गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) मजबूत मसल्स से बना हुआ एक स्ट्रक्चर होता है जो हर महीने बदलता है और प्रेगनेंसी के दौरान पूरी तरह फैलकर भ्रूण को जगह देता है। इसी मसल्स वाली परत को मायोमेट्रियम (myometrium) कहा जाता है। अब इसी मायोमेट्रियम का एक हिस्सा होता है जो पीछे की तरफ़ होता है, जिसे पोस्टीरियर मायोमेट्रियम कहते हैं। यह कोई अलग अंग नहीं है, बल्कि उसी मसल का एक हिस्सा है जो आपकी रीढ़ की हड्ड़ी की तरफ़ होता है। समझने वाली बात यह है कि यह हिस्सा अपने आप में नॉर्मल होता है। फर्क तब पड़ता है जब इस परत में कोई बदलाव होने लगता है, जैसे उसकी मोटाई बढ़ना, बनावट बदलना या उसमें कोई गाँठ बनना। ऐसे बदलाव कभी-कभी लक्षण देते हैं और कभी बिना लक्षण के भी होते हैं।
इस posterior myometrium meaning in hindi आर्टिकल में आप समझेंगे कि मायोमेट्रियम (myometrium) क्या होता है, "पोस्टीरियर" का मतलब क्या है, इस हिस्से में कौन-सी समस्याएँ हो सकती हैं, और फर्टिलिटी पर इसका क्या असर पड़ता है।
आपके यूट्रस की दीवार तीन परतों से बनी होती है। सबसे बाहरी परत को पेरीमेट्रियम (perimetrium) कहते हैं, जो एक पतली सुरक्षा की परत है।
बीच की मोटी परत को मायोमेट्रियम कहते हैं, जो मसल्स से बनी है। यही परत सबसे ज़्यादा काम करती है। प्रेगनेंसी में यह फैलती है ताकि बच्चे को जगह मिल सके, और डिलीवरी के समय यही मसल सिकुड़ती है।
सबसे अंदर की परत को एंडोमेट्रियम (endometrium) कहते हैं, जो हर महीने बनती और टूटती है, और इसी से पीरियड आता है।
मायोमेट्रियम इन तीनों में सबसे मोटी परत है और यूट्रस की ताक़त इसी से आती है। इसी परत की वजह से यूट्रस प्रेगनेंसी के 9 महीनों में कई गुना बड़ा हो पाता है और डिलीवरी के बाद वापस अपने साइज़ में आ जाता है।
यूट्रस की चार दीवारें होती हैं, आगे वाली यानी एंटीरियर (Anterior), पीछे वाली यानी पोस्टीरियर (Posterior), और दो बगल वाली यानी लेटरल(Lateral)।
पोस्टीरियर मायोमेट्रियम का मतलब है यूट्रस की पीछे वाली दीवार की मसल। यह हिस्सा आपकी रीढ़ की हड्डी की तरफ़ होता है। जब अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में लिखा होता है कि "fibroid in posterior myometrium" या "adenomyosis involving posterior wall", तो इसका मतलब है कि समस्या यूट्रस के पीछे वाले हिस्से में है।
दो समस्याएँ सबसे कॉमन होती हैं एक एडिनोमायोसिस और दूसरी फाइब्रॉइड (fibroid)।
इसमें एंडोमेट्रियम की परत मायोमेट्रियम के अंदर घुस जाती है। इससे यूट्रस की दीवार मोटी हो जाती है और पीरियड में बहुत ज़्यादा दर्द और हैवी ब्लीडिंग होती है। यह स्थिति पोस्टीरियर दीवार में ज़्यादा कॉमन है।
मायोमेट्रियम में बनने वाली गाँठों को फाइब्रॉइड्स कहते हैं । यह मसल से ही बनी होती है लेकिन कैंसर नहीं होती । फाइब्रॉइड यूट्रस में कहीं भी बन सकती है, लेकिन पोस्टीरियर दीवार में होने पर इसका असर थोड़ा अलग हो सकता है।
इसके अलावा कभी-कभी रिपोर्ट में "heterogeneous posterior myometrium" लिखा आता है, जिसका मतलब है कि मसल की बनावट एक जैसी नहीं दिख रही। यह एडिनोमायोसिस, छोटे फाइब्रॉइड, या पिछली सर्जरी या डिलीवरी के बाद के बदलाव हो सकते हैं।
सामान्य रूप से एंडोमेट्रियम यूट्रस के अंदर रहती है और हर महीने बनती और टूटती है। लेकिन एडिनोमायोसिस में यह परत मायोमेट्रियम की मसल के अंदर घुस जाती है। वहाँ भी यह पीरियड के दौरान सूज जाती है और खून निकलता है, लेकिन उस खून को बाहर निकलने की जगह नहीं मिलती। इसी वजह से बहुत तेज़ दर्द होता है।
इसके लक्षणों में बहुत भारी पीरियड, पीरियड में तेज़ दर्द, जो साल-दर-साल बढ़ता जाता है, संबंध बनाते समय दर्द, और कभी-कभी पीरियड के बीच में भी स्पॉटिंग आ जाना इत्यादि शामिल हैं।
