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Reviewed by Dr. Megha Gusain
Gynecologist & IVF Specialist
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सारांश (Overview)
मोलर प्रेगनेंसी में प्रेगनेंसी सामान्य तरीके से आगे नहीं बढ़ती। गर्भाशय में बच्चा बनने के बजाय प्लेसेंटा बनाने वाला टिश्यू असामान्य तरीके से बढ़ने लगता है। इसका इलाज किया जाता है, लेकिन सफाई के बाद भी कुछ समय तक hCG की जांच कराना जरूरी होता है।
यही बात इसे दूसरी प्रेगनेंसी लॉस से अलग बनाती है। hCG सामान्य तरीके से कम हो रहा है या नहीं, यह देखकर पता चलता है कि इलाज पूरा हुआ है या आगे किसी और इलाज की जरूरत है।
इस आर्टिकल में जानेंगे कि मोलर प्रेगनेंसी क्या होती है, कम्प्लीट और पार्शियल मोल में क्या अंतर है, इलाज के बाद hCG की निगरानी कितने समय चलती है और दोबारा कंसीव करने की कोशिश कब की जा सकती है।
प्रेगनेंसी की शुरुआत में प्लेसेंटा और बच्चा दोनों बनने लगते हैं। मोलर प्रेगनेंसी में गुणसूत्रों में गड़बड़ी हो जाती है, जिसकी वजह से प्लेसेंटा बनाने वाला टिश्यू असामान्य तरीके से बढ़ने लगता है। बच्चा या तो बनता ही नहीं या उसका विकास ठीक से नहीं हो पाता।
यह टिश्यू गर्भाशय के अंदर छोटे-छोटे अंगूर जैसे गुच्छों में बढ़ सकता है। इसी वजह से इसे कई बार अंगूर जैसी गर्भावस्था भी कहा जाता है और अल्ट्रासाउंड में भी ऐसी ही तस्वीर दिखाई दे सकती है।
RCOG के डाटा के अनुसार, एशियाई मूल की महिलाओं में मोलर प्रेगनेंसी हर 387 प्रेगनेंसी में करीब एक बार होती है, जबकि गैर-एशियाई महिलाओं में यह हर 752 प्रेगनेंसी में करीब एक बार होती है। यानी भारतीय महिलाओं में इसकी संभावना ज्यादा होती है।
मोलर प्रेगनेंसी दो तरह की होती है, कम्प्लीट और पार्शियल। दोनों में क्रोमोसोम की गड़बड़ी होती है, लेकिन दोनों में प्रेगनेंसी अलग तरह से आगे बढ़ती है। इसलिए आपकी रिपोर्ट में कौन सा मोल है, यह जानना जरूरी है।
कम्प्लीट मोल | पार्शियल मोल | |
|---|---|---|
क्रोमोसोम | तीन सेट, दो पिता की तरफ से | |
बच्चा | बनती ही नहीं | कुछ हिस्से बन सकते हैं, लेकिन प्रेगनेंसी आगे नहीं बढ़ पाती |
अल्ट्रासाउंड | अक्सर अंगूर जैसे गुच्छे दिखते हैं | बच्चे के कुछ हिस्से भी दिखते हैं |
लक्षण | अक्सर ज्यादा साफ होते हैं | कई बार सामान्य मिसकैरेज जैसे लगते हैं |
आगे इलाज की जरूरत | ज्यादा | बहुत कम |
पार्शियल मोल कई बार सामान्य मिसकैरेज जैसा ही लगता है। ऐसे में सफाई के बाद निकले टिश्यू की जांच से पता चलता है कि यह पार्शियल मोल था। इसलिए हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट को संभालकर रखना जरूरी है।
मोलर प्रेगनेंसी में हर महिला को एक जैसे लक्षण हों, यह जरूरी नहीं है। NHS के मुताबिक मोलर प्रेगनेंसी में कोई लक्षण नहीं भी हो सकते, या प्रेगनेंसी के सामान्य लक्षण ही महसूस हो सकते हैं। कई बार यह पहली रूटीन स्कैन में ही पकड़ में आती है।
जहां लक्षण दिखते हैं, वहां आमतौर पर ये होते हैं।
सिर्फ बहुत ज्यादा उल्टी होने से मोलर प्रेगनेंसी नहीं मानी जाती। लेकिन अगर इसके साथ ब्लीडिंग या दूसरे लक्षण भी हैं, तो अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी हो सकता है।
मोलर प्रेगनेंसी की पहचान के लिए मुख्य रूप से अल्ट्रासाउंड और बीटा hCG की जांच की जाती है।
