Main navigation
Reviewed by Dr. Ashima Gupta
Gynaecologist & IVF Specialist
10+ years of experience
Expert Verified
How is this page expert verified?
This information has been reviewed and approved by an experienced fertility specialist at Indira IVF to provide accurate and up-to-date guidance for our readers.
जब प्रेगनेंसी की प्लानिंग शुरू होती है, तो सबसे पहला सवाल जो पुरुषों के मन में आता है वो है कि स्पर्म काउंट कितना होना चाहिए।
WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन के अनुसार नॉर्मल स्पर्म काउंट कम से कम 15 मिलियन प्रति मिलीलीटर (ml) सीमेन में होना चाहिए। इससे कम होने पर इसे लो स्पर्म काउंट यानी ऑलिगोस्पर्मिया (oligospermia) कहा जाता है। लेकिन सिर्फ़ स्पर्म काउंट देखना काफ़ी नहीं है। स्पर्म की मोटिलिटी (motility), मॉर्फोलॉजी (morphology), और सीमेन वॉल्यूम भी उतने ही जरूरी हैं।
इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि नॉर्मल और लो स्पर्म काउंट में क्या फर्क है, स्पर्म टेस्ट कैसे होता है, रिपोर्ट कैसे पढ़ें, और अगर काउंट कम है तो क्या किया जा सकता है।
स्पर्म काउंट का मतलब है एक मिलीलीटर सीमेन यानी वीर्य में कितने स्पर्म मौजूद हैं। यह संख्या सीमेन एनालिसिस (semen analysis) टेस्ट से पता चलती है।
स्पर्म वेसेल्स हैं जो पुरुष के टेस्टिकल्स (testicles) में बनते हैं। प्रेगनेंसी के लिए सिर्फ एक स्पर्म की जरूरत होती है जो अंडे यानी ओवम (Ovum) तक पहुँचे और उसे फर्टिलाइज़ करे। लेकिन यह सफ़र इतना आसान नहीं है। लाखों स्पर्म में से बहुत कम ही अंडे तक पहुँच पाते हैं, इसीलिए स्पर्म काउंट का हेल्दी होना जरूरी है।
एक बात समझना ज़रूरी है कि स्पर्म काउंट और स्पर्म क्वालिटी दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। स्पर्म काउंट बताता है कि स्पर्म कितने हैं, जबकि क्वालिटी बताती है कि वे कितने अच्छे से चल सकते हैं यानी उनकी मोटिलिटी और उनकी शेप यानी मॉर्फोलॉजी कैसी है। स्पर्म काउंट अधिक पर भी अगर मोटिलिटी कम है तो प्रेगनेंसी में दिक्कत आ सकती है।
WHO की लेटेस्ट गाइडलाइंस के मुताबिक सामान्य स्पर्म काउंट कम से कम 15 मिलियन प्रति ml होना चाहिए। वहीं, एक पूरे इजैकुलेट (ejaculate) में कुल स्पर्म काउंट 39 मिलियन या उससे ज़्यादा होना नॉर्मल माना जाता है।
|
स्पर्म काउंट |
रिजल्ट |
|
15 मिलियन/ml से ऊपर |
नॉर्मल रेंज |
|
10 से 15 मिलियन/ml |
माइल्ड लो (mild oligospermia) |
|
5 से 10 मिलियन/ml |
मॉडरेट लो (moderate oligospermia) |
|
5 मिलियन/ml से कम |
सीवियर लो (severe oligospermia) |
|
0 यानी स्पर्म बिल्कुल नहीं है |
एज़ूस्पर्मिया (azoospermia) |
|
सीमेन वॉल्यूम |
1.5 ml या उससे ज़्यादा |
|
मोटिलिटी |
कम से कम 40% स्पर्म गतिशील (चलने वाले) हों |
|
प्रोग्रेसिव मोटिलिटी |
32% या ज़्यादा |
|
मॉर्फोलॉजी |
कम से कम 4% स्पर्म की शेप नॉर्मल हो |
