आईवीएफ प्रक्रियाके अंतर्गत अंडाणु और शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचित कर भ्रूण तैयार कर पुनः महिला के गर्भ में उसे प्रत्यारोपित किया जाता है। यह प्रक्रिया उनके लिए है जो प्राकृतिक तौर पर गर्भधारण करने में असमर्थ हैं। यह एक जटिल प्रक्रिया है। अतः भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद सही देखभाल, विटामिन युक्त आहार और डॉक्टर द्वारा दी गई सलाह के अनुसार अपनी दिनचर्या रखते हुए भ्रूण के विकास में सहयोग करना चाहिए।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद कुछ सावधानियों का बरतना अति आवश्यक है जिससे भ्रूण के विकास में कोई बाधा न हो।
इस प्रक्रिया के अंदर निश्चित किए गए अंडे को प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है। अंडाणु और शुक्राणु के निषेचन के बाद भ्रूण तैयार किया जाता है जिसे महिला के गर्भाशय में स्थांतरित किया जाता है। इसके लिये डॉक्टर एक पतली ट्यूब जिसे कैथेटर कहते हैं, की मदद से भ्रूण को गर्भाशय में छोड़ते हैं। जब भ्रूण गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाता है तो इस प्रक्रिया के बाद महिला गर्भवती हो जाती है।
आईवीएफ (IVF)प्रक्रिया में भ्रूण प्रत्यारोपण की भूमिका आइवीएफ प्रक्रिया में भ्रूण प्रत्यारोपण की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके बिना गर्भधारण संभव नहीं हो सकता। जो महिला प्राकृतिक तौर पर गर्भधारण नहीं कर सकती उसके लिए यह विधि वरदान साबित होती है। भ्रूण प्रत्यारोपण के द्वारा ही गर्भावस्था को प्राप्त किया जाता है।
आइए भ्रूण प्रत्यारोपण की संपूर्ण प्रक्रिया को समझते हैं।
इनविट्रो फर्टिलाइजेशन अर्थात आईवीएफ की प्रक्रिया के अंतर्गत भ्रूण प्रत्यारोपण के लिए सबसे पहले महिला के अंडाशय (ovaries) से अंडे को निकाला जाता है साथ ही पुरुष के शुक्राणु को भी उसके वीर्य से निकाला जाता है। 24 घंटे के भीतर अंडाणु और शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचित किया जाता है। निषेचन की प्रक्रिया के लगभग तीन दिनों बाद कोशिका विभाजन होता है। 4 से पांचवें दिन कोशिकाएं गोलाकार रूप में परिवर्तित हो जाती हैं और 5 से 6 दिन बाद ब्लास्टोसिस्ट का निर्माण होता है भ्रूण निर्माण की आरंभिक अवस्था है। जो लगभग 7 से 10 दिन मैं गर्भाशय की दीवार से चिपक जाती है और वहां स्थिर हो जाती है, इस प्रकार भ्रूण प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी होती है।
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समयांतर |
प्रत्यारोपण के चरण |
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D- 1 |
निषेचन या फर्टिलाइजेशन |
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D-3 |
कोशिका विभाजन (Cleavage Stage) |
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D-4-5 |
मोरुला - कोशिकाओं का गोलाकार रूप में परिवर्तन (Morula) |
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D- 5- 6 |
ब्लास्टोसिस्ट |
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D- 7- 10 |
प्रत्यारोपण अर्थात इंप्लांटेशन |
प्रयोगशाला में अंडे और शुक्राणु के निषेचन के बाद जब भ्रूण तैयार हो जाता है तो इसे डॉक्टर एक पतली ट्यूब या कैथेटर की मदद से भ्रूण को गर्भाशय में इस प्रकार से स्थानांतरित करते हैं की वह महिला के गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाये ताकि महिला गर्भवती हो सके इस प्रक्रिया में महिला को बेहोश करने की आवश्यकता नहीं होती और डॉक्टर अल्ट्रा साउंड की मदद से कैथेटर को गर्भाशय तक ले जाते हैं ओर उसकी सहायता से भ्रूण को गर्भाशय के भीतर छोड़ दिया जाता है।