अल्ट्रासाउंड में कम्प्लीट मोल में अक्सर अंगूर के गुच्छों जैसी तस्वीर दिखती है, जबकि पार्शियल मोल में बच्चे के कुछ हिस्से भी नजर आ सकते हैं। बीटा hCG का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ हो, तो इससे भी मोलर प्रेगनेंसी का शक होता है।
पक्की पहचान के लिए सफाई के बाद निकले टिश्यू की जांच की जाती है। इसे हिस्टोपैथोलॉजी कहते हैं। इससे पता चलता है कि मोल कंप्लीट है या पार्शियल।
मोलर प्रेग्नेंसी में गर्भ में बच्चे की जगह असामान्य टिश्यू बन जाता है। घबराने की जरूरत नहीं है—समय पर इलाज और नियमित β-hCG जांच से इसका सही तरीके से इलाज और निगरानी की जा सकती है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार फॉलो-अप करना बहुत जरूरी है।
— Dr. Sneha Lata
मोलर प्रेगनेंसी में यूट्रस के अंदर जो असामान्य टिश्यू बना है, उसे पूरा निकालना जरूरी होता है। इसके लिए आमतौर पर सक्शन से यूट्रस की सफाई की जाती है, जिसके लिए 12 से 14 mm की सक्शन कैनुला इस्तेमाल होती है। यह तरीका इसीलिए पसंद किया जाता है क्योंकि इसमें फर्टिलिटी को नुकसान नहीं पहुँचता।
कई बार जब यह टिश्यू अपने आप मिसकैरेज के साथ नहीं निकलता, तो डॉक्टर सक्शन से इसे निकालते हैं।
यूट्रस निकालने की जरूरत आमतौर पर नहीं पड़ती। सक्शन से सफाई करने पर गर्भाशय बना रहता है, इसलिए आगे प्रेगनेंसी की संभावना भी रहती है।
सफाई के बाद hCG की जांच कराना बहुत जरूरी होता है। इसकी वजह यह है कि अगर थोड़ा भी टिश्यू यूट्रस के अंदर रह गया हो, तो वह hCG बनाता रहेगा। इसलिए चेक करना होता है कि इलाज के बाद hCG लगातार कम हो रहा है और नॉर्मल लेवल पर आ गया है या नहीं।
ऑब्ज़र्वेशन कितने समय तक चलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मोल कम्प्लीट है या पार्शियल और hCG कितनी जल्दी नॉर्मल होता है।
प्रकार | निगरानी का नियम |
|---|---|
कम्प्लीट मोल, hCG 56 दिन में नॉर्मल हो गया | सफाई की तारीख से 6 महीने तक निगरानी |
कम्प्लीट मोल, hCG 56 दिन में नॉर्मल नहीं हुआ | जिस दिन hCG नॉर्मल हुआ, उससे 6 महीने तक |
पार्शियल मोल | कम से कम 4 हफ्ते के अंतर पर hCG दो बार नॉर्मल आने तक |
इसलिए हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट संभालकर रखना जरूरी है। इसी से पता चलता है कि मोल कम्प्लीट है या पार्शियल और उसी के हिसाब से आगे hCG का ऑब्ज़र्वेशन किया जाता है।
मोलर प्रेगनेंसी के बाद दोबारा प्रेगनेंसी की कोशिश तब करनी चाहिए, जब hCG का ऑब्ज़र्वेशन पूरा हो जाए। तब तक प्रेगनेंसी से बचना जरूरी होता है।
ऐसा इसलिए क्योंकि नई प्रेगनेंसी में भी hCG बढ़ता है। अगर निगरानी के दौरान आप प्रेग्नेंट हो जाती हैं, तो यह समझना मुश्किल होगा कि hCG नई प्रेगनेंसी की वजह से बढ़ रहा है या गर्भाशय में बचे टिश्यू की वजह से।
इसलिए hCG की निगरानी पूरी होने तक गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करना इलाज का ही एक हिस्सा है। अगर कीमोथेरेपी की जरूरत पड़ी हो, तो इलाज पूरा होने के बाद आमतौर पर एक साल तक प्रेगनेंसी से बचने की सलाह दी जाती है।
ज्यादातर महिलाओं में मोलर प्रेगनेंसी को निकालने के बाद आगे किसी इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन कुछ मामलों में hCG सामान्य तरीके से कम नहीं होता और तब आगे इलाज करना पड़ सकता है।
RCOG के अनुसार, पार्शियल मोलर प्रेगनेंसी के बाद करीब 0.5 से 1 प्रतिशत मामलों में कीमोथेरेपी की जरूरत पड़ती है। कम्प्लीट मोलर प्रेगनेंसी में यह करीब 13 से 16 प्रतिशत मामलों में हो सकती है।