इसलिए जब आप पूछें कि स्पर्म काउंट कितना होना चाहिए, तो सिर्फ़ नंबर नहीं,बल्कि पूरी रिपोर्ट देखना जरूरी है।
जब स्पर्म काउंट 15 मिलियन/ml से कम हो, तो इसे लो स्पर्म काउंट या ऑलिगोस्पर्मिया कहते हैं। लेकिन हर लो काउंट एक जैसा नहीं होता।
केवल एक सीमेन रिपोर्ट से कोई राय न बनाएं क्योंकि स्पर्म काउंट रोज़ बदलता रहता है। बुखार, स्ट्रेस, नींद की कमी, या कुछ दवाइयों से भी स्पर्म काउंट अस्थायी रूप से कम हो सकता है। इसीलिए डॉक्टर कम से कम 2 से 3 हफ्ते के गैप पर दोबारा टेस्ट करवाते हैं।
स्पर्म काउंट कितना होना चाहिए, यह जानने के बाद अगला सवाल आता है कि काउंट कम क्यों होता है। इसके कई कारण हो सकते हैं।
टेस्टोस्टेरोन (testosterone) कम होना, FSH या LH का इम्बैलेंस, प्रोलैक्टिन (prolactin) का बढ़ना, या थायरॉइड (thyroid) की दिक्कत स्पर्म प्रोडक्शन को सीधे प्रभावित करती है। ब्रेन से टेस्टिकल्स तक जो हॉर्मोनल सिग्नल जाता है, अगर उसमें कहीं रुकावट हो, तो स्पर्म बनना कम हो जाता है।
यह टेस्टिकल की नसों में सूजन है। करीब 40% इनफर्टाइल यानी निःसंतान पुरुषों में वैरिकोसील पाया जाता है। इसकी वजह से टेस्टिकल का टेंपरेचर बढ़ जाता है, जिससे स्पर्म प्रोडक्शन घट जाता है।
STI यानी सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन (sexually transmitted infection), एपिडिडाइमिस (epididymis) से इंफेक्शन, या प्रोस्टेट इंफेक्शन स्पर्म को नुकसान पहुंचा सकते हैं या रास्ते में ब्लॉकेज बना सकते हैं।
स्मोकिंग की वजह से स्पर्म का DNA डैमेज हो जाता है, इसके अलावा स्मोकिंग स्पर्म काउंट को 23% तक कम कर सकती है। ज़्यादा शराब पीने से भी टेस्टोस्टेरोन का लेवल गिर जाता है।
BMI 30 से ऊपर होने पर एस्ट्रोजन (estrogen) बढ़ता है जो टेस्टोस्टेरोन को कम कर देता है। इससे स्पर्म काउंट और मोटिलिटी दोनों पर असर पड़ता है।
लंबे समय तक स्ट्रेस रहने से कॉर्टिसोल (cortisol) बढ़ जाता है जो टेस्टोस्टेरोन को प्रभावित करता है।
बॉडीबिल्डिंग के लिए स्टेरॉइड्स, कुछ एंटीडिप्रेसेंट्स, और ब्लड प्रेशर की कुछ दवाइयां स्पर्म प्रोडक्शन को प्रभावित कर सकती हैं।
अनडिसेंडेड टेस्टिकल (undescended testicle) की हिस्ट्री, कीमोथेरेपी, रेडिएशन, या जेनेटिक कंडीशन जैसे क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter syndrome) भी स्पर्म काउंट कम होने के कारण हो सकते हैं।
कुछ रोजमर्रा की आदतें जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता, स्पर्म हेल्थ को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकती हैं।
स्पर्म काउंट कितना होना चाहिए, यह जानने का एकमात्र तरीका सीमेन एनालिसिस (semen analysis) है। यह एक सिंपल टेस्ट है जिसमें 10 से 15 मिनट लगते हैं।
टेस्ट से पहले 2 से 5 दिन तक इजैकुलेशन (ejaculation) से बचना होता है। बहुत कम या बहुत ज़्यादा गैप दोनों सीमेन एनालिसिस के रिज़ल्ट को प्रभावित कर सकते हैं। सीमेन का सैंपल लैब में एक प्राइवेट रूम में मास्टरबेशन से कलेक्ट किया जाता है। सैंपल को 30 मिनट के अंदर लैब में देना जरूरी है ताकि रिज़ल्ट सटीक आएं।
