सरोगेसी क्या है (Surrogacy Meaning in Hindi): प्रक्रिया, नियम और ख़र्च की सच्चाई

Last updated: September 03, 2026

Overview

इस ब्लॉग में सरोगेसी का मतलब, भारत में लागू मौजूदा सरोगेसी कानून, इच्छुक माता-पिता और सरोगेट माँ की पात्रता, जरूरी दस्तावेज़ और कानूनी प्रक्रिया को आसान भाषा में समझाया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि भारत में कमर्शियल सरोगेसी प्रतिबंधित है और सरोगेट माँ को भुगतान नहीं किया जा सकता। साथ ही, IVF प्रक्रिया, सरोगेसी से जुड़े मेडिकल खर्च, डोनर गैमीट के 2024 के नियम और सरोगेसी को कब विकल्प माना जाता है, इसकी जानकारी दी गई है।

परिचय

सरोगेसी को लेकर भारत में सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी एक ही है - और वो पैसे से जुड़ी है।

बहुत से लोग आज भी सोचते हैं कि सरोगेसी का मतलब है किसी महिला को पैसे देकर अपना बच्चा जन्म करवाना, जैसा फ़िल्मों में या पुरानी ख़बरों में दिखता था। पर 2021-22 में भारत का कानून पूरी तरह बदल चुका है, और अब ये तस्वीर सिर्फ़ पुरानी नहीं, बल्कि अवैध है।

इसीलिए अगर आप "सरोगेसी का ख़र्चा" खोजते हुए यहाँ आई हैं, तो सबसे ज़रूरी बात यही है - भारत में अब सरोगेट माँ को पैसे देना कानूनन मना है। ख़र्च का पूरा मतलब बदल चुका है, और वो कैसे, ये आगे विस्तार से समझेंगे।

पहले बुनियाद से शुरू करते हैं।

सरोगेसी का मतलब क्या होता है

सरोगेसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक महिला किसी दूसरे दंपति (या व्यक्ति) के लिए बच्चा अपने गर्भ में पालती है और जन्म देती है। जन्म के बाद वो बच्चा उन्हीं "इच्छुक माता-पिता" (intended parents) का होता है।

जो महिला बच्चा अपने गर्भ में पालती है, उसे सरोगेट माँ कहते हैं।

ये विकल्प आमतौर पर तब सामने आता है जब कोई महिला किसी मेडिकल कारण से ख़ुद प्रेग्नेंसी नहीं रख सकती - जैसे गर्भाशय न होना, बार-बार गर्भपात, कोई गंभीर बीमारी जिसमें प्रेग्नेंसी ख़तरनाक हो, या कई बार IVF असफल होना।

यहाँ एक बात साफ़ कर लेना ज़रूरी है, क्योंकि इससे बहुत भ्रम दूर होता है।

आज भारत में जो सरोगेसी होती है, वो लगभग हमेशा "जेस्टेशनल सरोगेसी" होती है - यानी सरोगेट माँ का बच्चे से कोई आनुवंशिक (genetic) रिश्ता नहीं होता। अंडा और शुक्राणु इच्छुक माता-पिता के (या नियमों के तहत एक डोनर के) होते हैं, भ्रूण IVF से बनता है, और उसे सरोगेट माँ के गर्भ में रखा जाता है। वो बच्चे को जन्म देती है, पर जैविक रूप से वो उसकी माँ नहीं होती।

सबसे ज़रूरी हिस्सा - भारत में सरोगेसी का मौजूदा कानून

ये पूरे लेख का सबसे अहम हिस्सा है, क्योंकि यहीं ज़्यादातर पुरानी जानकारी ग़लत हो चुकी है।

भारत में सरोगेसी अब सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 से नियंत्रित होती है, जो 25 जनवरी 2022 से लागू है। साथ में इसके 2024 के संशोधन भी हैं।

इस कानून की सबसे बड़ी बात एक ही वाक्य में है - व्यावसायिक (commercial) सरोगेसी पूरी तरह बंद है, सिर्फ़ परोपकारी (altruistic) सरोगेसी की इजाज़त है।

