सारांश (Overview)
एस्ट्रोजन को अक्सर सिर्फ पीरियड्स से जोड़कर देखा जाता है, जबकि इसका काम इससे कहीं ज्यादा है। यह हार्मोन हड्डियों, त्वचा, नींद, मूड और दिल की सेहत पर भी असर डालता है। इसलिए जब एस्ट्रोजन का स्तर गड़बड़ाता है, तो इसके लक्षण सिर्फ पीरियड्स में नहीं, बल्कि पूरे शरीर में दिखाई दे सकते हैं। एक और जरूरी बात यह है कि एस्ट्रोजन का स्तर पूरे महीने एक जैसा नहीं रहता। यह मासिक चक्र के दौरान बदलता है, प्रेगनेंसी में बढ़ता है और मेनोपॉज के बाद कम हो जाता है। इसलिए सिर्फ एक रिपोर्ट का नंबर देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि एस्ट्रोजन का स्तर सही है या नहीं। इसे उम्र और चक्र के दिन के साथ देखकर समझना जरूरी है। आगे जानेंगे कि एस्ट्रोजन कहां बनता है, क्या काम करता है और इसकी कमी या अधिकता से क्या होता है।
एस्ट्रोजन सिर्फ एक हार्मोन नहीं है, बल्कि यह हार्मोन का एक समूह है। इसे महिलाओं का मुख्य सेक्स हार्मोन माना जाता है, लेकिन पुरुषों के शरीर में भी यह कम मात्रा में मौजूद होता है और कई जरूरी काम करता है।
एस्ट्रोजन के तीन मुख्य रूप होते हैं। इन तीनों का काम भी अलग-अलग होता है और जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर इनकी भूमिका बदलती रहती है।
एस्ट्रोजन का रूप | कब सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है |
|---|---|
एस्ट्राडियोल (E2) | प्रजनन आयु में, यही सबसे ताकतवर रूप है |
एस्ट्रोन (E1) | मेनोपॉज के बाद, यह सबसे कमजोर रूप है |
एस्ट्रिओल (E3) | प्रेगनेंसी के दौरान |
मेनोपॉज के बाद शरीर का मुख्य एस्ट्रोजन एस्ट्राडियोल से बदलकर एस्ट्रोन हो जाता है, और यही वजह है कि उस दौर में लक्षण बदलने लगते हैं।
इसका सबसे जाना-पहचाना काम प्रजनन तंत्र से जुड़ा है, लेकिन असर इससे कहीं आगे तक जाता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि यह हार्मोन अकेले काम नहीं करता। प्रोजेस्टेरोन के साथ इसका संतुलन ही पीरियड्स को नियमित रखता है, इसीलिए किसी एक हॉर्मोन का बढ़ना या घटना दूसरे के असर को भी बदल देता है।
प्रेगनेंसी से पहले यानी प्रजनन आयु में एस्ट्रोजन का सबसे बड़ा हिस्सा ओवरी में बनता है। इसके अलावा एड्रिनल ग्लैंड और शरीर का फैट टिश्यू भी एस्ट्रोजन बनाता है। प्रेगनेंसी के दौरान प्लेसेंटा भी इसे बनाता है।
शरीर में फैट जितना ज्यादा होगा, उससे बनने वाला एस्ट्रोजन भी उतना ज्यादा हो सकता है। इसलिए वजन बढ़ने से हार्मोन का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
मेनोपॉज के बाद ओवरी का काम कम हो जाता है। इस दौरान एस्ट्रोन मुख्य एस्ट्रोजन होता है, जो ज्यादातर फैट टिश्यू और एड्रिनल ग्लैंड से बनता है।
एस्ट्रोजन का लेवल जीवनभर एक जैसा नहीं रहता। उम्र और प्रेगनेंसी जैसे अलग-अलग पड़ाव पर इसमें बदलाव होते रहते हैं।
किशोरावस्था में एस्ट्रोजन का स्तर तेजी से बढ़ता है। इसी वजह से पीरियड्स शुरू होते हैं और शरीर में इस उम्र के सामान्य बदलाव आने लगते हैं। शुरुआती एक-दो साल पीरियड्स अनियमित रहना भी आम है।
पीरियड्स खत्म होने के बाद एस्ट्रोजन बढ़ने लगता है और ओव्यूलेशन से ठीक पहले सबसे ज्यादा होता है। इसके बाद इसका स्तर कम होता है और प्रोजेस्टेरोन का असर बढ़ने लगता है। इसलिए पूरे महीने एस्ट्रोजन का स्तर बदलता रहता है और जांच का दिन भी मायने रखता है।
प्रेगनेंसी में एस्ट्रोजन का स्तर काफी बढ़ जाता है, क्योंकि प्लेसेंटा भी इसे बनाने लगता है। यह प्रेगनेंसी को सपोर्ट करने में मदद करता है।
मेनोपॉज में ओवरी का काम धीरे-धीरे कम होने लगता है और एस्ट्रोजन का स्तर गिरता है। इसी वजह से हॉट फ्लैश और वेजाइनल ड्राइनेस जैसे लक्षण हो सकते हैं। यह बदलाव मेनोपॉज से कई साल पहले शुरू हो सकता है, जिसे पेरिमेनोपॉज कहते हैं।
एस्ट्रोजन की कमी के लक्षण सिर्फ पीरियड्स तक सीमित नहीं रहते, इसीलिए इन्हें पहचानने में देर हो जाती है।
