मिसकैरेज के बाद शरीर को ठीक होने में समय लगता है और भावनात्मक रिकवरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। इस ब्लॉग में जानें मिसकैरेज के बाद ब्लीडिंग और पीरियड कब तक रह सकते हैं, ओव्यूलेशन कब वापस शुरू हो सकता है, किन लक्षणों में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और दोबारा प्रेग्नेंसी की कोशिश कब की जा सकती है। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य, पार्टनर के साथ भावनात्मक बदलाव और अगली प्रेग्नेंसी की तैयारी से जुड़ी जरूरी बातें समझें।
अस्पताल से छुट्टी मिलते वक़्त अक्सर एक वाक्य कहा जाता है - "अब सब ठीक है।"
और उसी शाम घर पहुँचकर पता चलता है कि कुछ भी ठीक नहीं लग रहा।
शरीर की जाँच पूरी हो चुकी है, रिपोर्ट सामान्य है, दवाएँ लिख दी गई हैं। लेकिन ब्लीडिंग कब तक रहेगी, पीरियड कब आएगा, कब से दोबारा कोशिश कर सकते हैं, ये सोचना ठीक है या नहीं - इनमें से किसी सवाल का जवाब किसी ने नहीं दिया।
ये लेख उन्हीं सवालों के लिए है। जो पूछे जाने चाहिए थे, पर पूछे नहीं गए - या पूछने का मौक़ा ही नहीं मिला।
ये हर महिला में अलग होता है, और यही सबसे ज़्यादा चिंता पैदा करता है।
शुरुआती दिनों में ब्लीडिंग पीरियड जैसी या उससे ज़्यादा हो सकती है, साथ में तेज़ मरोड़। फिर धीरे-धीरे कम होती जाती है, और हल्की स्पॉटिंग कुछ हफ़्तों तक चल सकती है।
कितनी अवधि सामान्य है, ये इस पर निर्भर करता है कि मिसकैरेज कितने हफ़्ते पर हुआ और इलाज किस तरह हुआ - अपने आप, दवा से, या प्रक्रिया से। इसीलिए यहाँ कोई एक तय आँकड़ा नहीं दिया जा रहा; आपकी स्थिति के हिसाब से ये आपके डॉक्टर बताएँगे।
एक व्यावहारिक बात - इस दौरान सैनिटरी पैड का ही इस्तेमाल कीजिए, टैम्पॉन या मेंस्ट्रुअल कप का नहीं। ब्लीडिंग के दौरान योनि के अंदर कुछ भी डालने से इन्फ़ेक्शन का ख़तरा बढ़ता है।
इसी वजह से NHS की सलाह है कि मिसकैरेज के सारे लक्षण ख़त्म होने तक सम्बंध न बनाएँ, क्योंकि इससे इन्फ़ेक्शन का ख़तरा रहता है (NHS)।
NHS के मुताबिक़ पीरियड्स आमतौर पर मिसकैरेज के 4 से 8 हफ़्तों के भीतर लौट आते हैं, हालाँकि सामान्य चक्र में लौटने में कई महीने लग सकते हैं।
दो बातें ध्यान रखिए।
पहला पीरियड अलग लग सकता है - ज़्यादा भारी, ज़्यादा दर्द वाला, या तारीख़ आगे-पीछे। ये चिंता की बात नहीं। हार्मोन को अपनी जगह लौटने में समय लगता है।
प्रेग्नेंसी टेस्ट कुछ समय तक पॉज़िटिव आ सकता है - क्योंकि प्रेग्नेंसी हार्मोन शरीर से धीरे-धीरे निकलता है। इसे देखकर उम्मीद बाँध लेना और फिर दोबारा टूटना - ये बहुत तकलीफ़देह होता है, इसलिए बेवजह टेस्ट दोहराने से बचिए।
अगर आठ हफ़्ते बीत जाएँ और पीरियड न आए, तो डॉक्टर से बात कीजिए।
अब वो बात जो सबसे ज़्यादा चौंकाती है, और सबसे कम बताई जाती है।
