सारांश (Overview)
Mild IVF यानी माइल्ड आईवीएफ में फॉलिकल बढ़ाने वाली दवाओं की डोज कम रखी जाती है। लेकिन IVF के बाकी स्टेप कन्वेंशनल IVF जितने ही होते हैं। एग रिट्रीवल, फर्टिलाइजेशन और एम्ब्रीओ ट्रांसफर का प्रोसेस लगभग वही रहता है, मुख्य रूप से अंतर दवा की मात्रा और उससे मिलने वाले एग की संख्या का होता है।
कम दवा लेने से OHSS का रिस्क कम हो सकता है और इंजेक्शन व दवा का खर्च भी कम हो सकता है। लेकिन कुछ महिलाओं में साइकिल बीच में रुकने का रिस्क बढ़ सकता है। इसलिए माइल्ड IVF हर महिला के लिए एक जैसा विकल्प नहीं होता।
माइल्ड आईवीएफ में ओवरी को फॉलिकल बढ़ाने के लिए दवाएं तो दी जाती हैं, लेकिन उनकी डोज कन्वेंशनल IVF की तुलना में कम रखी जाती है। क्योंकि, माइल्ड IVF में ज्यादा से ज्यादा एग न निकालकर, जरूरत के हिसाब से एग निकाले जाते हैं।
जनरली गोनाडोट्रॉपिन की रोज की डोज 150 IU या उससे कम रखी जाती है। कुछ प्रोटोकॉल में इंजेक्शन की डोज कम रखने के लिए क्लोमिफीन या लेट्रोजोल जैसी टेबलेट्स भी दी जाती हैं।
कम डोज से भी ओवरी में एक से ज्यादा फॉलिकल बढ़ते हैं, बस उतने नहीं जितने ज्यादा डोज से बढ़ते हैं। स्कैन से उनकी ग्रोथ देखी जाती है और सही स्टेज पर एग रिट्रीवल होता है।
यानी माइल्ड IVF में IVF के स्टेप कम नहीं होते, सिर्फ ओवरी को स्टिमुलेट करने वाली दवा कम होती है।
माइल्ड IVF की प्रक्रिया कन्वेंशनल IVF जैसी ही होती है: बेसलाइन जांच, कम डोज में स्टिमुलेशन, स्कैन से निगरानी, ट्रिगर, एग रिट्रीवल, फर्टिलाइजेशन और एम्ब्रीओ ट्रांसफर। मुख्य अंतर दवा की डोज का है, और कई बार दवा का कोर्स भी छोटा रहता है।
पीरियड शुरू होने के दूसरे या तीसरे दिन अल्ट्रासाउंड किया जाता है। जरूरत के अनुसार हार्मोन टेस्ट भी किए जा सकते हैं। इससे डॉक्टर को ओवरी की शुरुआती स्थिति और फॉलिकल की संख्या का अंदाजा मिलता है।
इसके बाद कम डोज में गोनाडोट्रॉपिन दी जाती है, ताकि एक से ज्यादा फॉलिकल बढ़ सकें, और कुछ प्रोटोकॉल में साथ में गोलियां भी।
स्टिमुलेशन के दौरान अल्ट्रासाउंड से फॉलिकल की ग्रोथ देखी जाती है। जरूरत के अनुसार दवा की डोज बदली जा सकती है। एक समय से पहले रिलीज न हो, इसके लिए GnRH एंटागोनिस्ट भी दिया जा सकता है।
जब फॉलिकल सही स्टेज पर पहुंचते हैं, तो एग को आखिरी बार मैच्योर करने के लिए ट्रिगर दिया जाता है। इसके बाद तय समय पर एग रिट्रीवल किया जाता है।
मिले हुए एग को लैब में स्पर्म के साथ फर्टिलाइज किया जाता है। इसके बाद बने एम्ब्रीओ को यूट्रस में ट्रांसफर किया जा सकता है या आगे के लिए फ्रीज किया जा सकता है।
दोनों में IVF के मुख्य स्टेप लगभग एक जैसे होते हैं, अंतर डोज (dose) और कितने एग चाहिए का है। माइल्ड IVF में रोज की डोज 150 IU या कम रहती है। ESHRE की 2025 गाइडलाइन के अनुसार कन्वेंशनल IVF में यह करीब 150 से 225 IU होती है।
माइल्ड IVF | कन्वेंशनल IVF | |
|---|---|---|
रोज की डोज | 150 IU या कम | 150 से 225 IU के बराबर |
गोलियों का इस्तेमाल | अक्सर, इंजेक्शन घटाने के लिए | आमतौर पर नहीं |
कितने एग चाहिए | कम, पर काम लायक | ज्यादा से ज्यादा |
दवा का कोर्स | आमतौर पर छोटा | आमतौर पर लंबा |
दवा का खर्च | कम | ज्यादा |
