आईवीएफ से कंसीव करने की स्टेज एम्ब्रीओ ट्रांसफर से शुरू होती है। इसमें डॉक्टर एक पतली सुई के जैसे कैथेटर (catheter) की मदद से एम्ब्रीओ को यूट्रस में ट्रांसफर कर देते हैं। इस पूरे प्रोसेस में 10 से 15 मिनट लगते हैं। और हाँ, इसमें किसी प्रकार का दर्द बिल्कुल नहीं होता।
एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद आप घर जा सकती हैं और अपना नॉर्मल रूटीन फॉलो कर सकती हैं। शुरुआती 24 घंटों में कुछ महिलाओं को हल्की क्रैम्पिंग महसूस होती है, जैसे पीरियड्स से पहले होता है। ऐसा होना नॉर्मल है और यह प्रोसीजर के कारण होता है, यह प्रेगनेंसी का लक्षण नहीं है।
कुछ महिलाओं को बिल्कुल कुछ महसूस नहीं होता, वह भी नॉर्मल है। याद रखिए, ट्रांसफर के बाद एम्ब्रीओ तुरंत इम्प्लांट नहीं होता। उसे यूट्रस की लाइनिंग तक पहुँचने और जुड़ने में कुछ दिन लगते हैं।
इसलिए पहले कुछ दिनों का कोई भी सिम्पटम प्रेगनेंसी के नहीं बल्कि प्रोसीजर और दी जा रही हार्मोन की दवाईंयों के कारण होता है।
प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) सपोर्ट, जो IVF में ज़रूरी है, खुद भी कई प्रेगनेंसी जैसे सिम्पटम्स दे सकता है। इसलिए हर फीलिंग को प्रेगनेंसी मानकर ज्यादा न सोचें।
ट्रांसफर के पहले 3 दिनों में एम्ब्रीओ अभी यूट्रस में फ्री-फ्लोटिंग स्टेज में होता है। वह धीरे-धीरे यूट्रस की दीवार की ओर बढ़ता है। इस दौरान किसी को कुछ भी खास महसूस नहीं होता और यह पूरी तरह नॉर्मल है।
इस समय पर जो सिम्पटम होते हैं वह ज्यादातर प्रोजेस्टेरॉन इंजेक्शन, थकान, मूड स्विंग्स और हल्की ब्रेस्ट टेंडरनेस यानी स्तनों में हलकी सूजन और दर्द के रूप में आते हैं। ये सभी हॉर्मोनल मेडिसिन के साइड इफेक्ट्स हैं, प्रेगनेंसी का पक्का संकेत नहीं है। इस स्टेज पर सिम्पटम होना या न होना रिज़ल्ट का अंदाज़ा नहीं दे सकता।
यह भी पढ़ें : AMH टेस्ट कब करना चाहिए?
चौथे दिन से 7वें दिन के बीच एम्ब्रीओ यूट्रस की लाइनिंग में इम्प्लांट होना शुरू करता है। यही वह टाइम है जब प्रेगनेंसी असल में शुरू होती है। कुछ महिलाओं को इस दौरान हल्के सिम्पटम महसूस हो सकते हैं।
कुछ महिलाओं को इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग भी हो सकती है। यह हल्की पिंक या ब्राउन कलर की स्पॉटिंग होती है, जो एक-दो दिन में खत्म हो जाती है। अगर स्पॉटिंग हुयी है तो पॉज़िटिव सिग्नल है, लेकिन बिना स्पॉटिंग के भी प्रेगनेंसी हो सकती है।
हल्की क्रैम्पिंग पीरियड्स जैसा महसूस हो सकता है। ब्रेस्ट टेंडरनेस बढ़ सकती है। लेकिन ये सभी सिम्पटम प्रोजेस्टेरॉन के कारण भी हो सकते हैं। बिल्कुल कोई सिम्पटम न होना भी नॉर्मल है।
यह फ़ैसला डॉक्टर स्पर्म की रिपोर्ट और पिछले ट्रीटमेंट के एक्सपीरियंस के आधार पर तय करते हैं।
कई क्लीनिक में अब ज़्यादातर केसों में ICSI ही किया जाता है, भले ही स्पर्म की रिपोर्ट ठीक हो। इसके पीछे सोच यह है कि ICSI से फर्टिलाइजेशन फेल होने का रिस्क कम हो जाता है।
IVF में प्रेगनेंसी कन्फर्म करने का सही तरीका है Beta hCG ब्लड टेस्ट, जो आमतौर पर एम्ब्रीओ ट्रांसफर के 10 से 14 दिन बाद किया जाता है। यह टेस्ट ब्लड में hCG हॉर्मोन की सटीक मात्रा बताता है।
अगर लेवल कट-ऑफ से ज़्यादा है तो प्रेगनेंसी पॉज़िटिव मानी जाती है। लेकिन एक टेस्ट काफी नहीं होता, 48 घंटे बाद दूसरा टेस्ट होता है। हेल्दी प्रेगनेंसी में Beta hCG लेवल हर 48 से 72 घंटे में डबल होना चाहिए।
Beta hCG पॉज़िटिव होने के 2 हफ्ते बाद पहला अल्ट्रासाउंड स्कैन होता है जिसमें जेस्टेशनल सैक (gestational sac) दिखना चाहिए। उसके एक हफ्ते बाद फीटल हार्टबीट देखा जाता है।
ट्रांसफर के बाद के 2 हफ्तों को "two week wait" कहते हैं। इस दौरान धैर्य रखना और खुद को व्यस्त रखना बहुत ज़रूरी है।
यह भी पढ़ें : बीटा एचसीजी क्या है?
हर सिम्पटम सीरियस नहीं होता, लेकिन कुछ संकेत ऐसे हैं जिन पर तुरंत डॉक्टर को बताना चाहिए। यह समझना बहुत अहम है कि कब आपको चिंतित होना चाहिए और कब आराम करना चाहिए।
IVF के बाद प्रेगनेंसी सिम्पटम पर ध्यान देना नैचुरल है, लेकिन इस दौरान धैर्य रखना सबसे ज़रूरी है। सिम्पटम का होना या न होना प्रेगनेंसी कन्फर्म या डिनाई नहीं करता। सही कन्फर्मेशन सिर्फ Beta hCG ब्लड टेस्ट से मिलता है।
टू वीक वेट को आसान बनाने के लिए अपने आप को व्यस्त रखें और हर छोटे से बदलाव के बारे में ज्यादा न सोचें अपने डॉक्टर की सलाह फॉलो करें।
नॉर्मल सिम्पटम जैसे हल्की थकान, माइल्ड नॉज़िया, हल्का क्रैम्पिंग, ब्रेस्ट टेंडरनेस के लिए घबराने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन जब कोई सिम्पटम "सीवियर" हो जाए या आप असहज महसूस करें तो तुरंत डॉक्टर से मिलना जरूरी है।