कुछ बातों का ध्यान रखें जैसे, टेस्ट से 24 घंटे पहले शराब न पिएँ, बुखार या कोई बीमारी हो तो टेस्ट आगे के लिए टाल दें, और डॉक्टर को बताएं कि कोई दवाई चल रही है या नहीं।
रिज़ल्ट आमतौर पर 1 से 2 दिन में आ जाता है। अगर पहली रिपोर्ट में कोई दिक्कत दिखे, तो डॉक्टर कन्फर्म करने के लिए 2 से 3 हफ्तों बाद दोबारा टेस्ट करवाते हैं।
सीमेन एनालिसिस रिपोर्ट में सिर्फ स्पर्म काउंट नहीं, बल्कि कई पैरामीटर चेक किए जाते हैं।
स्पर्म काउंट (Sperm Count): प्रति ml में कितने स्पर्म हैं, अगर नॉर्मल तो वह नंबर 15 मिलियन/ml या इससे ज़्यादा होता है।
सीमेन वॉल्यूम (Semen Volume): एक बार के इजैकुलेट में कुल सीमेन कितना निकला। नॉर्मल वॉल्यूम 1.5 ml या इससे ज़्यादा होती है। कम वॉल्यूम ब्लॉकेज, रेट्रोग्रेड इजैकुलेशन, या सेमिनल वेसिकल (seminal vesicle) की समस्या का लक्षण हो सकता है।
मोटिलिटी (Motility): कितने प्रतिशत स्पर्म चलते हुए पाए गए। नॉर्मल टोटल मोटिलिटी 42% या उससे ज़्यादा और प्रोग्रेसिव मोटिलिटी यानी आगे की तरफ तैरने वाले स्पर्म 30% या उससे ज़्यादा होने चाहिए। कम मोटिलिटी को एस्थेनोज़ूस्पर्मिया (Asthenozoospermia) कहते हैं।
मॉर्फोलॉजी (Morphology): स्पर्म की बनावट यानी शेप कैसी है। क्रूगर स्ट्रिक्ट क्राइटेरिया (Kruger Strict Criteria) के अनुसार नॉर्मल मॉर्फोलॉजी में कम से कम 4% स्पर्म सही आकार और संरचना वाले होने चाहिए। अगर स्पर्म की शेप सामान्य नहीं है, तो उन्हें एग तक पहुँचने और उसे फर्टिलाइज़ करने में दिक्कत हो सकती है।
pH लेवल: नॉर्मल: 7.2 से 8.0। बहुत कम या ज़्यादा pH इंफेक्शन या ग्लैंड की दिक्कत बता सकता है।
लिक्विफ़ेक्शन टाइम: सीमेन निकलने के बाद सामान्यतः 20 से 30 मिनट के अंदर पतला हो जाना चाहिए। अगर सीमेन लंबे समय तक गाढ़ा बना रहे, तो स्पर्म की मूवमेंट प्रभावित हो सकती है और उन्हें आगे बढ़ने में दिक्कत हो सकती है।
रिपोर्ट में अगर कोई भी पैरामीटर नॉर्मल से कम हो, तो इसका यह मतलब नहीं है कि व्यक्ति निःसंतान है। डॉक्टर पूरी रिपोर्ट मिलाकर देखते हैं और फिर आगे के टेस्ट या ट्रीटमेंट की सलाह देते हैं।
नेचुरल प्रेगनेंसी के लिए करोड़ों स्पर्म इजैकुलेट होते हैं, लेकिन एग तक सिर्फ़ कुछ सौ ही पहुँच पाते हैं। बाकी रास्ते में ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिए अगर शुरुआत में ही काउंट कम है, तो एग तक पहुँचने वाले स्पर्म की संख्या और भी कम हो जाती है।
माइल्ड ऑलिगोस्पर्मिया (10 से 15 मिलियन/ml) में नेचुरल प्रेगनेंसी संभव है, ख़ासकर अगर मोटिलिटी अच्छी हो और पार्टनर की फर्टिलिटी नॉर्मल हो। मॉडरेट और सीवियर लो काउंट में मदद की ज़रूरत पड़ सकती है।
पुरुष फ़ैक्टर करीब 30 से 50% इनफर्टिलिटी के मामलों में एक कारण होता है। कई बार दोनों पार्टनर में कुछ न कुछ समस्या होती है। इसीलिए दोनों की जाँच एक साथ होनी चाहिए।
अगर स्पर्म काउंट कम है, तो लाइफस्टाइल बदलाव से लेकर मेडिकल ट्रीटमेंट तक कई तरीके हैं।
