सारांश (Overview)
Follicular monitoring में एक के बाद एक अल्ट्रासाउंड करके फॉलिकल की बढ़त और ओव्यूलेशन पर नजर रखी जाती है। रिपोर्ट में फॉलिकल का साइज और एंडोमेट्रियम की मोटाई देखकर यह समझा जाता है कि ओव्यूलेशन कब होने वाला है या हो चुका है।
इस आर्टिकल में जानिए follicular monitoring कब शुरू होती है, कितने स्कैन की जरूरत पड़ सकती है और रिपोर्ट में फॉलिकल के साइज का क्या मतलब होता है। साथ ही समझें कि एंडोमेट्रियम की मोटाई को कैसे देखा जाता है और किन स्थितियों में यह जांच जरूरी होती है।
हर महीने में कई फॉलिकल बढ़ना शुरू करते हैं। इनमें से आमतौर पर एक फॉलिकल बाकी से ज्यादा तेजी से बढ़ता है। इसे डॉमिनेंट फॉलिकल कहते हैं और इसी से ओव्यूलेशन के समय एग निकलता है।
Follicular monitoring में कुछ दिनों के अंतर पर अल्ट्रासाउंड करके फॉलिकल की ग्रोथ देखी जाती है। इससे पता चलता है कि फॉलिकल कितना बड़ा हो रहा है और ओव्यूलेशन कब होने की संभावना है।
यह स्कैन आमतौर पर ट्रांसवजाइनल यानी TVS होता है, जिससे फॉलिकल को साफ देखा और मापा जा सकता है। ध्यान रखें, कि फॉलिक्युलर मॉनिटरिंग कोई इलाज नहीं है। यह सिर्फ फॉलिकल की ग्रोथ और ओव्यूलेशन को ट्रैक करने का तरीका है।
Follicular monitoring कब शुरू होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप नेचुरल साइकिल, IUI या IVF में हैं। आमतौर पर नेचुरल और IUI साइकिल में 9वें या 10वें दिन से स्कैन शुरू होता है, जबकि IVF में यह 5वें या 6वें दिन से शुरू हो सकता है।
इसके बाद कितने स्कैन होंगे, यह फॉलिकल की ग्रोथ पर निर्भर करता है। फॉलिकल आमतौर पर रोजाना करीब 1 से 2 mm बढ़ता है, इसलिए डॉक्टर जरूरत के हिसाब से एक या दो दिन के अंतर पर दोबारा स्कैन कर सकते हैं।
साइकिल | पहला स्कैन | आगे का क्रम |
|---|---|---|
नेचुरल कोशिश | नौवें से दसवें दिन | हर एक-दो दिन में, फॉलिकल की ग्रोथ के हिसाब से |
नौवें से दसवें दिन | ओव्यूलेशन या ट्रिगर का समय तय होने तक | |
पांचवें से छठवें दिन | ज्यादा स्कैन, क्योंकि कई फॉलिकल साथ बढ़ रहे होते हैं |
अगर आपके पीरियड रेगुलर नहीं हैं या साइकिल 28 दिन से लंबी है, तो स्कैन शुरू करने का दिन अलग हो सकता है। इसलिए नौवें या दसवें दिन का नियम हर महिला पर लागू नहीं होता।
रिपोर्ट में फॉलिकल का साइज mm में लिखा होता है, जैसे 16 × 15 mm। दोनों नापों का औसत लेकर फॉलिकल का साइज देखा जाता है।
साइज (औसत) | इसका मतलब | आगे क्या |
|---|---|---|
10 mm से कम | फॉलिकल अभी छोटा है, ग्रोथ जारी है। | दो-तीन दिन बाद दोबारा स्कैन |
10 से 14 mm | फॉलिकल ग्रो कर रहा है। | रफ्तार 1 से 2 mm रोज, अगला स्कैन एक-दो दिन में |
15 से 17 mm | ओव्यूलेशन करीब हो सकता है। | स्कैन पास-पास, ट्रिगर की बात यहीं से शुरू होती है |
18 से 22 mm | फॉलिकल आमतौर पर ओव्यूलेशन के लिए तैयार माना जाता है। | यही वह जगह है जिसके लिए पूरी मॉनिटरिंग होती है |
25 mm से ऊपर, फटा नहीं | फॉलिकल बड़ा हो गया है, लेकिन ओव्यूलेशन नहीं हुआ। | डॉक्टर इसकी अलग से जांच करते हैं |
डॉमिनेंट फॉलिकल आमतौर पर 18–22 mm होने पर ओव्यूलेट कर सकता है। अगर रिपोर्ट में 16 mm लिखा हो, तो इसका मतलब यह नहीं कि कुछ गलत है। फॉलिकल अभी ग्रो कर रहा हो सकता है और अगले स्कैन से पता चलेगा कि ओव्यूलेशन कितना करीब है।
