IVF का नाम तो बहुत सुना है लेकिन यह होता कैसे है, इसे लेकर बहुत से कपल्स के मन में कन्फ़्यूज़न रहता है। IVF technique in hindi में समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि आप हर स्टेप को पहले से जान सकेंकि कब दवाइयाँ शुरू होंगी, एग कैसे निकाले जाते हैं, एम्ब्रीओ कैसे बनता है और ट्रांसफर कैसे होता है और इसके लिए आपको क्या और कैसे तैयारी करनी होगी।
इस आर्टिकल में आप हर एक स्टेप को आसान भाषा में समझेंगे ताकि आप जान सकें कि इस पूरे प्रोसेस में साथ क्या-क्या होता है।
IVF शुरू करने से पहले डॉक्टर यह समझना चाहते हैं कि आपकी बॉडी इस ट्रीटमेंट के लिए कितनी तैयार है और कहाँ कोई रुकावट तो नहीं है। इसलिए कुछ जरूरी टेस्ट किए जाते हैं, ताकि आगे का पूरा प्लान सही बने।
महिला के लिए सबसे पहले ब्लड टेस्ट जैसे AMH, FSH, LH, थायरॉइड और प्रोलैक्टिन किए जाते हैं। इनसे यह पता चलता है कि ओवरी कितनी अच्छी तरह काम कर रही है और एग्स की संख्या और क्वालिटी कैसी हो सकती है। इसके बाद अल्ट्रासाउंड से ओवरी और यूट्रस को देखा जाता है कि कहीं सिस्ट, फाइब्रॉइड या लाइनिंग की कोई समस्या तो नहीं है।
कुछ केस में हिस्टेरोस्कोपी की जाती है, जिसमें यूट्रस के अंदर सीधे देखकर किसी भी संभावित छोटी समस्या को पहले ही पहचान लिया जाए।
पुरुष के लिए सीमेन एनालिसिस किया जाता है, जिससे स्पर्म की संख्या, मूवमेंट और शेप समझी जाती है। अगर ज़रूरत लगे, तो DNA फ्रेगमेंटेशन टेस्ट भी कराया जाता है, ताकि स्पर्म की क्वालिटी और अच्छी तरह समझ आ सके।
इन सभी रिपोर्ट्स के आधार पर डॉक्टर आपका पूरा IVF प्लान तय करते हैं कि कौन सी दवाइयाँ दी जाएँगी, कितनी डोज़ होगी, और फर्टिलाइजेशन के लिए नॉर्मल IVF होगा या ICSI।
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नॉर्मली एक पीरियड्स साइकल (menstrual cycle) में सिर्फ एक एग मैच्योर होता है। लेकिन IVF में ज़्यादा एग्स चाहिए ताकि ज़्यादा एम्ब्रीओ (embryo) बन सकें। इसके लिए हॉर्मोनल इंजेक्शन्स दिए जाते हैं जो ओवरीज़ को स्टिमुलेट करते हैं।
यह प्रोसेस 8 से 14 दिन चलता है। इस दौरान हर 2 से 3 दिन में अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट होता है ताकि डॉक्टर देख सकें कि एग्स कितने बड़े हो रहे हैं। इसी के आधार पर दवाइयों की डोज़ एडजस्ट की जाती है।
जब एग्स सही साइज़ यानी 17 से 20 मिमी के हो जाते हैं तो एक ट्रिगर इंजेक्शन दिया जाता है। यह इंजेक्शन एग्स को फ़ाइनल मैच्योरिटी देता है। ट्रिगर के 34 से 36 घंटे बाद एग रिट्रीवल का प्रोसेस किया जाता है।
एग रिट्रीवल एक छोटा प्रोसीजर है, जिसमें 15 से 20 मिनट लगते हैं। इसमें हल्का एनेस्थीसिया (anesthesia) यानी हल्की बेहोशी की दवा दी जाती है ताकि महिला को कोई तकलीफ़ न हो।
डॉक्टर अल्ट्रासाउंड से देखते हुये एक पतली सुई वजाइना (vagina) से ओवरीज़ तक पहुँचाते हैं और एग्स को को बाहर निकालते हैं। इस प्रोसीजर के बाद 1 से 2 घंटे ऑब्ज़र्वेशन में रहना होता है, फिर आप उसी दिन घर जा सकती हैं।
प्रोसीजर के बाद हल्की क्रैम्पिंग, पेट में भारीपन या हल्की स्पॉटिंग हो सकती है, यह नॉर्मल है। उसी दिन पुरुष पार्टनर से स्पर्म सैंपल भी लिया जाता है।
एग्स निकालने के बाद उन्हें तुरंत लैब में ले जाया जाता है। यहाँ एम्ब्रियोलॉजिस्ट (embryologist) एग्स और स्पर्म को मिलाता है। दो तरीके होते हैं।
इसमें एक पेट्री डिश के अंदर एग रखा जाता है और उसके आसपास हज़ारों स्पर्म रखे जाते हैं .इसके बाद नेचुरल तरीके से फर्टिलाइजेशन (fertilization) होने दिया जाता है।
