जाइगोट क्या होता है और यह कैसे बनता है? (Zygote Meaning in Hindi )

Last updated: October 23, 2026

सारांश (Overview)

प्रेगनेंसी की जानकारी पढ़ते हुए एक शब्द बार-बार सामने आता है, जाइगोट। लेकिन जाइगोट आखिर होता क्या है और यह एम्ब्रियो से कैसे अलग है?

जाइगोट वह पहली सेल है जो एग और स्पर्म के मिलने से बनती है। यह बहुत कम समय तक रहती है। करीब एक दिन बाद यह सेल दो हिस्सों में बंटना शुरू करती है और आगे चलकर इसे एम्ब्रियो कहा जाता है।

आगे हम समझेंगे कि जाइगोट कैसे बनता है, कितने समय तक रहता है और इसके बाद शरीर में क्या होता है। साथ ही, IVF में जाइगोट की क्या भूमिका होती है, यह भी जानेंगे।

जाइगोट का मतलब क्या है? (Zygote meaning in Hindi)

जाइगोट (zygote) उस एक सेल का नाम है जो एग और स्पर्म के मिलने के तुरंत बाद बनती है।

एग में 23 क्रोमोसोम होते हैं और स्पर्म में भी 23 क्रोमोसोम होते हैं। दोनों के मिलते ही जाइगोट में 46 क्रोमोसोम पूरे हो जाते हैं। इन्हीं क्रोमोसोम में बच्चे की जेनेटिक जानकारी होती है, जिसमें आंखों का रंग, ब्लड ग्रुप और लिंग जैसी कई विशेषताएं शामिल होती हैं।

इसके बाद यह एक सेल लंबे समय तक ऐसी ही नहीं रहती। यह बंटना शुरू करती है और सेल्स की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। इसी शुरुआती विकास के दौरान जाइगोट आगे चलकर एम्ब्रियो में बदलता है।

जाइगोट बनता कैसे है?

जाइगोट बनने की शुरुआत एग और स्पर्म के मिलने से होती है। यह मिलन यूट्रस में नहीं, बल्कि फैलोपियन ट्यूब में होता है।

ओव्यूलेशन के बाद एग करीब 24 घंटे तक फर्टिलाइज़ होने लायक रहता है। दूसरी तरफ, स्पर्म महिला के शरीर में पहुंचने के बाद कई दिनों तक मौजूद रह सकते हैं। इसलिए ओव्यूलेशन से पहले के दिन भी प्रेगनेंसी के लिहाज़ से महत्वपूर्ण होते हैं।

एग तक पहुंचने के बाद स्पर्म में कुछ बदलाव होते हैं, जिनकी मदद से वह एग की बाहरी परत को पार कर पाता है। इस बदलाव को कैपेसिटेशन (capacitation) कहते हैं।

एग के अंदर एक स्पर्म पहुँचते ही उसकी बाहरी परत में बदलाव आता है। इसके बाद बाकी स्पर्म अंदर नहीं जा पाते। यही वजह है कि सामान्य फर्टिलाइजेशन में एग के अंदर एक ही स्पर्म पहुंचता है।

स्पर्म के एग में पहुंचने के बाद दोनों के क्रोमोसोम इकट्ठा होने लगते हैं। एग के 23 और स्पर्म के 23 क्रोमोसोम मिलकर 46 क्रोमोसोम पूरे करते हैं। इस दौरान एग और स्पर्म की जेनेटिक जानकारी कुछ समय के लिए अलग अलग रहती है। इन्हीं दो हिस्सों को प्रोन्यूक्लियस (pronucleus) कहा जाता है।

जब ये दोनों प्रोन्यूक्लियस मिलते हैं, तब जाइगोट बनता है। इसके बाद इसकी एक सेल बंटना शुरू करती है और यहीं से आगे एम्ब्रियो बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

Zygote Process

जाइगोट कितने समय तक रहता है?

जाइगोट बनने के बाद यह अवस्था बहुत ज्यादा समय तक नहीं रहती। दोनों प्रोन्यूक्लियस के मिलने के करीब 24 से 30 घंटे बाद जाइगोट की सेल बंटना शुरू कर देती है।

इसके बाद इसे जाइगोट नहीं कहा जाता और एम्ब्रियो बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसलिए जाइगोट को करीब एक दिन का छोटा सा पड़ाव समझ सकते हैं।

हालांकि यह समय बहुत कम होता है, लेकिन प्रेगनेंसी की शुरुआत के लिए यह एक अहम चरण है। यहीं से सेल के बंटने और आगे की ग्रोथ शुरू होती है।

जाइगोट के बाद एम्ब्रियो और फीटस कब कहलाते हैं?