30 से 40 साल की उम्र की उन महिलाओं जिनकी पहले डिलीवरी या सर्जरी हो चुकी है, यह ज़्यादा कॉमन है।
एडिनोमायोसिस को देखने के लिए TVS (ट्रांसवेजाइनल) अल्ट्रासाउंड किया जाता है।
एक बात समझना ज़रूरी है कि एडिनोमायोसिस कोई ट्यूमर या कैंसर नहीं है। यह एंडोमेट्रियम की सेल्स का ग़लत जगह पर बढ़ना है। इसका ट्रीटमेंट संभव है और बहुत-सी महिलाएँ एडिनोमायोसिस के बावजूद सफलतापूर्वक प्रेगनेंट होती हैं।
फाइब्रॉइड अगर पोस्टीरियर मायोमेट्रियम में है, तो इसका असर इस पर निर्भर करता है कि वो कितनी बड़ी है और कहाँ बनी है।
अगर फाइब्रॉइड मायोमेट्रियम के बाहरी हिस्से, सबसेरोसल में है, तो यह फर्टिलिटी पर ज़्यादा असर नहीं डालती। लेकिन अगर यह अंदर की तरफ़ बढ़ रही है और एंडोमेट्रियम को दबा रही है, जिसे सबम्यूकोसल कहते हैं, तो इम्प्लांटेशन (implantation) में दिक़्क़त हो सकती है।
पोस्टीरियर दीवार में बड़ी फाइब्रॉइड होने पर कभी-कभी कमर दर्द, कब्ज़, और हैवी पीरियड की शिकायत हो सकती है।
3 सेंटीमीटर से छोटी फाइब्रॉइड जो एंडोमेट्रियम से दूर है, वो जनरली कोई दिक़्क़त नहीं करती। बड़ी फाइब्रॉइड या एंडोमेट्रियम के पास वाली फाइब्रॉइड में डॉक्टर ट्रीटमेंट की सलाह दे सकते हैं।
पोस्टीरियर दीवार की फाइब्रॉइड की एक ख़ास बात यह है कि कभी-कभी इसकी वजह से पीठ दर्द हो सकता है क्योंकि यह रीढ़ की तरफ़ दबाव डालती है।
अगर फाइब्रॉइड बहुत बड़ी हो और आसपास के अंगों पर दबाव डाल रही हो तो वह कुछ महिलाओं को यूरिन या बाउल मूवमेंट में भी दिक़्क़त कर सकती है । ये लक्षण ज़्यादातर बड़ी फाइब्रॉइड यानी 5 सेंटीमीटर से ज़्यादा, में दिखते हैं।
अगर पोस्टीरियर मायोमेट्रियम नॉर्मल है, तो फर्टिलिटी पर कोई असर नहीं पड़ता। यह यूट्रस का एक सामान्य हिस्सा है। लेकिन अगर यहाँ एडिनोमायोसिस या बड़ी फाइब्रॉइड है, तो कुछ तरीक़ों से फर्टिलिटी प्रभावित हो सकती है।
लेकिन यह भी समझ लें कि बहुत-सी महिलाएँ पोस्टीरियर दीवार में छोटी फाइब्रॉइड या हल्की एडिनोमायोसिस के साथ भी बिना किसी दिक़्क़त के प्रेगनेंट होती हैं और नॉर्मल डिलीवरी करती हैं।
IVF ट्रीटमेंट में डॉक्टर एम्ब्रीओ ट्रांसफ़र (embryo transfer) से पहले यूट्रस की पूरी जाँच करते हैं। अगर पोस्टीरियर मायोमेट्रियम में एडिनोमायोसिस या बड़ी फाइब्रॉइड है, तो डॉक्टर पहले उसका ट्रीटमेंट करते हैं।
एडिनोमायोसिस में IVF से पहले कुछ महीने हॉर्मोनल ट्रीटमेंट, जैसे GnRH एगोनिस्ट दिया जाता है ताकि यूट्रस की कंडीशन अच्छी हो सके। फाइब्रॉइड अगर एंडोमेट्रियम को दबा रही है, तो पहले उसे सर्जरी से निकाल दिया जाता है।
IVF की सफलता में यूट्रस की हैल्थ बहुत मायने रखती है। एंडोमेट्रियम की मोटाई और पैटर्न के साथ-साथ मायोमेट्रियम की कंडीशन भी देखी जाती है।
अगर सब ठीक है, तो IVF के रिज़ल्ट अच्छे आते हैं। अगर एडिनोमायोसिस है, तो कुछ रिसर्च बताती है कि ट्रीटमेंट के बाद IVF की सक्सेस रेट बढ़ जाती है।
अगर पोस्टीरियर मायोमेट्रियम नॉर्मल है, तो किसी ट्रीटमेंट की ज़रूरत नहीं। ट्रीटमेंट तभी ज़रूरी है जब कोई समस्या हो और वो आपकी ज़िंदगी या फर्टिलिटी को प्रभावित कर रही हो।\
अगर आपकी रिपोर्ट में बस "posterior myometrium normal" लिखा है, तो चिंता की कोई बात नहीं। लेकिन साथ में एडिनोमायोसिस, फाइब्रॉइड, या कोई और finding लिखी है, तो अपने डॉक्टर से बात करें और समझें कि आपके लिए आगे क्या करना ज़रूरी है।
सबसे ज़रूरी बात यह है कि रिपोर्ट पढ़कर ख़ुद से कोई नतीजा न निकालें, क्योंकि बहुत-सी findings देखने में गंभीर लगती हैं लेकिन असल में कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं होती।