यह प्रक्रिया दो प्रकार से होती है कुछ मामलों में फ्रेश भ्रूण प्रत्यारोपण किया जाता है जिसमें अंडाणु निकालने के तीन या 5 दिन बाद भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है।
यह प्रक्रिया दो प्रकार से की जाती है। कुछ मामलों में फ्रेश भ्रूण प्रत्यारोपण (Fresh Embryo Transfer) किया जाता है, जिसमें अंडाशय से अंडे निकालने और प्रयोगशाला में निषेचन के लगभग 3 से 5 दिन बाद उसी चक्र में तैयार भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
लेकिन कई बार फ्रोजेन भ्रूण प्रत्यारोपण (Frozen Embryo Transfer - FET) की आवश्यकता पड़ती है। इसमें निषेचन के बाद तैयार किए गए भ्रूण को विशेष तकनीक (vitrification) द्वारा फ्रीज करके सुरक्षित रख लिया जाता है और बाद में किसी उपयुक्त चक्र में, जब गर्भाशय की परत (endometrium) प्रत्यारोपण के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है, तब उस फ्रोजेन भ्रूण को पिघलाकर (thaw करके) गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि अंडों की फ्रीजिंग (Egg Freezing) और भ्रूण की फ्रीजिंग अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। यदि कोई महिला कम उम्र में अपने अंडे फ्रीज करवाती है ताकि भविष्य में मां बन सके, तो उन फ्रोजेन अंडों को सीधे गर्भाशय में स्थानांतरित नहीं किया जाता। पहले उन अंडों को पिघलाया जाता है, फिर शुक्राणु के साथ निषेचित करके भ्रूण तैयार किया जाता है, और उसके बाद ही उस भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है ताकि महिला गर्भधारण कर सके।
भ्रूण प्रत्यारोपण एक जटिल प्रक्रिया है जो कई चरणों से होकर यह गुजरती हैं। शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से यह महिला को प्रभावित करती है। आईवीएफ (IVF ) के जरिए भ्रूण प्रत्यारोपण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप इस प्रक्रिया के बाद डॉक्टर द्वारा बताई गई सावधानियां किस प्रकार बरतती है।
भ्रूण के विकास और उसके सुरक्षित स्थापन के लिए निम्नलिखित सावधानियों का बरतना अति आवश्यक है-
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भी आईवीएफ (IVF) द्वारा भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद शराब और धूम्रपान का सेवन न करने की सलाह दी जाती है। इससे महिला और उसके भ्रूण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
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करें |
ना करें |
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समय पर डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयां ले |
भाग दौड़ ना करें |
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हल्के फुल्के काम करें |
भारी वजन ना उठाएं |
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शारीरिक गतिविधि बनाए रखें |
हमेशा बिस्तर पर ना रहें |
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अच्छी नींद ले |
तनाव न पालें |
