सारांश (Overview)
PMS और प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षणों में इतना फर्क नहीं होता कि सिर्फ शरीर में हो रहे बदलाव देखकर दोनों को अलग किया जा सके। स्तनों में भारीपन, पेट में ऐंठन, थकान और मूड में बदलाव दोनों में हो सकते हैं।
इसकी वजह यह है कि ओव्यूलेशन के बाद प्रोजेस्टेरोन बढ़ता है। प्रेगनेंसी होने पर भी यह हॉर्मोन बना रहता है, जबकि प्रेगनेंसी का अपना हॉर्मोन hCG इम्प्लांटेशन के बाद बनना शुरू होता है।
इसीलिए इस फर्क को समझने में लक्षणों से ज्यादा टाइमिंग काम आती है। आगे जानेंगे कि ओव्यूलेशन के बाद किस दिन क्या होता है, कौन से लक्षण कब मायने रखते हैं और प्रेगनेंसी टेस्ट कब करना सही रहता है।
PMS और प्रेगनेंसी की शुरुआत में महसूस होने वाले बदलाव काफी हद तक एक जैसे होते हैं। स्तनों में भारीपन, पेट में ऐंठन, थकान या मूड में बदलाव दोनों में हो सकते हैं। इसलिए सिर्फ इन लक्षणों से यह समझना मुश्किल होता है कि प्रेगनेंसी हुई है या पीरियड आने वाला है।
ओव्यूलेशन के बाद प्रोजेस्टेरोन बढ़ता है और प्रेगनेंसी हो या न हो, कुछ समय तक इसका असर शरीर पर रहता है। प्रेगनेंसी होने पर इम्प्लांटेशन के बाद hCG बनना शुरू होता है। यहीं से दोनों स्थितियों में फर्क धीरे-धीरे समझ आने लगता है।
इसलिए लक्षणों के साथ टाइमिंग को देखना जरूरी है। आगे जानेंगे कि ओव्यूलेशन के बाद किस दिन क्या होता है और प्रेगनेंसी टेस्ट कब करना सही रहता है।
प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षणों को समझने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि शरीर में क्या बदलाव हो रहा है। यह भी देखना जरूरी है कि ओव्यूलेशन के कितने दिन बाद वह बदलाव महसूस हुआ।
इसलिए नीचे दी गई टेबल को अपनी ओव्यूलेशन की तारीख के हिसाब से देखें। इससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि किसी खास दिन महसूस हुआ लक्षण प्रेगनेंसी से जुड़ा हो सकता है या नहीं।
ओव्यूलेशन के बाद | शरीर में क्या चल रहा है | लक्षण का क्या मतलब निकालें |
|---|---|---|
दिन 1 से 7 | कॉर्पस ल्यूटियम से प्रोजेस्टेरोन बन रहा है, hCG अभी बना ही नहीं | जो भी महसूस हो रहा है वह प्रोजेस्टेरोन का असर है, प्रेगनेंसी का नहीं |
दिन 8 से 10 | 84 प्रतिशत में इम्प्लांटेशन इन्हीं तीन दिनों में होता है, hCG बनना शुरू | हल्की स्पॉटिंग या ऐंठन हो सकती है, पर यही PMS में भी होती है |
दिन 11 से 14 | hCG बढ़ रहा है, पर अभी टेस्ट की सीमा के आसपास | ब्लड टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है, लक्षण अब भी दोनों में एक जैसे |
पीरियड की तारीख | लगभग 10 प्रतिशत में इम्प्लांटेशन अब भी नहीं हुआ होता | यूरिन टेस्ट भरोसेमंद है, पर नेगेटिव आखिरी जवाब नहीं |
तारीख के एक हफ्ते बाद | hCG काफी ऊपर, प्रेगनेंसी के अपने लक्षण शुरू | मतली और एरिओला का गहरा होना जैसे संकेत अब मायने रखते हैं |
