आपको संतान के लिए कोशिश करते हुए पहले महीने बीते और फिर साल भी बीत गए लेकिन फिर भी प्रेगनेंसी नहीं हुयी। अबकी बार डॉक्टर ने पुरुष की जाँच यानी सीमेन एनालिसिस करवाया जिसमे testosterone लेवल कम पाया गया। अब सवाल आता है कि यह Testosterone kya hota hai? और फर्टिलिटी में इसका रोल क्या होता है। पहली बात समझें कि टेस्टोस्टेरोन स्पर्म बनाने के लिए ज़िम्मेदार होता है। अगर टेस्टोस्टेरोन कम है तो स्पर्म काउंट और क्वालिटी दोनों पर असर पड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि कम टेस्टोस्टेरोन का इलाज संभव है, लेकिन अगर आप पिता बनना चाहते हैं तो इलाज का तरीका बहुत सोच-समझकर चुनना होगा क्योंकि कुछ इलाज होते हैं जो टेस्टोस्टेरोन तो बढ़ाते हैं, लेकिन स्पर्म काउंट को और कम कर सकते हैं। इस आर्टिकल के माध्यम से आप समझेंगे कि टेस्टोस्टेरोन क्या होता है, कम टेस्टोस्टेरोन के क्या लक्षण हैं, और कौन सा इलाज करवा कर आप संतान पाने का सपना जल्दी ही पूरा कर सजाते हैं
टेस्टोस्टेरोन पुरुषों का मुख्य सेक्स हॉर्मोन है जो टेस्टिस यानी अंडकोष में बनता है। यह हॉर्मोन पुरुषों के शरीर में कई ज़रूरी काम करता है।
स्पर्म प्रोडक्शन: टेस्टोस्टेरोन स्पर्म बनने की प्रक्रिया के लिए ज़रूरी हॉर्मोन है। बिना पर्याप्त टेस्टोस्टेरोन के स्पर्म सही तरीके से नहीं बनते।
सेक्स ड्राइव: टेस्टोस्टेरोन यौन इच्छा यानी लिबिडो को कंट्रोल करता है। अगर टेस्टोस्टेरोन का लेवल कम है तो सेक्स की इच्छा भी कम होगी।
इरेक्शन: टेस्टोस्टेरोन इरेक्शन को बनाये रखने में भी भूमिका निभाता है।
मांसपेशियाँ और हड्डियाँ: मसल मास (muscle mass) और बोन डेंसिटी (bone density) बनाए रखने में टेस्टोस्टेरोन मदद करता है।
ऊर्जा और मूड: एनर्जी लेवल और मानसिक स्थिति भी टेस्टोस्टेरोन से प्रभावित होती है।
पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का सामान्य लेवल 270 से 1070 ng/dL होता है। 300 ng/dL से कम होने पर इसे लो टेस्टोस्टेरोन या हाइपोगोनाडिज़्म (Hypogonadism) कहा जाता है।
स्पर्म बनने के लिए टेस्टिस के अंदर टेस्टोस्टेरोन का लेवल खून में मौजूद टेस्टोस्टेरोन से 50 से 100 गुना ज़्यादा होना चाहिए। यानी भले ही ब्लड टेस्ट में टेस्टोस्टेरोन थोड़ा कम दिखे, टेस्टिस के अंदर पर्याप्त हो सकता है।
लेकिन अगर टेस्टोस्टेरोन बहुत कम है तो स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित होता है। कम टेस्टोस्टेरोन से स्पर्म काउंट कम हो सकता है, स्पर्म की गतिशीलता यानी मोटिलिटी कम हो सकती है, और स्पर्म की आकृति यानी मॉर्फोलॉजी भी प्रभावित हो सकती है।
टेस्टोस्टेरोन कम होने के कई कारण हो सकते हैं। कुछ कारण जीवनशैली से जुड़े हैं जिन्हें बदला जा सकता है, और कुछ मेडिकल कंडीशन हैं जिनका इलाज ज़रूरी है।
मोटापा: अधिक वज़न होने से शरीर में एस्ट्रोजन बढ़ता है जो टेस्टोस्टेरोन को कम करता है। स्टडीज़ के अनुसार मोटापे से ग्रस्त पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन लेवल 30% तक कम हो सकता है।
तनाव: लगातार तनाव से कोर्टिसोल हॉर्मोन बढ़ता है जो टेस्टोस्टेरोन के उत्पादन को रोकता है।
नींद की कमी: टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन नींद के दौरान सबसे ज़्यादा होता है। 5 घंटे से कम नींद लेने पर टेस्टोस्टेरोन 15% तक गिर सकता है।
शराब: ज़्यादा शराब पीने से टेस्टिस की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और टेस्टोस्टेरोन घटता है।
धूम्रपान और नशीले पदार्थ: सिगरेट, गाँजा और अन्य नशीले पदार्थ टेस्टोस्टेरोन लेवल को कम करते हैं।
