जब गर्भ में दो शिशु एक साथ विकसित हो रहे होते हैं, तब उसे जुड़वाँ या ट्विन प्रेगनेंसी (twin pregnancy) कहते हैं। कुछ मामलों में यह नैचुरली से होता है लेकिन कुछ में फ़र्टिलिटी ट्रीटमेंट की वजह से जुड़वा गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है। जुड़वा बच्चे होने में आनुवंशिक कारण, उम्र, हार्मोनल बदलाव और गर्भाशय की प्रकृति भी भूमिका निभाते हैं। twins pregnancy in hindi में समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि जुड़वा बच्चे कैसे बनते हैं, किन कारणों से यह संभावना बढ़ती है और किन संकेतों से पता चल सकता है कि गर्भ में दो शिशु पल रहे हैं।
जुड़वा बच्चे दो अलग-अलग तरीकों से बन सकते हैं। पहला तरीका मोनोज़िगोटिक ट्विन (Monozygotic Twins)। इसमें एक ही अंडाणु यानि एग एक ही स्पर्म से फ़र्टिलाइज होता है। गर्भ बन जाने के बाद यह एक फ़र्टिलाइज़्ड एग दो हिस्सों में बंट जाता है। इन दोनों भागों से दो शिशु विकसित होते हैं, और दोनों बिल्कुल एक जैसे दिखाई दे सकते हैं। आँखें, चेहरे का आकार, बालों का रंग इत्यादि सब कुछ लगभग समान रहता है। इन्हें आईडेंटिकल ट्विन (Identical Twins) कहा जाता है।
दूसरी स्थिति में महिला का अंडाशय यानि ओवरी (ovary) एक ही महीने में दो एग्स रिलीज करती है। प्रत्येक अंडाणु हरेक एग अलग-अलग स्पर्म से फ़र्टिलाइज होता है। इस तरह दो शिशु बनते हैं जो एक दूसरे से बिल्कुल अलग भी दिख सकते हैं। इन्हें डिज़िगोटिक ट्विन (Dizygotic Twins) या फ्रैटर्नल ट्विन (Fraternal Twins) कहा जाता है। twins baby kaise hote hai का सरल उत्तर यही है कि या तो एक फ़र्टिलाइज़्ड एग दो भागों में बंट जाता है, या दो अलग एग्स दो अलग स्पर्म से फ़र्टिलाइज़्ड होकर दो शिशु बनाते हैं।
जुड़वाँ संतान कई वजहों से हो सकती हैं। कुछ नैचुरली (प्राकृतिक) होते हैं, जबकि कुछ लाइफस्टाइल और फ़र्टिलिटी ट्रीटमेंट (प्रजनन उपचार) के कारण हो सकते हैं।
यह भी पढ़ें: एम्ब्रीओ ट्रांसफर क्या होता है?
गर्भ के शुरुआती महीनों में ट्विन प्रेगनेंसी के कुछ ऐसे लक्षण (symptoms) दिखाई दे सकते हैं लेकिन यह लक्षण हर महिला में एक जैसे नहीं होते।
ये लक्षण सिर्फ संकेत देते हैं; ट्विन प्रेगनेंसी की पुष्टि यानि कन्फर्मेशन हमेशा अल्ट्रासाउंड से ही होती है।
यह भी पढ़ें: प्रेगनेंसी में क्या खाना चाहिए?
ट्विन प्रेगनेंसी में माँ और उसकी होने वाली संतान दोनों को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है क्योंकि दो भ्रूण होने पर गर्भाशय पर दबाव बढ़ जाता है जिससे कुछ जोखिम बढ़ सकते हैं। इसलिए सावधानी, नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह बेहद महत्वपूर्ण है।
ट्विन प्रेगनेंसी में पर्याप्त आराम और नींद बहुत जरूरी है। तनाव कम करने के लिए प्राणायाम (deep breathing), हल्का योग और परिवार का सपोर्ट जरुरी होता है।
IVF ट्रीटमेंट में जुड़वा गर्भ की संभावना नेचुरल प्रेगनेंसी की तुलना में थोड़ी अधिक होती है। इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि IVF में एम्ब्रीओ ट्रांसफर की संख्या।
यदि IVF में एक से अधिक एम्ब्रीओ ट्रांसफर किए जाते हैं, तो ट्विन प्रेगनेंसी की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, IVF दवाइयों से अंडाशय कई एग्स तैयार कर सकता है, जिससे भी ट्विन प्रेगनेंसी हो सकती है।
जुड़वा बच्चे एक ही एम्ब्रीओ के दो हिस्सों में बँटने या दो अलग-अलग एम्ब्रीओ के बनने से होते हैं। ट्विन प्रेगनेंसी में माँ और दोनों शिशुओं को अतिरिक्त देखभाल, नियमित जांच और संतुलित आहार की जरुरत होती है।