एस्ट्राडियोल (E2) एस्ट्रोजन हॉर्मोन का सबसे एक्टिव फॉर्म है। शरीर में तीन तरह के एस्ट्रोजन होते हैं, लेकिन प्रजनन उम्र यानी रिप्रोडक्टिव एज (reproductive age) में एस्ट्राडियोल सबसे ज्यादा और सबसे ताकतवर होता है।
यह हॉर्मोन अंडाशय यानी ओवरी (ovary) में बनता है। ओवरी में जो छोटे-छोटे फॉलिकल्स (follicles) होते हैं, उनके अंदर जब एग ग्रो करने लगता है तो फॉलिकल की दीवार से एस्ट्राडियोल रिलीज़ होता है। फॉलिकल जितना बड़ा होगा, उतना ज़्यादा एस्ट्राडियोल बनेगा।
इसका मतलब यह है कि ब्लड में एस्ट्राडियोल का लेवल सीधे बताता है कि ओवरी में एग्स कितने अच्छे से ग्रो कर रहे हैं। यही वजह है कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में estradiol test इतना जरूरी माना जाता है।
एस्ट्राडियोल सिर्फ़ एग ग्रोथ ही नहीं बताता। यह गर्भाशय यानी यूट्रस (uterus) की अंदरूनी परत यानी एंडोमेट्रियम (endometrium) को मोटा करने का काम भी करता है। जब एस्ट्राडियोल बढ़ता है, तो एंडोमेट्रियम की मोटाई भी बढ़ती है ताकि एम्ब्रीओ को इम्प्लांट होने के लिए सही जगह मिल सके।
एस्ट्राडियोल टेस्ट एक सिंपल ब्लड टेस्ट है। इसमें बांह की नस से ब्लड का सैंपल लिया जाता है और लैब में E2 का लेवल चेक किया जाता है। इस टेस्ट के लिए आपको खाली पेट होना जरूरी नहीं है।
लेकिन एस्ट्राडियोल टेस्ट को करवाने की टाइमिंग बहुत मायने रखती है। अगर बेसलाइन लेवल चेक करना है तो डॉक्टर पीरियड साइकल के Day 2 या Day 3 पर टेस्ट करवाते हैं क्योंकि इस समय E2 का लेवल सबसे कम होता है, इसलिए यही बेसलाइन माना जाता है।
अगर ओव्यूलेशन (ovulation) के आसपास टेस्ट करवाना हो तो Day 12 से Day 14 के बीच करवाया जाता है जब E2 अपने पीक पर होता है।
IVF ट्रीटमेंट में तो estradiol test कई बार करवाना पड़ता है। इस दौरान स्टिम्यूलेशन शुरू होने के बाद हर 2 से 3 दिन में ब्लड टेस्ट होता है जिससे डॉक्टर को यह पता रहता है कि दवाइयों का असर कैसा हो रहा है।
E2 का लेवल मेंस्ट्रुअल साइकल के अलग-अलग फेज में अलग होता है। एक तय नंबर को "नॉर्मल" कहना सही नहीं है क्योंकि यह इस पर निर्भर करता है कि टेस्ट साइकल के किस दिन किया गया।
पीरियड शुरू होने पर E2 सबसे कम होता है। इस समय ब्रेन में मौजूद पिट्यूटरी ग्लैंड (pituitary gland) FSH यानी फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन रिलीज़ करती है जो ओवरी को सिग्नल देता है कि नए फॉलिकल्स ग्रो करने शुरू करो।
जैसे-जैसे फॉलिकल्स बढ़ते हैं, वो एस्ट्राडियोल बनाने लगते हैं। एक हेल्दी ग्रोइंग फॉलिकल रोज़ाना करीब 200 pg/mL एस्ट्राडियोल बना सकता है। यही वजह है कि E2 का लेवल पीरियड्स के बीच में तेजी से बढ़ता है।
जब E2 एक निश्चित लेवल तक पहुँच जाता है, तो ब्रेन को सिग्नल जाता है कि एग मैच्योर हो गया है। इसके बाद LH सर्ज (LH surge) होता है और ओव्यूलेशन ट्रिगर होता है। ओव्यूलेशन के बाद E2 थोड़ा गिरता है लेकिन पूरी तरह कम नहीं होता।
प्रेगनेंसी होने पर E2 लगातार बढ़ता रहता है, लेकिन प्रेगनेंसी न होने पर E2 का लेवल गिरता है और पीरियड्स आ जाते हैं।
IVF में estradiol test का बहुत बड़ा रोल होता है। IVF स्टिम्यूलेशन में दवाइयों से एक साथ कई फॉलिकल्स ग्रो करवाए जाते हैं। हर फॉलिकल एस्ट्राडियोल बनाता है, इसलिए E2 का लेवल तेजी से बढ़ता है।