ओव्यूलेशन (Ovulation) पीरियड आने से पहले ही शुरू हो सकता है।
पहली तिमाही में हुए मिसकैरेज के बाद ये दो हफ़्ते के भीतर तक हो सकता है
इसका सीधा मतलब ये है कि आप पीरियड लौटने से पहले ही दोबारा गर्भवती हो सकती हैं।
इसीलिए NHS की सलाह बिल्कुल दो-टूक है - अगर आप अभी गर्भवती नहीं होना चाहतीं, तो गर्भनिरोधक तुरंत इस्तेमाल कीजिए ।
ये सलाह अटपटी लग सकती है। अभी-अभी एक प्रेग्नेंसी खोई है, और बात गर्भनिरोधक की हो रही है। लेकिन इसका मक़सद सिर्फ़ इतना है कि अगला क़दम आपकी मर्ज़ी से उठे - इत्तेफ़ाक़ से नहीं। मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होने से पहले दोबारा प्रेग्नेंट हो जाना बहुत भारी पड़ सकता है।
इनमें से कुछ भी दिखे तो इंतज़ार मत कीजिए, तुरंत डॉक्टर से संपर्क कीजिए:
बुख़ार और बदबूदार डिस्चार्ज - ये दोनों इन्फ़ेक्शन के संकेत हैं और इनमें देर करना ठीक नहीं। "थोड़ा और देख लेते हैं" वाली सोच यहाँ काम नहीं आती।
ये हिस्सा सबसे ज़रूरी है, और भारत में सबसे ज़्यादा अनदेखा है।
NHS इसे साफ़ शब्दों में स्वीकार करती है - मिसकैरेज के बाद थकान, भूख कम लगना और नींद में दिक़्क़त होना आम है। अपराधबोध, सदमा, उदासी और ग़ुस्सा भी महसूस हो सकता है - कभी पार्टनर पर, कभी उन दोस्तों या रिश्तेदारों पर जिनकी प्रेग्नेंसी सफल रही ।
उस आख़िरी हिस्से को दोबारा पढ़िए।
किसी की गोद भराई की तस्वीर देखकर ग़ुस्सा आना, किसी गर्भवती रिश्तेदार से मिलने का मन न करना, पार्टनर पर बेवजह चिढ़ जाना - इनमें से कुछ भी आपको बुरा इंसान नहीं बनाता। ये शोक का हिस्सा है, और चिकित्सा साहित्य में दर्ज है।
और ये कितना आम है? 29 अध्ययनों और 35,375 प्रतिभागियों वाली एक व्यवस्थित समीक्षा में पाया गया कि मिसकैरेज के बाद के छह हफ़्तों में क़रीब 32.5% महिलाओं में एंग्ज़ायटी (Anxiety), 30.1% में डिप्रेशन (Depression) और 33.6% में तनाव मौजूद था - और निम्न व मध्यम आय वाले देशों में यह अनुपात और भी ज़्यादा रहा।
यानी हर तीन में से एक महिला। ये कमज़ोरी नहीं है, न ही "ज़्यादा सोचना" है।
NHS ये भी कहती है कि हर व्यक्ति अलग तरह से शोक मनाता है - कुछ लोगों को अपनी भावनाएँ बाँटने से राहत मिलती है, कुछ के लिए इस विषय पर बात करना ही बहुत तकलीफ़देह होता है।
तो अगर आपका मन बात करने का नहीं कर रहा - ये भी ठीक है। और अगर बार-बार बात करने का मन कर रहा है - वो भी ठीक है। इसका कोई तय तरीक़ा नहीं है।
पर एक सीमा ज़रूर रखिए: अगर कुछ हफ़्तों बाद भी उदासी, नींद की दिक़्क़त या बेचैनी उसी तरह बनी हुई है, तो इसे "समय के साथ ठीक हो जाएगा" के भरोसे मत छोड़िए। अपने डॉक्टर से इसका ज़िक्र कीजिए - रिपोर्ट और दवाओं की बात के बीच में नहीं, बल्कि सीधे इसी विषय पर।
यहाँ दो अलग सवाल हैं, और इन्हें अलग-अलग देखना ज़रूरी है।