ICSI यानी इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (Intracytoplasmic Sperm Injection) में एक चुना हुआ स्पर्म सीधे एग के अंदर इंजेक्ट किया जाता है। लेकिन आपके ट्रीटमेंट में कौन सा तरीका इस्तेमाल होगा, यह स्पर्म की रिपोर्ट पर निर्भर करता है।
16 से 18 घंटे बाद चेक किया जाता है कि कितने एग्स में फर्टिलाइजेशन हुआ। नॉर्मल तौर पर 60 से 80% एग्स में सफलतापूर्वक फर्टिलाइजेशन हो जाता है।
याद रहे कि सारे एग्स मैच्योर नहीं होते, और सारे मैच्योर एग्स फर्टिलाइज़ भी नहीं होते। अगर 10 एग्स निकले तो 7 से 8 एग मैच्योर हो सकते हैं, और उनमें से 5 से 6 में फर्टिलाइजेशन हो सकता है। यह नंबर हर पेशेंट में अलग होता है।
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फर्टिलाइज़्ड एग्स अब एम्ब्रीओ बन चुके हैं और इन्हें लैब में स्पेशल इन्क्यूबेटर (incubator) में रखा जाता है। यह इन्क्यूबेटर एम्ब्रीओ को शरीर के जैसा माहौल देता है जिससे इन्हें सही टेम्प्रेचर, सही गैसेज़, और सही न्यूट्रिएंट्स मिल सके।
तीसरे दिन तक एम्ब्रीओ में 6 से 8 सेल्स (cells) बन चुकी हैं, इसे क्लीवेज स्टेज (cleavage stage) कहते हैं। पाँचवें दिन तक एम्ब्रीओ ब्लास्टोसिस्ट (blastocyst) बन जाता है जिसमें सौ से ज़्यादा सेल्स होती हैं।
आजकल ज़्यादातर डॉक्टर पाँचवें दिन यानी ब्लास्टोसिस्ट स्टेज पर एम्ब्रीओ ट्रांसफर करना पसंद करते हैं क्योंकि जो एम्ब्रीओ इस स्टेज तक पहुँच जाता है वह सबसे हेल्दी और स्ट्रांग साबित हो चुका होता है। बचे हुए अच्छी क्वालिटी के एम्ब्रीओ फ्रीज़ करके रख लिए जाते हैं।
एम्ब्रीओ ट्रांसफर 10 से 15 मिनट का प्रोसीजर होता है और इसमें बेहोशी की ज़रूरत नहीं होती। डॉक्टर अल्ट्रासाउंड से देखते हुए एक पतली कैथेटर (catheter) से एम्ब्रीओ को यूट्रस के अंदर सबसे सही जगह पर रखते हैं।
इस दौरान आपका ब्लैडर (bladder) भरा होना चाहिए ताकि अल्ट्रासाउंड इमेज क्लियर आए। ज़्यादातर महिलाओं को सिर्फ हल्का प्रेशर या चुभन फ़ील होती है, कोई दर्द नहीं होता।
प्रोसीजर के बाद 15 से 30 मिनट आराम करने को कहा जाता है। उसके बाद आप घर जा सकती हैं। एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद कंप्लीट बेडरेस्ट की जरूरत नहीं होती, आप हल्की नॉर्मल दिनचर्या जारी रख सकती हैं।
एम्ब्रीओ ट्रांसफर के 10 से 14 दिन बाद ब्लड टेस्ट से बीटा hCG (Beta hCG) चेक किया जाता है। यह टेस्ट कन्फर्म करता है कि प्रेगनेंसी हुई है या नहीं।
घरेलू प्रेगनेंसी किट का रिजल्ट इतना भरोसेमंद नहीं होता, इसीलिए IVF प्रेगनेंसी कन्फर्म करने के लिए बताये गए समय पर ब्लड टेस्ट ही करवायें।
अगर रिजल्ट नेगेटिव है तो निराश न हों। डॉक्टर से रिव्यू मीटिंग करें, अगली साइकल की प्लानिंग करें, और बॉडी को रिकवर होने दें।
वेटिंग पीरियड इमोशनली बहुत मुश्किल होता है। इस दौरान बार-बार होम प्रेगनेंसी टेस्ट न करें क्योंकि हॉर्मोन की दवाइयों की वजह से फ़ॉल्स रिजल्ट आ सकता है।
IVF technique in hindi को स्टेप-बाय-स्टेप समझ लेने से यह प्रोसेस उतना काम्प्लेक्स नहीं लगता जितना शुरुआत में लगता है। पूरा IVF साइकल आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों का होता है, जिसमें हर स्टेप पहले से तय और मॉनिटर किया जाता है।
आपको बस दवाइयाँ समय पर लेना, अपॉइंटमेंट्स फॉलो करना और शरीर का ध्यान रखना होता है। जब आपको पता होता है कि आगे क्या होने वाला है, तो घबराहट कम होती है और आप इस ट्रीटमेंट को ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ पूरा कर पाते हैं।