सारांश (Overview)
कंसीव करने की कोशिश में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि सही समय कौन सा है। कैलेंडर से 14वां दिन गिन लेना या ऐप के अनुमान पर भरोसा करना ज्यादातर महिलाओं में सही नहीं बैठता, क्योंकि मेंस्ट्रुअल साइकिल की लंबाई बदलने पर ओव्यूलेशन का दिन भी बदल जाता है।
फॉलिक्युलर स्टडी इसी अंदाजे को हटाकर आंखों से देखी गई तस्वीर सामने रखती है। इसमें अल्ट्रासाउंड की एक के बाद एक कई जांचें करके यह देखा जाता है कि फॉलिकल कितना बढ़ा, कितनी तेजी से बढ़ रहा है, और सबसे जरूरी, वह फटा या नहीं।
फॉलिक्युलर स्टडी को समझने के लिए यही सबसे जरुरी बात है, क्योंकि फॉलिकल का बड़ा होना अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि ओव्यूलेशन हुआ ही है। आगे हम देखेंगे कि यह जांच कैसे होती है, कब शुरू होती है, रिपोर्ट में क्या लिखा होता है, और इसके बाद इलाज किस दिशा में जाता है।
यह एक ही मेंस्ट्रुअल साइकिल में कुछ कुछ दिन के अंतर पर किए जाने वाले अल्ट्रासाउंड की एक सीरीज है, जिससे ओवरी में फॉलिकल की ग्रोथ देखी जाती है और यह अंदाजा लगाया जाता है कि ओव्यूलेशन हुआ या नहीं। इसे फॉलिकुलोमेट्री भी कहा जाता है।
फॉलिकल ओवरी में मौजूद वह छोटी थैली है जिसके अंदर एग बढ़ता है। हर महीने कई फॉलिकल बढ़ना शुरू करते हैं, पर आमतौर पर एक ही आगे निकलता है, जिसे डोमिनेंट फॉलिकल कहते हैं, और वही फटकर एग रिलीज करता है।
स्कैन से पता चलता है कि फॉलिकल किस दिन मैच्योर यानी मैच्योर हुआ और फटा या नहीं, जिससे ओव्यूलेशन की पुष्टि हो जाती है।
ओव्यूलेशन का समय पता चलने पर डॉक्टर बता सकते हैं कि किन दिनों में शारीरिक संबंध बनाने से गर्भधारण की संभावना सबसे ज्यादा रहेगी।
पीरियड्स अनियमित हों, तो यह जांच बताती है कि ओव्यूलेशन हो भी रहा है या नहीं, और हो रहा है तो कब।
IUI और IVF में दवाओं की खुराक और ट्रिगर का समय इसी स्कैन से तय होता है, इसलिए इन साइकिल में स्कैन ज्यादा बार होते हैं।
फॉलिक्युलर स्टडी एक ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड के माध्यम से की जाती है, जो OPD में ही हो जाता है और इसमें आमतौर पर 10 से 15 मिनट लगते हैं। यह अल्ट्रासाउंड आसानी से हो जाता है और इसमें कोई दर्द नहीं होता है। इसके अलावा इसका कोई साइड इफेक्ट रिपोर्ट नहीं किया गया है।
हर विजिट पर तीन चीजें देखी जाती हैं, फॉलिकल का आकार, एंडोमेट्रियम यानी गर्भाशय की परत की मोटाई, और आखिरी स्कैन में यह कि फॉलिकल फटा या नहीं। खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती, बस यूरिन ब्लैडर खाली रखने को कहा जाता है।
शुरुआत का दिन इस बात पर निर्भर करता है कि साइकिल नेचुरल है या दवाओं से शुरू की गयी है। ISUOG के अनुसार नेचुरल या IUI साइकिल में यह आमतौर पर नौवें से दसवें दिन शुरू होती है, जबकि IVF साइकिल में पांचवें से छठे दिन शुरू होती है।
इसके बाद हर एक से तीन दिन में स्कैन दोहराया जाता है, और फॉलिकल 14 mm तक पहुंचने पर रोज भी करना पड़ सकता है। पूरी जांच आमतौर पर एक हफ्ते के आसपास चलती है, साइकिल लंबी हो तो ज्यादा भी।
साइकिल का प्रकार | पहली स्कैन कब | कितनी बार |
|---|---|---|
नेचुरल साइकिल | दिन 9 से 10 | हर 1 से 3 दिन में |
IUI साइकिल | दिन 9 से 10 | हर 1 से 3 दिन में |
IVF साइकिल | दिन 5 से 6 | ज्यादा बार, दवा के असर के हिसाब से |