रिपोर्ट में एंडोमेट्रियम की मोटाई को ET या एंडोमेट्रियल थिकनेस के रूप में लिखा जाता है। इसे देखकर तुरंत यह तय नहीं किया जा सकता कि मोटाई कम है या ठीक, क्योंकि यह साइकिल के दिन के साथ बदलती रहती है।
पीरियड के बाद एंडोमेट्रियम पतला होता है और ओव्यूलेशन के आसपास इसकी मोटाई बढ़ती है। इसलिए आठवें दिन 5 mm और सोलहवें दिन 5 mm होने का मतलब एक जैसा नहीं है।
यह भी जरूरी नहीं कि एंडोमेट्रियम के लिए कोई एक फिक्स नंबर हो, जिसके नीचे प्रेगनेंसी की संभावना खत्म हो जाए। 80,585 ART साइकिल की एक बड़ी स्टडी में 6 mm से कम मोटाई पर भी जीवित संतान का जन्म हुआ और किसी एक फिक्स कट-ऑफ का कोई स्पष्ट फायदा नहीं दिखाई दिया।
इसलिए रिपोर्ट में 7 या 8 mm देखकर अकेले चिंता करने की जरूरत नहीं है। डॉक्टर ET की मोटाई को साइकिल के दिन, फॉलिकल की ग्रोथ और बाकी रिपोर्ट के साथ देखकर समझते हैं।
ओव्यूलेशन हुआ या नहीं, यह आमतौर पर एक ही स्कैन से पता नहीं चलता। इसके लिए पहले और बाद के स्कैन की तुलना की जाती है।
कुछ बदलाव आते हैं, जिनसे ओव्यूलेशन होने का साइन मिलता है।
इन बदलावों को देखकर डॉक्टर समझ सकते हैं कि ओव्यूलेशन हो चुका है और आगे की टाइमिंग उसी हिसाब से तय की जा सकती है।
फॉलिकल मॉनिटरिंग खुद प्रेगनेंसी में मदद नहीं करती। इससे ओव्यूलेशन का समय समझने, उसे ट्रैक करने और उसी के अनुसार आगे का स्टेप लेने में मदद मिलती है।
इस तरह फॉलिकल मॉनिटरिंग का फायदा प्रेगनेंसी कराने में सीधे नहीं, बल्कि सही समय पर सही स्टेप उठाने में होता है।
अगर पीरियड्स रेगुलर हैं और किसी तरह की फर्टिलिटी से संबंधित समस्या नहीं है, तो हर महीने फॉलिकल मॉनिटरिंग की जरूरत नहीं होती। नियमित रूप से हर 2 से 3 दिन में संबंध बनाने से भी ओव्यूलेशन के आसपास सही समय पर गर्भधारण की कोशिश हो जाती है।
फॉलिकल की निगरानी की जरूरत तब पड़ सकती है, जब ओव्यूलेशन को लेकर कोई समस्या हो, ओव्यूलेशन की दवा चल रही हो या IUI या IVF जैसा कोई ट्रीटमेंट चल रहा हो। लंबे समय से कोशिश के बावजूद कंसीव न होने पर फर्टिलिटी जांच के दौरान भी डॉक्टर इसकी सलाह दे सकते हैं।
अगर महिला की उम्र 36 साल या उससे ज्यादा है, तो फर्टिलिटी जांच के लिए एक साल तक इंतजार करने की जरूरत नहीं होती।
स्कैन में अगर फॉलिकल की ग्रोथ ठीक तरह से नज़र नहीं हो रही या फॉलिकल बड़ा होने के बाद भी नहीं फट रहा, तो दोनों कंडीशन का मतलब अलग होता है।
अगर पूरी साइकिल में सभी फॉलिकल छोटे ही रहें और कोई डॉमिनेंट फॉलिकल न बने, तो उस महीने ओव्यूलेशन नहीं हुआ। इसका कारण PCOS, थायरॉइड की गड़बड़ी, प्रोलैक्टिन बढ़ना या वजन में तेज बदलाव हो सकता है।
अगर फॉलिकल 25 mm या उससे बड़ा हो जाए, लेकिन ओव्यूलेशन न हो, तो इसे LUF यानी ल्यूटिनाइज्ड अनरप्चर्ड फॉलिकल कहते हैं। इसमें एग फॉलिकल के अंदर ही रह जाता है। इसका पता सिर्फ फॉलिक्युलर मॉनिटरिंग से ही चलता है।
follicle monitoring से डॉक्टर को ओव्यूलेशन के बारे में ज्यादा स्पष्ट जानकारी मिलती है। खासकर जब पीरियड्स अनियमित हों या फर्टिलिटी ट्रीटमेंट चल रहा हो, तब इससे यह समझने में मदद मिलती है कि फॉलिकल किस तरह ग्रो कर रहा है और आगे क्या करना चाहिए।
हालांकि, हर महिला को इस जांच की जरूरत नहीं होती। अगर आपके पीरियड्स नियमित हैं और आप सामान्य तरीके से गर्भधारण की कोशिश कर रही हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ही तय करें कि यह जांच आपके लिए जरूरी है या नहीं।