शादी के एक साल बाद भी जब प्रेगनेंसी न हो, तो मन में सवाल आना लाज़मी है कि अब आगे क्या करें। Infertility treatment in Hindi में जानेंगे कि इनफर्टिलिटी का मतलब क्या है, इसको चेक करने के लिए डॉक्टर कौन-से टेस्ट करते हैं, और इसके ट्रीटमेंट में कौन सी दवाईयां दी जाती हैं। इसके आलावा यह भी समझेंगे कि आर्टिफिशियल रिप्रोडक्टिव ट्रीटमेंट जैसे IUI, IVF कब चुनने चाहिए और ये उपाय कैसे काम करते हैं। आपको यह समझना इसलिए जरुरी है क्योंकि हर कपल की कंडीशन अलग होती है, तो सही समय पर सही ट्रीटमेंट चुनना बहुत ज़रूरी होता है।
जब कोई कपल बिना किसी कॉन्ट्रासेप्शन (contraception) या प्रोटैक्शन के एक साल तक रेगुलर कोशिश करे और प्रेगनेंसी न हो, तो इसे infertility कहते हैं। इसमें भी अगर महिला की उम्र 35 साल से ज़्यादा है, तो 6 महीने की कोशिश के बाद ही डॉक्टर से मिलना चाहिए।
इनफर्टिलिटी सिर्फ महिला की समस्या नहीं है। संतान न होने के करीब 40 प्रतिशत केसों में पुरुष पार्टनर इसके लिए जिम्मेदार होते हैं, 40 प्रतिशत में महिला, और बाकी 20 प्रतिशत केसों में दोनों जिम्मेदार होते हैं या इनफर्टिलिटी का कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता। इसलिए infertility treatment शुरू करने से पहले दोनों पार्टनर की जांच होती है।
एक ग़लतफ़हमी यह है कि इनफर्टिलिटी है तो बच्चा कभी नहीं हो सकता। सही गाइडेंस और ट्रीटमेंट से संतान प्राप्ति हो सकती है।
ट्रीटमेंट शुरू करने से पहले डॉक्टर कुछ बेसिक टेस्ट करवाते हैं ताकि पता चले कि समस्या कहां है।
महिला के लिए हॉर्मोन प्रोफाइल (hormone profile) चेक किया जाता है जिसमें FSH, LH, AMH, और थाइरॉइड शामिल हैं। AMH टेस्ट से ओवरी में एग्स का रिज़र्व पता चलता है। अल्ट्रासाउंड से ओवरी और यूट्रस (uterus) की कंडीशन देखी जाती है। HSG टेस्ट यानी हिस्टेरोसैल्पिंगोग्राफी (hysterosalpingography) से फैलोपियन ट्यूब खुली है या बंद, यह चेक होता है।
पुरुष पार्टनर का सीमेन एनालिसिस (semen analysis) होता है जिसमें स्पर्म की संख्या, गति, और आकार चेक किया जाता है। कई बार सिर्फ इन टेस्ट से ही समस्या का कारण पता चल जाता है और infertility treatment की डायरेक्शन तय हो जाती है।
अगर ओव्यूलेशन (ovulation) में दिक्कत है, तो सबसे पहले दवाओं से इलाज शुरू किया जाता है। ओव्यूलेशन का मतलब है ओवरी से एग का निकलना, और अगर यह प्रोसेस सही से नहीं हो रहा तो फिर प्रेग्नेंट होना मुश्किल है।
क्लोमिफीन सिट्रेट (clomiphene citrate) सबसे कॉमन दवाई है जो ओवरी को एग बनाने के लिए स्टिमुलेट करती है। यह पीरियड्स के 2 से 5 दिन से शुरू होती है और 5 दिन तक ली जाती है। इसके बाद अल्ट्रासाउंड से एग की ग्रोथ मॉनिटर की जाती है।
अगर क्लोमिफीन से रिज़ल्ट नहीं आता, तो लेट्रोज़ोल (letrozole) या गोनैडोट्रोपिन (gonadotropin) इंजेक्शन दिए जा सकते हैं। PCOS वाली महिलाओं में ये दवाएं अच्छा काम करती हैं।
दवाओं से infertility treatment तब सबसे असरदार होता है जब बाकी सब नॉर्मल हो, बस ओव्यूलेशन में प्रॉब्लम हो।
जब सिर्फ दवाओं से प्रेगनेंसी नहीं हो पाती, तो डॉक्टर IUI यानी इंट्रायूटेराइन इन्सेमिनेशन (intrauterine insemination) की सलाह देते हैं। इसमें स्पर्म को लैब में प्रोसेस करके सीधे यूट्रस में डाल दिया जाता है।