लाइफस्टाइल बदलाव: रोज़ 30 से 45 मिनट मॉडरेट एक्सरसाइज करें। वॉक, जॉगिंग, स्विमिंग अच्छे ऑप्शन हैं। लेकिन बहुत ज़्यादा इंटेंस वर्कआउट टेस्टोस्टेरोन को अस्थायी रूप से कम कर सकता है, इसलिए बैलेंस रखें। वज़न को नियंत्रित रखें क्योंकि मोटापा सीधे हॉर्मोन असंतुलन पैदा करता है।
स्मोकिंग और शराब छोड़ें: स्मोकिंग छोड़ने के 3 महीने बाद स्पर्म क्वालिटी में सुधार दिखने लगता है। शराब कम करें या बिल्कुल बंद करें।
नींद पूरी लें: रोज़ 7 से 8 घंटे की नींद टेस्टोस्टेरोन प्रोडक्शन के लिए जरूरी है।
स्ट्रेस कम करें: योग, मेडिटेशन, या कोई भी रिलैक्सेशन टेक्निक अपनाएँ। स्ट्रेस कम होने से हॉर्मोनल बैलेंस बेहतर होता है।
गर्मी से बचें: लैपटॉप गोद में न रखें, टाइट अंडरवियर न पहनें, और लंबे समय तक गर्म पानी में नहाने से बचें।
मेडिकल ट्रीटमेंट: अगर हॉर्मोनल इम्बैलेंस है, तो दवाइयों से सुधार हो सकता है। वैरिकोसील हो तो सर्जरी से 60 से 70% मामलों में सीमेन पैरामीटर बेहतर होते हैं। इंफेक्शन हो तो एंटीबायोटिक्स से इलाज होता है।
स्पर्म बनने में करीब 74 दिन लगते हैं, इसलिए किसी भी बदलाव का असर 3 से 6 महीने में दिखता है। धीरज रखना जरूरी है।
डाइट का स्पर्म हेल्थ पर सीधा असर पड़ता है। कुछ न्यूट्रिएंट्स ख़ास तौर पर जरूरी हैं।
ज़िंक (Zinc): जिंक स्पर्म प्रोडक्शन के लिए सबसे जरूरी मिनरल होता है, इसके लिए पंपकिन सीड्स, दालें, चने, अंडे, और अगर नॉन-वेज खाते हैं तो चिकन और मटन अच्छे सोर्स हैं।
सेलेनियम (Selenium): यह स्पर्म मोटिलिटी बढ़ाने में मदद करता है। इसके लिए ब्राज़ील नट्स, सनफ्लावर सीड्स, ब्राउन राइस, और मशरूम को भोजन में शामिल करें।
विटामिन C: यह एक पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट है जो स्पर्म को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाता है। विटामिन C संतरा, आँवला, अमरूद, शिमला मिर्च में भरपूर होता है।
विटामिन D: यह टेस्टोस्टेरोन लेवल को सही बनाए रखने में मदद करता है। इसके लिए धूप का एक्सपोज़र सबसे आसान सोर्स है। इसके अलावा अंडे की जर्दी और फ़ोर्टिफ़ाइड दूध को भोजन में शामिल करें। डॉक्टर की सलाह से विटामिन D का कोर्स भी कर सकते हैं।
ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड्स: इससे स्पर्म मेम्ब्रेन हेल्दी रहती है। अखरोट, अलसी (flaxseed), चिया सीड्स, और फ़ैटी फ़िश जैसे सैल्मन, मैकेरल ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड्स के अच्छे सोर्स हैं।
फ़ोलिक एसिड (Folic Acid): यह स्पर्म DNA की क्वालिटी को ठीक बनाए रखने में मदद करता है। इसके लिए हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, दालें, और बीन्स अपने खाने में शामिल करें।
एंटीऑक्सीडेंट-रिच फूड्स: टमाटर (लाइकोपीन), बेरीज़, डार्क चॉकलेट, और ग्रीन टी स्पर्म को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं।
प्रोसेस्ड फूड, ज़्यादा शुगर, सोया प्रोडक्ट्स (ज़्यादा मात्रा में), और ट्रांस फैट से बचना चाहिए क्योंकि ये स्पर्म हेल्थ को नुकसान पहुँचाते हैं।