नाम

कब से कब तक

उस समय क्या होता है

एग और स्पर्म

मिलने से पहले

दोनों अलग, दोनों में 23-23 क्रोमोसोम

जाइगोट

मिलने के बाद पहले करीब 24 से 30 घंटे

एक ही सेल, 46 क्रोमोसोम पूरे

एम्ब्रियो

पहली बार बंटने से लेकर आठवें हफ्ते तक

सेल्स बढ़ती हैं, अंग बनना शुरू होते हैं

मोरुला

तीसरे से चौथे दिन

सेल्स बढ़कर 16 से 32 सेल्स का ठोस गुच्छा बनाती हैं 

ब्लास्टोसिस्ट

पांचवें से छठे दिन

अंदर खाली जगह बनती है, दो हिस्से अलग दिखने लगते हैं

फीटस

नौवें हफ्ते से जन्म तक

अंग बन चुके होते हैं, अब बढ़ना और पकना चलता है

 

मोरुला और ब्लास्टोसिस्ट एम्ब्रियो बनने की शुरुआती अवस्थाएं हैं। IVF में इन अवस्थाओं को खास तौर पर देखा जाता है, क्योंकि इसी दौरान एम्ब्रियो में लगातार बदलाव होते हैं।

जाइगोट एक सेल से शुरू होता है। इसके बाद सेल्स की संख्या बढ़ती जाती है और एम्ब्रियो का बनना शुरू होता है। नौवें हफ्ते से इसे फीटस कहा जाता है।

पहले हफ्ते की पूरी घड़ी

फर्टिलाइज़ेशन के बाद पहले सात दिनों में सेल लगातार बदलती और आगे बढ़ती रहती है। इस दौरान वह कुछ दिन फैलोपियन ट्यूब में रहती है और फिर यूट्रस तक पहुंचती है। 

 

समय

क्या होता है

कहाँ होता है

0 घंटा

एग और स्पर्म मिलते हैं

फैलोपियन ट्यूब के बाहरी सिरे पर 

16 से 20 घंटे

दोनों प्रोन्यूक्लियस दिखाई देते हैं

फैलोपियन ट्यूब

24 से 30 घंटे

सेल पहली बार दो हिस्सों में बंटती है 

फैलोपियन ट्यूब

दूसरा दिन

सेल्स की संख्या 2 से 4 हो जाती है 

ट्यूब में आगे बढ़ते हुए

तीसरा दिन

सेल्स की संख्या 6 से 8 हो जाती है 

ट्यूब का आखिरी हिस्सा

चौथा दिन

16 से 32 सेल्स का मोरुला बनता है 

यूट्रस में प्रवेश

पांचवें से छठे दिन

ब्लास्टोसिस्ट बनता है और यूट्रस की ओर बढ़ता है 

यूट्रस

छठे से दसवें दिन

ब्लास्टोसिस्ट एंडोमेट्रियम में चिपकना और धंसना शुरू करता है 

यूट्रस की दीवार

 

यही वजह है कि फर्टिलाइज़ेशन के तुरंत बाद प्रेगनेंसी टेस्ट में कुछ दिखना जरूरी नहीं है। टेस्ट जिस hCG हॉर्मोन को पकड़ता है, वह इम्प्लांटेशन के बाद बनना शुरू होता है। इसलिए फर्टिलाइज़ेशन और पॉज़िटिव टेस्ट के बीच कुछ दिनों का अंतर होना सामान्य है।  

एम्ब्रियो यूट्रस तक कैसे पहुंचता है और इम्प्लांटेशन कब होता है?

फर्टिलाइज़ेशन के बाद एम्ब्रियो तुरंत यूट्रस में नहीं पहुंचता। पहले कुछ दिनों तक वह फैलोपियन ट्यूब में आगे बढ़ता है और आमतौर पर तीसरे से चौथे दिन तक यूट्रस में पहुंच जाता है।

यूट्रस में पहुंचने के बाद भी एम्ब्रियो तुरंत एंडोमेट्रियम से नहीं चिपकता। पांचवें से छठे दिन के आसपास वह ब्लास्टोसिस्ट बनता है और अपनी बाहरी परत से बाहर निकलता है। इसके बाद वह एंडोमेट्रियम की सतह से जुड़ता है और धीरे-धीरे उसकी परत में धंसना शुरू करता है। इसे इम्प्लांटेशन कहते हैं। यह प्रक्रिया करीब छठे दिन से शुरू होकर दसवें दिन तक पूरी हो सकती है।

प्रेगनेंसी में जाइगोट की भूमिका क्या है?