PMS यानी प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम में पेट फूलना, स्तनों में भारीपन, सिरदर्द, मांसपेशियों या जोड़ों में दर्द, चिड़चिड़ापन, बिना वजह रोना और नींद का बिगड़ना आम लक्षण हैं।
ACOG के स्टैंडर्ड के अनुसार PMS को पहचानने में तीन बातें देखी जाती है।
अगर हर महीने पीरियड से पहले लगभग इसी समय वही लक्षण शुरू होते हैं और पीरियड आने पर कम हो जाते हैं, तो यह PMS का पैटर्न हो सकता है।
भारत में PMS बहुत कॉमन है। यहाँ हुई स्टडीज के एक मेटा-एनालिसिस में करीब 43% महिलाओं में PMS और करीब 8% में PMDD पाया गया है।
प्रेगनेंसी की शुरुआत में थकान, स्तनों में भारीपन, पेट फूलना और मूड में बदलाव जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। इनका बड़ा कारण प्रोजेस्टेरोन का बढ़ जाना है, जो PMS में भी बढ़ जाता है।
दोनों में अंतर यह है कि प्रेगनेंसी होने पर प्रोजेस्टेरोन का लेवल उतना ही बढ़ा हुआ बना रहता है। इसलिए ये लक्षण पीरियड की तारीख निकलने के बाद भी बने रह सकते हैं।
इम्प्लांटेशन के आसपास कुछ महिलाओं को हल्की स्पॉटिंग भी हो सकती है। यह आमतौर पर बहुत कम होती है और एक-दो दिन में रुक जाती है, जबकि पीरियड की ब्लीडिंग धीरे धीरे बढ़ती है।
गंध से उबकाई, खाने की पसंद बदलना और बार-बार पेशाब आना आमतौर पर पीरियड की तारीख निकलने के बाद के हफ्तों में शुरू होते हैं।
लक्षण | PMS में | प्रेगनेंसी में |
|---|---|---|
स्तनों में भारीपन और दर्द | पीरियड शुरू होते ही कम होने लगता है | तारीख के बाद भी बना रहता है, बल्कि बढ़ता है |
पेट के निचले हिस्से में ऐंठन | तारीख से एक-दो दिन पहले तेज होती है | हल्की और रुक-रुक कर, तेज दर्द सामान्य नहीं |
थकान | पीरियड शुरू होने के एक-दो दिन में ठीक | हफ्तों तक रहती है, दिन में भी नींद आती है |
मूड में उतार-चढ़ाव | होता है | होता है, इस लक्षण से फर्क नहीं निकलता |
ब्लीडिंग | पूरा फ्लो, तीन से पांच दिन, बीच में बढ़ता है | हल्की स्पॉटिंग, एक-दो दिन, बढ़ती नहीं |
मतली और उल्टी | बहुत कम | तारीख के बाद शुरू होकर नौवें हफ्ते तक बढ़ती है |
बार-बार पेशाब आना | नहीं | तारीख निकलने के बाद के हफ्तों में |
एरिओला का रंग गहरा होना | नहीं | कुछ हफ्तों में दिखने लगता है |
ऐसे कोई तीन लक्षण नहीं हैं जो सिर्फ प्रेगनेंसी में हों और PMS में कभी न दिखें। फिर भी कुछ बदलाव प्रेगनेंसी में ज्यादा देखने को मिलते हैं और उनकी टाइमिंग भी मायने रखती है।
एक मेडिकल रिव्यू के मुताबिक, करीब 75% प्रेगनेंसी में मतली और उल्टी हो सकती है। यह आखिरी पीरियड की तारीख से करीब चार हफ्ते के अंदर शुरू हो सकती है और नौवें हफ्ते के आसपास सबसे ज्यादा रहती है। यानी पीरियड मिस होने के आसपास होने वाली मतली प्रेगनेंसी में हो सकती है, लेकिन इससे अकेले प्रेगनेंसी की पुष्टि नहीं होती।
एरिओला यानी निप्पल के चारों ओर का हिस्सा प्रेगनेंसी में गहरा हो सकता है और उस पर छोटे-छोटे दाने भी उभर सकते हैं। ऐसा हॉर्मोन में हुए बदलावों के कारण होता है।