स्पर्म काउंट कितना होना चाहिए यह जानना पहला कदम है, लेकिन कुछ स्थितियों में डॉक्टर से मिलना जरूरी है।
शर्मिंदगी महसूस करने की कोई बात नहीं। सीमेन एनालिसिस एक रूटीन टेस्ट है, जिससे बहुत कम समय में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिल जाती है।
जब स्पर्म काउंट बहुत कम हो या दूसरे ट्रीटमेंट से फायदा न हो, तो IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन या ICSI यानी इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन का ऑप्शन भी उपलब्ध होता है।
IVF में एग और स्पर्म को लैब में मिलाया जाता है और बने हुए एम्ब्रियो (embryo) को यूट्रस यानी गर्भाशय (uterus) में ट्रांसफर किया जाता है। IVF तब काम करता है जब स्पर्म काउंट कम हो लेकिन कुछ हेल्दी स्पर्म मौजूद हों।
ICSI IVF से एक कदम आगे है। इसमें एक सिंगल स्पर्म को सीधे एग के अंदर इंजेक्ट किया जाता है। यह सीवियर ऑलिगोस्पर्मिया, कम मोटिलिटी, या खराब मॉर्फोलॉजी में सबसे कारगर ऑप्शन है।
अगर सीमेन में बिल्कुल स्पर्म न हो (एज़ूस्पर्मिया), तो TESE (टेस्टिकुलर स्पर्म एक्सट्रैक्शन) से सीधे टेस्टिकल्स से स्पर्म निकालकर ICSI किया जा सकता है।
कौन सा ट्रीटमेंट सही है, यह स्पर्म रिपोर्ट, पार्टनर की फर्टिलिटी, उम्र, और कितने समय से कोशिश चल रही है, इन सब बातों पर निर्भर करता है। फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट आपकी पूरी रिपोर्ट देखकर सबसे सही रास्ता बताते हैं।
स्पर्म काउंट कितना होना चाहिए, इसका सीधा जवाब है कि WHO के मुताबिक कम से कम 15 मिलियन प्रति ml। लेकिन सिर्फ़ काउंट नहीं, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी, और सीमेन वॉल्यूम भी मायने रखते हैं। अगर रिपोर्ट में कोई पैरामीटर कम या असामान्य आता है, तो पहले कन्फर्म करने के लिए दोबारा टेस्ट करवाएँ। लाइफस्टाइल बदलाव, संतुलित आहार, और ज़रूरत पड़ने पर मेडिकल ट्रीटमेंट से बहुत से केसेज़में सुधार होता है। और अगर काउंट बहुत कम हो, तो IVF और ICSI जैसे एडवांस्ड ऑप्शन मौजूद हैं। सबसे पहला कदम है सीमेन एनालिसिस करवाना और एक अच्छे फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से सलाह लेना।
WHO के मुताबिक नॉर्मल स्पर्म काउंट कम से कम 15 मिलियन प्रति ml सीमेन में होना चाहिए। कुल इजैकुलेट में 39 मिलियन या ज़्यादा स्पर्म नॉर्मल माने जाते हैं।
|
पैरामीटर |
नॉर्मल वैल्यू |
|
Count |
15 million/ml+ |
|
Motility |
40%+ |
|
Morphology |
4%+ |
|
Volume |
1.5 ml+ |
15 मिलियन/ml से कम स्पर्म काउंट को लो स्पर्म काउंट या ऑलिगोस्पर्मिया कहते हैं। इसमें भी माइल्ड, मॉडरेट, और सीवियर ग्रेड होते हैं।
हाँ, ख़ासकर माइल्ड लो काउंट में नेचुरल प्रेगनेंसी संभव है। लेकिन काउंट जितना कम हो, चांस उतने कम हो जाते हैं। मॉडरेट और सीवियर केसों में मेडिकल मदद जरुरी हो सकती है।