इसका मतलब समझिए। परोपकारी सरोगेसी में सरोगेट माँ को कोई पैसा, फ़ीस या इनाम नहीं दिया जा सकता - सिर्फ़ प्रेग्नेंसी से जुड़ा मेडिकल ख़र्च और बीमा (insurance) दिया जा सकता है। यानी बच्चा पालने के "बदले" में कोई भुगतान अवैध है।

ये बदलाव क्यों आया? इसका मक़सद उन महिलाओं को शोषण से बचाना था जिन्हें पहले पैसों के लालच में सरोगेसी में धकेला जाता था। भारत एक समय सस्ती व्यावसायिक सरोगेसी का बड़ा केंद्र बन गया था, और उसी की ज़्यादतियों को रोकने के लिए ये कानून आया।

कौन सरोगेसी करवा सकता है - और कौन नहीं

नियम काफ़ी सख़्त हैं, और यही अक्सर लोगों को हैरान करता है। मौजूदा कानून के मुताबिक़ -

इच्छुक माता-पिता के लिए -

  • सिर्फ़ भारतीय विवाहित दंपति, जिनकी शादी को कम से कम पाँच साल हो चुके हों
  • साथ में विधवा या तलाकशुदा महिलाएँ (एक तय उम्र सीमा में) भी पात्र हैं
  • किसी रजिस्टर्ड डॉक्टर से बांझपन या मेडिकल ज़रूरत का प्रमाणपत्र ज़रूरी
  • पति और पत्नी दोनों के लिए उम्र की सीमा तय है
  • दंपति की कोई जीवित संतान न हो (जैविक, गोद ली, या सरोगेसी से) - कुछ अपवादों को छोड़कर, जैसे गंभीर रूप से बीमार या दिव्यांग बच्चा

जो पात्र नहीं हैं -

सरोगेट माँ के लिए -

  • उसे इच्छुक दंपति की करीबी रिश्तेदार होना ज़रूरी है
  • 25 से 35 साल की विवाहित महिला, जिसका ख़ुद का कम से कम एक बच्चा हो
  • वो जीवन में सिर्फ़ एक बार सरोगेट बन सकती है
  • मेडिकल और मानसिक रूप से फ़िट होने का प्रमाणपत्र ज़रूरी

एक अहम बात 2024 के संशोधन से जुड़ी है, जिसे जानना ज़रूरी है - अब कुछ मेडिकल स्थितियों में एक डोनर गैमीट (या तो अंडा या शुक्राणु) इस्तेमाल किया जा सकता है, पर बच्चा कम से कम एक इच्छुक माता-पिता से आनुवंशिक रूप से जुड़ा होना चाहिए। यानी दोनों डोनर के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं है।

ज़रूरी दस्तावेज़ और प्रमाणपत्र

चूँकि ये पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में है, इसमें कुछ ज़रूरी कागज़ात होते हैं -

  • एसेंशियलिटी सर्टिफ़िकेट (Essentiality Certificate) - ज़िला मेडिकल बोर्ड से, जो सरोगेसी की मेडिकल ज़रूरत की पुष्टि करता है
  • एलिजिबिलिटी सर्टिफ़िकेट - इच्छुक माता-पिता और सरोगेट माँ, दोनों के लिए
  • बीमा (Insurance) - सरोगेट माँ के लिए, जो प्रेग्नेंसी के बाद तक की अवधि को कवर करे
  • सरोगेसी क्लिनिक का रजिस्टर्ड होना ज़रूरी

अब वो सवाल जिसके लिए बहुत लोग आए - सरोगेसी का ख़र्च

यहाँ ईमानदारी सबसे ज़रूरी है, क्योंकि यही सबसे ज़्यादा ग़लत समझा जाता है।

पहली और सबसे बड़ी बात - सरोगेट माँ को "देने" वाला कोई पैसा नहीं होता, क्योंकि वो कानूनन मना है। तो अगर कहीं आपको "सरोगेट को इतने लाख मिलते हैं" जैसी बात दिखे, तो समझ लीजिए कि वो या तो पुरानी जानकारी है या अवैध व्यवस्था की।

तो फिर ख़र्च किस बात का होता है? कानूनी परोपकारी सरोगेसी में ख़र्च इन चीज़ों का होता है -

  • IVF और भ्रूण बनाने की पूरी मेडिकल प्रक्रिया
  • सरोगेट माँ की प्रेग्नेंसी के दौरान की सारी मेडिकल देखभाल, जाँचें, डिलीवरी
  • सरोगेट माँ का बीमा
  • कानूनी दस्तावेज़ और प्रक्रिया
  • क्लिनिक की फ़ीस