डॉक्टर E2 लेवल से अंदाज़ा लगाते हैं कि कितने फॉलिकल्स एक्टिवली ग्रो कर रहे हैं। अगर 10 फॉलिकल्स ग्रो हो रहे हैं तो E2 लेवल 2000 से 3000 pg/mL तक पहुँच सकता है।
अगर E2 बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जैसे 4000 pg/mL से ऊपर, तो ओवेरियन हाइपरस्टिम्यूलेशन सिंड्रोम यानी OHSS का रिस्क बढ़ जाता है। ऐसे में डॉक्टर दवाइयों की डोज़ कम कर सकते हैं या ट्रिगर शॉट का टाइम बदल सकते हैं।
अगर E2 बहुत धीमे बढ़ रहा है, तो इसका मतलब है कि फॉलिकल्स ठीक से रिस्पॉन्ड नहीं कर रहे। ऐसे में डॉक्टर दवाइयों की डोज़ बढ़ा सकते हैं।
एग रिट्रीवल (egg retrieval) का सही समय भी E2 लेवल और अल्ट्रासाउंड दोनों के अनुसार तय किया जाता है। आमतौर पर जब E2 सही रेंज में हो और फॉलिकल्स 17 से 18 mm के हो जाएँ, तब ट्रिगर शॉट दिया जाता है।
अगर बेसलाइन E2 बहुत कम है, 20 pg/mL से नीचे, तो ओवरी में फॉलिकल एक्टिविटी कम है। यह अर्ली मेनोपॉज़ या प्रीमैच्योर ओवेरियन इंसफिशिएंसी (premature ovarian insufficiency) का लक्षण हो सकता है।
IVF स्टिम्यूलेशन के दौरान अगर E2 अपेक्षा से कम बढ़ रहा है तो इसका मतलब है कि ओवरी दवाइयों पर ठीक से रिस्पॉन्ड नहीं कर रही। ऐसे केस में प्रोटोकॉल बदलने की ज़रूरत पड़ सकती है।
Day 3 पर अगर E2 80 pg/mL से ज़्यादा आ रहा है, तो यह ओवेरियन सिस्ट (ovarian cyst) या ओवेरियन रिज़र्व कम होने का लक्षण हो सकता है। कभी-कभी ओवरी में बचा हुआ फॉलिकल पिछले साइकल से एस्ट्राडियोल बना रहा होता है जिससे बेसलाइन लेवल ऊँचा दिखता है।
IVF में E2 का बहुत ज़्यादा बढ़ने से OHSS का रिस्क बढ़ जाता है। इस समय पेट में सूजन, दर्द, और साँस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण हो सकते हैं। इसीलिए डॉक्टर E2 को बड़ी सावधानी से मॉनिटर करते हैं।
Estradiol test की सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह टेस्ट सिर्फ़ एक नंबर नहीं बताता, बल्कि ओवरी में एग्स की ग्रोथ, एंडोमेट्रियम की तैयारी, और पूरे रिप्रोडक्टिव सिस्टम की हेल्थ के बारे में बताता है।
IVF में तो E2 मॉनिटरिंग दवाइयों की डोज़ तय करने और एग रिट्रीवल का सही समय तय करने के लिए बहुत ज़रूरी है। अगर आप फर्टिलिटी ट्रीटमेंट ले रहीं हैं या प्रेगनेंसी प्लान कर रहीं हैं, तो E2 लेवल का रिज़ल्ट समझना आपके लिए फ़ायदेमंद रहेगा।
नहीं, एस्ट्राडियोल टेस्ट के लिए फ़ास्टिंग की जरूरत नहीं है। आप कुछ भी खाकर टेस्ट करवा सकती हैं। हाँ, टाइमिंग जरूरी है, डॉक्टर जिस दिन बताएं उसी दिन टेस्ट कराएं।
एस्ट्रोजन एक ग्रुप है जिसमें तीन हॉर्मोन आते हैं, एस्ट्राडियोल (E2), एस्ट्रोन (E1), और एस्ट्रिओल (E3)। एस्ट्राडियोल इनमें सबसे एक्टिव और सबसे ज़रूरी है, ख़ासकर प्रजनन उम्र में।
IVF स्टिम्यूलेशन के दौरान हर मैच्योर फॉलिकल के लिए करीब 200 से 300 pg/mL E2 होने की उम्मीद की जाती है। अगर 10 फॉलिकल्स ग्रो हो रहे हैं तो E2 लेवल 2000 से 3000 pg/mL तक हो सकता है।
E2 कम होने का मतलब हमेशा इनफर्टिलिटी नहीं है। अगर ओव्यूलेशन हो रहा है और एग क्वालिटी अच्छी है तो प्रेगनेंसी हो सकती है। लेकिन लगातार कम E2 लेवल पर डॉक्टर से ज़रूर बात करनी चाहिए।
AMH टेस्ट ओवरी में बचे हुए कुल एग्स की संख्या बताता है, जबकि एस्ट्राडियोल टेस्ट बताता है कि अभी इस साइकल में फॉलिकल्स कैसे ग्रो कर रहे हैं। AMH साइकल के किसी भी दिन करवा सकते हैं, लेकिन E2 का टाइमिंग बहुत मायने रखती है।