प्रेग्नेंसी में ब्लड प्रेशर बढ़ने की सबसे मुश्किल बात ये है कि ज़्यादातर वक़्त कुछ महसूस ही नहीं होता।
न सिरदर्द, न घबराहट, न कोई तकलीफ़। महिला बिल्कुल ठीक महसूस करती है, और अंदर ही अंदर एक चीज़ बढ़ रही होती है जिसका पता सिर्फ़ बीपी मशीन से चलता है।
यही वजह है कि हर प्रीनेटल विज़िट में ब्लड प्रेशर नापा जाता है - भले ही आप एकदम स्वस्थ महसूस कर रही हों। वो जाँच बोरिंग लगती है, बार-बार वही बात। पर असल में वो सबसे ज़रूरी जाँचों में से एक है।
तो पहले साफ़ कर लेते हैं कि ये है क्या।
आसान शब्दों में - प्रेग्नेंसी के 20वें हफ़्ते के बाद ब्लड प्रेशर का बढ़ जाना, जबकि उससे पहले वो सामान्य था, और पेशाब में प्रोटीन या कोई और गंभीर लक्षण न हो।
ACOG के मुताबिक़ प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर तब माना जाता है जब वो 140/90 या उससे ऊपर हो - और वो भी एक बार नहीं, कम से कम चार घंटे के अंतर पर दो बार नापने पर।
इस "दो बार" वाली बात पर ध्यान दीजिए, क्योंकि इससे बहुत बेवजह की घबराहट रुक सकती है। एक बार का ऊँचा रीडिंग अपने आप में निदान नहीं है। डॉक्टर के कमरे में बीपी अक्सर सिर्फ़ नर्वस होने से भी बढ़ जाता है - इसे "व्हाइट कोट" असर कहते हैं। इसीलिए एक रीडिंग देखकर दवा शुरू नहीं होती।
अब तीन नाम अक्सर आपस में गड्डमड्ड होते हैं, तो उन्हें अलग कर लेते हैं। अगर ब्लड प्रेशर प्रेग्नेंसी से पहले या 20वें हफ़्ते से पहले ही बढ़ा हुआ था, तो वो क्रॉनिक हाइपरटेंशन है। अगर 20वें हफ़्ते के बाद बढ़ा और साथ में प्रोटीन या अंगों पर असर है, तो वो प्रीक्लेम्पसिया है। और अगर 20वें हफ़्ते के बाद सिर्फ़ बीपी बढ़ा, बाक़ी कुछ नहीं - तो वो जेस्टेशनल हाइपरटेंशन है। ये तीनों अलग हैं, और इनका इलाज भी थोड़ा अलग होता है।
यहाँ आधी-अधूरी बात नुक़सान करती है, इसलिए सीधे कहनी होगी।
जेस्टेशनल हाइपरटेंशन अपने आप में ज़्यादातर मामलों में संभल जाता है। पर इसे नज़रअंदाज़ इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि ये कभी-कभी आगे बढ़कर प्रीक्लेम्पसिया बन जाता है - जो माँ और बच्चे दोनों के लिए ज़्यादा गंभीर स्थिति है।
और ये कितनी बार होता है? आँकड़ा चौंकाने वाला है। ACOG की सामग्री के मुताबिक़ जेस्टेशनल हाइपरटेंशन वाली आधी तक महिलाओं में आगे चलकर प्रीक्लेम्पसिया के लक्षण उभर आते हैं।
आधी तक। यही वजह है कि "बस बीपी ही तो बढ़ा है" कहकर इसे हल्के में लेना ठीक नहीं। निदान होने का मतलब बीमारी नहीं - मतलब है कि अब नज़दीक से नज़र रखी जाएगी। ज़्यादा विज़िट, ज़्यादा बीपी जाँच, कुछ ब्लड और यूरिन टेस्ट। बस।
