जब कोई कपल IVF के बारे में सोचता है, तो पहला सवाल यही होता है कि इसमें सफलता के चांसेस कितने हैं। यह सवाल बिल्कुल सही है। IVF एक बड़ा आर्थिक, शारीरिक और इमोशनल कमिटमेंट है, इसलिए सही उम्मीद रखना ज़रूरी है। सच यह है कि IVF success rate कोई फिक्स्ड नंबर नहीं है। यह उम्र, हेल्थ, क्लिनिक की एक्सपर्टीज़, और कई दूसरे फैक्टर्स पर निर्भर करती है। ivf success rate in hindi आर्टिकल में IVF के द्वारा संतान प्राप्त करने के कितने चांस होते हैं इस बात की प्रैक्टिकल जानकारी दी जाएगी ताकि आप सही फैसला ले सकें।
IVF की सक्सेस रेट का मतलब है कि एक साइकल में प्रेगनेंसी होने या बच्चा पैदा होने का चांस कितना है। लेकिन इसे समझने के लिए एक बात साफ़ करना ज़रूरी है कि सक्सेस का मतलब हर जगह एक जैसा नहीं होता।
इसे आमतौर पर दो तरीकों से मापा जाता है। पहला होता है प्रति साइकल, यानी एक बार एम्ब्रीओ ट्रांसफर में प्रेगनेंसी होने का चांस कितना है। दूसरा होता है क्यूमुलेटिव, यानी अगर आप 2 से 3 साइकल करते हैं तो कुल मिलाकर सफलता की संभावना कितनी हो जाती है।
एक और ज़रूरी फर्क यहाँ समझना चाहिए। प्रेगनेंसी रेट का मतलब है कि टेस्ट पॉज़िटिव आया, जबकि लाइव बर्थ रेट का मतलब है कि बच्चा सुरक्षित जन्मा। कई बार क्लिनिक प्रेगनेंसी रेट बताते हैं, जो सुनने में ज़्यादा लगता है, लेकिन असली महत्त्व लाइव बर्थ रेट का होता है।
IVF में सबसे बड़ा फैक्टर महिला की उम्र है, क्योंकि इसका सीधा कनेक्शन एग की क्वालिटी से है। एक महिला जन्म से ही सारे एग्स लेकर पैदा होती है। उम्र बढ़ने के साथ एग्स की संख्या और क्वालिटी दोनों कम होती जाती हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उम्र के साथ एग्स में क्रोमोसोमल (chromosomal) एबनॉर्मेलिटीज़ बढ़ जाती हैं। इम्प्लांटेशन (implantation) के चांसेस कम होते हैं, और मिसकैरेज (miscarriage) का रिस्क बढ़ जाता है।
उम्र बढ़ने के साथ पुरुष की फर्टिलिटी भी प्रभावित होती है, लेकिन उतनी तेज़ी से इस पर असर नहीं पड़ता। इसलिए IVF ट्रीटमेंट करवाने का फैसला लेने में देर न करें, क्योंकि जितनी जल्दी ट्रीटमेंट शुरू होगा सक्सेस के चांसेस होंगे।
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IVF में पहली कोशिश में सफलता न मिलना बहुत कॉमन होता है। इसका मतलब यह नहीं कि अब कभी प्रेगनेंसी नहीं होगी। असल में, बहुत सारे कपल को दूसरी या तीसरी कोशिश में ही सफलता मिलती है।
जब पहला साइकल फेल होता है, तो डॉक्टर केस रिव्यू करते हैं। वे देखते हैं कि एग्स कम मिले या फर्टिलाइज़ेशन (fertilization) में दिक्कत थी, एम्ब्रीओ (embryo) की क्वालिटी कैसी थी, या इम्प्लांटेशन फेल हुआ।
इन सवालों के बेसिस पर अगले साइकल की स्ट्रैटेजी बनाई जाती है। कई बार प्रोटोकॉल (protocol) बदला जाता है या PGT यानी प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (Preimplantation Genetic Testing) जैसे टेस्ट की सलाह दी जाती है।
भावनात्मक रूप से भी, पहली साइकल फ़ेल होने के बाद कुछ टाइम का ब्रेक लेना ज़रूरी है। काउंसलिंग या सपोर्ट ग्रुप से मदद लेना भी अच्छा रहता है।
कई कपल को सुनकर हैरानी होती है कि IVF में 2 या 3 साइकल लग सकती हैं। इसके कुछ बायोलॉजिकल कारण होते हैं।
क्यूमुलेटिव success rate के हिसाब से, 35 साल से कम उम्र की महिलाओं में 2 से 3 साइकल के बाद सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसलिए IVF शुरू करते समय मानसिक और आर्थिक रूप से एक से ज़्यादा कोशिशों के लिए तैयार रहना ज़रूरी होता है।
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कुछ फैक्टर्स आपके कंट्रोल में नहीं हैं लेकिन बहुत कुछ आप खुद कर सकती हैं।
सबसे ज़रूरी बात, डॉक्टर की हर सलाह को सही तरीके से फॉलो करें, दवाइयाँ समय पर लें और कोई भी अपॉइंटमेंट मिस न करें, क्योंकि IVF में टाइमिंग बहुत मायने रखती है।
IVF Success rate कई फ़ैक्टर्स पर निर्भर करती है। जैसे आपकी उम्र, एग और स्पर्म की क्वालिटी, एम्ब्रीओ की क्वालिटी, और यूट्रस की कंडीशन इत्यादि के आधार पर सक्सेस रेट तय होती है। इसलिए दो अलग महिलाओं या कपल्स में रिज़ल्ट अलग हो सकते हैं।
उम्र सबसे बड़ा फैक्टर है, लेकिन लाइफस्टाइल, हेल्थ, और सही मेडिकल केयर भी काफ़ी महत्वपूर्ण होते हैं। सही उम्मीद के साथ ट्रीटमेंट शुरू करें। सही प्लानिंग और सपोर्ट के साथ सफलता के चांसेस काफ़ी बढ़ जाते हैं।
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