ओव्यूलेशन के बाद बेसल बॉडी टेम्परेचर थोड़ा बढ़ता है और पीरियड आने पर आमतौर पर नीचे आ जाता है। अगर आप रोज सुबह तापमान नोट करती हैं और पीरियड की तारीख निकलने के बाद भी यह बढ़ा हुआ बना रहता है, तो यह प्रेगनेंसी की संभावना की ओर इशारा कर सकता है। हालाँकि प्रेगनेंसी को कन्फर्म करने के लिए प्रेगनेंसी टेस्ट करना जरूरी है।
बहुत जल्दी प्रेगनेंसी टेस्ट करने पर नेगेटिव रिजल्ट आ सकता है। इम्प्लांटेशन के बाद hCG बनना शुरू होता है, लेकिन शुरुआत में इसका स्तर इतना कम होता है कि यूरिन टेस्ट में प्रेगनेंसी दिखाई नहीं देती। आमतौर पर इसके लिए hCG करीब 25 mIU/mL तक पहुंचना जरूरी होता है।
क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, ब्लड टेस्ट कंसेप्शन के करीब 7 से 10 दिन बाद hCG का पता लगा सकता है, जबकि यूरिन टेस्ट में थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है। इसलिए पीरियड की तारीख तक इंतजार करना बेहतर रहता है।
नेगेटिव रिजल्ट का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि प्रेगनेंसी नहीं है। JAMA की एक स्टडी में पाया गया कि पीरियड मिस होने के पहले दिन तक करीब 10% प्रेगनेंसी में इम्प्लांटेशन हुआ ही नहीं था। ऐसे में उस समय टेस्ट नेगेटिव आ सकता है।
इसलिए प्रेगनेंसी टेस्ट के लिए नीचे दिया गया पैटर्न फॉलो करना चाहिए।
PCOS, थायरॉइड में बदलाव, वजन में तेज बदलाव, तनाव और प्रोलैक्टिन बढ़ना भी पीरियड देर से आने की वजह हो सकते हैं। इनमें ओव्यूलेशन देर से हो सकता है या रुक सकता है।
IUI या IVF के बाद अक्सर प्रोजेस्टेरोन सपोर्ट दिया जाता है। इससे स्तनों में भारीपन, पेट फूलना, थकान और हल्की ऐंठन जैसे बदलाव हो सकते हैं। यही लक्षण प्रेगनेंसी में भी महसूस हो सकते हैं, इसलिए इस समय सिर्फ लक्षणों से अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।
अगर ट्रिगर इंजेक्शन में hCG दिया गया है, तो उसका असर कुछ दिनों तक शरीर में रह सकता है। ऐसे में बहुत जल्दी किया गया प्रेगनेंसी टेस्ट गलत तरीके से पॉजिटिव आ सकता है।
इसलिए ट्रीटमेंट के बाद डॉक्टर जिस तारीख को बीटा hCG ब्लड टेस्ट कराने के लिए कहें, उसी दिन टेस्ट कराना बेहतर है। उससे पहले घर पर बार-बार टेस्ट करने से रिजल्ट को समझना मुश्किल हो सकता है।
pms vs pregnancy symptoms लिस्ट से दोनों में फर्क करना मुश्किल है। ज्यादा भरोसेमंद तरीका है ओव्यूलेशन के बाद के दिनों को ध्यान से समझना।
ओव्यूलेशन के बाद शुरुआती दिनों में महसूस होने वाले बदलाव आमतौर पर प्रोजेस्टेरोन के असर से होते हैं। इम्प्लांटेशन के बाद hCG बढ़ना शुरू होता है और पीरियड की तारीख के आसपास यूरिन टेस्ट से प्रेगनेंसी का पता लगाया जा सकता है।
इसलिए हर लक्षण को प्रेगनेंसी का संकेत मानने के बजाय अपनी ओव्यूलेशन की तारीख से दिन गिनें। पीरियड की तारीख पर टेस्ट करें और नेगेटिव आने के बावजूद पीरियड न आए तो कुछ दिन बाद दोबारा टेस्ट करें। बार-बार नेगेटिव रिजल्ट और अनियमित पीरियड की स्थिति में ओव्यूलेशन की जांच जरूरी हो सकती है।