पूरी सच्चाई ये है कि इसकी सटीक वजह अब भी पूरी तरह समझी नहीं गई है। इसका बहुत कुछ प्लेसेंटा के शुरुआती विकास से जुड़ा माना जाता है।
पर कुछ चीज़ें ख़तरा बढ़ाती हैं, और इन्हें जानना काम का है क्योंकि इन्हीं के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं कि किस पर ज़्यादा नज़र रखनी है। इनमें शामिल हैं - पहली प्रेग्नेंसी, पिछली प्रेग्नेंसी में प्रीक्लेम्पसिया रहा हो, पहले से हाई बीपी या डायबिटीज़ या किडनी की बीमारी, कुछ ऑटोइम्यून स्थितियाँ, जुड़वाँ या उससे ज़्यादा बच्चे, बहुत ज़्यादा वज़न, परिवार में इतिहास, और 35 से ऊपर की उम्र।
ध्यान दीजिए - इनमें से कई चीज़ें ऐसी हैं जिन पर आपका कोई ज़ोर नहीं। तो अगर ये हो गया, वो आपकी किसी ग़लती की वजह से नहीं है।
जैसा शुरू में कहा, जेस्टेशनल हाइपरटेंशन अक्सर बिना किसी लक्षण के चलता है। इसीलिए बीपी की नियमित जाँच इतनी अहम है।
पर कुछ लक्षण ऐसे हैं जो इशारा करते हैं कि बात प्रीक्लेम्पसिया की तरफ़ बढ़ रही है। इन्हें याद रखना ज़रूरी है, क्योंकि इनके दिखते ही तुरंत डॉक्टर तक पहुँचना होता है -
आख़िरी वाला ख़ास तौर पर ध्यान देने लायक़ है। शुरुआती महीनों वाली मिचली अलग बात है, पर अगर वो चली गई थी और बीच-प्रेग्नेंसी के बाद अचानक लौट आई - तो इसे मामूली मत समझिए।
एक बात साफ़ कर दूँ, क्योंकि ये डराने के लिए नहीं है। ये लक्षण दिखने का मतलब ये नहीं कि कुछ बहुत बुरा हो गया। इसका मतलब बस इतना है कि तुरंत जाँच होनी चाहिए। जल्दी पकड़ में आ जाए तो ज़्यादातर चीज़ें आसानी से संभल जाती हैं।
ये इस बात पर निर्भर करता है कि बीपी कितना बढ़ा है और प्रेग्नेंसी किस हफ़्ते में है।
हल्के मामलों में अक्सर दवा की भी ज़रूरत नहीं पड़ती - बस नज़दीक से निगरानी होती है। ज़्यादा विज़िट, घर पर बीपी नापना, और समय-समय पर ये जाँचना कि प्रीक्लेम्पसिया की तरफ़ तो नहीं बढ़ रहा।
जब बीपी ज़्यादा हो, तो दवा दी जाती है। यहाँ एक ज़रूरी बात - प्रेग्नेंसी में कुछ ख़ास ब्लड प्रेशर की दवाएँ सुरक्षित मानी जाती हैं और कुछ नहीं। लेबेटालॉल और निफ़ेडिपिन जैसी दवाएँ प्रेग्नेंसी भर सुरक्षित मानी जाती हैं। इसीलिए अगर आप पहले से कोई बीपी की दवा ले रही थीं, तो प्रेग्नेंसी पता चलते ही डॉक्टर को बताना ज़रूरी है - हो सकता है उसे बदलना पड़े।
और इसीलिए ब्लड प्रेशर की कोई भी दवा ख़ुद से शुरू, बंद या कम-ज़्यादा मत कीजिए। ये फ़ैसला सिर्फ़ डॉक्टर का है।
जब बीपी बहुत ज़्यादा हो - यानी 160/110 या उससे ऊपर - तो इसे प्रीक्लेम्पसिया जितनी ही गंभीरता से लिया जाता है, भले ही बाक़ी लक्षण न हों। ऐसी स्थिति में अक्सर अस्पताल में निगरानी की ज़रूरत पड़ती है।