आपने शायद सुना होगा कि तीन से छह महीने रुकना चाहिए। ये सलाह भारत में बहुत आम है, और इसकी जड़ विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक पुरानी सिफ़ारिश में है।
लेकिन इस पर सबूत बदल चुके हैं, और ये जानना आपका हक़ है।
Human Reproduction Update में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण का निष्कर्ष था कि मिसकैरेज के बाद छह महीने से कम का अंतराल अगली प्रेग्नेंसी में प्रतिकूल नतीजों से जुड़ा नहीं है, और इस जानकारी का इस्तेमाल मौजूदा दिशानिर्देशों में संशोधन के लिए किया जा सकता है ।
नॉर्वे के 49,058 जन्मों के आँकड़ों पर आधारित एक बड़े अध्ययन का निष्कर्ष भी यही रहा - मिसकैरेज के छह महीने के भीतर गर्भधारण करना प्रतिकूल प्रसव-परिणामों के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा नहीं पाया गया ।
इसी अध्ययन में ये भी दर्ज है कि पिछली मिसकैरेज वाली पाँच में से तीन महिलाएँ छह महीने के भीतर ही गर्भवती हो जाती हैं ।
पर सावधानी ज़रूरी है। इसका मतलब ये नहीं कि अपने डॉक्टर की सलाह को नज़रअंदाज़ कर दीजिए। अगर उन्होंने इंतज़ार करने को कहा है, तो हो सकता है उसकी कोई ख़ास वजह हो - जैसे इन्फ़ेक्शन, कोई प्रक्रिया, या आपकी अपनी कोई मेडिकल स्थिति। सही क़दम ये है कि उनसे पूछिए: "मेरे मामले में इंतज़ार की वजह क्या है?"
एक व्यावहारिक कारण अक्सर एक पीरियड का इंतज़ार करने के पीछे होता है - इससे अगली प्रेग्नेंसी की तारीख़ें तय करना आसान हो जाता है। ये चिकित्सकीय पाबंदी नहीं, सुविधा की बात है।
यहाँ कोई आँकड़ा काम नहीं आता, और कोई गाइडलाइन आपको तारीख़ नहीं बता सकती।
कुछ महिलाओं को जल्दी दोबारा कोशिश करने से राहत मिलती है। कुछ के लिए वही सोच घबराहट पैदा करती है। दोनों सही हैं।
जो सलाह हर जगह से आ रही है - "जल्दी कर लो", "उम्र निकल रही है", "भूल जाओ आगे बढ़ो" - उसे थोड़ा किनारे रखिए। ये फ़ैसला आपका और आपके पार्टनर का है।
एक बात जो लगभग हमेशा छूट जाती है: पुरुष भी शोक में होता है।
फ़र्क़ बस इतना है कि उससे कोई पूछता नहीं। सारे सवाल, सारी सहानुभूति, सारी नज़रें महिला की तरफ़ होती हैं - और वो अक्सर "मज़बूत बने रहने" की भूमिका में धकेल दिया जाता है।
इससे दो लोग एक ही घर में अलग-अलग शोक मनाने लगते हैं, और अक्सर एक-दूसरे को ग़लत समझने लगते हैं। एक को लगता है कि दूसरे को फ़र्क़ ही नहीं पड़ा। दूसरे को लगता है कि उसे रोने की इजाज़त नहीं है।
NHS की सलाह यहाँ सीधी है - अगर आप किसी रिश्ते में हैं, तो दोनों का अपनी भावनाओं के बारे में खुलकर बात करना मदद करता है ।
अगली मुलाक़ात के लिए ये सवाल लिखकर ले जाइए:
आख़िरी दो सवाल ख़ास तौर पर पूछिए। अगली प्रेग्नेंसी की तैयारी उसके शुरू होने से पहले होती है, बाद में नहीं।