सीमेन एनालिसिस टेस्ट में सीमेन का सैंपल लैब में दिया जाता है। टेस्ट से पहले 2 से 5 दिन का एब्सटीनेंस (abstinence) जरूरी है। रिज़ल्ट 1 से 2 दिन में आ जाता है।
काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी, वॉल्यूम, pH, और लिक्विफ़ेक्शन टाइम मुख्य पैरामीटर्स हैं। डॉक्टर सब मिलाकर देखते हैं, सिर्फ़ एक नंबर से फ़ैसला नहीं होता।
हॉर्मोनल इम्बैलेंस, वैरिकोसील, इंफेक्शन, स्मोकिंग, शराब, मोटापा, स्ट्रेस, और कुछ दवाइयाँ कॉमन कारण हैं। कभी-कभी जेनेटिक कारण भी होते हैं।
हाँ, लंबे समय का स्ट्रेस कॉर्टिसोल बढ़ाता है जो टेस्टोस्टेरोन को प्रभावित करता है। इससे स्पर्म काउंट और मोटिलिटी दोनों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
मोटिलिटी का मतलब है स्पर्म की चलने की क्षमता। नॉर्मल मोटिलिटी 40% या ज़्यादा होनी चाहिए। कम मोटिलिटी होने पर स्पर्म अंडे तक नहीं पहुँच पाता।
हाँ, स्मोकिंग स्पर्म DNA को डैमेज करती है, काउंट 23% तक कम कर सकती है, और मोटिलिटी पर भी बुरा असर डालती है। स्मोकिंग छोड़ने के 3 महीने बाद सुधार दिखने लगता है।
ज़िंक (पंपकिन सीड्स, दालें), सेलेनियम (ब्राज़ील नट्स), विटामिन C (संतरा, आंवला), ओमेगा-3 (अखरोट, अलसी), और एंटीऑक्सीडेंट-रिच फूड्स (टमाटर, बेरीज़) खाने चाहिए।
स्पर्म बनने में करीब 74 दिन लगते हैं। इसलिए लाइफस्टाइल बदलाव या ट्रीटमेंट का असर 3 से 6 महीने में दिखता है।
हाँ, मॉडरेट एक्सरसाइज़ (वॉक, जॉगिंग, स्विमिंग) टेस्टोस्टेरोन बढ़ाती है और स्पर्म क्वालिटी सुधारती है। लेकिन बहुत ज़्यादा इंटेंस वर्कआउट उल्टा असर कर सकता है।
एक साल कोशिश के बाद प्रेगनेंसी न हो, सीमेन रिपोर्ट एब्नॉर्मल हो, सेक्शुअल फंक्शन में दिक्कत हो, या कोई मेडिकल हिस्ट्री हो तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें।
हाँ, IVF और ख़ासकर ICSI लो स्पर्म काउंट में बहुत कारगर है। ICSI में सिर्फ़ एक स्पर्म की ज़रूरत होती है जो सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है।
ICSI (इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन) में एक हेल्दी स्पर्म चुनकर सीधे अंडे के अंदर इंजेक्ट किया जाता है। यह सीवियर मेल इनफर्टिलिटी में सबसे एडवांस और कारगर टेक्नीक है।
हाँ, ज़्यादा शराब टेस्टोस्टेरोन गिराती है, स्पर्म काउंट कम करती है, और मोटिलिटी खराब करती है। हफ़्ते में 14 से ज़्यादा ड्रिंक्स फर्टिलिटी पर गंभीर असर डाल सकती हैं।
विटामिन C, विटामिन D, फ़ोलिक एसिड, ज़िंक, सेलेनियम, और ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड्स स्पर्म हेल्थ के लिए सबसे जरूरी हैं। ये स्पर्म प्रोडक्शन, मोटिलिटी, और DNA क्वालिटी सुधारने में मदद करते हैं।
हाँ, 40 के बाद स्पर्म काउंट, मोटिलिटी, और DNA क्वालिटी धीरे-धीरे कम होती है। लेकिन पुरुष बढ़ती उम्र में भी पिता बन सकते हैं, बस चांस कम हो जाते हैं।
बिल्कुल। स्मोकिंग, शराब, मोटापा, स्ट्रेस, नींद की कमी, और खराब डाइट सब मिलकर स्पर्म हेल्थ को नुकसान पहुँचाते हैं। अच्छी बात यह है कि ये सब रिवर्सिबल फैक्टर हैं।