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद सुपाच्य और पौष्टिक आहार ले जो पोषक तत्वों से भरा हो। अपने आहार में प्रोटीन युक्त खाद्य सामग्री, ताजा रसदार फल , हरी सब्जियां एवं हल्की वसा वाले खाद्य तत्वों को शामिल करें। साथ ही फोलिक एसिड, कैल्शियमयुक्त आहार लें। ओमेगा 3 फैटी एसिड की भूमिका प्रजनन संबंधी हार्मोन को तथा गर्भाशय में रक्त के प्रभाव को संतुलित करने में बहुत ही महत्वपूर्ण होती है अतः ओमेगा युक्त खाद्य पदार्थ का सेवन करें जैसे -वॉलनट्स,चिया सीड्स, सालमन, एवोकाडो इत्यादि।
जलीय पदार्थों के सेवन से रक्त प्रवाह संतुलित रहता है साथ ही गर्भाशय में भ्रूण के सफल प्रत्यारोपण में भी मदद मिलती है। लगभग 8 से 10 गिलास पानी पीना चाहिए। इसलिए नारियल पानी, पानी, ताजे फलों का रस जैसे अन्य तरल पदार्थों इत्यादि को समय-समय पर लेते रहें ताकि शरीर में पानी की कमी ना हो। शरीर के साथ-साथ गर्भाशय में भी नमी बनी रहे।
अपने आहार में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे पनीर अंडे, दालें, सोयाबीन, चिकन, टोफू इत्यादि शामिल करें। यह भ्रूण के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। फोलिक एसिड से भरपूर खाद्य पदार्थ या दवा गर्भाशय की परत को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
कुछ खाद्य पदार्थ गर्भाशय एवं भ्रूण को नुकसान पहुंचा सकते हैं, उसके विकास में बाधक हो सकते हैं । ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से बचने से भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद हार्मोन संतुलन बनाए रखने और पाचन को दुरुस्त रखने में मदद मिलती है। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ या प्रोसेस्ड फूड या कच्चे भोजन से बचना चाहिए क्योंकि इनमें बैक्टीरिया या परजीवी मौजूद होते हैं जिससे संक्रमण का खतरा बना रहता है और संक्रमण के कारण गर्भपात की संभावना बन जाती है।
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खाएं/पीएं |
ना खाएं/पीएं |
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प्रोटीन, फोलिक एसिड, कैल्शियम ,ओमेगा युक्त |
तलीभुनी चीजें, |
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अंडे, चिकन, सोयाबीन, टोफू ,पनीर, हरी सब्जियां |
अधपका या कच्चा भोजन, |
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पानी, नारियल पानी, फलों का रस |
शराब, सिगरेट, कैफीन युक्त पेय |
आईवीएफ भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद कुछ सामान्य लक्षणों का होना आम बात है। हालांकि यह महिला की शारीरिक बनावट सहनशक्ति पर भी निर्भर करता है लेकिन आमतौर पर थकान, बार-बार पेशाब लगना, हल्का रक्तस्राव या स्पॉटिंग , स्तन में सूजन या लाल हो जाना, पेट में हल्की सूजन यानी स्राव बढ़ जाना और पेट दर्द या असहजता जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद कई प्रकार के शारीरिक और भावात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं। आईवीएफ के द्वारा भ्रूण प्रत्यारोपण होने के लगभग दो सप्ताह के बाद ही प्रेगनेंसी टेस्ट किया जाता है ऐसे में रोगी अत्यंत तनाव, घबराहट और बेचैनी महसूस करते हैं। आईवीएफ द्वारा भ्रूण प्रत्यारोपण की प्रक्रिया में अंडाशय में अंडे विकसित होने से लेकर भ्रूण प्रत्यारोपण की प्रक्रिया तक अनेक प्रकार के हार्मोन युक्त दवाइयों और इंजेक्शन का सेवन किया जाता है जैसे FSH, LH, HCG, एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टरॉन।
एस्ट्रोजेन के स्तर के बढ़ने से महिलाओं में कई शारीरिक और मानसिक बदलाव के लक्षण दिखाई देते हैं। एस्ट्रोजेन के चलते सर्वाइकल म्यूकस का अधिक निर्माण होता है जो पेट में सूजन और स्तनों में कोमलता पैदा करती है।
