जब आप प्रेगनेंसी की कोशिश कर रही हैं, तो हर छोटी चीज पर आपका ध्यान जाता है। पीरियड्स की तारीख करीब आती है और अचानक हल्की सी स्पॉटिंग दिखती है। मन में तुरंत सवाल उठता है कि क्या यह पीरियड्स शुरू हो रहे हैं या यह इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग (implantation bleeding) है।
यह कन्फ्यूजन इसलिए होता है क्योंकि दोनों ही लगभग एक ही समय पर हो सकती हैं, यानी आपके अगले पीरियड्स के आसपास और दोनों में ब्लीडिंग होती है, जिससे बिना सही जानकारी के फर्क करना मुश्किल हो जाता है।
लेकिन अगर आप ध्यान से देखें तो कई ऐसे संकेत हैं जो दोनों को अलग करते हैं। कलर, फ्लो, टाइमिंग, दर्द और कुछ साथ के लक्षण मिलकर आपको बता सकते हैं कि यह क्या है। इस implantation bleeding vs period in hindi आर्टिकल में हम इन सभी फर्कों को विस्तार से समझेंगे ताकि आपको अनावश्यक चिंता न हो।
जब स्पर्म और एग मिलते हैं तो फर्टिलाइजेशन होता है। इसके बाद बना हुआ भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) फैलोपियन ट्यूब से होते हुए गर्भाशय मतलब यूट्रस (Uterus) की तरफ बढ़ता है। एम्ब्रीओ को यूट्रस तक पहुँचने में 6 से 10 दिन लगते हैं।
जब एम्ब्रीओ यूट्रस तक पहुंचता है, तो उसे गर्भाशय की अंदरूनी परत यानी एंडोमेट्रियम (endometrium) में जुड़ना होता है। इस जुड़ने के प्रोसेस को इम्प्लांटेशन कहते हैं।
इंप्लांटेशन के दौरान एम्ब्रीओ एंडोमेट्रियम में थोड़ा सा गड़ता है, जिस वजह से कभी कभी छोटी खून की नलियां टूट जाती हैं और थोड़ा सा खून निकलता है। यही खून जब बाहर आता है तो उसे इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग कहते हैं।
यह पूरी तरह सामान्य है और लगभग 25 से 30 प्रतिशत प्रेगनेंसी में होती है। इसका मतलब यह है कि सभी गर्भवती महिलाओं को इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग नहीं होती, लेकिन जिन्हें होती है उनमें यह कोई चिंता की बात नहीं है।
यह भी पढ़ें : HSG टेस्ट क्या है?
सबसे बड़ा अंतर ब्लीडिंग की मात्रा में है। पीरियड्स में ब्लीडिंग धीरे धीरे बढ़ती है। पहले दिन ब्लीडिंग हल्की हो सकती है, दूसरे और तीसरे दिन सबसे ज्यादा होती है, और फिर धीरे धीरे कम होती है। पूरा साइकल 4 से 7 दिन चलता है। आपको पैड या टैम्पन बदलने की जरूरत पड़ती है और ब्लीडिंग लगातार होती है।
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग इससे बिल्कुल अलग होती है। यह बहुत हल्की होती है, इतनी कि कई बार सिर्फ वॉशरूम जाने पर टिश्यू पर या अंडरवियर पर हल्का सा दाग दिखता है। यह आमतौर पर 1 से 2 दिन से ज्यादा नहीं रहती। कई महिलाओं में तो यह सिर्फ कुछ घंटों की होती है। इसमें पैड की जरूरत नहीं पड़ती, एक पैंटी लाइनर से काम चल जाता है। अगर ब्लीडिंग बढ़ रही है और पैड भीग रहा है, तो यह इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग नहीं है।
यह भी पढ़ें : एम्ब्रीओ ट्रांसफर के कितने दिन बाद लक्षण दिखाई देते हैं?