व्यायाम की कमी: बैठे रहने वाली यानी सेडेंटरी लाइफस्टाइल से टेस्टोस्टेरोन घटता है।
बढ़ती उम्र: 30 साल के बाद टेस्टोस्टेरोन हर साल लगभग 1% कम होता जाता है। यह सामान्य है, लेकिन कुछ पुरुषों में यह गिरावट तेज़ होती है।
टेस्टिस में चोट या इंफेक्शन: टेस्टिस को कोई नुकसान होने पर टेस्टोस्टेरोन उत्पादन प्रभावित होता है।
वैरिकोसील: टेस्टिस की नसों में सूजन से तापमान बढ़ता है जो टेस्टोस्टेरोन और स्पर्म दोनों को प्रभावित करता है।
थायराइड की समस्या: थायराइड असंतुलन हॉर्मोनल बैलेंस को बिगाड़ता है।
डायबिटीज़: टाइप 2 डायबिटीज़ और कम टेस्टोस्टेरोन का गहरा संबंध है।
कुछ दवाइयाँ: ओपिओइड पेनकिलर, स्टेरॉयड और कुछ अन्य दवाइयाँ भी टेस्टोस्टेरोन को कम कर सकती हैं।
कम टेस्टोस्टेरोन के लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं, इसलिए कई पुरुष इन्हें पहचान नहीं पाते। कम टेस्टोस्टेरोन को पहचानने के लिए नीचे दिए गए लक्षणों पर ध्यान दें।
सेक्स से जुड़े लक्षण: सेक्स की इच्छा में कमी, इरेक्शन में दिक्कत खासकर सुबह इरेक्शन न होना, और सेक्स में संतुष्टि कम होना।
शारीरिक लक्षण: थकान जो आराम करने से भी न जाए, मांसपेशियों का कमज़ोर होना, पेट के आसपास चर्बी बढ़ना, और दाढ़ी-मूँछ का कम होना।
मानसिक लक्षण: चिड़चिड़ापन, उदासी, एकाग्रता में कमी, और आत्मविश्वास घटना।
खान-पान का टेस्टोस्टेरोन पर सीधा असर पड़ता है। कुछ पोषक तत्व टेस्टोस्टेरोन उत्पादन के लिए ज़रूरी हैं।
ज़िंक टेस्टोस्टेरोन बनने के लिए सबसे ज़रूरी मिनरल है। ज़िंक की कमी से टेस्टोस्टेरोन तेज़ी से गिरता है।
कद्दू के बीज, मूँगफली, काजू, चने, राजमा, मटन, अंडे, दही
विटामिन D की कमी कम टेस्टोस्टेरोन से जुड़ी है। भारत में धूप होने के बावजूद ज्यादातर लोगों में विटामिन D की कमी पाई जाती है। खाने के अलावा रोज़ाना 15-20 मिनट, खासकर सुबह 10-11 बजे के बीच, कम कपड़े पहनकर धूप में रहें।
अंडे की जर्दी, फैटी फिश (सैल्मन, टूना, रोहू, कतला), मशरूम, फोर्टिफाइड दूध
मैग्नीशियम टेस्टोस्टेरोन के साथ पॉज़िटिव तरीके से जुड़ा है। जो पुरुष पर्याप्त मैग्नीशियम लेते हैं, उनमें टेस्टोस्टेरोन लेवल बेहतर होता है।
पालक, केला, बादाम, डार्क चॉकलेट, साबुत अनाज, अंजीर
प्रोटीन टेस्टोस्टेरोन उत्पादन और मसल बिल्डिंग दोनों के लिए ज़रूरी है।
क्या खाएं: पूरे अंडे जर्दी समेत, चिकन, मछली, पनीर, दालें, सोयाबीन
टेस्टोस्टेरोन कोलेस्ट्रॉल से बनता है, इसलिए हेल्दी फैट ज़रूरी है।
अखरोट, बादाम, जैतून का तेल, देसी घी (संतुलित मात्रा में), एवोकाडो
लहसुन और प्याज: इनमें मौजूद एलिसिन कोर्टिसोल कम करता है जिससे टेस्टोस्टेरोन बढ़ता है।
अनार: अनार का जूस कोर्टिसोल कम करता है और टेस्टोस्टेरोन बढ़ाता है।
शहद: इसमें बोरॉन होता है जो टेस्टोस्टेरोन उत्पादन में मदद करता है।
अश्वगंधा: यह आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी टेस्टोस्टेरोन और स्पर्म क्वालिटी दोनों सुधारती है।
कुछ खाने की चीज़ें टेस्टोस्टेरोन को कम करती हैं। इनसे बचें या कम खायें।
प्रोसेस्ड और तला हुआ खाना: चिप्स, पैकेज्ड स्नैक्स, फास्ट फूड में ट्रांस फैट होता है जो टेस्टोस्टेरोन घटाता है।
ज़्यादा चीनी: मीठा खाने से इंसुलिन बढ़ता है जो टेस्टोस्टेरोन को कम करता है। कोल्ड ड्रिंक्स, मिठाइयाँ, और पैकेज्ड जूस से बचें।
शराब: शराब टेस्टिस को सीधे नुकसान पहुँचाती है। लगातार शराब पीने से टेस्टोस्टेरोन में भारी गिरावट आती है।
सोया प्रोडक्ट्स: सोया में फाइटोएस्ट्रोजन होते हैं जो बहुत ज़्यादा मात्रा में लेने पर टेस्टोस्टेरोन प्रभावित कर सकते हैं। संतुलित मात्रा में सोया ठीक है।