माइल्ड IVF को नेचुरल साइकिल IVF भी नहीं समझना चाहिए। नेचुरल साइकिल में फॉलिकल बढ़ाने वाली दवा नहीं दी जाती और शरीर खुद जो एग तैयार करता है, उसी से IVF किया जाता है। माइल्ड IVF में दवा दी जाती है और उससे एक से ज्यादा फॉलिकल्स मैच्योर किए जाते हैं।
माइल्ड IVF का सबसे क्लियर फायदा OHSS यानी ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम का रिस्क कम होना है। OHSS में ओवरी जरूरत से ज्यादा एक्टिव हो जाती है, पेट में पानी भरने लगता है और कुछ सीरियस केसेस में अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आ सकती है।
माइल्ड IVF में दवाओं की डोज कम होने की वजह से कुछ महिलाओं में फॉलिकल और एग की संख्या कम रह सकती है। इससे IVF साइकिल कैंसिल हो सकती है। हालांकि, यह रिस्क हर महिला में एक जैसा नहीं होता।
माइल्ड IVF उन महिलाओं के लिए एक ऑप्शन हो सकता है जिनमें IVF की दवाओं से बहुत ज्यादा फॉलिकल बनने का रिस्क होता है, या जिनमें ज्यादा डोज देने के बावजूद एग की संख्या बहुत बढ़ने की उम्मीद नहीं होती। अंतिम फैसला आपकी ओवरी की प्रतिक्रिया और पिछले IVF के अनुभव को देखकर किया जाता है।
ESHRE की 2025 गाइडलाइन के अनुसार, जिनकी ओवरी बहुत ज्यादा फॉलिकल्स बनाती है, उनके लिए कम डोज सही है। पर जिनकी ओवरी सामान्य संख्या में फॉलिकल बनाती है, उनके लिए गाइडलाइन सामान्य डोज को ही ठीक मानती है।
माइल्ड IVF की सफलता आपकी उम्र, एग की संख्या और क्वालिटी, एम्ब्रीओ की क्वालिटी और ओवरी के रिस्पॉन्स पर निर्भर करती है। सिर्फ IVF में इस्तेमाल की गई दवा की डोज देखकर सफलता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
31 ट्रायल के एक बड़े रिव्यू में माइल्ड और कन्वेंशनल IVF की लाइव बर्थ दर में कोई साफ अंतर नहीं मिला। यह नतीजा हर तरह की महिलाओं में एक जैसा रहा, चाहे उनकी ओवरी कम, सामान्य या ज्यादा फॉलिकल बनाती हो। 2,037 महिलाओं वाली पांच स्टडीज में कई साइकिल जोड़कर भी देखा गया, और तब भी दोनों तरीकों में लाइव बर्थ बराबर रही।
माइल्ड IVF में दवाएं कम होती हैं, लेकिन मॉनिटरिंग उतनी ही जरूरी रहती है। सही समय पर स्कैन करवाना, दवाएं ठीक तरह से लेना, साइकिल कैंसल होने का रिस्क पहले से समझना और OHSS के लक्षणों पर नजर रखना, ये चार बातें सबसे जरूरी हैं।
Mini IVF की कोई एक तय मेडिकल परिभाषा नहीं है, और कई क्लिनिक इस नाम का इस्तेमाल कम डोज वाले IVF के लिए करते हैं। इसलिए नाम से ज्यादा यह देखना जरूरी है कि कितनी दवा दी जा रही है और कितने एग का टारगेट रखा गया है।
क्या देखें | Mild IVF | Mini IVF |
|---|---|---|
दवा की डोज | कम डोज | कम डोज |
फॉलिकल का टारगेट | कुछ फॉलिकल | कुछ फॉलिकल |
एग का टारगेट | कन्वेंशनल IVF से कम | आमतौर पर कम |
नाम की स्थिति | रिसर्च में इस्तेमाल होने वाला शब्द | कोई एक तय मेडिकल परिभाषा नहीं |
डॉक्टर से क्या पूछें | डोज, कितने दिन दवा और एग का टारगेट | डोज, कितने दिन दवा और एग का टारगेट |
माइल्ड आईवीएफ में दवा की डोज कम रखी जाती है, लेकिन IVF की बाकी प्रक्रिया लगभग वही रहती है। इससे OHSS का रिस्क कम हो सकता है, हालांकि कुछ महिलाओं में एग कम मिलने या साइकिल कैंसल होने का खतरा बढ़ सकता है।
रिसर्च में Mild IVF और Conventional IVF के बीच लाइव बर्थ में कोई साफ अंतर नहीं मिला है। इसलिए आपके लिए कौन सा प्रोटोकॉल सही है, यह ओवरी के रिस्पॉन्स, पिछले IVF के अनुभव और OHSS के रिस्क जैसी बातों को देखकर तय किया जाता है।