प्रोजेस्टरॉन हार्मोन की भूमिका भी आईवीएफ उपचार (IVF treatment) द्वारा भ्रूण प्रत्यारोपण में महत्वपूर्ण होती है। वह एक स्वस्थ अंडे के गर्भाशय से प्राप्त करने और प्रत्यारोपित करने में सहायक होता है। लेकिन इस हार्मोन के स्तर के बढ़ने से महिलाओं के शरीर में कई लक्षण दिखाई देते हैं जैसे सूजन, थकान, मनोदशा में बदलाव, स्तन में सूजन और कोमलता आदि। कई बार हल्की ऐंठन या क्रैंप महसूस होती है जिसके कारण यह भ्रम पैदा हो जाती है कि कहीं यह मासिक धर्म के लक्षण तो नहीं।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद पेट के निचले हिस्से में हल्का दर्द महसूस होता है। यह हार्मोन परिवर्तन या गर्भाशय की सतह में खिंचाव के कारण भी हो सकता है हालांकि यह क्षणिक होता है इसलिए इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता ऐसा होना सामान्य लक्षण है।
स्पॉटिंग या हल्का रक्त स्राव- भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद हल्का रक्तस्राव या स्पॉटिंग सामान्य लक्षण है और इसे इस प्रक्रिया की सफलता के रूप में देखा जाता है भ्रूण जब गर्भाशय की दीवार से जुड़ता है तो ऐसा होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। भ्रूण स्थानांतरण के लगभग 6 से 12 दिनों तक ऐसा हो सकता है। खून का रंग हल्का भूरा या गुलाबी होता है।
प्रोजेस्टरॉन हार्मोन के बढ़ते हुए स्तर के कारण थकान और चिड़चिड़ापन भी महसूस होता है। इसका कारण शारीरिक और हार्मोनल दोनों ही बदलाव है।
यदि आपको भ्रूण प्रत्यारोपण (embryo transfer) के बाद अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा हो या खून के थक्के (clots) आ रहे हों, पेट के निचले हिस्से में बहुत तेज, असहसहनीय पीड़ा हो रही हो, सांस लेने में कठिनाई के साथ सीने में दर्द हो या ओवेरियन हाइपर स्टीमुलस सिंड्रोम (OHSS) के संकेत मिल रहे हों, ऐसे में डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए।
यदि आपको 100°F (37.8°C) से अधिक बुखार हो और अचानक तेजी से वजन बढ़ रहा हो तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें क्योंकि यह प्रजनन अंगों मे संक्रमण का संकेत हो सकता है।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद कुछ देर का आराम जरूरी होता है ताकि रोगी अपने आप को सहज महसूस कर सके लेकिन इसका कोई चिकित्सकीय कारण नहीं है।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद कुछ देर आराम करने की सलाह दी जाती है इसके कुछ महत्वपूर्ण कारण होते हैं
हालांकि ऐसा नहीं है की पूर्ण आराम या बेड रेस्ट से भ्रूण प्रत्यारोपण की स्थिति में सुधार या गिरावट आती है। बल्कि हल्की फुल्की शारीरिक गतिविधियां भ्रूण के विकास और रोगी के लिए पूर्णतः सुरक्षित है।
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मिथक |
सच |
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भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद बेड रेस्ट जरूरी होता है। |
नहीं, बेड रेस्ट जरूरी नहीं है। कुछ देर का आराम पर्याप्त है। |
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बेड रेस्ट से प्रत्यारोपण सफल माना जाता है। |
जी नहीं, बेड रेस्ट से इसकी सफलता का कोईलेना देना नहीं है। |