प्लास्टिक में रखा खाना: प्लास्टिक से BPA निकलता है जो हॉर्मोन से छेड़खानी करता है। गर्म खाना प्लास्टिक में न रखें।
कम टेस्टोस्टेरोन लेवल को लाइफस्टाइल में बदलाव करके सही किया जा सकता है।
वज़न कम करें: 5 से 10% वज़न कम करने से टेस्टोस्टेरोन में सुधार आ सकता है।
व्यायाम करें: वेट ट्रेनिंग यानी डंबल, बारबेल जैसी एक्सरसाइज़ टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने में सबसे प्रभावी है। हफ्ते में 3-4 बार 30 से 45 मिनट वेट एक्सरसाइज जरूर करें।
नींद पूरी लें: 7-8 घंटे की नींद टेस्टोस्टेरोन लेवल को सही करने के लिए बहुत ज़रूरी है।
तनाव कम करें: योग, मेडिटेशन, या कोई भी एक्टिविटी करें जो तनाव कम करती है।
TRT यानी टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी खून में टेस्टोस्टेरोन तो बढ़ाती है, लेकिन स्पर्म प्रोडक्शन को बंद कर सकती है। जब बाहर से टेस्टोस्टेरोन दिया जाता है, तो दिमाग़ को लगता है कि शरीर में पर्याप्त टेस्टोस्टेरोन है। इसलिए वह टेस्टिस को सिग्नल भेजना बंद कर देता है। नतीजा यह होता है कि टेस्टिस काम करना बंद कर देते हैं और स्पर्म बनना रुक जाता है।
अगर आप अगले 1-2 साल में पिता बनना चाहते हैं, तो TRT न लें। डॉक्टर को बताएं कि आप संतान चाहते हैं, ताकि वे सही इलाज चुनें। अगर गलती से TRT ले ली है, तो बंद करने के 3 से 6 महीने बाद स्पर्म वापस आ सकते हैं।
कई बार लाइफस्टाइल बदलने और दवाइयों के बाद भी टेस्टोस्टेरोन या स्पर्म काउंट में पर्याप्त सुधार नहीं होता। ऐसे में एडवांस फर्टिलिटी ट्रीटमेंट मदद कर सकते हैं।
IUI (इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन): अगर स्पर्म काउंट थोड़ा कम है लेकिन मोटिलिटी ठीक है, तो IUI से स्पर्म को सीधे गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) में डाला जाता है।
ICSI के साथ IVF: अगर स्पर्म काउंट बहुत कम है या मोटिलिटी खराब है, तो ICSI सबसे प्रभावी विकल्प है। इसमें एक स्वस्थ स्पर्म की आवश्यकता होती है जिसे सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है।
TESA/PESA: अगर सीमन में स्पर्म नहीं है यानी एज़ूस्पर्मिया की कंडीशन है, तो टेस्टिस से सीधे स्पर्म निकाला जा सकता है और ICSI में इस्तेमाल किया जा सकता है।
अगर आप पिता बनने की कोशिश कर रहे हैं और टेस्टोस्टेरोन कम है, तो सबसे पहले लाइफस्टाइल में बदलाव करें, वज़न कम करें, सही खाएं, व्यायाम करें। Testosterone kya hota hai जानना ही जरुरी नहीं है, डॉक्टर को साफ़ बताएं कि आप संतान चाहते हैं ताकि वे TRT की जगह सही दवाइयाँ दें।
अगर इलाज के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं हो रही, तो 6 महीने से ज़्यादा इंतज़ार न करें और फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें। IVF और ICSI जैसे तरीकों से बहुत कम स्पर्म काउंट वाले पुरुष भी पिता बन रहे हैं। याद रहे कोई भी दवाई या बाज़ार में मिलने वाले सप्लीमेंट बिना डॉक्टर की सलाह के न खायें।
सुबह 8-10 बजे के बीच खाली पेट।क्योंकि इस समय टेस्टोस्टेरोन लेवल सबसे सही मिलता है।
ज़रूरी नहीं। कम टेस्टोस्टेरोन से स्पर्म प्रभावित हो सकता है, लेकिन इलाज से सुधार संभव है। IVF/ICSI से बहुत कम स्पर्म में भी पिता बनना संभव है।
लाइफस्टाइल बदलने से 2-3 महीने में फ़र्क दिखने लगता है। दवाइयों से 4-6 सप्ताह में सुधार आ सकता है।
ज़िंक, विटामिन D, और अश्वगंधा जैसे सप्लीमेंट्स मदद कर सकते हैं अगर इनकी कमी है।
हाँ, 30 के बाद हर साल लगभग 1% कम होता है।
हाँ, TRT बंद करने के 3-6 महीने बाद स्पर्म प्रोडक्शन आमतौर पर वापस आ जाता है। लेकिन कुछ मामलों में ज़्यादा समय लग सकता है।