जाइगोट बनने के साथ क्रोमोसोम की संख्या पूरी होती है, बच्चे का लिंग तय होता है और आगे चलकर बच्चे और प्लेसेंटा के बनने की शुरुआत होती है।

क्रोमोसोम की गिनती यहीं पूरी होती है

एग और स्पर्म से आए 23-23 क्रोमोसोम मिलकर जाइगोट में 46 क्रोमोसोम बनाते हैं। अगर इस दौरान क्रोमोसोम की गिनती में गड़बड़ी हो जाए, तो आगे का विकास रुक सकता है या बहुत शुरुआती मिसकैरेज हो सकता है। यही वजह है कि फर्स्ट ट्राइमेस्टर में होने वाले कई मिसकैरेज का संबंध क्रोमोसोम संबंधी  ऐसी गड़बड़ियों से होता है।

यह गड़बड़ी क्यों होती है, इसका संबंध एग की उम्र से भी है। एग महिला के जन्म से ही मौजूद रहते हैं, और उम्र बढ़ने के साथ क्रोमोसोम के सही तरीके से अलग होने में गलती की संभावना बढ़ती जाती है। इसी वजह से उम्र बढ़ने के साथ मिसकैरेज का जोखिम भी बढ़ता है।

संतान का जेंडर इसी समय तय होता है

एग में हमेशा X क्रोमोसोम होता है, जबकि स्पर्म में X या Y क्रोमोसोम हो सकता है। X क्रोमोसोम वाला स्पर्म एग से मिलता है, तो XX बनता है और संतान लड़की होती है। Y क्रोमोसोम वाला स्पर्म मिलने पर XY बनता है और संतान लड़का होती है। 

बच्चे और प्लेसेंटा की शुरुआत यहीं से होती है

जाइगोट की सेल्स आगे चलकर अलग-अलग तरह की सेल्स में बदलती हैं। इनमें से कुछ से एम्ब्रियो बनता है और कुछ से प्लेसेंटा जैसे सहायक टिश्यू बनते हैं। यानी बच्चे के साथ-साथ उसे पोषण देने वाले प्लेसेंटा की शुरुआत भी इसी एक सेल से होती है।

IVF में जाइगोट की जांच क्यों महत्वपूर्ण होती है?

IVF में एग और स्पर्म के मिलने के बाद सबसे पहले यह देखना जरूरी होता है कि फर्टिलाइज़ेशन सही तरीके से हुआ या नहीं। इसी के लिए फर्टिलाइज़ेशन के करीब 16 से 22 घंटे बाद एम्ब्रियोलॉजिस्ट एग को देखकर प्रोन्यूक्लियस की संख्या चेक करते हैं। 

एग को स्पर्म के साथ रखा गया हो या ICSI में एक स्पर्म सीधे एग के अंदर डाला गया हो, दोनों ही केसेस में यह जांच की जाती है। आमतौर पर अगर दो प्रोन्यूक्लियस दिखाई दें तो माना जाता है कि सामान्य फर्टिलाइज़ेशन हुआ है।