एस्ट्रोजन लेवल का जरूरत से ज्यादा होना भी उतना ही परेशान करता है जितना की उसका बढ़ा हुआ लेवल, खासकर जब प्रोजेस्टेरोन उसके मुकाबले कम रह जाए।
यह नॉर्मल ब्लड टेस्ट के ज़रिये होता है, जिसमें आमतौर पर एस्ट्राडियोल यानी E2 का स्तर देखा जाता है। इसमें बांह की नस से सैंपल लिया जाता है और इसके लिए खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती।
सबसे जरूरी बात जांच के दिन की है। चूंकि एस्ट्रोजन हॉर्मोन का लेवल पूरे मेंस्ट्रुअल साइकिल में में बदलता रहता है, इसलिए डॉक्टर अक्सर साइकिल का कोई खास दिन बताकर जांच करवाते हैं। फर्टिलिटी से जुड़ी जांच में यह अक्सर पीरियड्स के दूसरे या तीसरे दिन करवाई जाती है, ताकि बेसलाइन लेवल का पता चल सके।
इसी वजह से रिपोर्ट के साथ जांच की तारीख, आपकी उम्र, चक्र का दिन और कोई भी हार्मोन वाली दवा की जानकारी देना जरूरी होता है।
PCOS, थायरॉइड की गड़बड़ी और प्रोलैक्टिन का बढ़ा हुआ लेवल, ये सब एस्ट्रोजन हॉर्मोन के संतुलन को प्रभावित करते हैं। बहुत ज्यादा वजन बढ़ना या बहुत कम वजन होना भी इसी केटेगरी में आता है, क्योंकि दोनों सिचुएशन में हार्मोन का पैटर्न बदल जाता है।
उम्र के साथ ओवरी का काम कम होना सबसे आम और सामान्य कारण है। लेकिन कुछ महिलाओं में यह 40 साल की उम्र से पहले ही हो जाता है, जिसे प्राइमरी ओवेरियन इनसफिशिएंसी कहते हैं, और इसमें पीरियड्स अनियमित होने के साथ कंसीव करने में भी दिक्कत आती है।
ओवरी निकाल देने, कीमोथेरेपी या रेडिएशन, और कुछ खास दवाओं की वजह से एस्ट्रोजन का लेवल घट सकता है। लिवर से जुड़ी बीमारियां भी एस्ट्रोजन लेवल पर असर डालती हैं, क्योंकि शरीर से अतिरिक्त एस्ट्रोजन बाहर निकालने का काम लिवर ही करता है।
अगर एस्ट्रोजन की कमी ज्यादा है, तो डॉक्टर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी यानी HRT की सलाह दे सकते हैं, जो मेनोपॉज से जुड़े लक्षणों और हड्डियों की कमजोरी में दी जाती है।
कंसीव करने के लिए एस्ट्रोजन का काम दो हिस्सों में बंटा है। पहला, यह फॉलिकल को बढ़ने और एग को परिपक्व होने में मदद करता है। दूसरा, यह एंडोमेट्रियम को मोटा करता है ताकि एम्ब्रियो उसमें टिक सके।
फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में इसी वजह से एस्ट्राडियोल का लेवल बार बार देखा जाता है। स्टिमुलेशन के दौरान यह डॉक्टर को यह समझने में मदद करता है कि ओवरी दवाओं पर कैसी प्रतिक्रिया दे रही है, और इसी के साथ अल्ट्रासाउंड से फॉलिकल की गिनती भी की जाती है।
प्रेगनेंसी ठहरने के बाद इसका लेवल बढ़ता जाता है और प्लेसेंटा इसे बनाने लगता है। एस्ट्रोजन का यही बढ़ा हुआ लेवल गर्भाशय यानी यूट्रस में खून का बहाव बनाए रखता है।
अगर पीरियड्स लगातार अनियमित हैं, तीन महीने से ज्यादा समय से नहीं आए हैं या ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हो रही है, तो जांच करवाना जरूरी है।
40 साल की उम्र से पहले हॉट फ्लैश या वेजाइनल ड्राइनेस जैसे लक्षण दिखें, तो इन्हें नजरअंदाज न करें, क्योंकि ये ओवरी के जल्दी कमजोर होने का संकेत हो सकते हैं।
अगर एक साल से कंसीव करने की कोशिश कर रही हैं और सफलता नहीं मिल रही है, तो फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें। इस दौरान हार्मोन का पैटर्न भी जांचा जाता है। सबसे जरूरी बात, इंटरनेट पर पढ़कर या किसी और को दी गई हार्मोन की दवा खुद से शुरू न करें।
एस्ट्रोजन हार्मोन का एक समूह है, जो पीरियड्स और ओव्यूलेशन के साथ हड्डियों, त्वचा, नींद और मूड को भी प्रभावित करता है। इसका स्तर उम्र, मासिक चक्र, प्रेगनेंसी और मेनोपॉज के दौरान बदलता रहता है। इसकी कमी से हॉट फ्लैश, वेजाइनल ड्राइनेस और अनियमित पीरियड्स हो सकते हैं, जबकि अधिकता में ज्यादा ब्लीडिंग और मूड में बदलाव दिख सकते हैं। अगर लक्षण बने रहें, तो खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से जांच करवाएं।