फॉलिकल 14 mm से ऊपर | रोज या एक दिन छोड़कर | मैच्योर होने तक |
रिपोर्ट में फॉलिकल का आकार मिलीमीटर में लिखा होता है, और यह भी कि वह किस ओवरी में है। नॉर्मल साइकिल में डोमिनेंट फॉलिकल रोज करीब 1 से 2 mm बढ़ता है।
दूसरी चीज एंडोमेट्रियम की मोटाई होती है, क्योंकि एग रिलीज होने के साथ परत का भी तैयार होना जरूरी है। फर्टिलिटी में 7 mm से पतली परत के साथ इम्प्लांटेशन और प्रेग्नेंसी की दर कम देखी गई है।
तीसरी और सबसे अहम बात आखिरी स्कैन में होती है। फॉलिकल का सिकुड़ जाना और पेल्विस में थोड़ा तरल दिखना बताता है कि वह फट चुका है, यानी ओव्यूलेशन हो गया।
सामान्य रिपोर्ट में तीन बातें मिलती हैं, फॉलिकल का ठीक रफ्तार से बढ़ना, मैच्योर आकार तक पहुंचना और फट जाना। ओव्यूलेशन आमतौर पर तब होता है जब डोमिनेंट फॉलिकल 18 से 22 mm का हो।
क्या देखा जाता है | सामान्य तौर पर |
|---|---|
रोज की ग्रोथ | करीब 1 से 2 mm |
मैच्योर फॉलिकल का आकार | 18 से 22 mm |
एंडोमेट्रियम की मोटाई | ओव्यूलेशन के आसपास आमतौर पर 7 mm से ज्यादा |
ओव्यूलेशन की पुष्टि | फॉलिकल का फटना और पेल्विक फ्लूइड दिखना |
ध्यान रहे कि, फॉलिकल का आकार अकेले सब तय नहीं करता। स्टडीज़ में 16 से 22 mm के फॉलिकल से मैच्योर एग मिले हैं, जबकि 22 mm से बड़े फॉलिकल में अक्सर एग जरूरत से ज्यादा पक चुका होता है।
FSH और LH का संतुलन बिगड़ने पर फॉलिकल बढ़ना शुरू तो होता है, पर मैच्योर नहीं हो पाता। थायरॉइड की गड़बड़ी और बढ़ा हुआ प्रोलैक्टिन भी यही असर डालते हैं।
इसमें ओवरी में छोटे-छोटे कई फॉलिकल दिखते हैं, लेकिन उनमें से कोई डोमिनेंट फॉलिकल बनकर आगे नहीं बढ़ता। यही वजह है कि PCOS में पीरियड्स अनियमित रहते हैं और ओव्यूलेशन हर महीने नहीं होता।
ओवेरियन रिजर्व कम होना, वजन का बहुत ज्यादा या बहुत कम होना और कुछ दवाएं भी फॉलिकल की बढ़त पर असर डालती हैं। कई बार फॉलिकल मैच्योर होकर भी नहीं फटता, जिसे LUF सिंड्रोम कहते हैं, और यह सिर्फ इसी जांच में पकड़ में आता है।
ग्रोथ और ओव्यूलेशन दोनों सामान्य हों, तो डॉक्टर कपल को फर्टाइल दिन बताते हैं और नेचुरल तरीके से कोशिश जारी रखने की सलाह देते हैं।
फॉलिकल बढ़ ही नहीं रहा या फट नहीं रहा, तो ओव्यूलेशन इंडक्शन की दवाएं शुरू की जाती हैं और अगली साइकिल में दोबारा स्कैन से असर देखा जाता है। बार बार नतीजा न मिलने पर डॉक्टर IUI या IVF की सलाह देते हैं।
अगर आप एक साल से कोशिश कर रही हैं और प्रेगनेंसी नहीं ठहर रही, तो जांच शुरू करवाने का समय आ गया है। उम्र 35 वर्ष से ज्यादा हो तो यह सिर्फ छह महीने ही इंतजार करें।
इसके अलावा पीरियड्स का बहुत अनियमित होना, तीन महीने से ज्यादा न आना, या PCOS और थायरॉइड जैसी कंडीशन पहले से पता होना भी डॉक्टर से मिलने की वजह हैं।
फॉलिक्युलर स्टडी एक ही साइकिल में बार-बार किए जाने वाले अल्ट्रासाउंड की सीरीज है, जिससे फॉलिकल की ग्रोथ और ओव्यूलेशन का पता चलता है। नेचुरल और आईयूआई साइकिल में यह आमतौर पर 9वें से 10वें दिन, जबकि आईवीएफ में 5वें से 6वें दिन शुरू होती है। फॉलिकल रोज करीब 1 से 2 एमएम बढ़ता है और 18 से 22 एमएम पर मैच्योर होकर फट सकता है। रिपोर्ट में फॉलिकल का आकार, एंडोमेट्रियम की मोटाई और फॉलिकल के फटने की जानकारी देखी जाती है। ग्रोथ न होने या फॉलिकल के न फटने पर आगे का इलाज तय किया जाता है।