पीरियड्स का खून आमतौर पर चमकीला लाल या गहरा लाल होता है। जैसे जैसे पीरियड्स आगे बढ़ते हैं, कलर बदलता है, शुरू में गहरा, बीच में लाल, और आखिर में ब्राउन हो जाता है। पीरियड्स में खून के थक्के यानी क्लॉट (clots) आना भी आम है, खासकर भारी फ्लो वाले दिनों में।
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग का कलर पीरियड्स से अलग होता है। अमूमन यह लाइट पिंक या लाइट ब्राउन होता है। चमकीला लाल खून इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग में बहुत कम देखा जाता है। इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग में क्लॉट भी नहीं आते। फ्लो इतना कम होता है कि आप इसे ब्लीडिंग की बजाय ‘स्पॉटिंग’ कह सकती हैं। कई महिलाओं को लगता है कि शायद उनके पीरियड्स शुरू हो रहे हैं लेकिन फिर कुछ घंटों में ब्लड आना बंद हो जाता है।
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग जनरली ओव्यूलेशन (ovulation) के 6 से 12 दिन बाद होती है। अगर आपकी साइकल 28 दिन की है, तो ओव्यूलेशन करीब 14वें दिन होता है। इसका मतलब है कि इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग 20वें से 26वें दिन के बीच हो सकती है, यानी आपके अगले पीरियड्स से कुछ दिन पहले।
पीरियड्स हमेशा आपके साइकल के आखिर में आते हैं, यानी 28वें दिन या उसके आसपास। अगर ब्लीडिंग आपकी पीरियड्स की तारीख से 2 से 5 दिन पहले शुरू हो रही है और बहुत हल्की है, तो यह इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग हो सकती है।
लेकिन अगर ब्लीडिंग ठीक पीरियड्स की तारीख पर या उसके बाद शुरू हो रही है और ब्लीडिंग का फ़्लो बढ़ रहा है, तो यह पीरियड्स होने की संभावना ज्यादा है।
एक बात और समझ लें कि अगर आपका साइकल अनियमित है, तो टाइमिंग से पहचानना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में ब्लीडिंग के कलर और फ्लो पर ज्यादा ध्यान दें।
पीरियड्स में क्रैम्प काफी तेज हो सकते हैं। पेट के निचले हिस्से में ऐंठन, कमर दर्द, और कभी कभी जांघों तक दर्द जाना, ये सब पीरियड्स में कॉमन होते हैं। ये क्रैम्प पीरियड्स के पहले और दूसरे दिन सबसे ज्यादा होते हैं।
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग में भी हल्की क्रैम्पिंग हो सकती है, लेकिन यह पीरियड्स के दर्द से बहुत कम होती है। इसे इम्प्लांटेशन क्रैम्प कहते हैं। यह पेट के निचले हिस्से में हल्की सी चुभन या खिंचाव जैसा महसूस होता है। कई बार तो इतना हल्का होता है कि आपको पता भी नहीं चलता।
अगर दर्द इतना तेज है कि आपको दवा लेनी पड़ रही है, तो यह इम्प्लांटेशन क्रैम्प नहीं है।
इम्प्लांटेशन के दौरान कुछ महिलाओं को स्तनों में हल्का दर्द या भारीपन, थकान, और हल्की सी मतली भी महसूस हो सकती है। ये शुरुआती प्रेगनेंसी के लक्षण हैं जो इम्प्लांटेशन के आसपास शुरू हो सकते हैं।
पीरियड्स में भी स्तनों में दर्द होता है, लेकिन वह पीरियड्स शुरू होते ही कम होने लगता है।
अगर आपको लग रहा है कि यह इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रेगनेंसी टेस्ट कब करें। बहुत जल्दी टेस्ट करना सही नहीं है क्योंकि hCG हार्मोन को बढ़ने में समय लगता है। इम्प्लांटेशन के बाद शरीर hCG बनाना शुरू करता है, लेकिन इसे इतना बढ़ने में 2 से 3 दिन लगते हैं कि यूरिन टेस्ट में पकड़ आ सके।
सबसे अच्छा समय है कि आप अपने पीरियड्स की तारीख गुजरने का इंतजार करें। अगर पीरियड्स नहीं आए, तो पीरियड्स की तारीख से 1 या 2 दिन बाद टेस्ट करें। सुबह उठकर पहला यूरिन सबसे अच्छा होता है क्योंकि उसमें hCG की मात्रा सबसे ज्यादा होती है।
अगर टेस्ट नेगेटिव आए लेकिन पीरियड्स अभी भी नहीं आए, तो 2 से 3 दिन बाद दोबारा टेस्ट करें। कभी कभी hCG बढ़ने में थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है।
अगर आप बिल्कुल पक्का करना चाहती हैं, तो ब्लड टेस्ट करवाएं। ब्लड hCG टेस्ट यूरिन टेस्ट से ज्यादा संवेदनशील होता है और बहुत कम मात्रा में hCG को भी डिटेक्ट कर लेता है।
यह भी पढ़ें : महिला की उम्र IVF की सफलता को कैसे प्रभावित करती है?
ज्यादातर मामलों में इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग होना नॉर्मल होता है और इसमें डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं होती। लेकिन कुछ सिचुएशन में आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
एक तरफ का तेज दर्द एक्टॉपिक प्रेगनेंसी (ectopic pregnancy) का लक्षण हो सकता है, जो एक सीरियस कंडीशन है। बहुत ज्यादा ब्लीडिंग मिसकैरेज का लक्षण भी हो सकता है।
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग और पीरियड्स में अंतर समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि दोनों एक ही समय के आसपास होते हैं और दिखने में मिलते-जुलते लग सकते हैं। लेकिन अगर आप कलर, फ्लो, टाइमिंग और दर्द को साथ में देखेंगीं, तो आसानी से समझ सकती हैं।
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग बहुत हल्की और कम समय की होती है, जबकि पीरियड्स का फ्लो बढ़ता है और कई दिन चलता है। इसलिए सिर्फ़ एक लक्षण पर ही नहीं, पूरे पैटर्न पर आपको ध्यान देना चाहिए।
अगर आपको अभी भी कन्फ्यूजन है, तो जल्दबाज़ी में निष्कर्ष निकालने की बजाय सही समय पर प्रेगनेंसी टेस्ट करें या डॉक्टर से बात करें। यही समझ आपको अनावश्यक तनाव से बचाती है और सही निर्णय लेने में मदद करती है।