भ्रूण के सफल प्रत्यारोपण के बाद महिला यह जानने के लिए इच्छुक रहती है कि उसने सफलता पूर्वक गर्भधारण कर लिया है जिसके लिए वह प्रेगनेंसी टेस्ट करना चाहती है। आमतौर पर 11 से 14 दिनों के बाद प्रेगनेंसी टेस्ट करने की सलाह दी जाती है। इस प्रक्रिया के बाद दो सप्ताह का इंतजार या Two week wait जरूरी होता है क्योंकि इस दौरान भ्रूण गर्भाशय की दीवार से चिपककर स्थिर हो जाता है जिससे रक्त में HCG हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाता है जिससे प्रेगनेंसी टेस्ट के सकारात्मक आने की संभावना अधिक रहती है। बीटा एचसीजी टेस्ट (beta HCG test) द्वारा गर्भावस्था की स्थिति को जाना जाता है। भ्रूण प्रत्यारोपण के 11 से 14 दिनों के बीच एचसीजी हार्मोन का स्तर शरीर में बढ़ने से जांच की सही रिपोर्ट आने की संभावना भी बढ़ जाती है। हालांकि हर रोगी के लिए एक जैसे परिणाम की आशा नहीं की जा सकती है।
बीटा एचसीजी (beta HCG test) एक प्रकार का ब्लड टेस्ट है जिसे भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद प्रेगनेंसी की पुष्टि के लिए किया जाता है यह सबसे सही और शीघ्र परिणाम देने वाला टेस्ट माना जाता है।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद टेस्ट करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए अन्यथा रिपोर्ट गलत आ सकता है और इसके कारण आप अकारण तनाव और निराशा का शिकार होंगी। भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद शरीर में एचसीजी हार्मोन जिसे ह्यूमन कोरीयोनिक गोनेडोटरोपिन (human choreonic gonadotropin) कहते हैं, का स्तर कम रहता है जिसके कारण रिपोर्ट गलत आती है कई बार रिपोर्ट नेगेटिव आ सकती है भले ही आप गर्भवती हों। कई बार प्रत्यारोपण के समय दी गई दवाइयों के असर के कारण भी गलत रिपोर्ट आ सकती है।
भ्रूण प्रत्यारोपण सफल होने के बाद शरीर कई प्रकार के संकेत देता है हालांकि यह संकेत हर महिला में एक समान नहीं होता। कुछ महिलाओं में संकेत न के बराबर होते हैं। आमतौर पर जो संकेत देखे जाते हैं वह निम्नलिखित हैं -
इस बात का दावा नहीं किया जा सकता कि हर किसी में एक समान संकेत ही दिखाई देंगे।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद मानसिक तनाव होना एक आम बात है। हार्मोन के स्तर का घटना और बढ़ना इसके पीछे एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आईवीएफ के दौरान कई प्रकार की दवाइयां दि जाती हैं ,साथ ही यह महिला के गर्भावस्था से जुड़ी समस्या का निदान होती है जिसके चलते महिला के भीतर बहुत ही भावात्मक उथल-पुथल होने लगता है जिसे कम करना बहुत ही जरूरी होता है ताकि भ्रूण का विकास निर्बाध रूप से हो सके। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। रोगी को अच्छी नींद और आराम की बहुत जरूरत होती है उसे किसी भी प्रकार का शारीरिक और मानसिक तनाव नहीं पालना चाहिए हल्के-फुल्के व्यायाम करके अपने नींद को संतुलित करें । परिवार को भी चाहिए की हर प्रकार से उसका सहयोग करें ऐसी कोई बात ना करें ऐसा वातावरण घर में ना बनाएं जिससे उसे किसी भी प्रकार का तनाव हो। घर का वातावरण बिल्कुल खुशनुमा बनाए रखें क्योंकि आपके मां बनने का सपना पूरा होने जा रहा है।
नहीं। रिसर्च के अनुसार, हल्की एक्टिविटीज़ ब्लड सर्कुलेशन को नार्मल रखती हैं। जब तक डॉक्टर न कहे तब तक कम्पलीट बेड रेस्ट से लाभ की पुष्टि नहीं हुई है।
पहले 5–7 दिनों तक लंबी यात्रा से बचना चाहिए। छोटी दूरी की यात्रा की जा सकती है, बशर्ते डॉक्टर ने अनुमति दी हो।