अगर आगे इलाज की जरूरत पड़ती भी है, तो इसके नतीजे आमतौर पर बहुत अच्छे होते हैं। RCOG के अनुसार इलाज की सफलता लगभग 100 प्रतिशत के करीब रहती है।
इसीलिए सफाई के बाद hCG की नियमित जांच इतनी जरूरी है। इससे अगर आगे इलाज की जरूरत हो, तो उसका पता जल्दी चल जाता है।
मोलर प्रेगनेंसी होने का मतलब यह नहीं है कि आगे आप प्रेगनेंट नहीं हो पाएंगी।NHS के अनुसार, इससे आगे प्रेगनेंट होने की संभावना पर असर नहीं पड़ता। दोबारा मोलर प्रेगनेंसी होने का खतरा भी कम होता है, करीब 1 प्रतिशत।
अगर आपको कीमोथेरेपी की जरूरत पड़ी थी, तब भी आगे प्रेगनेंसी हो सकती है।RCOG के अनुसार, GTN के इलाज के बाद करीब 80 प्रतिशत महिलाएं आगे प्रेगनेंट हो जाती हैं।
अगली प्रेगनेंसी में एक बात का ध्यान रखें। अगर पहले कीमोथेरेपी नहीं हुई थी, तो आगे की प्रेगनेंसी के बाद आमतौर पर hCG की दोबारा जांच की जरूरत नहीं होती। अगर कीमोथेरेपी हुई थी, तो प्रेगनेंसी के बाद hCG की जांच करानी होती है।
अगली बार प्रेगनेंसी ठहरने पर शुरुआती अल्ट्रासाउंड थोड़ा जल्दी करा लेना अच्छा रहता है, ताकि शुरुआत में ही यह पता चल जाए कि प्रेगनेंसी सामान्य तरीके से आगे बढ़ रही है।
Molar pregnancy में सफाई इलाज का अंत नहीं, शुरुआत होती है। इसके बाद hCG की नियमित जांच इसलिए जरूरी है ताकि यह पता चलता रहे कि शरीर में कोई टिश्यू बाकी तो नहीं है। कम्प्लीट मोल में निगरानी कई महीने चल सकती है, जबकि पार्शियल मोल में यह जल्दी पूरी हो जाती है।
इस दौरान दोबारा प्रेगनेंसी से बचना भी जरूरी है, क्योंकि नई प्रेगनेंसी में hCG बढ़ता है और फिर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि hCG किस वजह से बढ़ रहा है।
सबसे जरूरी बात यह है कि अगर आगे इलाज की जरूरत पड़ती भी है, तो उसके नतीजे आमतौर पर बहुत अच्छे रहते हैं। आगे प्रेगनेंट होने की संभावना भी बनी रहती है और दोबारा मोलर प्रेगनेंसी होने का खतरा करीब 1 प्रतिशत ही है।
इसे आमतौर पर अंगूर जैसी गर्भावस्था कहा जाता है, क्योंकि गर्भाशय में बढ़ने वाला टिश्यू अंगूर के छोटे दानों जैसा दिख सकता है। मेडिकल भाषा में इसे हाइडेटिडिफॉर्म मोल कहते हैं।
यह फर्टिलाइजेशन के समय क्रोमोसोम की गड़बड़ी की वजह से होती है। इसका खानपान, दवा या किसी काम से कोई संबंध नहीं है। उम्र इसका एक ज्ञात जोखिम कारक है।
नहीं। कम्प्लीट मोल में बच्चा बनता ही नहीं और पार्शियल मोल में बच्चे के कुछ हिस्से बन सकते हैं, लेकिन प्रेगनेंसी आगे नहीं बढ़ पाती।
यह मोल के प्रकार पर निर्भर करता है। कम्प्लीट मोल में hCG सामान्य होने के बाद भी 6 महीने तक निगरानी चल सकती है। पार्शियल मोल में 4 हफ्ते के अंतर पर hCG दो बार सामान्य आने के बाद निगरानी खत्म मानी जाती है।
hCG की निगरानी पूरी होने के बाद और डॉक्टर की सलाह के अनुसार। अगर कीमोथेरेपी हुई हो, तो इलाज पूरा होने के बाद आमतौर पर एक साल तक प्रेगनेंसी से बचने की सलाह दी जाती है।
ज्यादातर मामलों में नहीं। पार्शियल मोल के बाद 0.5 से 1 प्रतिशत और कम्प्लीट मोल के बाद 13 से 16 प्रतिशत मामलों में आगे कीमोथेरेपी की जरूरत पड़ सकती है। इन मामलों में इलाज के नतीजे आमतौर पर बहुत अच्छे रहते हैं।
आमतौर पर नहीं। ज्यादातर मामलों में सक्शन से सफाई की जाती है, ताकि गर्भाशय और आगे की प्रेगनेंसी की संभावना बनी रहे।
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