और अंत में, इस पूरी स्थिति का असली इलाज एक ही है - बच्चे का जन्म। इसीलिए डिलीवरी का समय सोच-समझकर तय किया जाता है, ये देखते हुए कि बीपी कितना क़ाबू में है और प्रेग्नेंसी कितनी आगे बढ़ चुकी है।
अगर प्रीक्लेम्पसिया का ख़तरा ज़्यादा है, तो अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन्स कम डोज़ वाली एस्पिरिन की सलाह देती हैं - और यहाँ समय बहुत मायने रखता है।
ACOG के मुताबिक़ इसे 12वें से 28वें हफ़्ते के बीच शुरू किया जाना चाहिए, सबसे बेहतर 16 हफ़्ते से पहले, और सबसे ज़्यादा फ़ायदा तभी मिलता है जब जल्दी शुरू हो। किसे ज़रूरत है, ये आपकी जोखिम की स्थिति देखकर डॉक्टर तय करते हैं।
पर ये दवा भी ख़ुद से शुरू मत कीजिए। अगर ऊपर बताए जोखिम कारकों में से कुछ आप पर लागू होता है और इस पर बात नहीं हुई, तो अगली विज़िट में पूछ लीजिए - पर फ़ैसला डॉक्टर का होगा।
ये हिस्सा शायद इस पूरे लेख का सबसे ज़रूरी है।
बहुत से लोग - मरीज़ और घरवाले दोनों - मानते हैं कि बच्चा हो गया तो ख़तरा ख़त्म। पर प्रीक्लेम्पसिया डिलीवरी के बाद भी शुरू हो सकता है या बिगड़ सकता है, और सबसे ज़्यादा जोखिम जन्म के पहले हफ़्ते में रहता है।
चिकित्सा सामग्री में इसे साफ़ चेतावनी के तौर पर रखा गया है - महिलाओं को अस्पताल से छुट्टी से पहले इन लक्षणों के बारे में बताया जाना चाहिए, और कहा जाना चाहिए कि तेज़ सिरदर्द, नज़र में बदलाव, बहुत सूजन या लगातार ऊँचे बीपी पर तुरंत लौटें।
भारत में क्या होता है? डिलीवरी के बाद पूरा ध्यान बच्चे पर चला जाता है। माँ का बीपी कोई नहीं नापता, और वो ख़ुद भी थकान और नई ज़िम्मेदारी में इन लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देती है। यही सबसे ख़तरनाक चूक है।
तो अगर आपको प्रेग्नेंसी में बीपी की दिक़्क़त रही है, तो डिलीवरी के बाद भी कुछ हफ़्ते अपने बीपी और इन लक्षणों पर नज़र रखिए। और अगर सिरदर्द, नज़र की गड़बड़ी या तेज़ सूजन दिखे - बच्चे को छोड़कर पहले अपने डॉक्टर के पास जाइए। ये देर करने वाली बात नहीं है।
प्रेग्नेंसी में हाई बीपी सिर्फ़ नौ महीने की बात नहीं है। इसे एक तरह का संकेत भी माना जाता है।
चिकित्सा सामग्री में दर्ज है कि प्रेग्नेंसी में बीपी की दिक़्क़त वाली महिलाओं में आगे चलकर हाई बीपी और दिल की बीमारी का ख़तरा ज़्यादा रहता है। इसीलिए सलाह दी जाती है कि ऐसी महिलाएँ डिलीवरी के कुछ महीनों के भीतर अपने दिल की सेहत को लेकर डॉक्टर से बात करें।
इसे डराने वाली बात मत समझिए - इसे एक फ़ायदे की तरह देखिए। आपको अपने शरीर के बारे में एक जानकारी मिल गई है जो ज़्यादातर लोगों को दशकों बाद पता चलती है। इसका मतलब है कि आप समय रहते अपनी जीवनशैली और सेहत पर ध्यान दे सकती हैं।