आमतौर पर भ्रूण ट्रांसफर के 14 दिन बाद बीटा hCG ब्लड टेस्ट कराया जाता है। यही गर्भधारण की पुष्टि करता है।
आमतौर पर अंडाणु निषेचन के 3 या 5 दिन बाद भ्रूण ट्रांसफर किया जाता है, जो भ्रूण की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
नियमित दवा सेवन, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव नियंत्रण IVF की सफलता दर बढ़ाते हैं।
सामान्यतः 12–14 दिनों के बाद बीटा hCG स्तर बढ़ने लगता है और टेस्ट पॉजिटिव आता है।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद आराम करें , अपने आहार का ध्यान रखें और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयां को समय पर लें।
जी नहीं, कुछ देर आराम करने की सलाह दी जाती है लेकिन बेड रेस्ट जरूरी नहीं है।
इस प्रक्रिया के बाद हल्का रक्त स्राव या स्पॉटिंग, हल्का चक्कर आना , पेट दर्द, आदि सभी सामान्य लक्षण है लेकिन हर महिला में सभी लक्षण नहीं देखे जाते।
हल्की ब्लीडिंग होना या स्पॉटिंग होना भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद सामान्य लक्षण है इसमें डरने की कोई बात नहीं है।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद पौष्टिक और सुपाच्य भोजन लेने चाहिए जो विटामिन युक्त हो।
जी हां, आप हल्की यात्रा कर सकते हैं, कम दूरी की, जो आरामदायक हो।
हां , सीढ़ियां चढ़ने में कोई खतरा नहीं है।
प्रेगनेंसी टेस्ट 11 से 14 दिनों के बाद, लगभग दो सप्ताह के इंतजार के पश्चात करना चाहिए इससे रिपोर्ट के सही-सही आने की संभावना अधिक होती है।
बीटा एचसीजी beta HCG टेस्ट एक प्रकार का ब्लड टेस्ट है जिससे सुनिश्चित किया जाता है की एंब्रियो ट्रांसफर के बाद महिला गर्भवती है या नहीं।
हां, हल्का दर्द होना सामान्य बात है।
एक से दो दिनों का आराम पर्याप्त है।
जी हां, आप आईवीएफ (IVF) के बाद ऑफिस जा सकते हैं।
जी हां आईवीएफ के बाद स्ट्रेस लेना आईवीएफ की सफलता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए डॉक्टर द्वारा तनाव मुक्त रहने की सलाह दी जाती है।
हालांकि हर महिला में एक समान संकेत नहीं देखे जाते हैं लेकिन सामान्यतः हल्का रक्त स्राव या स्पॉटिंग, पेट दर्द, स्तनों में सूजन या लाल हो जाना और थकान महसूस होना यह भ्रूण प्रत्यारोपण की सफलता के संकेत है।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद भारी चीज नहीं उठानी चाहिए, लंबी दूरी की असहज यात्रा नहीं करनी चाहिए, तनाव पालने से बचना चाहिए साथ ही कैफीन युक्त चीजों के भी सेवन से भी बचना चाहिए।
यदि पेट में बहुत अधिक दर्द महसूस हो रहा हो, रक्तस्राव अत्यधिक मात्रा में हो रहा हो,खून के थक्के आ रहे हों , बहुत ज्यादा चक्कर आ रहा हो, घबराहट महसूस हो रही हो तो ऐसे में डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए।
जी हां, एंब्रियो ट्रांसप्लांट के बाद व्यायाम करना सुरक्षित है लेकिन इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि व्यायाम हल्का हो जिससे आपको अच्छी नींद आए।
पहली बार में आईवीएफ की सफलता इस बात पर निर्भर करती है की गर्भाशय की संरचना और क्षमता किस प्रकार है कुछ मामलों में यह एक बार में सफल नहीं होता इसके इस प्रक्रिया को कई चरणों में करना पड़ता है। महिला की उम्र और उसके शारीरिक संरचना पर भी निर्भर करता है।
जी हाँ, एंब्रियो ट्रांसफर के बाद सामान्य जीवन जीने में कोई दिक्कत नहीं है। सिर्फ कुछ सावधानियां बरतने की आवश्यकता है और डॉक्टर की सलाह को ध्यान में रखते हुए अपने जीवन शैली निर्धारित करनी है।