IUI तब सबसे अच्छा काम करता है जब स्पर्म की संख्या या गति थोड़ी कम हो, सर्विक्स (cervix) में कोई दिक्कत हो, या ओव्यूलेशन में हल्की समस्या हो। लेकिन IUI तभी होगा जब कम से कम एक फैलोपियन ट्यूब खुली हो।
IUI की सक्सेस रेट हर साइकल में 10 से 20 प्रतिशत होती है। पूरी प्रक्रिया क्लिनिक में 10 से 15 मिनट में हो जाती है और आप उसी दिन घर जा सकती हैं। आमतौर पर 3 से 4 साइकल ट्राई करने के बाद, अगर सफलता न मिले, तो IVF ट्रीटमेंट पर विचार करना चाहिए।
IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (in vitro fertilization) एक एडवांस infertility treatment है जिसमें एग और स्पर्म को शरीर के बाहर लैब में मिलाया जाता है। जब भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) बन जाता है, तो उसे यूट्रस में ट्रांसफर किया जाता है।
IVF की ज़रूरत तब पड़ती है:
38 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं को भी डॉक्टर अक्सर सीधे IVF की सलाह देते हैं क्योंकि उम्र के साथ एग की क्वालिटी तेज़ी से कम होती है।
IVF में सबसे पहले 10 से 12 दिन तक इंजेक्शन से ओवरी में कई एग्स तैयार किए जाते हैं। फिर एग रिट्रीवल (egg retrieval) होती है, लैब में स्पर्म से मिलाया जाता है, और 3 से 5 दिन बाद एम्ब्रीओ यूट्रस में ट्रांसफर किया जाता है।
IVF की सक्सेस रेट 40 से 55 प्रतिशत प्रति साइकल होती है, जो IUI से काफी ज़्यादा है। PGT (प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग) से भ्रूण की जेनेटिक जांच भी हो सकती है, जो बार बार मिसकैरेज (miscarriage) वाले कपल्स के लिए बहुत फायदेमंद है।
कुछ मामलों में infertility treatment में सर्जरी भी ज़रूरी हो जाती है। जैसे:
इन कंडीशन में लैप्रोस्कोपी (laparoscopy) या हिस्टेरोस्कोपी (hysteroscopy) से इलाज किया जाता है।
लैप्रोस्कोपी एक मिनिमल इनवेसिव सर्जरी है जिसमें पेट पर छोटे कट लगाकर कैमरा और उपकरण डाले जाते हैं। इससे एंडोमेट्रियोसिस, सिस्ट, या ट्यूब की समस्या का इलाज होता है। हिस्टेरोस्कोपी से यूट्रस के अंदर की समस्या, जैसे पॉलिप (polyp) या सेप्टम (septum), ठीक की जाती है।
सर्जरी के बाद कई महिलाओं को नैचुरल प्रेगनेंसी हो जाती है, या IUI और IVF की सक्सेस रेट बढ़ जाती है।
उम्र infertility treatment की सफलता में सबसे बड़ा फैक्टर है।
पुरुष में भी उम्र का असर होता है, हालांकि महिलाओं जितना नहीं। 45 की उम्र के बाद स्पर्म की क्वालिटी कम होने लगती है।
इसीलिए डॉक्टर कहते हैं कि अगर प्रेगनेंसी नहीं हो रही तो इंतज़ार न करें। जितनी जल्दी सही ट्रीटमेंट शुरू हो, उतनी ज्यादा संभावना होती है।
कई बार लोग ट्रीटमेंट के बारे में फैसला लेने में सालों निकाल देते हैं, जिससे प्रेगनेंसी का सबसे अच्छा वक्त निकल जाता है।
Infertility treatment में सबसे पहले सही जांच होती है, फिर समस्या के हिसाब से इलाज तय किया जाता है। किसी को सिर्फ दवाओं से मदद मिल जाती है, किसी को IUI की ज़रूरत पड़ती है, और कुछ मामलों में IVF ही सबसे बढ़िया रास्ता होता है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि समय पर डॉक्टर से मिलें, सभी टेस्ट करवाएं, और अपनी उम्र और स्थिति के हिसाब से सही ट्रीटमेंट प्लान बनाएं।