Zygote

लैब में क्या दिखता है

इसका मतलब

आगे क्या होता है

दो प्रोन्यूक्लियस

एक एग और एक स्पर्म से सामान्य फर्टिलाइज़ेशन 

इसी को आगे बढ़ाया जाता है

एक प्रोन्यूक्लियस

फर्टिलाइज़ेशन में गड़बड़ी हो सकती है या दूसरा प्रोन्यूक्लियस देर से दिख सकता है 

कुछ घंटे और ऑब्ज़र्वेशन के बाद फैसला लिया जाता है 

तीन प्रोन्यूक्लियस

एक से ज्यादा स्पर्म एग में पहुंच गए या फर्टिलाइज़ेशन में दूसरी गड़बड़ी हुई 

ट्रांसफर नहीं किया जाता

कोई प्रोन्यूक्लियस नहीं

फर्टिलाइज़ेशन नहीं हुआ

उस एग को आगे नहीं बढ़ाया जाता

IVF में जितने एग मिलते हैं, उतने एम्ब्रियो बनना जरूरी नहीं है। सामान्य IVF (Conventional IVF) में लगभग 50-70% और ICSI प्रक्रिया में लगभग 70-85% मैच्योर एग्स सफलतापूर्वक फर्टिलाइज़ होते हैं। यानी दस एग मिलने का मतलब दस एम्ब्रियो मिलना नहीं है। पहले फर्टिलाइज़ेशन की जांच होती है, फिर जो एग सही तरीके से फर्टिलाइज़ हुए हैं, उनमें से आगे कितने एम्ब्रियो बनते हैं यह देखा जाता है।

इसके बाद एम्ब्रियो की ग्रोथ पर नजर रखी जाती है और आमतौर पर तीसरे या पांचवें दिन ट्रांसफर का फैसला लिया जाता है। 

अगर ब्लास्टोसिस्ट स्टेज पर क्रोमोसोम की जांच करनी हो, तो एम्ब्रियो को उसी स्टेज तक कल्चर किया जाता है। इसलिए पहले दिन की यह छोटी सी जांच सिर्फ फर्टिलाइज़ेशन की पुष्टि नहीं करती, बल्कि आगे की IVF प्रक्रिया के लिए पहला महत्वपूर्ण चेकपॉइंट भी है।

याद रखने वाली मुख्य बातें (Key Takeaways)

  • जाइगोट एग और स्पर्म के मिलने से बनी एक ही सेल है, जिसमें पूरे 46 क्रोमोसोम होते हैं।
  • यह फैलोपियन ट्यूब में बनता है, यूट्रस में नहीं, और यूट्रस तक पहुँचने में तीन से चार दिन लगते हैं।
  • जाइगोट नाम सिर्फ़ करीब 24 से 30 घंटे रहता है, पहली बार बंटते ही इसे एम्ब्रियो कहा जाने लगता है।
  • इम्प्लांटेशन छठे से दसवें दिन के बीच होता है, इसीलिए प्रेगनेंसी टेस्ट इससे पहले पॉज़िटिव नहीं आता।
  • IVF में इसी चरण पर प्रोन्यूक्लियस गिनकर तय किया जाता है कि फर्टिलाइज़ेशन सामान्य हुआ या नहीं।

निष्कर्ष (Conclusion)

Zygote meaning in Hindi को समझने का सबसे साफ़ तरीका यही है कि इसे एक नाम नहीं, एक बहुत छोटी अवधि मानकर देखा जाए। एग और स्पर्म मिलते हैं, 46 क्रोमोसोम पूरे होते हैं, और एक दिन के भीतर यह सेल बंटकर आगे बढ़ जाती है।

इस छोटे से पड़ाव का असर पूरी प्रेगनेंसी पर रहता है। जेनेटिक नक्शा, लिंग, और आगे की बनावट, तीनों यहीं तय हो जाते हैं। यही वजह है कि शुरुआती दिनों की गड़बड़ियां अक्सर इसी चरण से जुड़ी निकलती हैं।

अगर आप प्रेगनेंसी की कोशिश कर रही हैं, तो इससे एक व्यावहारिक बात निकलती है। ओव्यूलेशन से पहले के दिन सबसे अहम हैं, क्योंकि एग सिर्फ़ एक दिन इंतज़ार करता है जबकि स्पर्म पहले से मौजूद रह सकते हैं। और अगर आप IVF की प्रक्रिया में हैं, तो एग निकलने के अगले दिन आने वाली फर्टिलाइज़ेशन रिपोर्ट को इसी नज़र से देखिए, वह पूरी साइकिल की पहली असली खबर होती है।

Zygote से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

जाइगोट क्या होता है?

जाइगोट कितने समय तक रहता है?

जाइगोट कहाँ बनता है?

जाइगोट और एम्ब्रियो में क्या अंतर है?

जाइगोट बन गया तो क्या प्रेगनेंसी पक्की हो जाती है?

क्या खानपान या दवा से बच्चे का लिंग बदला जा सकता है?

जाइगोट बनने के कितने दिन बाद प्रेगनेंसी टेस्ट पॉज़िटिव आता है?

क्या IVF में भी जाइगोट बनता है?

IVF में सारे एग जाइगोट क्यों नहीं बनते?

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