यहाँ इस लेख में कोई तय रुपये का आँकड़ा जान-बूझकर नहीं दिया जा रहा, और इसकी ठोस वजह है। ये ख़र्च शहर, क्लिनिक, मेडिकल स्थिति और कितने IVF चक्र लगते हैं - इन सब पर बहुत निर्भर करता है, और हर मामले में अलग होता है। किसी वेबसाइट का "फ़िक्स पैकेज" वाला आँकड़ा अक्सर भ्रामक होता है। सही और अपने मामले के हिसाब से अनुमान सिर्फ़ किसी रजिस्टर्ड फर्टिलिटी क्लिनिक से मिल सकता है।

एक चेतावनी - अगर कोई एजेंट या क्लिनिक "पैसे देकर सरोगेट दिलाने" या "गारंटीड सरोगेसी पैकेज" की बात करे, तो सतर्क हो जाइए। ये मौजूदा कानून के ख़िलाफ़ है, और इसमें कानूनी जोखिम आपका भी बन सकता है। हमेशा रजिस्टर्ड क्लिनिक और कानूनी रास्ते से ही आगे बढ़िए।

सरोगेसी की प्रक्रिया - कदम दर कदम

मोटे तौर पर कानूनी सरोगेसी इन चरणों से गुज़रती है -

पहले इच्छुक दंपति की जाँच और काउंसलिंग होती है, ये पक्का करने के लिए कि सरोगेसी सचमुच ज़रूरी है और वो पात्र हैं। फिर ज़रूरी मेडिकल और कानूनी प्रमाणपत्र लिए जाते हैं। इसके बाद सरोगेट माँ (जो करीबी रिश्तेदार होती है) की जाँच और सहमति होती है।

फिर IVF की प्रक्रिया शुरू होती है - इच्छुक माता-पिता के अंडे और शुक्राणु से भ्रूण बनाया जाता है, और उसे सरोगेट माँ के गर्भ में रखा जाता है। इसके बाद की प्रेग्नेंसी सामान्य प्रेग्नेंसी की तरह ही चलती है, बस उसकी देखभाल और निगरानी क्लिनिक के ज़िम्मे होती है।

जन्म के बाद, कानून के मुताबिक़ बच्चा इच्छुक माता-पिता का ही होता है - कानूनन उसे इच्छुक दंपति की जैविक संतान माना जाता है, बशर्ते सारे दस्तावेज़ पूरे हों।

एक ज़रूरी बात - सरोगेसी पहला विकल्प नहीं है

ये समझना अहम है। सरोगेसी बांझपन का पहला इलाज नहीं है, बल्कि तब का रास्ता है जब बाक़ी विकल्प काम न करें या मुमकिन न हों।

ज़्यादातर मामलों में पहले दवाओं, IUI, या IVF जैसे इलाज आज़माए जाते हैं। सरोगेसी तब सामने आती है जब कोई ठोस मेडिकल कारण हो - जैसे गर्भाशय न होना या प्रेग्नेंसी का जानलेवा जोखिम। कानून भी इसे "मेडिकल ज़रूरत" के तौर पर ही देखता है, एक विकल्प के तौर पर नहीं।

इसलिए अगर आप संतान के लिए रास्ते तलाश रही हैं, तो सही शुरुआत एक फर्टिलिटी विशेषज्ञ से पूरी जाँच है - जो बताएगा कि आपके मामले में सबसे पहले क्या ठीक रहेगा।

सरोगेसी से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या भारत में सरोगेसी कानूनी है?

क्या सरोगेट माँ को पैसे मिलते हैं?

क्या कोई भी महिला सरोगेट बन सकती है?

क्या अकेले लोग या विदेशी नागरिक भारत में सरोगेसी करवा सकते हैं?

क्या सरोगेट माँ बच्चे की असली माँ होती है?

सरोगेसी का ख़र्च कितना आता है?

क्या सरोगेसी में डोनर के अंडे या शुक्राणु इस्तेमाल हो सकते हैं?

© 2026 Indira IVF Hospital Limited. All Rights Reserved. T&C Apply | Privacy Policy| *Disclaimer