब 10,000 से 25,000 रुपये का आता है, जिसमें दवाएं, अल्ट्रासाउंड और प्रक्रिया शामिल है।
IVF का एक साइकल 1,50,000 से 2,50,000 रुपये या उससे भी ज़्यादा हो सकता है। अगर ICSI, फ्रोज़न एम्ब्रीओ ट्रांसफर, या PGT जैसी एडवांस तकनीक लगे तो खर्च और बढ़ जाता है।
लेकिन खर्च का फैसला सिर्फ एक साइकल की कीमत देखकर नहीं लेना चाहिए। अगर 3 से 4 बार IUI करवाया जाए और फिर भी सफलता न मिले, तो कुल खर्च 60,000 से 1,00,000 रुपये तक पहुंच सकता है, और ऊपर से 6 से 8 महीने का समय भी चला जाता है। कई बार सीधे IVF करवाना पैसे और समय दोनों बचा सकता है, खासकर जब उम्र 35 से ज़्यादा हो।
आपका डॉक्टर आपकी स्थिति देखकर बता सकता है कि कौन सा रास्ता आपके लिए सही है।
IUI शारीरिक रूप से हल्का ट्रीटमेंट है। दवाओं से हल्की सूजन या मूड में बदलाव हो सकता है, लेकिन कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। एनेस्थीसिया (anaesthesia) की ज़रूरत नहीं पड़ती और आप उसी दिन अपनी रूटीन में लौट सकती हैं।
IVF शारीरिक रूप से ज़्यादा demanding है। रोज़ाना इंजेक्शन, बार बार अल्ट्रासाउंड, और एग रिट्रीवल में हल्की बेहोशी दी जाती है। एग रिट्रीवल के बाद कुछ दिन पेट में सूजन हो सकती है। कुछ महिलाओं में OHSS (ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम) हो सकता है, हल्के मामलों में आराम से ठीक हो जाता है लेकिन गंभीर मामलों में अस्पताल जाना पड़ सकता है।
मानसिक रूप से दोनों ट्रीटमेंट तनावपूर्ण हो सकते हैं, इसलिए इस दौरान परिवार और पार्टनर का सहारा बहुत ज़रूरी है।
IUI और IVF दोनों ही फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के अच्छे विकल्प हैं, लेकिन दोनों अलग स्थितियों के लिए सही हैं। अगर समस्या हल्की है, उम्र कम है, और ट्यूब खुली है, तो IUI एक अच्छा पहला कदम है। लेकिन अगर समस्या गंभीर है, उम्र ज़्यादा है, या IUI से नतीजा नहीं मिला, तो IVF सही रास्ता है।
सबसे ज़रूरी बात यह है कि आप अपने डॉक्टर से खुलकर बात करें। अपनी रिपोर्ट, उम्र, और बजट के बारे में ईमानदारी से बताएं ताकि डॉक्टर आपके लिए सबसे सही प्लान बना सकें। समय बर्बाद न करें, जितनी जल्दी सही ट्रीटमेंट शुरू होगा, सफलता की संभावना उतनी बेहतर होगी।